क्षितिज (काव्य संकलन) - 3 Rajesh Maheshwari द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

क्षितिज (काव्य संकलन) - 3

जीवन की राह

गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम

पवित्र हो सकता है

किंतु मोक्षदायक नही।

मोक्ष निर्भर है

धर्म एवं कर्म पर।

संगम में डुबकी से भावना बदल सकती है

किंतु बिना कर्म के मोक्ष असंभव है।

हमारी सांस्कृतिक मान्यता है

जैसा होगा कर्म वैसा ही होगा कर्मफल।

जब हम मनसा वाचा कर्मणा

सत्यमेव जयते को अपनायेंगें

तो जीवन में होगा

सुख, संपदा और स्नेह का संगम।

सूर्य देगा ऊर्जा,

प्रकाश दिखलाएगा रास्ता

सुहावनी संध्या देगी शांति

निशा देगी विश्राम

चांदनी से मिलेगी तृप्ति की अनुभूति

और हम पर बरसेगी परमात्मा की कृपा।

हमारे जीवन में हो समर्पण

कर्म में हो सेवा, धर्म में हो परोपकार

धनोपार्जन में हो ईमानदारी और सच्चाई

हृदय में हो आत्मीयता

और वाणी में हो मधुरता

तो ईश्वर हमारे साथ रहेगा

और स्वर्ग बन जाएगा

हमारा घर, नगर और हमारा देश।

प्रेरणा

क्षण भर पहले वह हँस रहा था

अचानक हुई दुर्घटना

और वह सडक पर पडा कराह रहा था

एकत्रित हो गई भीड

कर रही थी एम्बुलेंस की प्रतीक्षा

और समय बिताते हुए

कैसे, कब, क्या हुआ

कर रही थी इसकी समीक्षा।

मैंने उसे उठाया सहारा देकर अस्पताल पहुँचाया।

अस्पताल में चिकित्सक ने बताया

थोडा सा भी विलम्ब कर सकता था बडा अनर्थ।

मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया

जिसने मुझे निमित्त बनाकर

उसको जीवन दान दिया

और मेरे जीवन को समझाया जीने का अर्थ।

उसकी आँखों से झाँकती हुई संवेदना

उसमें जागी हुई जीवन की आशा

और मेरे प्रति उसका आभार

आज भी मुझे दिखता है

मेरी आँखों में झूलता हुआ।

मुझसे कहता है -

कभी किसी पीडित की

सहायता में विलम्ब मत करना।

किसी को मदद की हो आवश्यकता

तो मत करना किसी की प्रतीक्षा।

तुम्हारी यह सेवा और सेवा की तत्परता

तुम्हारे जीवन को देगी सार्थकता।

संस्कारधानी

आँखों में झूमते हैं वे दिन

हमारे शहर में

गली-गली में थे

साहित्य के सृजनकर्ता,

संगीत के साधक,

तरह-तरह के रंगों से,

जीवन की विविधताओं को

उभारते हुये चित्रकार,

राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत

देश और समाज के उत्थान का

पोषण करने वाले पत्रकार

साहित्य, कला, संस्कृति और समाज के

सकारात्मक स्वरूप को

प्रकाशित करने वाले अखबार

और थे इन सब को वातावरण और

संरक्षण देने वाले जन-प्रतिनिधि।

जिनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन में

नई पीढ़ी का होता था निर्माण

पूरा नगर था एक परिवार

और पूरा देश जिसे कहता था संस्कारधानी।

सृजन की वह परंपरा

वह आत्मीयता और

वह भाई-चारा

कहाँ खो गया ?

