एक दिन अर्थ ने मुझसे अपने पहले प्यार का जिक्र किया | मैं गुमसुम हो गयी, न जाने क्यों ?पर क्या सच ही कोई कारण न था ?कारण था सुप्त भावनाओं का दबाव !मधुर स्मृति की धमक !विवश आंसू! कितनी आसानी से पुरूष अपने प्रेम का जिक्र कर लेते हैं |वे उसे अपनी गौरव गाथा समझते हैं| पर क्या स्त्री के लिए भी उतना सहज होता है अपने प्रेम का जिक्र करना ....उसे स्वीकारना, निभाना!नहीं ...कदापि नहीं |पुरूष अपने प्रेम की असफलता का श्रेय अपने प्रेमिका को देकर किसी अन्य से प्रेम करने लगता है ,इसमें उसे कोई अपराध-बोध नहीं होता ,पर क्या यह स्वार्थ नहीं ?क्या प्रेम जैसी भावना व्यापार है जो दूसरे पक्ष के मनोनुकूल न होने पर खत्म हो जाए ...जो किसी उम्मीद से की जाए और उम्मीद पूरी न होते देख तोड़ दी जाए |
कितनी सहजता से अर्थ अपनी हर असफलता को दूसरे पर थोप देता है और एक मैं हूँ जो जीवन भर खुद में ही कमियाँ ढूंढती रही |शत्रु के प्रति भी सहानुभूति से सोचा |किसी को दोष न दिया |जीवन में आए हर व्यक्ति के बारे में उसकी जगह रहकर सोचा |फिर किसी ने भी मेरे बारे में मेरी जगह आकर क्यों नहीं सोचा ? जिंदगी में जब भी दुविधा की स्थिति आई मैंने अपने हित की तुलना में दूसरे की भावनाओं को महत्व दिया |परिणामत:आज इस स्थिति में पहुँच गयी हूँ कि बोझ बन गयी हूँ ,जिसे वहन करने वाला इस अभिमान में फूलता है कि वह महान है ...लीक से हटकर है मेरा अपना वजूद नगण्य रह गया है |
क्यों प्यार का नाम आते ही मेरी आँखें छलछला आती हैं ,क्या कोई जान सकता है ?नहीं जान सकता है क्योंकि मैंने किसी को बताया ही नहीं |बता भी तो नहीं सकती क्योंकि कोई उसे समझ नहीं सकता |किसी के पास वैसा दिल नहीं ....दृष्टि नहीं |क्या सच ही किसी को मुझसे प्यार नहीं रहा ?हर कदम पर प्यार का दावा करने वाले मिले ...फिर भी ....|क्या मेरी किस्मत आंसुओं से लिखी गयी है ?मेरा जीवन असफल रहा पर मैं हर रिश्ते के प्रति ईमानदार रही ,इसके गवाह ये आँसू हैं जो अकेले में बह निकलते हैं |
पर स्त्री को विज्ञापन ,शो पीस ,आई टानिक व सिर्फ देह समझने वाले पुरूषों से समाज अटा पड़ा है |स्त्री के संबंध में लगभग सभी पुरूष एक- से ही होते हैं –लोलुप,कामुक,राल गिराने वाले श्वान |आह,उम्र गुजर गयी पर वह राम नहीं मिला जो पुष्पवाटिका में सीता के नुपूर धुन से विचलन महसूस कर फैसला कर लेता है कि यही मेरी भावी पत्नी होगी क्योंकि पर -स्त्री के लिए कोई काम भाव उनके मन में आ ही नहीं
सकता |वनवास के लिए जाते समय भी ग्राम –वधुओं के प्रश्नों का उत्तर वे सीता का मुख देखते हुए ही देते हैं |त्रैलोक्य-सुंदरी शूपर्णखा के काम-प्रस्ताव से वे विचलित नहीं हुए |सीता परित्याग के बाद एकाकी जीवन बिताया |सीता की प्रस्तर मूर्ति के साथ बैठकर ही यज्ञ किया |राम इसी लिए मेरे आदर्श पुरूष रहे हैं |मैंने कल्पना में उन्हीं -सा पुरूष पाने की साध रखी पर धरती पर दूसरा राम फिर कहाँ हुआ ?
