उपन्यास चित्रलेखा संक्षिप्त विवरण Dr. Bhairavsinh Raol द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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उपन्यास चित्रलेखा संक्षिप्त विवरण

गीत शिर्षक:" मन रे तू काहे ना धीर
धरे"
मन रे तू काहे ना धीर धरे
वो निर्मोही मोह ना जाने,
जिनका मोह करे
मन रे ...

इस जीवन की चढ़ती ढलती
धूप को किसने बांधा
रंग पे किसने पहरे डाले
रुप को किसने बांधा
काहे ये जतन करे
मन रे ...

उतना ही उपकार समझ कोई
जितना साथ निभा दे
जनम मरण का मेल है सपना
ये सपना बिसरा दे
कोई न संग मरे
मन रे ...

चित्रपट : चित्रलेखा
संगीतकार रोशन
गीतकार : साहिर लुधियानवी
गायक : मोहम्मद रफ़ी
राग : कल्याण
चित्रलेखा 1964 में बनी हिन्दी भाषा की अद्वीतीय फिल्म है ,जो भगवती चरण वर्मा द्वारा रचित हिन्दी उपन्यास ‘चित्रलेखा’ (1934) पर आधारित है। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं अशोक कुमार,मीना कुमारी और प्रदीप कुमार
। फिल्म के निर्देशक है केदार शर्मा जिन्होंने इसी नाम से १९४१ में भी एक फिल्म बनाई थी। फिल्म रोचक है।
साहिर लुधियानवी के गीत और रोशन का संगीत कर्ण प्रिय हैं। 'संसार से भागे फिरते हो' और 'मन रे तू काहे न धीर धरे' आज भी लोकप्रिय हैं। साहिर लुधियानवी के गीत और रोशन का संगीत कर्ण प्रिय हैं। 'संसार से भागे फिरते हो' और 'मन रे तू काहे न धीर धरे' आज भी लोकप्रिय हैं।

चित्रलेखा उपन्यास के बारे में संक्षिप्त विवरण:
भगवतीचरण वर्मा (३० अगस्त १९०३ - ५ अक्टूबर 1981) हिन्दी साहित्यकार थे। उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन १९७१ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।1934 में प्रकाशित 'चित्रलेखा' उपन्यास ने लोकप्रियता के कई पुराने कीर्तिमान बनाए थे। कहा जाता है कि अनेक भारतीय भाषाओं में अनूदित होने के अतिरिक्त केवल हिन्दी में नवें दशक तक इसकी ढाई लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी थी।चित्रलेखा भगवती चरण वर्मा द्वारा रचित हिन्दी उपन्यास है। यह न केवल भगवतीचरण वर्मा को एक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने वाला पहला उपन्यास है बल्कि हिन्दी के उन विरले उपन्यासों में भी गणनीय है जिनकी लोकप्रियता काल की सीमा को लाँघती रही है।भगवतीचरण वर्मा ने उपन्यास, कहानी, नाटक, कविताओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य और भाषा को भरपूर समृद्ध किया है। चित्रलेखा के यशस्वी और अमर रचनाकार की स्मृति को शत-शत प्रणाम अर्पित है।उपन्यास लेखक ने विभिन्न विचारधाराओं ''योग' और 'भोग' दोनों के बीच संतुलन बनाए रखा है।भगवतीचरण वर्मा के कालजई उपन्यास चित्रलेखा के अनुसार व्यक्ति न तो 'पाप' करता है और न ही 'पुण्य' करता है, बल्कि व्यक्ति तो वह करता है, जो करने के लिए परिस्थितियां उसे विवश कर देती हैं। इसी सार्वभौमिक चिंतन और मानवीय मनोविज्ञान ने इस उपन्यास को वह 'गहराई' दी, जिसके कारण यह लोकप्रिय और पठनीय बना।
चित्रलेखा अपने मन की बात बहुत कुछ उससे छिपाने की चेष्टा करती है, पर नायक सामंत बीजगुप्त समझ लेता है कि चित्रलेखा योगी कुमारगिरि की ओर आकृष्ट हो गयी है । उसने देवत्व को स्वीकार किया | चित्रलेखा के लिए उसने असाधारण त्याग किया। अपना धन, वैभव, सुख और सात पद तक छोड़कर मिकारी का जीवन उसने अपनाया । क्षमा ने उसके चरित्र को और भी मुखरित कर दिया है ।

इस उपन्यास का अंत इस निष्कर्ष से होता है कि संसार में पाप कुछ भी नहीं है, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। सम्मोहक और तर्कपूर्ण भाषा ने इस उपन्यास को मोहक और पठनीय बना दिया है। '

चित्रलेखा की कथा वस्तु पाप और पुण्य की समस्या पर आधारित है। पाप क्या है? उसका निवास कहां है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए रत्नाम्बर के दो शिष्य, श्वेतांक और विशालदेव, क्रमशः सामंत बीजगुप्त और योगी कुमारगिरि की शरण में जाते हैं।
हम कई बार करते सहीं हैं पर परिस्थितिवश समाज उसे गलत का दर्जा दे देता है। ऐसे में पाप-पुण्य की परिभाषा को समझना कई बार मुश्किल हो जाता है। इसी पर आधारित है भगवतीचरण वर्मा का उपन्यास चित्रलेखा।

माहिती एवं प्रस्तुतकर्ता: डॉ भैरवसिंह राओल