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अपहरण - भाग ६

मुँह पर बँधी हुई पट्टी खुलते ही मिताली ने कहा, "अम्मा जी मुझे बचा लो वह गुंडे…।"

अम्मा ने कहा, "मिताली बिटिया डरने की कोई बात नहीं है।"  

"आप मुझे कैसे जानती हैं अम्मा।"

"तुम्हें कौन नहीं जानता, इतने बड़े घर की बेटी जो हो"

"…तो आपने मेरा अपहरण करवाया है? आख़िर क्यों? मैंने आपका क्या बिगाड़ा है? अच्छा वही पैसे की भूख, बोलिये कितने पैसे चाहिए आपको?"

" मिताली बिटिया बड़े घर की बेटी हो इसलिए ऐसा ही सोचोगी वैसे भी तुम्हारा अपहरण क्यों हुआ है यह तुम्हें वही बताएंगे जिन्होंने तुम्हारा अपहरण किया है,” इतना कहते हुए अम्मा ने रमेश को आवाज़ लगाई, " रमेश तुम सब अंदर आओ।"

उनके अंदर आते ही मिताली घबरा गई, "कौन हो तुम लोग? क्या चाहते हो? मुझे यहाँ क्यों लाए हो? मेरे साथ क्या करना चाहते हो तुम लोग? देखो मेरे पास आने की कोशिश भी मत करना। यदि मुझे हाथ भी लगाया ना तो मेरा भाई उस हाथ को ही काट डालेगा।"

इतना कह कर वह अम्मा से चिपक गई और रोने लगी। 

तभी रमेश ने कहा, " मिताली जी आप बेफ़िक्र रहिए। हमें कुछ करना होता तो हम आपको यहाँ क्यों लाते?"

"हम आपसे इंसाफ़ मांगने के लिए आपको यहां ले आए हैं।"

"इंसाफ़, कैसा इंसाफ़? मुझे जाने दो।"

"पहले आप मेरी पूरी बात तो सुनिए। पूरे रास्ते में हम में से किसी ने भी आपके साथ क्या कोई बदतमीजी की है? नहीं ना मिताली जी! फिर आप इतना डर क्यों रही हैं? आप रो क्यों रही हैं? आप सबसे पहले शांत हो जाइए। मयंक थरमस में से पानी दे इन्हें।"

"हाँ अभी लाता हूँ।"

मिताली ने पानी पिया और थोड़ी शांत हुई। 

"मिताली बेटा तुम बिल्कुल आराम से बैठो। यहाँ तुम बिल्कुल उसी तरह सुरक्षित हो जिस तरह तुम्हारे भाई रंजन के साथ रहती हो।"

"आप तो हमारे पूरे परिवार को जानती हैं। कौन हैं आप?"

"मैं कौन हूँ वह छोड़ो, पहले इन बच्चों की बात बिना डरे इत्मीनान के साथ सुन लो।"

तब रमेश ने कहा, "मिताली जी आप हमारी बहन जैसी हैं। जिस तरह आप रंजन की बहन हैं, उसी तरह हम सब की भी बहनें हैं। गाँव की मासूम लड़कियाँ हैं जो सब अपने घर से बाहर निकलने में डरती हैं।"

"लेकिन यह आप मुझे क्यों बता रहे हैं?" 

"क्योंकि उन्हें डर किसी और से नहीं, आपके भाई रंजन से है।"

"यह क्या कह रहे हो आप?"

"जी हाँ आपका भाई अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर उनके साथ बदसलूकी करता है। वे सब उन्हें छेड़ते हैं, अश्लील तंज कसते हैं। हमारी बहनें घर से बाहर निकलने में घबराती हैं। हम सभी ने बहुत बर्दाश्त किया लेकिन अब तो रंजन ने मेरी बहन का सुनसान गली में हाथ तक पकड़ लिया। हमें भी तो डर लगता है ना कि हमारी बहनों के साथ किसी दिन… सोच कर भी रूह कांप जाती है।"

चारों दोस्त अपनी-अपनी बहनों के बताए किस्से मिताली को सुना रहे थे। मिताली की आँखों में शर्म थी, आँखों से आँसू टप-टप कर के नीचे गिर रहे थे। इतनी गंदी सोच, इतना गंदा व्यवहार करता है उसका भाई, सोच कर वह मानो धरती में गड़ी जा रही थी। अपने भाई के विषय में यह सब सुनकर उसे रंजन से नफ़रत हो रही थी। वह सोच रही थी कि जो भाई अपनी स्वयं की बहन की रक्षा के लिए अपनी जान लगा देता है, वही भाई दूसरे की बहनों के साथ ऐसा कैसे कर सकता है। वह जानती है कि रंजन उससे कितना प्यार करता है।

 

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)

स्वरचित और मौलिक

क्रमशः

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