ममता की परीक्षा - 67 राज कुमार कांदु द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
शेयर करे

ममता की परीक्षा - 67



जमनादास बड़ी देर तक आँखें बंद किये उस बेंच की पुश्त से पीठ टिकाए बैठा रहा। बाहर से देख कर कोई उसके अंतर के हलचल को महसूस नहीं कर सकता था। साधना की परछाई ठहाके लगाते हुए अचानक गायब हो गई थी और छोड़ गई थी अपने पीछे कई सवाल। ये वो सवाल थे जो उसके मन में असीम वेदना उत्पन्न कर रहे थे लेकिन उसके पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था।

उस दिन मास्टर साहब अपना क्रोध उसपर प्रकट करने के बाद अचानक उठ कर निकल गए थे। उनके काँपते कदमों को उसने महसूस भी किया था लेकिन फिर भी न जाने क्यों वह उनसे रुकने का आग्रह नहीं कर सका था। बँगले से बाहर निकलकर उनका क्या हुआ ? वह अपने गाँव पहुँचे भी कि नहीं ? तभी उसके अंतर्मन ने जवाब दिया ' अवश्य पहुँचे होंगे। नहीं तो साधना या गाँव का कोई न कोई उनकी खोजखबर लेने अवश्य उसके पास तक आते।'

' लेकिन जो खबर उन्हें मैंने बताया था गोपाल के बारे में उसे सुनकर भी तो उन्हें अवश्य आना चाहिए था। इतनी बड़ी बात को वो लोग कैसे बरदाश्त कर लेते ? कोई नहीं आया उससे गोपाल के बारे में तस्दीक करने। कहीं इसका मतलब ये तो नहीं कि मास्टर साहब ने साधना से सच छिपा लिया हो ? लेकिन कब तक सच छिपाया जा सकता है ? आज इतने साल बित गए हैं। उसने भी तो मास्टर जी और साधना का पता लगाने की कोई कोशिश नहीं की।.. क्यों ? क्या बिती होगी साधना पर जब उसने गोपाल की दूसरी शादी के बारे में जाना होगा ? भले ही मास्टर ने न बताया हो लेकिन उसे कभी न कभी यह बात पता अवश्य चली होगी। उस समय मेरे लिए दबी हुई नफरत की चिंगारी क्रोध की ज्वाला में धधक उठी होगी। उसे उसने कैसे शांत किया होगा ? क्या हुआ होगा उसका बाद में ? '

तभी उसके अंतर्मन में अमर के कमरे में लगी साधना की तस्वीर कौंध गई।..तो अमर साधना का बेटा है। साधना और गोपाल के पवित्र प्रेम की निशानी !

ओह ! कैसी दुविधा में फंसा हुआ है वह ! एक तरफ उसकी मासूम बेटी है जिसका इस पूरे प्रकरण से कोई लेना देना नहीं है। वह मासूम तो यह सब जानती भी न होगी। दूसरी तरफ वह उस अमर के बच्चे की माँ बनने वाली है जिसकी माँ का गुनहगार वह खुद है। अमर ! जो उसे कभी भी प्रभावित नहीं कर पाया, जिसे उसने कभी पसंद नहीं किया। उससे रजनी का पीछा छुड़ाने के लिए क्या क्या नहीं किया ? और अब वह उसके प्रयासों की वजह से ही गायब है। उसका गायब होना ही उचित था उस समय की परिस्थिति के लिहाज से, लेकिन अब ? अब जबकि रजनी उसके बच्चे की माँ बननेवाली है और अमर भी गायब है। ऐसे में क्या होगा ? लोग क्या कहेंगे ? रजनी किसी भी हालत में एबॉर्शन के लिए तैयार नहीं होगी। जिद्दी है बचपन से। अब क्या करे ? साधना ने भी तो इसी परिस्थिति को जीया होगा ? साधना की हालत देखकर उसके पिता पर क्या बिती होगी ? मास्टर ने भी तो उस अवस्था को झेला ही होगा न ? नहीं ! मुझसे ना झेला जाएगा ये बेइज्जती और अपनी फूल सी बच्ची के आँसू।'

तभी उसके दिमाग ने उसे चेताया ' बिना प्रयास किये हार मानना बेवकूफों और कायरों की निशानी है जमना। रजनी से बात करके तो देखो, उसे बुरा भला समझा के तो देखो। क्या पता वह बात समझ ले और मान भी जाय एबॉर्शन के लिए ! आखिर उसके खुद की जिंदगी का सवाल है।'
' शायद तुम ठीक कह रहे हो ! प्रयास करने में क्या हर्ज है ? चलो यह प्रयास भी कर ही लेते हैं।'
★★★★★★★★★★★★★