अर्थ खुद को जाने क्या समझता है |वह उन पुरूषों में है जो देह-धंधे से लेकर किसी भी गलीज कर्म में लिप्त हो सकते हैं |उन्हें बस पैसा चाहिए |देह तो बोनस है उनके लिए |उसके बारे में सब कुछ जानती हूँ |जान-समझकर भी कैसे ऐसे व्यक्ति से मैं प्रेम कर रही हूँ ?अंतरंग क्षणों में वह वह एक और लड़की को बीच में रखने की बात करता है |नए की तलाश उसकी फितरत बन चुकी है |फिर भी मैं उसके पीछे भाग रही हूँ |इसे नासमझी कहूँ या कहूँ कि मुझे उसकी आदत पड़ चुकी है और आदतें बदली नहीं जा सकतीं |उससे मिलने वाला सुख इन सारी चीजों पर भारी पड़ जाता है और मैं उसे छोड़ नहीं पाती |मैं ही क्यों वह लड़की भी तो उसके लिए पागल है |उसके साथ भी तो उसने यही सब किया है |सात सालों से उसे घूमा रहा है ,उसे मुट्ठी में कर रखा है |उसे धोखा देकर ही तो मेरे पास आता है |फिर मुझे तकलीफ देकर उसके पास चला जाता है |मैंने उस लड़की की तकलीफ को महसूस किया है |अर्थ में ऐसा क्या है ,जो लड़कियां उसकी दीवानी हो उठती हैं |वह अभिमान से कहता है –मैं किसी से प्यार नहीं करता पर सब मुझसे प्यार करते हैं |लोग मुझे कृष्ण कहते हैं |कुछ तो उसमें ऐसा जरूर है कि सब उसके आकर्षण में बंध जाते हैं |जब मैं बंध गयी तो औरों को क्या कहूँ ?दिखने में वह इतना सभ्य ,सुशील ,हंसमुख और बेहद शरीफ दिखता है पर दिमाग से इतना गंदा है कि क्या कहूँ ?जाने उसे लड़कियों की कितनी भूख है ...हर समय नयी लड़की के जुगाड़ में रहता है |फिर भी वही बात ....दिल नहीं मानता |उसके सामने होते ही सारी शिकायतें फुर्र हो जाती हैं ...’हजारों खून भी माफ’ जैसा भाव उठने लगता है |वह बिना कुछ बोले बादल की तरह जब देह की धरती पर बरसता है पूरी सृष्टि हरी-भरी हो जाती है |कलियों का घूँघट उठ जाता है |मेरे भीतर की अधूरी स्त्री पूरी हो जाती है और चाहती है कि हर पल वह साथ रहे कहीं जाए ही नहीं |दुनिया अभी इसी क्षण हमेशा के लिए थम जाए |
पर ऐसा नहीं होता |सम्मोहन टूटता है |वह बोलने लगता है कुछ भी उल्टा-पलटा |उसकी बातों से अफसोस होता है |एक ही आदमी में दो अलग पुरूष !एक मनचाहा पुरूष दूसरा बिलकुल ही अनचाहा |यह अनचाहा पुरूष अनिद्रा,अवसाद बनकर तकलीफ देने लगा है |रात को अचानक नींद खुल जाती है और मन घबराने लगता है |मन से आवाज उठती है कि ऐसे आदमी का साथ तत्काल छोड़ दो |पर फिर मन में पीड़ा की लहरें उठाने लगती हैं |उसको खो देने की कल्पना ही पीड़ादायक है |मेरा अब कुछ नहीं हो सकता |किस्मत ने मुझे यह किस जगह लाकर खड़ा कर दिया है |मैं न तो उसे भूल सकती हूँ और न वह मुझे स्वीकार करेगा |वह अच्छा आदमी नहीं है ...वह किसी का नहीं हो सकता |उसका सच जानकर भी उससे दूर न हो पाना मेरी कायरता है कि कमजोरी |मैं चाहकर भी उससे मुक्त नहीं हो पाती |जब कभी वह नाराज हो जाता है तो मैं मुर्दे से हो जाती हूँ कहीं मेरे मन में उससे बदला लेने का भाव तो नहीं |उसने मेरी जिंदगी को दोराहे पर ला दिया है ,क्या मैं इसका बदला लेना चाहती हूँ ?