क्षितिज (काव्य संकलन) - 5 - अंतिम भाग Rajesh Maheshwari द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

क्षितिज (काव्य संकलन) - 5 - अंतिम भाग

सफलता का आधार

जब मन में हो दुविधा

और डिग रहा हो आत्म विश्वास

तब तुम करो आत्म चिंतन

और करो स्वयं पर विश्वास

यह है ईश्वर का अद्भुत वरदान

इससे तुम्हें मिलेगा

कठिनाईयों से निकलने की राह का आभास

ये जीवन के अंत तक

देंगे तुम्हारा साथ

कठिनाइयों और परेशानियों को दूर कर

हर समय ले जाएंगे

सफलता की ओर

इनसे मिलेगी तुम्हें कर्म की प्रेरणा

और तुम बनोगे कर्मयोगी

लेकिन धर्म को मत भूलना

धर्मयोग है ब्रह्मस्त्र

वह हमेशा तुम्हारी मदद करेगा

और विपत्तियों को

जीवन में आने से रोकेगा

सफलता सदैव मिलती है

साहस, लगन और परिश्रम से

इससे मिलती है मस्तिष्क को संतुष्टि

और हृदय को मिलती है तृप्ति

यही है जीवन में सफलता का आधार

कल था, आज है और कल भी रहेगा।

मूल मंत्र

सूरज आता है

प्रतिदिन सबको जगाता है

हर ओर बिखर जाती है उसकी किरणें

उसका प्रकाष नही करता है

जाति, धर्म, वर्ग, संप्रदाय या

अमीर गरीब का भेद।

वह उपलब्ध होता है

सभी को समानता से।

वह है एकता और सदभाव का प्रतीक।

उसके बिना संभव नही है

इस सृष्टि में जीवन का अस्तित्व।

उदय और अस्त होकर वह

देता है ज्ञान

समय की पाबंदी का।

देता है संदेष

सतत् कर्मरत रहने का।

अस्त होकर भी प्रकाशित करता है

चंद्रमा को।

समझाता है मानव को

जीवन की निरन्तरता और

कर्मठता का रहस्य।

जीवन की सफलता और

सार्थकता का मूल मंत्र।

अनुभव

अनुभव अनमोल हैं

इनमें छुपे हैं

सफलता के गोपनीय सूत्र

इनमें है अगली पीढ़ियों के लिये

नया जीवन और मार्गदर्शन।

बुजुर्गों के अनुभव और

नयी पीढ़ी का

श्रम व सृजन में

निहित है देश व समाज का विकास

इससे निर्मित इमारत

होगी इतनी मजबूत कि

उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे

आँधी या भूकम्प

ठण्ड गर्मी बरसात और धूप।

अनुभवों को अतीत समझकर

तिरस्कृत मत करो

ये अमूल्य हैं

इन्हें करो स्वीकार और अंगीकार

इनसे मिलेगी

राष्ट्र को नयी दिशा

व समाज को सुखमय जीवन।

ओ मेरे सूर्य

बचपन बीता शिक्षा, संस्कार

और संस्कृति की पहचान में।

यौवन बीता

सृजन और समाज के उत्थान में।

अब वृद्धावस्था में

अपने अनुभव समाज को बाँटो।

युवाओं को दिखलाओ

अपने अनुभवों से रास्ता।

संचालित करो

सेवा और परोपकार की गतिविधियाँ

आने वाली पीढियों के लिये

बन जाआ प्रेरणा।

तुम हो सूर्य के समान ऊर्जावान

अपनी ऊर्जा से

समाज में प्रकाश भर दो।

बचपन की शिक्षा

यौवन का सृजन

और वृद्धावस्था के अनुभव

जब इनका होगा संगम,

तब यह त्रिवेणी

करेगी राष्ट्र की प्रगति

सच हो जाएगा

भारत महान का सपना

युवाओं को सौंपकर देश की कमान

इसे बनाओ विश्व में महान।

संस्कार

हमारे कर्म जन्म देते है

हमारे संस्कारों को।

हमारे संस्कार

निर्मित करते हैं हमारी संस्कृति

और विकसित करते है सभ्यता।

हमारी विकसित और सतत्

विकासशील संस्कृति और सभ्यता

हमारी धरती को बनाती है

संपन्न तथा शक्तिशाली और

सृदृढ करती है उसका आधार।

इससे विपरीत स्थिति में

बढती है विध्वंसक गतिविधियाँ।

गरीबी, मंहगाई, बेरोजगारी और

अनैतिक कार्यकलापों का

आदर्शो से होता है टकराव।

आज सारी दुनिया सिमट गई है

अपनी अपनी सीमाओं में।

संघर्ष चल रहा है

उदारवादी और कट्टरपंथी विचारधाराओं में।

जितना हो रहा है सृजन

उससे अधिक हो रहा है विध्वंस।

यदि विश्व में बहने लगे

शांति, सद्भाव और सुसंस्कृति की बयार

तो सारी दुनिया बन जाए एक उद्यान।

कलयुग में भी आ जाए सतयुग

और स्वर्ग भी उतर आए धरती पर।

आओ हम सब मिलकर करें प्रयास

मिलकर कदम बढाएं और

उतारें वसुधा का कर्ज।

तब निश्चित ही

अपनी धरती बन जाएगी स्वर्ग।

प्रगति की सीढी

अपवादों को छोड दे तो

आज आदमी इसलिये दुखी है

क्योंकि उसका पडोसी सुखी है

किसी के दुख पर सहानुभूति रखना

और उसे प्रगट करना बहुत आसान है

पर बहुत कठिन है

किसी को सुखी देखना।

दुख का कारण सुख का न होना है

सुख का कारण दुख का ना होना है

हम इसलिये दुखी है क्योंकि

हमारी अपेक्षाए हैं अधिक

और योग्यता है कम।

हम नही रख पाते है अपनी

योग्यता और अपेक्षाओं में सामंजस्य

हम नही कर पाते है

सही समय की प्रतीक्षा

अपेक्षाओं की संतुष्टि की

जल्दबाजी में

ले लेते है गलत निर्णय

और उठा लेते है गलत कदम।

सुख का मूल मंत्र है

सीमित अपेक्षाए,

स्वयं की योग्यता की पहचान,

उपेक्षा को सहने की शक्ति

और उचित समय की प्रतीक्षा।

यदि हममें यह आ जाए

तो हम निश्चित सफलता पायेंगें।

प्रगति की सीढियां चढते जायेंगे।

अपने लिये, अपने परिवार के लिये,

अपने समाज के लिये,

और अपने राष्ट्र के लिये

एक सार्थक इकाई बन जायेंगें।

प्रकृति और हम

मेघों से आच्छादित आकाश,

हरियाली से लहलहाती वसुधा,

फल फूल, पत्तों से लदे वृक्ष

पक्षियों के कलरव से चहकता वातावरण

सृष्टिकर्ता का अद्भुत सृजनात्मक वरदान

मानवीय त्रुटि से हो गया असंतुलित।

पर इसे ना समझ सका इंसान

स्वयं के स्वार्थ की इच्छा में

करने लगा प्रकृति का अति दोहन,

प्रकृति से खिलवाड

कही पर खनन, कही पर निर्माण।

अनायास ही हो गया, विकास के साथ साथ

विध्वंस का प्रारंभ, सौन्दर्य का विनाश।

हम भूल रहे हैं -

प्रकृति के अस्तित्व पर ही

अवलम्बित है हमारा अस्त्तित्व

हमें करना होगा जन चेतना का जागरण

बनाना होगा

प्रकृति और विकास के बीच संतुलन

तभी हरा भरा होगा हमारा संसार।

सहज, सुखी और प्रफुल्लित होगा

धडकता हुआ प्रत्येक हृदय,

सांसे लेता हुआ हर जीवन।

युवा

युवा तुम हो शक्ति, क्षमता

और शौर्य से भरपूर

व्यर्थ मत हेाने दो अपनी ऊर्जा।

तुम्हें संवारना है अपना

समाज का, देश का, मानव मात्र का

और इस संपूर्ण सृष्टि का भविष्य।

मत बनो किसी के हाथों की कठपुतली,

जागृत रखो अपना विवेक

निर्धारित करो अपने जीवन का लक्ष्य

और फिर संलग्न हो जाओ

लक्ष्य के संधान में।

तुम्हें करना है नये निर्माण

और देना है समाज को नयी दिशा।

तुम्हारी राह में रोडा बनकर खडे है

भांति भांति के स्वयंभू मठाधीश।

वे तुम्हें दिखलायेंगे

तरह तरह के सब्ज बाग

और फिर तुम्हारे कंधे पर चढकर

बढ जाएंगे आगे

तुम्हें छोडकर अकेला।

तुम्हें रहना है इनसे सर्तक

और बढना है अपने लक्ष्य की ओर,

अपने सृजन और संकल्पों के साथ।

जीवन पथ पर बढो आगे

और अपने कर्मयोग से

स्वयं और समाज को बनाओ

सुखी, समृद्ध और सार्थक।

मैं कौन हूँ

मैं कौन हूँ

आज क्यों मौन हूँ

खोज रहा हूँ

अपने को अपने में।

देख रहा हूँ समुद्र की लहरों में

दूर वहाँ क्षितिज में हो रहा है सूर्यास्त।

चौराहे पर खडा हुआ मैं

अपने भीतर उमडना महसूस कर रहा हूँ

भावनायें और कामनाओं का।

मैं भरपूर हूँ आत्मविश्वास से।

मन में चल रहा है

विचारों का आगमन और निर्गमन।

इन्ही विचारों, कल्पनाओं और हकीकत से

जन्म लेती है कविता

कविता की प्रशंसा करती है भाव विभोर।

उसकी आलोचना देती है नयी शक्ति

और फिर जागता है प्रश्न

मैं कौन हूँ ?

स्वयं की खोज में जन्म ले रही है

फिर एक नयी कविता।

फिर वही प्रशंसा

फिर वही आलोचना

जीवन का यही क्रम है

कल था, आज है और कल भी रहेगा।

सूर्योदय के साथ होगा प्रारंभ

और सूर्यास्त में थम जाएगा।

वसुधैव सः कौटुम्बकम्

ईमानदारी की राह

सच्चाई का संकल्प

धर्मपूर्वक कर्म की प्रवृत्ति

जीवन में लगन और श्रम

तथा सद्कार्यों का समर्पण

कठिन हो सकता है

पर असंभव नही।

हम जागरूक करें अपनी चेतना

होने दे विचारों का

आगमन और निर्गमन।

ये विचार सकारात्मक भी होंगे

और नकारात्मक भी।

नकारात्मक विचारों को

मनन, चिंतन तथा सतत् प्रयास से

बदलें सकारात्मक विचारों में

स्मरण रखें असफलता ही बनती है

जीवन में सफलता का आधार

यह परिवर्तन देगा हमको नई दिशा

करेगा नये संस्कारों का उदय

जिससे होगा हमारा भाग्योदय।

हम धरती के पुत्र है

हम पर वसुधा का कर्ज है

हमें यह कर्ज चुकाना है

अपना फर्ज निभाना है

यह कठिन है पर असंभव नही।

हम उभारें अपनी प्रतिभा

जन्म दे एक नयी मानसिक क्रांति को

हर नागरिक हो स्वावलंबी एवं जागरूक।

धरती पर उदित हो

विकास की क्रांति का नया सूर्य।

जग में गूँज उठे

मानवीयता का गान।

वसुधैव सः कौटुम्बकम् की भावना का

फिर से हो सम्मान।

हिम्मत

हिम्मत एक सच्ची मित्र

सुख और दुख में

सही राह दिखलाने वाली

बढती उम्र में

वक्त भी साथ छोड देता है

पर विपरीत परिस्थितियो में भी

जो निभाती है साथ

देती है शक्ति

और थामे रहती है हाथ

अपनी वसीयत में

धन और संपत्ति से पहले

अपनी अगली पीढी को

सौंप देना इसे

इससे बडी नही है

कोई और दौलत

जीवन भर

निभाएगी उनका भी साथ

और उन्हें दिखलाएगी

सही राह।

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LALIT LUNAVARA

LALIT LUNAVARA 6 महीना पहले

Rajesh Maheshwari

Rajesh Maheshwari मातृभारती सत्यापित 6 महीना पहले