अपंग - 18 Pranava Bharti द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

अपंग - 18

18

कई घंटों की शारीरिक व मानसिक टूटन के बाद भानु ने एक बालक को जन्म दिया, ए मेल चाइल्ड ! भानुमति की प्रतीक्षा पूरी हो गई थी, उसने चैन की साँस ली | उसके 'लेबरपेन्स' के बीच में कई बार उससे पूछा गया था कि बच्चे का पिता उसके साथ क्यों नहीं था ? वह कुछ उत्तर नहीं दे पाई थी | डॉक्टर परिचित तो थे ही, डिलीवरी के बाद फिर डॉक्टर ने उससे यही प्रश्न पूछा |

"आउट ऑफ़ स्टेशन ---" बोलकर वह चुप हो गई |

उसने अपने नन्हे बच्चे का स्वागत किया, अकेले ही, ऑल अलोन !

उसके मन में कई सवाल उठते, थमते फिर उठते और वह उन सवालों की डोरी पकडे हुए दरवाज़े तक पहुँच जाती, फिर सवालों को मन के कोने में दुबककर उसकी दृष्टि वापिस आकर बच्चे पर आकर ठिठक जाती | बच्चे के प्यारे मासूम चेहरे, गुलाबी रंगत, खूबसूरती देखकर भानु का मन उद्वेलित हुआ जा रहा था | इसके पिता को कोई चिंता, उत्सुकता, बेचैनी नहीं हो रही होगी ? उसके मन में तरह तरह के सवाल उठ रहे थे | क्या राजेश अपने बच्चे के बारे में कुछ नहीं सोच रहा होगा ?यदि कुछ भी सोचता तो क्या यहाँ पर न आता ?

सोचते हुए भानु ने अपनी आँखें बंद कर लीं | प्रश्नों का अंबार उसके मन में उठा-पटक करने लगा | जन्म देना मातृत्व का एक छोटा सा हिस्सा था, अब ? सैंकड़ों सवालात थे | उसके समक्ष बहुत बड़ी चुनौती थी | कहने में छोटी सी बात थी कि वह अकेले ही पाल लेगी बच्चे को लेकिन बच्चे का भरण-पोषण, उसमें संस्कार-रोपण आदि बहुत से ऐसे काम उसके सामने आ खड़े हो उसको चिढ़ाने लगे थे | बच्चे की परवरिश में उसे अब अपने आपको भुला देना था | न जाने किस-किस बात का, समस्या का सामना करना था उसे !

उसे कई -कई बार लगा ऐसा नहीं हो सकता कि राजेश अपने बच्चे से मिलने न आए फिर कहीं मन में खुदर-बुदर भी होती कि यहीं राजेश बच्चे को तो उससे नहीं छीन लेगा ? कुशंकाओं से उसका मन घिरा रहता, एक तरफ़ यह भी सोचती कि उसके पास बच्चे के लिए समय ही कहाँ होगा ?भानु का जीता-जागता सपना उसके लिए एक माँस के लोथड़े से अधिक नहीं था जिसके लिए वह अपना समय व्यर्थ करता |

रिचार्ड व्यवसायिक काम से शहर से बाहर गया हुआ था | भानुमति ने उसके पीछे से बच्चे को जन्म दिया था | वाक़ई जो भाग्य में होता है, वही होता है | हर प्रसव के लिए माँ अकेले ही कष्ट भोगती है किन्तु पिता के रूप में पति की मॉरल सपोर्ट या किसी और का साथ तो होता ही है लेकिन उसे अकेले ही मानसिक त्रास सहन करना था | ऐनी हाऊ, शी हैड टू सफ़र अलोन |

'हे ईश्वर बल दे मुझे, शक्ति दे सब कुछ सहने की !'वह सोचती और प्रभु को याद करके हाथ जोड़ देती |

नार्मल प्रसव होने के कारण उसे दूसरे दिन घर भेज दिया गया | उसके पास न तो अपनी गाड़ी थी और न ही कोई बच्चे की आवश्यकताओं का समान ! डॉक्टर ने उसे हॉस्पिटल की गाड़ी से उसे घर भेज दिया जिसके लिए उन्हें हॉस्पिटल की ऑथॉरिटीज़ से विशेष परमीशन लेनी पड़ी थी | भानु को उनहोंने घर पहुंचा दिया था जिसके लिए वह डॉक्टर के प्रति न जाने कितनी बार कृतज्ञता प्रगट करती रही | अपने नन्हे शिशु के लिए उसने अभी तक कोई तैयारी की ही नहीं थी, डॉक्टर ने उसे बच्चे की काफ़ी ऎसी चीज़ें उस समय वहीं से ही मुहैया करवा दीं थीं जिनकी उसे आते ही ज़रुरत पड़ने वाली थी | एक बार अच्छी थी, उसके पास अपना कार्ड रहता था जिससे वह अपनी आवश्यकता के लिए भुगतान कर सकती थी |

जब वह घर पर पहुँची तब भी उसने पर्स में से चाबी निकालकर एक हाथ से

बच्चे को पकड़कर मुश्किल से च एपार्टमेंट के मुख्या द्वार के 'की-होल' में घुमाई | उसे दर भी लगा, कहीं बच्चा उसके हाथ से फिसल न जाए | अपने बच्ची का ऐसे स्वागत देखकर न चाहते हुए भी उसकी आँखें भर आईं | जबकि वह जानती थी कि ऐसा ही होने वाला है |

यह इंसान का स्वभाव ही होता है कि वह एक उम्मीद के वृक्ष के नीचे छाया की ही कल्पना करता है, यह नहीं सोच पाता कि जब वृक्ष के पत्ते झर जाते हैं तब कितना भी घना वृक्ष क्यों न हो, उसके नीचे खड़े रहने से धूप से बचाव नहीं हो सकता |

राज न जाने कहाँ था ? भानु कैसे न कैसे जो कुछ उसके पास था उस थोड़े से में ही अपना काम चलाती रही| ऎसी स्थिति में कैसा अकेला महसूस होता है, वही जानती थी | इतना एकाकी तो उसने बच्चे के जन्म से पहले भी नहीं महसूस किया था जितना अब कर रही थी | उसके बच्चे बेचारे को सब कुछ होते हुए भी किसीका प्यार, दुलार नहीं मिल पाया था |

अचानक शाम को रिचार्ड को फूलों से भरी बास्केट और ढेर सारे पैकेट्स के साथ आते देखकर उसकी ऑंखें भर आईं|उसे देखकर भानु प्रसन्नता से खिल उठी | उसे महसूस हुआ जन्मों के प्यासे को रेगिस्तान में पानी की झलक दिखाई दे गई है | वह कुर्सी लेकर खिड़की के पास बैठी कुछ सोच रही थी | रिचार्ड को देखते ही जैसे वह उसकी ओर भागी ;

"ओ ! रिचार्ड---" वह भावावेश में उससे चिपकने को ही थी कि अचानक थम गई | उसके पास जाते ही भानु की आँखों से पानी का स्रोत फूटने लगा था जैसे !

हाथों के पैकेट्स डाइनिंग टेबल पर रखकर रिचार्ड ने उसके हाथ में मेज़ पर रखी टोकरी से निकालकर एक बड़ा सा ख़ूबसूरत फूल निकलकर उसकी ओर बढ़ा दिया "फ़ॉर योर जॉय भानु --तुम्हारे बेटे की खुशी के लिए | तुम्हारा बेटा तुम्हारे लिए जॉय ही तो है |में आई कॉल हिम जॉय ?" उसने पालने की ओर जाते हुए भानु से बड़ी सहजता से पूछा |

"जॉय --?? भानु के चेहरे पर मुस्कराहट खिल उठी | न जाने अभी कितनी परेशानियाँ पर करनी होंगी तह जाकर खिन वह जॉय कहा जा सकेगा |

"वैरी स्वीट, लाइक हिज़ मदर ---"

"सब बच्चे स्वीट ही होते हैं रिचार्ड, और माँ के लिए तो बच्चे से प्यारा दूसरा कोई होता ही नहीं | "

"दैट्स राइट भानुमति --" रिचार्ड ने कहा और दोनों के चेहरों पर एक मीठी मुस्कान पसर गई |

"आई केम टू नो यस्टरडे ओनली, योर डॉक्टर टोल्ड मी ---" रिचार्ड कुछ छिपाना जानता ही नहीं था |

भानुमति ने आश्चर्य से उसे देखा---

"यस आई ऑलरेडी रिक्वेस्टेड योर डॉक्टर बिफोर आई लेफ़्ट --"

भानुमति उसकी और ताकती रह गई एक विश्वास, एक उम्मीद और एक धन्यवाद का भाग लेकर !

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ashit mehta

ashit mehta 3 महीना पहले