साहित्य, कला, संगीत और संस्कार

जन-प्रतिनिधि, पत्रकार और अखबार

सब कुछ जैसे

ठेकेदारों का कमीशन हो गया।

हर तरफ

डीजे और धमालों की

कान फोडू आवाजों पर

भौंडेपन और अश्लीलता के साथ

कमर मटका रही है नई पीढ़ी।

आम आदमी

रोजमर्रा की जिन्दगी,

मंहगाई

और परेशानियों में

खो गया है

सुबह से शाम तक

लगा रहता है काम में

कोल्हू का बैल हो गया है।

साहित्य-कला-संगीत की वह सृजनात्मकता

उपेक्षित जरूर है पर लुप्त नहीं है

आवश्यकता है उसके

प्रोत्साहन और उत्साहवर्धन की।

काश कि यह हो पाए

तो फिर से हमारा नगर

कलाधानी, साहित्यधानी और

संस्कारधानी हो जाए।

शहर और सडक

शहर की सड़क पर

उड़ते हुए धूल के गुबार ने

अट्टहास करते हुए मुझसे कहा -

मैं तुम्हारी ही भूल का परिणाम हूँ।

पहले मैं दबी रहती थी

तुम्हारे पैरों के नीचे सड़को पर।

पर आज मैं मुस्कुरा रही हूँ

तुम्हारे माथे पर बैठकर।

पहले तुम चला करते थे

निश्चिन्तता के साथ

शहर की प्यारी-प्यारी

सुन्दर व स्वच्छ सड़को पर।

पर आज तुम चल रहे हो

गड्ढों में सड़कों को खोजते हुए

कदम-कदम पर संभल-संभल कर।

तुमने भूतकाल में

किया है मेरा बहुत तिरस्कार,

मुझ पर किए हैं अत्याचार,

अब मैं उनका बदला लूंगी,

और तुम्हारी सांसों के साथ

तुम्हारे फेफडों में जाकर बैठूंगी।

तुम्हें उपहार में दूंगी

टीबी, दमा और श्वांस रोग।

तुम सारा जीवन रहोगे परेशान

और खोजते रहोगे संस्कारधानी की पुरानी

स्वच्छ, सुन्दर और साफ सड़कों को।

एकता और सम्मान

ताल के किनारे मंदिर और मस्जिद।

सूर्योदय पर मंदिर की छाया में मस्जिद,

सूर्यास्त पर मस्जिद की छाया में मंदिर,

सुबह एक के पहलू में दूसरा,

शाम को दूसरे के पहलू में पहला।

पूजा और इबादत,

आरती और अजान

प्रार्थना और नमाज

सभी थे साथ साथ।

एक दिन आई कही से

अफवाह की चिंगारी, धधका गई आग

भडका गई दंगा और फसाद

रक्त बहा मानव का

सिसक उठी मानवता।

मंदिर में ‘म’ और ‘द’

मस्जिद में भी ‘म’ और ‘द’

‘म’ और ‘द’ के मद ने

दोनो को भडकाया।

‘द’ और ‘म’ के दम ने

दोनो को लडवाया।

मद और दम में फंसकर

एकता हुई खंडित टूट गया भ्रातृ प्रेम

खोया सद्भाव और पनपे कटुता और क्लेश ।

किसी ने किसी का घर जलाया

किसी ने किसी का खून बहाया

किसी ने पति खोया

और कोई बेटे को खोकर

फूट फूट कर रोया।

अगर मद में आकर आदम

मदहोश नही हुआ होता

और झूठे दंभ में आकर

दम दिखलाने के लिये

न निकला होता

तो कोई बेघर नही होता

कोई अपना बेटा, पति या पिता नही खोता।

कायम रहता भाईचारा,

कायम रहती सांप्रदायिक एकता

और कायम रहता सद्भाव।

नही रूकती बस्ती की तरक्की

और नही झुकती सभ्यता की नजरें।

हम क्यों भूल जाते है कि -

हमारी एकता में ही छुपी है देश की एकता।

हमारी प्रगति में ही छुपी है देश की प्रगति और

हमारे सम्मान में ही छुपा है देश का सम्मान।

नादान

जब वे मंत्री थे तब

बडे बडे ठेकेदार और उद्योगपति

उनके दरवाजे पर संतरी थे।

जनता चरण छूकर करती थी नमन्

और उन्हें कहती थी भगवन्।

मंत्री बनने से पहले

वे ड्राइवर थे, ट्रक चलाते थे,

अब वे मालिक हो गए थे

ट्रक चलवाते थे।

लेकिन समय ने उनके साथ दगा किया

उनके प्रतिद्वंद्वी ने, उनको खिसकाकर

उनका मंत्री पद हथिया लिया।

उन्हें नमन करने वाली

जनता गायब हो गई।

मोहल्ले की जमादारन भी

उनके लिये साहब हो गई

स्टेशन का कुली भी करने लगा मोलभाव

टैक्सी वाला कहने लगा

प्री-पेड पर पैसे चुकाओ।

उनकी कोठी पर अब

उनका दरबार सूना था

जहाँ पुतता था नैरोलैक,

वहाँ पुत रहा चूना था

उनके लिये यह झटका बडा था

दरवाजे पर स्वागत के लिये

केवल उनका कुत्ता खडा था।

सब उन्हें बेईमान बता रहे थे

जो कल तक भगवान बताते थे

वे भ्रष्ट बताकर हंसी उडा रहे थे।

वे बहुत व्यथित थे

इस अनादर और उपेक्षा से,

सोचते थे कैसे निकले

इस विकट परीक्षा से।

उनके पुराने अनुभवों ने उन्हें रास्ता दिखाया।

उन्होने अपने आपको जमीन और

मकानों के धंधे में लगाया।

लाखों को करोडों बनाया।

जो दूर हो गये थे

वे फिर पास आने लगे

जो करते थे निंदा

वे प्रशंसा के गीत गाने लगे।

उनका दरबार फिर सजने लगा

उनके दरवाजे पर राजनीति का

बाजा फिर से बजने लगा।

किस्मत ने फिर जोर लगाया

उनको पुनः मंत्री बनाया।

वे हो गए जनता के

और उनकी हो गई जनता।

जनता बन गई भक्त मंडली

वे बन गए महन्ता।

फाइलों पर फिर वजन आने लगा,

और वजनदार लोगों की फाइलों को

तेजी से निपटाया जाने लगा।

आज राजनीति में नेता

कुर्सी पर है तो भगवान है

और कुर्सी से उतर गया

तो बेईमान है।

जनता कल भी नादान थी

आज भी नादान है।

बोझा

आज सुबह नाश्ते में

लड्डू, जलेबी और बादाम का हलुआ देखकर

मन बाग बाग हो गया।

इतना बढिया नाश्ता देखकर

मैं पत्नी के प्यार में खो गया

मेरी वाणी और मेरे स्वर में

उनके लिये बेहद प्यार आ गया

परंतु उनका जवाब सुनकर

मैं तो चक्कर ही खा गया

पडोसी का लडका

कालेज के अंतिम वर्ष में

प्रथम श्रेणी में प्रथम आया था

इसी खुशी में मैंने अपनी प्लेट में

यह लडडू पाया था

यह तो तय था कि उसे

कोई अच्छी नौकरी मिल जायेगी

और फिर जिंदगी भर

उससे चापूलसी करवायेगी।

दूसरे पडोसी की लडकी थी अलबेली

उसके अनुत्तीर्ण होने पर

बांटी गई थी जलेबी

उसे कर दिया था

महाविद्यालय से बाहर

इसलिये बहुत खुश थे

उसके मदर और फादर

वह रोज सिने तारिका बनकर

महाविद्यालय जाती थी

हर दिन उनके पास उसकी

नई नई शिकायत आती थी

अब वे कर सकेंगे

उसके पीले हाथ

और फिर तीर्थयात्रा पर

चले जायेंगे बद्रीनाथ।

तीसरा था एक नेता का लडका

पढने लिखने में था एकदम कडका

बडी मुश्किल से निकल पाया था

परीक्षा में केवल पासिंग मार्क्स लाया था

नेता जी खुशी जता रहे थे

लोगो को बता रहे थे

थर्ड डिवीजन में आया है

बडा उजला भविष्य लाया है

बहुत किस्मत वाला है

मुझसे ऊँचा जाएगा

मैं तो केवल नेता हूँ

यह मंत्री बन जाएगा

सबसे कह रहे थे मांगो दुआ

सबको खिला रहे थे

बादाम का हलुआ

मैं जैसे सो गया

अपने ही ख्यालों में खो गया

पहले जनता का बोझ ढोता था गधा

अब गधे का बोझा ढोयेगी जनता

लोकतंत्र का नया रूप नजर आएगा

लोक अब तंत्र का बोझा उठाएगा।

नेता जी यमलोक में

नेता जी की जय हो।

नेता जी की जय हो।

जय जयकार के शोर ने

वातावरण को हिला दिया

यमराज को नींद से जगा दिया।

यमदूत ने बतलाया कि

काल के आदेश पर वह

नेता जी को यमलोक लाया था

उनके चमचों को उनके मरने का

यकीन नही आया था।

उनके द्वारा नेता जी को

अस्पताल ले जाया गया।

डाक्टर द्वारा उन्हें मृत बतलाया गया।

इतना सुनकर चमचे बौखला गए

डाक्टर पर ताव खा गए।

उसे विरोधी पक्ष का जताने लगे

नेताजी की मौत में

उसका हाथ बताने लगे।

चमचों ने पूरे शहर में हंगामा बरपा दिया

दुकाने लूटी, बसें जलाई और

सैंकडों को मौत की नींद सुला दिया

वे सब मरने वाले अब यमलोक में आ गये है

नारे लगा लगाकर यमलोक को हिला रहे है

नीचे नेता जी जनता के दर्शनार्थ रखे हैं

उन पर तरह तरह के फूल चढ रहे है

हंगामें में मरे हुए मरघट में जल रहे है

उनके चमचों के हंगामें से

पूरा यमलोक हलाकान था।

काल, यमदूत और यमराज

हर कोई परेशान था।

बैठक चल रही थी यमलोक में।

पूरा यमलोक डूबा हुआ था शोक में

सर्व सम्मति से निर्णय लिया गया

नेताजी का कार्यकाल बढा दिया गया।

नेता जी अपने शरीर में वापिस आ गए

पर वे जिनके शरीर जल चुके थे

यमलोक में ही छा गए

वे वहाँ हंगामा मचा रहे हैं

और नेता जी यहाँ

नई पार्टी बना रहे हैं।

अधूरा सफर

वह पथिक था जा रहा था

रास्ता सुनसान था घबरा रहा था

तभी उसके कान में कोई फुसफुसाया

और बताया यह तो वह रास्ता है

जिस पर जाते है नेता।

जिस राह पर नेता जाते है

चोर, उचक्के और डाकू

उससे भाग जाते है।

छोटा हमेशा करता है बडों का सम्मान

यही है हमारी सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान।

पथिक को मिली राहत

चली गयी उसकी सारी घबराहट।

चलते चलते आ गया चौराहा

वह घबराया अब कहाँ जाऊँ ?

तभी उसे घेर लिया पक्ष और

विपक्ष के कार्यकर्ताओं ने

उसकी सारी पूंजी छीन ली

चुनाव में प्रचार के लिये।

वे गए तो आ गए किन्नर

धन नही मिला तो

उतार ले गए उसके सारे कपडे।

सामने जो दिखा रास्ता

वह उसी पर भागा और

टकरा गया लुटेरों से

उसे देख वे पहले गरजे

फिर उस पर बरसे -

कैसे की तुमने हिमाकत

चड्डी बनियान पर निकलने की

यह है हमारे गिरोह का निशान

इसे पहनकर तुमने किया है

हमारे गिरोह का अपमान।

वह गिडगिडा रहा था

मुझे भी अपने गिरोह में शामिल कर लो

वे फिर चिल्लाए तुम हो पिटे पिटाये

इसलिये चडडी बनियान में

यहाँ तक हो आये, चुपचाप भाग जाओ।

पहले बनो ताकतवर फिर हमारे पास आओ।

तभी खुल गई नींद

उसका सपना बिखर गया था।

वह बिस्तर के नीचे पडा था।

मेरा देश महान

एक दिन देवर्षि नारद

यूं ही चहल कदमी करने

धरती पर उतर आए।

जहाँ वे उतरे

वहाँ थी चाय की दुकान।

बगल में मिल रहे थे पान।

चाय लेकर वे चुस्कियाँ भरकर पीने लगे

उसके स्वाद में एक नया जीवन जीने लगे।

सामने दीवाल पर लिखा था

काश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है

वे सोचने लगे यह भरत भूमि आज भी कितनी नेक है।

वे चाय वाले से बोले क्यों भाई स्वर्ग चलोगे ?

बहुत दिनों से कोई नही गया

बहुत जगह खाली है

वह बोला मुझे नही जाना।

मेरी चाय के दाम चुकाओ

और अपने रास्ते पर जाओ।

नारद जी सकपकाये और

फिर बडबडाये ऐसा क्यों ?

वह बोला मेरा देश स्वर्ग से भी अच्छा है।

यहाँ हर स्कूल में देापहर का भोजन

मुफ्त पा रहा हर बच्चा है।

वर्ष में सौ दिन मिलता है रोजगार

फोकट में तनखा दे रही सरकार।

कारखाने में अगर नौकरी है पक्की

तो मालिक भी नही निकाल सकता

हमारी यूनियन है तगडी

हमारा कोई कुछ नही बिगाड सकता।

हमारे अधिकार है असीमित हमें कोई नही टोक सकता

काम करो या न करो वेतन कोई नही रोक सकता।

नेताजी की चम्मच बनकर दलाली करो और कमाओ।

मुर्गे फंसाओ, खुद खाओ और नेताजी को खिलाओ

और धन कुबेर बन जाओ

देश में बहुत अच्छे अच्छे कानून है नियम है

पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और अपराधों को

कम कर सकें किसमें इतना दम है।

स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक है स्वतंत्रता से रहते है

जैसा हमारा मन करता है हम उस धारा में बहते है

कदम कदम पर है मधुशाला, चाहे खुद पियो

वरना हाजिर है साकी और बार बाला।

नारद जी अचकचाए, बोले ये लो चाय के दाम

मुझे आ रहे है चक्कर मैं तो चला अपने धाम।

नववर्षाभिनन्दन

आ रहा है नव वर्ष

आओ हम सब मिलकर

नयी आशाओं और अपेक्षाओं के साथ

करें इसका अभिनन्दन।

राष्ट्र को दें नई दिशा

और लायें

नये सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन।

देश में

किसानों, व्यापारियों, श्रमिकों और उद्योगपतियों को

मिले उचित सम्मान

रिश्वत, मिलावट, भाई-भतीजावाद और मंहगाई से

मुक्त राष्ट्र का हो निर्माण।

कर्म की हो पूजा

और परिश्रम को मिले

उचित स्थान

जब राष्ट्र-प्रथम की भावना को

सभी देशवासी

वास्तव में कर लेंगे स्वीकार

नूतन परिवर्तन

नूतन प्रकाश का सपना

तभी होगा साकार

सूर्योदय के साथ हम जागें

लेकर मन में

विकास का संकल्प

तभी पूरी होगी जनता की अभिलाषाए

तब सब मिलकर

राष्ट्र की प्रगति के बनेंगे भागीदार

तभी सच्चा होगा

नूतन वर्ष का अभिनन्दन।

आनंद

आनन्द है

एक आध्यात्मिक पहेली।

दुख में भी हो सकती है

आनन्द की अनुभूति।

सुख में भी हो सकता है

आनन्द का अभाव।

इस पहेली को बूझने के लिये

देखने पड़ेंगे

जीवन के चित्र-

कठिनाइयों और परेशानियों से

घबराकर भागने वाला

जीवन को बना लेता है बोझ

डूबता-उतराता है

निराशा के सागर में,

समझता है संसार को

अवसादों का घनघोर घना जंगल।

जिसमें होता है साहस

जिसमें होती है कर्मठता

जिसमें होती है सकारात्मक सोच

और जिसमें होता है

संघर्ष का उत्साह

वह जूझता है परेशानियों से

हल करता है कठिनाइयों को

और ऐसा करते हुए

सफलता की हर सीढ़ी पर

अनुभव करता है वह

एक अलौकिक संतुष्टि

एक अलौकिक प्रसन्नता

स्वयं पर भरोसा

और एक अलौकिक सौन्दर्य युक्त संसार

यही आनन्द है।

धन, संपदा और वैभव

देते हैं केवल भौतिक सुख

आदमी

आनन्द की तलाश में

जीवन भर भागता रहता है

भौतिक सुखों के पीछे।

सुख भौतिक हैं

वे बाह्य है।

आनन्द आध्यात्मिक है

वह आन्तरिक है।

सुख की अनुभूति होती है

शरीर को

आनन्द की अनुभूति होती है

हृदय को

और हमारी आत्मा को।

आनन्द का उद्गम हैं

हमारे विचार,

हमारे सद्कर्म,

और हमारी कर्मठता।

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