पिया बसंती रे! - 1 Saroj Prajapati द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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पिया बसंती रे! - 1

भाग-1

छुट्टी का दिन था। खुशी अपने टेरेस गार्डन में पौधों की निराई गुड़ाई में लगी हुई थी। चंपा का पौधा जो उसने सर्दियों से पहले लगाया था। बसंत का मौसम आते ही उसमें व उसके साथ साथ दूसरे पौधों में नई नई कोंपले फूटने लगी थी। पुराने पत्ते झड़ गए थे और उनकी जगह नए चिकने हरे पत्तों ने ले ली थी। खुशी को इन पौधों के साथ समय बिताकर बहुत ही सुकून मिलता था।

बसंत के मौसम ने फूल पत्तों पर एक अलग ही आभा बिखेर दी थी। कल तक जो पौधे उदासी की चादर ओढ़े हुए थे। बसंती मौसम में देखो कैसे खिलकर लहलहा रहे थे। उन सबका रूप सौंदर्य देखते ही बन रहा था।

पौधे क्या! बसंत का मौसम तो हम सभी के जीवन में भी एक नई ऊर्जा लेकर आता है। फिजाओं में एक अलग सी मादकता छा जाती है। प्यार करने वालों के लिए तो इससे हसीं मौसम और कोई नहीं।

इसलिए तो बसंत को ऋतुराज कहा जाता है।

लेकिन क्या कभी मेरे जीवन में बसंत आ पाएगी। किसी का दिल मेरे लिए भी धड़केगा कभी! शायद नहीं! सोच खुशी के चेहरे की खुशी अचानक ही गायब हो गई।

"अरे तू, यहां पर है और मैं तुझे पूरे घर में ढूंढ रहा था!"

"क्यों पापा!" खुशी अपने चेहरे की पीड़ा छुपा, मुस्कुराते हुए बोली।

"अरे भूल गई! कल ही तो बताया था कि आज लड़का व उसके परिवार वाले तुझे देखने आ रहे हैं! चल बेटा तैयार हो जा।"

"पापा, मैं थक चुकी हूं इन सब से। वैसे भी मैंने पिछली बार आपको मना किया था ना कि इसके बाद नही और फिर भी! पापा आप मेरी तकलीफ क्यों नहीं समझते!" खुशी उदास होते हुए बोली।

"बेटा, यह कैसे समझ लिया तूने कि मैं तेरी तकलीफ नहीं समझता! कौन मां-बाप नहीं चाहेंगा उसकी बेटी को एक अच्छा जीवन साथी मिले। उसका एक अपना घर परिवार हो!"

"पापा, यह घर परिवार मेरा नहीं क्या!"

खुशी के इस प्रश्न ने उसके पापा को अंदर तक झिंझोड़ दिया। क्या जवाब दें एक बाप अपनी बेटी के इस सवाल का। कुछ गलत तो नहीं पूछा था उसने। अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए वह बोले

"है मेरी बच्ची! तेरा भी है लेकिन समाज के कुछ रीति रिवाज है। जो हम सब को ना चाहते भी निभाने पडते हैं! बेटा, मेरी दिली इच्छा है कि तुझे अपने हाथों से डोली में बैठाऊं। तेरा घर संसार बसते देखूं! अपने पापा की इच्छा पूरी नहीं करेगी क्या!"

"पापा, मैंने कब मना किया लेकिन झूठ के सहारे नहीं! और सच जानकर कोई मुझे अपनाना नहीं चाहता तो बताओ मैं क्या करूं!" खुशी अपने मन की पीड़ा को छुपाते हुए बोली।

"बेटा, लड़के व उसके परिवार वालों को तेरी तस्वीर बहुत पसंद आई। उन्होंने खुद आगे से रिश्ता भेजा है। बस तू चुप रहना इस बार। मेरा मन कहता है , सब अच्छा होगा!" बताते हुए उनकी आंखें खुशी से चमक रही थी।