अस्पताल में अपने बेड पर लेटी हुई रजनी अब खुद को सामान्य महसूस कर रही थी। अपने इर्दगिर्द कई मशीनें और उनमें से कुछ उसके शरीर से सीधे जुड़ी हुई मशीनें देखकर वह काफी हैरान सी लग रही थी। उसे हुआ क्या है ? ये इतनी सारी मशीनें लगी हुई हैं। कुछ देर वह अपने बारे में सोचती रही और फिर सोचने के क्रम में ही उसके विचारों में अमर ने फिर से दस्तक दे दिया।

अमर अपने कमरे पर भी नहीं मिला था। रेलवे स्टेशन पर भी नहीं था वह जबकि दो घंटे पहले तक कोई ट्रेन किसी तरफ गई भी नहीं थी। फिर कहाँ गया होगा अमर ?
जरूर कोई बड़ी बात हुई होगी। उसके पापा ने अवश्य उसे धमकी दी होगी, या फिर कहीं उसे गायब तो नहीं करवा दिया ? लेकिन उसके मकान मालिक ने तो बताया था कि अभी थोड़ी देर पहले ही वह कमरा खाली करके वहाँ से गया था। तो क्या हुआ ? कमरा खाली करने के बाद भी तो उसके साथ कोई घटना हो सकती है ? और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए उसके पापा लगातार उसके साथ बने हुए हैं। पापा का कोई भरोसा नहीं, कुछ भी कर सकते हैं।.. और फिर उन्होंने अमर पर पैसे से भरी बैग लेने का इल्जाम तो लगा ही दिया है। सबूत के नाम पर जो वीडियो दिखा रहे हैं उसमें अमर कहीं भी वह बैग स्वीकार करता नहीं दिख रहा। अचानक फेंकी गई वस्तु लपक लेने से कोई गुनहगार साबित नहीं हो जाता।.. और फिर अमर तो पैसे का लालची हो ही नहीं सकता। पूरी दुनिया चीख चीख कर उस पर यह इल्जाम लगाए लेकिन मुझे अपने अमर पर पूरा भरोसा है। वह पैसे के लिए मुझे कभी धोखा नहीं दे सकता। वह तो मुझसे दूर ही भागता था। पैसे की लालच होती तो वह खुद ही मुझपर डोरे डालता। इतने दिनों के साथ में भी उसने कभी उसके पैसों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। लालची वृत्ति इंसान अधिक देर नहीं छिपा सकता। यदि अमर पैसे का लालची होता तो उसके हावभाव उसके क्रियाकलाप उसके लालच की कभी न कभी चुगली जरूर कर चुके होते, लेकिन ऐसा कभी कुछ भी नजर नहीं आया। जरूर कोई गड़बड़ है, लेकिन क्या ? अमर गायब है यही सच्चाई है फिलहाल तो और जब तक वह मिल नहीं जाता ये सारी बातें मात्र एक कयास ही हैं। क्या करे कहाँ ढूंढें अमर को ?'

भरपूर प्रयास के बाद भी उसका मन किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सका था और दिमाग पर इन्हीं तनावों का बोझ लिए वह फिर एक बार नींद की आगोश में पहुँच गई। शायद उसके जिस्म में पैवस्त हो रही दवाई अपना काम कर रही थी।
यही वो समय था जब सेठ जमनादास ने रजनी के उस विशेष कमरे में प्रवेश किया जहाँ रजनी अपने बेड पर गहरी निद्रा में पहुँच चुकी थी। बेड के नजदीक खड़े होकर कुछ पल सेठ जमनादास ने रजनी के चेहरे की तरफ देखा। निद्रा के आगोश में उसका मासूम सुंदर सा चेहरा कुम्हलाया हुआ सा लग रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उसके चेहरे का रंग किसी ने निचोड़ लिया हो। रंगहीन व तेजहीन कांति मलीन आभा लिए हुए थी। उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए सेठ जमनादास की आँखें छलक आईं। भावावेश में रजनी के सिर पर स्नेहिल हाथ फिराते फिराते सेठ जी कब उसे झिंझोड़ बैठे खुद भी समझ नहीं पाये।

बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलने का प्रयास करती हुई रजनी ने एक नजर सेठ जमनादास की तरफ डाली और फिर उपेक्षा से दूसरी तरफ देखने लगी। सेठ जी तड़प गए रजनी की उपेक्षा को महसूस करके। वह उससे बात करना चाहते थे। अपने बारे में सफाई पेश करना चाहते थे, लेकिन रजनी तो दूसरी तरफ मुँह करके फिर से नींद की आगोश में पहुँच गई थी।

क्रमश: