जीवन वीणा - 10 - अंतिम, समापन किश्त Anangpal Singh Bhadoria द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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जीवन वीणा - 10 - अंतिम, समापन किश्त

उस अनंत के अतल गर्त में, इच्छाओं का एक कोष है ।
वही प्रकृति को आमंत्रित कर,उसमें भरता जोश होश है।।
प्रकृति पुरुष संयोग सुहावन, ऐसे रचता सृष्टि सुहानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी ।।

वह व्यापक ही परमेश्वर है, निर्गुण, निराकार,नीरस नर ।
होता जब संयोग प्रकृति का,तो बन जाता वह चेतन घर।।
जैसे बिना यंत्र के बिजली, कभी न करती कारस्थानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी ।।

अहंकार का गद्दा, तकिया, अहंकार का पलंग विछौना ।
अहंकार मण्डित मेरा घर, दूर न इससे हमको होना ।।
अहंकार की निशा अंधेरी, मेरे घर का काला पानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी,कदर न उसकी हमने जानी।।

कहीं पहुंचने से पहले ही, अहंकार जाकर जम जाता।
नहीं बैठने देता हमको, अगर न ऊंचा आसन पाता ।।
मन पर अहंकार की छाया, मन से करवाती मनमानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

अपना मन भी अहंकार का,साथी बन हमको भरमाता।
अहंकार को जो पोषण दे,ये मन ऐसी राह चलाता ।।
झूठ-मूठ सम्मान, प्रशंसा,अच्छी लगती झूठी वानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

फेंक नहीं पाया वीणा को, और बजा भी उसे न पाया।
मन ने वही कराया हमसे,और किया जो उसको भाया।।
संस्कार रवि लगा डूबने, संध्या लगने लगी विरानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

वीणा मेरे साथ सदा थी, सदा रहेगी यह तो तय है ।
इसे बजाना अगर न आया,तो फिर दुख पाना निश्चय है।।
छोड़ न पाते मन की मनसा,चलती है उसकी मनमानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी ।।

अहंकार की अंधी दुनियां, जीवन वीणा की दुश्मन है ।
उसे न इसकी तान सुहाती,कुछ उसकी इससे अनबन है ‌‌।।
सदाचार के सद् प्रयत्न से, अहंकार की टेक मिटानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

सही सही वीणा वादन से, मन में शांति सरलता आती ।
बार बार इसको सुनने से, मन को यह भाने लग जाती।।
नहीं भागता फिर मन अपना, और नहीं करता मनमानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी ।।

मन न लगे तो भी वीणा का, करना है अभ्यास निरंतर।
भाने लग जाएगी मन को,इसे बजाते रहो बराबर ।।
जितनी रगड़ करोगे उतनी,होती जाएगी आसानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

वीणा के झंकृत स्वर हमने, खूब सुने पहचान न पाया ।
सुनता रहा बराबर लेकिन, उसके रस को जान न पाया।।
बिता दिया ऐसे ही जीवन, करता रहा व्यर्थ मनमानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

जीवन वीणा के अंतर में, जाने कितने स्वर गुंजित हैं ।
अलग अलग कर समझ न पाते,एक दूसरे में गुम्फित हैं।।
यत्न प्रयत्न एक नहिं सूझा,समझ न जागी कभी सुहानी।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी ।।

वीणा के तारों को कसना, और बजाना मुझे न आया ।
कोशिश भी थोड़ी सी की पर,अंतर ज्ञान नहीं आ पाया।।
रख दी कहीं एक कोने में, हमने कर के बंद कहानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

जन्मों के संगीत भरे थे, इसीलिए हम डरे डरे थे ।
जब भी इसे बजाया हमने, जाने कितने दर्द झरे थे ।।
भरी हुई है इस वीणा में, जाने कितनी याद पुरानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

भरीं हुईं जीवन वीणा में, जाने कब कब की झंकारें ।
जिन्हें न सुनना चाहे ये मन,सुनना पड़तीं वह टंकारें।।
मन ने कहा छोड़ ये बाजा,घूमो जग बनके सैलानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

आत्म तत्व परमात्म तत्व के,बीच एक सम्बन्ध पुराना।
बाहर भी है अंदर भी है, जन्मों का जाना पहचाना ।।
छूट गई आवाजाही में, सम्बन्धों की कहीं निशानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी, कदर न उसकी हमने जानी।।

भूल गए शायद उसको जो, हृदय गुहा में पड़ा खजाना।
ये तन मन संसारी जीवन, हृदय कोष से है अनजाना ।।
बाहर पसरी पड़ी सृष्टि में, रुचि लेते रहते मनमानी ।
वीणा घर में रखी पुरानी,कदर न उसकी हमने जानी।।१५४।

समाप्त ।