पर यह बदले की भावना उसका क्या बिगाड़ेगी ,वह तो उल्टे मुझे ही तबाह करेगी |वह तो दोनों हाल में खुश रह लेता है |मुझसे दूर रहकर भी और पास आकर भी क्योंकि वह मन से नहीं जुड़ा है और मैं मन से जुड़ने के कारण दोनों अवस्थाओं में दुख पाती हूँ |देह से पास होकर भी मन से दूर रहना मुझे खलता है |वह चला जाएगा और फिर कभी नहीं आएगा ,यह और भी खलता है |
कभी-कभी सोचती हूँ कि उसे बर्बाद कर दूँ क्योंकि उसने मुझे धोखा दिया है |मेरे सरल मन को धोखा दिया है|मेरे निश्छल प्रेम को छला है |अगर वह मजबूर होता ,सरल होता तो मैं उसे माफ कर देती पर वह तो कपट से काम लेता है ...मुझपर इल्जाम लगाता है |मेरे दिल को लगने वाली बात कहता है |ऐसे आदमी को तो सबक देना ही चाहिए |पर मैं भी तो इसमें कम बदनाम नहीं होऊँगी और ऐसा करके भी क्या उसका प्रेम पा लूँगी ?उसको सुधार लूँगी ?फिर जिसे प्यार किया उसे बर्बाद करना क्या ठीक बात है ?नहीं, तो क्या मैं भी उसी की तरह बन जाऊँ और हर हाल में खुश रहूँ|
कभी-कभी जब वह कहता है कि मैं तो कुत्ता हूँ पर तुम कहीं विवाह कर लो...कहीं सेटल हो जाओ |तो लगता है कि उसे भी मेरी चिंता है ...शायद कोई नैतिक दबाव उसे भी है |वह मेरी भलाई चाहता है पर वह यह क्यों नहीं समझ पाता कि मेरी खुशी उसी से है ?मुझे उसके बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता |
यकीनन वह इस बात को समझ गया है तभी तो कहता है कि अपने प्रेमी को यह अहसास नहीं होने देना चाहिए कि आप उससे इतना प्यार करते हैं कि उसके बिना जी-मर नहीं सकते |नहीं तो वह परवाह करना छोड़ देता है |प्रेम के बारे में कैसी सोच है उसकी ?अपने प्रेमी को यह बताना गलत कैसे है कि आपको उससे किस कदर प्यार है |प्यार में दुराव,छिपाव,बनावट कैसे संभव है ?
इधर तो वह प्रेम का नाम लेने पर चीख पड़ता है |कहता है कि –किताबों में ही प्रेम की बातें अच्छी लगती हैं |कोई किसी पर नहीं मरता |मुझे लगने लगा है कि वह उलझन में है |दो नावों की सवारी उसे भारी पड़ रही है |वह मुक्ति के लिए छटपटा रहा है |वह बुरा नहीं है पर मेरे सामने बुरा इसलिए दिखाता रहा है कि मैं उससे मन से न जुड़ सकूँ और उसे किसी भावनात्मक उलझन का शिकार न होना पड़े |वह इतने कमजोर मनोबल वाला व्यक्ति है,यह मैं नहीं जानती थी |तो क्या मैं उसके लिए उसे छोड़ दूँ ?मुश्किल लग रहा है पर मेरी प्रेम कहानी का अंत तो अलगाव ही है |तो इसके पहले कि वह मुझे छोड़े मैं ही उसे छोड़ देती हूँ ताकि वह अपनी सात साल पुरानी प्रेमिका के साथ एक सामान्य जीवन जी सके |मेरा क्या पहले भी अकेली थी आगे भी रह लूँगी |उसके साथ बिताएँ पलों को जीवन –सुधा बनाकर |