वेश्या का भाई - भाग(१५) Saroj Verma द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

वेश्या का भाई - भाग(१५)

नवाबसाहब के जाते ही गुलनार ने केशर से पूछा...
क्या हुआ केशर! नवाबसाहब ऐसे ख़फा होकर क्यों चले गए? आपने उनसे ऐसा क्या कह दिया?
जी! ख़ालाजान वें मुझे मेरी औकात बता रहे थे तो मैने भी उनको उनकी औकात बता दी,केशरबाई बोली।।
लेकिन क्यों ऐसा क्या हुआ? हमें भी कुछ बताएं,गुलनार बोली।।
जी! आपको वक्त आने पर पता चल ही जाएगा,केशर बोली।।
आपको मालूम होना चाहिए कि वें आपके कद़रदानों में से एक हैं,गुलनार बोली....
कद़रदान.....हा....हा....सच में ख़ालाजान!आपको भी ऐसा लगता है,इस मतलबी दुनिया में तवायफ़ो के कद़रदान कबसे पैदा होने लगे?वे मेरे कद़रदान नहीं हैं, वे केवल अपनी हवस की भूख मिटाने यहाँ आते हैं,केशर बोली।।
ये कैसीं बातें कर रहीं हैं आप?गुलनार बोली।।
एकदम सच कहती हूँ ख़ालाज़ान! नवाबसाहब केवल हुस्न और जवानी के मज़े उठाने यहाँ आते हैं,उन्हें किसी के जज्बातों से कोई मतलब नहीं,केशर बोली।।
आपका दिमाग़ फिर गया है क्या? आज आप कैसीं बातें कर रही हैं?गुलनार ने गुस्से से पूछा....
दिमाग़ फिरा नहीं है आज ही ठिकाने पर आया है,अभी तक कोई पहचान नहीं थी ना मेरी,लेकिन अब मुझे मेरी पहचान मिल गई है,अब बस बहुत हुआ इन मर्दो का आतंक,बहुत हुई मर्दो की जोर-जबरदस्ती,अब मुझे ये अहसास हो गया है कि सबसे पहले मैं एक औरत हूँ और बाद में तवायफ़,अब कोई भी मेरी मर्जी के बिना ना मेरे बदन के साथ खेल सकता है और ना मेरे मन के साथ,केशर बोली।।

केशर का जवाब सुनकर गुलनार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई और उसे अपना कारोबार खतरे में पड़ता नज़र आया यही सोचकर वो उस वक्त चुप्पी साधकर वहाँ से चली गई लेकिन अब भी उसको पूरी बात पता नहीं थी और उसका जी ये सोच सोचकर घबरा रहा था कि अगर केशर ने सच में ये काम करने से इनकार कर दिया और उसकी देखादेखी और भी तवायफ़ो ने अपना रूख़ बदल लिया तो उसका धन्धा तो सच में चौपट हो जाएगा,तब क्या होगा?उसका कोठा तो शहर के मशहूर कोठों में गिना जाता है,
अच्छे-अच्छे जमींदार और नवाब उसके कोठे पर आना अपनी शान समझते है और अगर ये कोठा बंद हो गया तो वो तो भूखों मरने लगेगी,तब गुलनार ने मन में सोचा कि हमें ही नवाबसाहब की हवेली जाकर पूरी बात पता करनी होगी और नवाबसाहब से केशर की गुस्ताख़ी के लिए माँफी माँगकर हम उन्हें मना लेगें और ये सोचकर गुलनार ने पालकी निकलवाई और उस में बैठकर हवेली जा पहुँची.....
हवेली पहुँचकर गुलनार को पता चला कि नवाबसाहब तो हवेली में नहीं है,उनका मिज़ाज अच्छा नहीं था इसलिए शायद वें गौहरजान के कोठे पर चले गए हैं,ये बात सुनकर गुलनार को सदमा सा लगा कि नवाबसाहब किसी और के कोठे पर तशरीफ़ ले गए हैं और फिर वो वापस अपने कोठे पर आ गई,लेकिन अब फिक्रो ने उसके दिमाग़ पर पहरा लगा रखा था ,उसका मन किसी भी काम में नहीं लग रहा था,वो बस अपने कमरें में यूँ ही टहल रही थी,उसे नींद भी ना आ रही थी,वो बस जैसे तैसे सुबह होने का इन्तज़ार कर रही थी।।
सुबह हुई दिन चढ़ आया था और गुलनार अभी तक सोई पड़ी थी,क्योकिं वो देर रात तक फिक्र के मारे जागती रही थी,तभी उसकी नौकरानी उसके पास आकर बोली......
ख़ालाजान! नवाबसाहब की हवेली से नौकर आया है कहता था कि नवाबसाहब ने कहा है कि आप फौरन ही हवेली पहुँचें....
नौकरानी की आवाज़ सुनकर गुलनार जागी और बोली....
इतना दिन चढ़ आया और निगोड़ी तूने मुझे जगाया ही नहीं,नवाबसाहब के नौकर से कह दे कि बस मैं थोड़ी देर में हवेली पहुँँचती हूँ,थोड़ा इन्तज़ार करें।।
ठीक है ख़ाला! और इतना कहकर वो नौकरानी उस नौकर के पास पहुँची और गुलनार का पैगाम हवेली पहुँचाने को कहा।।
कुछ ही देर में गुलनार अपनी पालकी में हवेली पहुँची और नवाबसाहब के सामने हाजिर हुई,नवाबसाहब ने उन्हें देखा और बोले....
आइए....आइए....गुलनार...आइए तशरीफ़ रखिए।।
आपने हमें याद फ़रमाया,गुलनार ने पूछा।।
जी,हाँ! आपसे कुछ कहना था,नवाबसाहब बोले।।
जी! पहले आप कहिए,हमें भी आपसे कुछ पूछना है,गुलनार बोली।।
तो पहले आप ही पूछ लीजिए ,नवाबसाहब बोले।।
जी!नहीं ! आपने हमें हवेली बुलवाया है तो पहले आपका हक़ बनता है हमसे कुछ कहने का,गुलनार बोली।।
ठीक है तो पहले हम ही अपनी बात कहें देते हैं,नवाबसाहब बोले।।
तो कहिए,गुलनार बोली।।
हम ये कहना चाहते हैं कि आपको पता है कि केशर का बड़ा भाई मिल गया है और वो उसे कोठे से निकालकर इज्जत की ज़िंदगी देना चाहता है,नवाबसाहब बोले।।
जी! हमें तो कुछ नहीं मालूम,गुलनार चौंकते हुए बोली।।
जी! यही सच है तभी तो कल रात केशरबाई हम पर चीख रही थी,नवाबसाहब बोले।।
हम भी आप से यही पूछना चाहते कि केशर का आप पर चीखने का सबब क्या था?गुलनार बोली।।
क्या आप केशर के भाई से मिलना चाहेगीं?नवाबसाहब ने पूछा।।
जी!हाँ! जुरूर! गुलनार बोली।।
तो इसके लिए आप को हमारे मेहमानखाने की खिड़की से बाहर देखना होगा,वो बाहर ही होगा,हम उसे यहाँ बुलाकर आपसे मिलवा देते लेकिन ये मुनासिब ना होगा,हम नहीं चाहते कि मंगल ये समझे कि इन सबके पीछे हमारा हाथ है,नवाबसाहब बोले।।
तो फिर आप क्या चाहते हैं?,गुलनार ने पूछा।।
हम चाहते हैं कि साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे,नवाबसाहब बोले।।
हम कुछ समझे नहीं ,आपके कहने का क्या मतलब है?गुलनार बोली।।
हम चाहते हैं कि आप अपने लठैतों से मंगल का काम तमाम करवा दें,जब मंगल ही नहीं रहेगा तो फिर केशर किसके बलबूते पर आवाज उठाएगी?नवाबसाहब बोले।।
तो क्या ये करना मुनासिब होगा,कहीं पुलिस तक ख़बर पहुँच गई तो क्योकिं गोरों की पुलिस आजकल काफी़ सख्ती से पेश आ रही है,अभी दो चार दिन पहले ही ना जाने कितने आन्दोलनकारियों को खदेड़ा है पुलिस ने लाठीचार्ज तो किया ही ,साथ में गोलियांँ भी बरसाईं,गुलनार बोली।।
आप फिक्र ना करें बाद में हम सब सम्भाल लेगें,बस खिड़की से मंगल का चेहरा पहचान लें,नवाबसाहब बोले।।
ठीक है नवाबसाहब! जैसा आप कहें,हम तो आपके गुलाम हैं हुजूर!आखिर आपके दम पर ही तो हमारी रोजीरोटी चलती है और फिर अगर हमारे कोठे से केशर चली गई तो हमारा धन्धा तो एकदम चौपट हो जाएगा,गुलनार बोली।।
बस,हम यही तो कहना चाहते हैं कि आपकी कमाई का जरिया केशर ही है उसके जाने से तो आपका कोठा बिल्कुल बैठ जाएगा और फिर हम केशर से अपनी बेइज्जती का बदला भी लेना चाहते है बहुत जुबान चल रही थी ,अब देखते है कि ऊँट किस करवट बैठता है?नवाबसाहब बोले।।
तो हमारे लिए क्या हुक्म है अब?गुलनार ने पूछा।।
आप ऐसा करें कि पहले केशर से प्यार से पूछे कि वो हम पर इतना क्यों चिल्ला रही थीं?नवाबसाहब बोले।।
फिर,क्या करना होगा? गुलनार ने पूछा।।
फिर जब वो सारे राज उगल दें तो उसे समझाएं कि ये कोठा छोड़ना उसके लिए मुनासिब ना होगा,वो कैसे इस समाज का सामना कर पाएगी ?चूँकि वो एक तवायफ़ जो ठहरी,फिर उसका गरीब भाई कहाँ कहाँ तक उसे उसकी बदनामी से बचाता रहेगा आखिर एक ना एक दिन उसकी बदनामी उसे ढ़ूढ़ ही लेगी अगर ये सब बातें सुनने के बाद वो मान गई तो ठीक है और अगर ना मानी तो फिर उसके भाई का काम तमाम करवा दीजिएगा,नवाबसाहब बोले।
ये थोड़ी टेढ़ी खीर है लेकिन हम कोश़िश कर के देखते हैं,गुलनार बोली।।
आपको अपना कोठा बचाना है या नहीं,नवाबसाहब ने पूछा।।
बस,उसी की तो फिक्र है,गुलनार बोली।।
तो फिर हमने जो कहा उस पर गौर फ़रमाएं,नही तो आप कहीं कि नहीं रहेगीं,इस बुढ़ापे में कहाँ मारी-मारी फिरेगीं?कोई नहीं पूछेगा आपको क्योकिं ना तो आपका हुस्न बरकरार रहा और ना अब आपमें ताज़गी रह गई है,नवाबसाहब बोले।।
आपकी बात तो सोलह आने सच है नवाबसाहब! हम तो बुरे फँसे,ये नामुराद केशर का भाई कहाँ से आ धमका,हमारी जान खाने,गुलनार बोली।।
सच कहा आपने,हमारे यहाँ नौकर हैं और उसकी हिमाकत तो देखिए हमारी बेग़म से ही मदद माँगने जा पहुँचा,कल रात बहु-बेग़म भी हमसे बदजुबानी कर गईं,उसे इस गलती की सज़ा तो मिलनी ही चाहिए,नवाबसाहब बोले।।
सच कहा आपने,गुलनार बोली।।
खैर,बातें तो बाद में भी होतीं रहेगीं,पहले आप मंगल को पहचान लें,नवाबसाहब बोले।।
जी चलिए! तो चेहरा देख लें उस नामुराद का, इतना कहने के बाद गुलनार और नवाबसाहब दोनों झरोखे पर आकर मंगल को देखने लगे,तभी मंगल का चेहरा देखने के बाद गुलनार बोली.....
अरे,ये तो वही है।।
कौन है ? क्या आप पहले इससे मिल चुकीं हैं?नवाबसाहब ने पूछा।।
जी! ये वही है जो हमारे कोठे पर आकर केशर से मिलने की जिद कर रहा था लेकिन केशर ने इससे मिलने से इनकार कर दिया तो इसने शकीला को बुलवाया था,गुलनार बोली।।
तो इसका मतलब है कि उस दिन बाज़ार में इन सबके बीच कोई तो बात हुई थी इसलिए तो मंगल केशर से मिलने जा पहुँचा कोठे पर,नवाबसाहब बोले।।
मामला तो काफ़ी पेचीदा हो गया नवाबसाहब ! गुलनार बोली।।
आप फिक्र ना करें,आप सिर्फ़ पहले केशर को समझाएं और ना माने तो लठैतों से कहिए कि अपनी अपनी लाठियों को तेल पिलाकर रखें,नवाबसाहब बोले।।
जी! सही कहा आपने,गुलनार बोली।।
खैर! ये सब छोड़िए,कहिए क्या खिदमत की जाए आपकी?नवाबसाहब ने पूछा।।
जी! बस! अब चलेगें,हमें जल्द से जल्द कोठे पहुँचकर केशर से बात करनी है,गुलनार बोली।।
ठीक है जैसी आपकी मर्जी ,लेकिन याद रखिएगा बन्दा आपकी खिदमत में हमेशा हाजिर है,नवाबसाहब बोले।।
खुदाहाफ़िज़! अब हम चलते हैं और इतना कहकर गुलनार चली गई.....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....


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