"पापा, मेरी चुप्पी से सब कुछ सही हो जाए तो मैं सो बार चुप रहने के लिए तैयार हूं लेकिन सोचिए की जब शादी के बाद उनको पता चलेगा और वह मुझे अपनाने से इंकार कर देंगे तब! तब का सोचा है आपने! पापा आज की तकलीफ उस तकलीफ से कहीं ज्यादा होगी! प्लीज, आप मुझ पर इस बात का दबाव ना डालें।"

खुशी के पापा इस बात को समझते थे कि बेटी सही कह रही है। इसलिए उन्होंने बात को बढ़ाने की बजाय कहा

"ठीक है बेटा, जैसी प्रभु की इच्छा! अच्छा तू नीचे आकर तैयार तो हो ले। वह लोग 12:00 बजे तक आ जाएंगे।"

"बस आप चलिए पापा। यह दो चार पौधे ही बचे हैं। मैं इनकी छंटाई करके आती हूं।"

खुशी ने इतनी देर से अपने अंदर जो दर्द का सैलाब रोक कर रखा था। उसके पापा के जाते ही वो आंसुओं के रूप में बह निकला।

हर बार लोगों द्वारा नकार देने की पीड़ा उस पीड़ा से कहीं बढ़कर लगने लगी थी। उसे जो उसने आठ साल पहले सही थी। इस बात का उसे अच्छे से एहसास हो गया था।

आज भी याद है खुशी को। हां, 10th क्लास में थी वह। जब पहली बार उसे पेट में भयंकर असहनीय दर्द हुआ था।

परिवार वालों ने सोचा गैस का दर्द होगा। जब घरेलू नुस्खों से भी कोई आराम ना पड़ा तो वह उसे डॉक्टर के पास लेकर गए।

डॉक्टर की दवाई से दर्द दब तो गया लेकिन जब तब फिर से उभर जाता। डॉक्टर भी उसे मामूली दर्द समझ दवाइयां देते रहे और मर्ज़ अंदर ही अंदर बढ़ता रहा। जो 2 साल बाद भयानक रूप में सामने आया।

खुशी की 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं थी लेकिन दर्द चरम पर था। हालत यह हो गई थी कि उसका बैठना भी मुश्किल हो गया था। पेन किलर और दवाइयों के सहारे तकलीफ सहते हुए उसने किसी तरह अपनी परीक्षाएं दी।

परीक्षाएं खत्म होते होते, दर्द बर्दाश्त के बाहर हो गया था।

जल्दी से उसके माता पिता उसे हॉस्पिटल लेकर गए।

डॉक्टर्स ने कई एक्स-रे व अल्ट्रासाउंड किए। उसकी रिपोर्ट देख डॉक्टर खुद हैरान थे कि अब तक वह जिंदा कैसी थी। उसके पेट के अंदर एक हिस्से में बहुत ही ज्यादा मवाद भर गई थी।

"लेकिन डॉक्टर कैसे! इसे इससे पहले ना तो कोई बीमारी हुई और ना ही कभी चोट लगी।" उसके मम्मी पापा ने डॉक्टर से कहां।

" यह घाव बहुत पुराना है । हो सकता है, बचपन में कभी ये पेट के बल गिरी हो और आपको पता ना चला हो। उस समय यह घाव छोटा रहा होगा। बढ़ते बढ़ते आज उसने ऐसा रूप ले लिया।"

"डॉक्टर यह सही तो हो जाएगी ना!" उन्होंने दीन नजरों से डॉक्टर की ओर देखते हुए पूछा।

"कुछ नहीं कह सकते! बस आप भगवान से प्रार्थना करें!" सुनते ही खुशी के माता-पिता फूट-फूट कर रोने लगे थे ।

आज भी याद है उसे कैसे डॉक्टर के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए बोले थे "हमारे लिए आप ही भगवान हो। हमारी बच्ची को बचा लेना। बड़ी आस से आपके पास लेकर आए हैं।"

डॉक्टर कुछ नहीं बोले। बस खुशी के पापा के कंधे पर तसल्ली भरा हाथ रख, ऑपरेशन थिएटर की ओर बढ़ गए।

क्रमशः

सरोज ✍️