देहखोरों के बीच - भाग - चार Ranjana Jaiswal द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

देहखोरों के बीच - भाग - चार

भाग चार

समय तेजी से भागा जा रहा था।अर्चना काफी समय से नहीं दिख रही थी, पता चला कि वह ननिहाल गई है।मैंने दसवीं की परीक्षा पास कर ली थी।अब मेरे लिए भी संघर्ष की स्थिति थी क्योंकि बाबूजी और भाई मेरे आगे पढ़ने के ख़िलाफ़ थे।मेरे लिए वर की तलाश हो रही थी।बस अम्मा ही चाहती थी कि आगे पढूँ।अम्मा को फ़िल्म देखने और लोकप्रिय साहित्य पढ़ने का बहुत शौक था ।हालांकि वह खुद पांचवीं पास थी पर हम बच्चों को अक्षर- ज्ञान उसी से मिला था ।हिसाब- किताब में भी वह माहिर थी।गुलशन नंदा,रानू,शिवानी के उपन्यास वह दो दिन ही पढ़ डालती।यही कारण था कि वह चाहती थी कि मैं आगे पढूँ।मेरी कविता लिखने की रूचि को बढ़ावा देने का काम उसने ही किया।वह अपने सपनों को मुझसे पूरा करना चाहती थी।विशेषकर अपनी शिक्षा की कमी और उपन्यास की नायिका की तरह आम लड़कियों से अलग-थलग,कुछ विशेष होने का सपना।उसे टीचर और नर्स की नौकरी पसन्द थी।उन दिनों इन्हीं क्षेत्रों में लड़कियों ने काम करना शुरू किया था।यहां वे अन्य नौकरियों की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित मानी जाती थीं।पर ऐसा नहीं था हर जगह देहखोरों की उपस्थिति होती थी। लड़कियों को ही अपनी बुद्धि का उपयोग कर उनसे बचना होता था। थोड़ी- सी असावधानी उन्हें दलदल में धकेल देती थी, फिर उससे उबरना मुश्किल होता था।अम्मा मुझे सुरक्षित रहते हुए आगे बढ़ने की कला सीखा रही थी।मैं गुमराह न होऊं,इसके लिए वह मुझे मर्दों की बेवफाई के किस्से सुनाती थी।उन दिनों 'तोता -मैना की कहानी' वाली कोई पत्रिका आती थी ,जिसमें एक तोता मैना को बेवफाई की कहानियां सुनाता था।बेवफाई स्त्री पुरूष दोनों की होती थी।अम्मा उसे पढ़ती और मेरी चोटी करते समय उनकी कहानी अपने तरीके से सुनाती यानी सिर्फ पुरुषों की बेवफाई के किस्से सुनाती।इसका परिणाम ये हुआ कि मुझे पुरूष जाति से ही नफरत हो गई।मैं कॉलेज,पास-पड़ोस और रिश्तेदार लड़कों तक से बात नहीं करती थी।हर लड़का या पुरुष मुझे गलत ही नज़र आता।मैं उनके बारे में अच्छा सोच ही नहीं पाती थी। मैं विभक्त हो रही थी।मेरे भीतर कई स्त्रियाँ बन रही थी। एक जो प्रकृति ने मुझे बनाया था,दूसरी वह जो माँ मुझे बनाना चाहती थी, तीसरी वह जो पास -पड़ोस और समाज को देखकर मुझमें बन रही थी, चौथी वह जो मुझे शिक्षा और किताबें बना रही थीं।कब कौन सी स्त्री मुझ पर हावी हो जाएगी ,पता नहीं था।
प्रकृति ने मेरे भीतर पुरुष के प्रति आकर्षण पैदा किया था पर बाकी सारी स्थितियां /परिस्थितियां मेरे भीतर उसके प्रति विकर्षण पैदा कर रही थी।
मैं अम्मा से बहुत घुली -मिली थी।उससे कोई भी बात नहीं छिपाती थी।कॉलेज आते- जाते अगर कोई लड़का मुझे छेड़ देता तो वह भी उसे बता देती।अम्मा इसी कारण मुझ पर बहुत ज्यादा विश्वास करती थी।वैसे मेरे साथ इस तरह की घटनाएं कम ही हुई ।इसका पहला कारण तो मेरा सामान्य रूप -रंग और बेहद दुबली -पतली काया थी।हाईस्कूल तक मेरी देह पर यौन- चिह्न दिखाई ही नहीं देते थे।दूसरा कारण कॉलेज से घर तक ही मेरी सीमा-रेखा थी।अम्मा मुझे किसी सखी- सहेली के घर न जाने देती थी ,न उनका अपने घर आना ही उसे पसन्द था।वह कहती कि सखी- सहेलियां ही लड़कियों को बिगाड़ती हैं।लड़के लड़कियों को मिलाने के लिए वे बिचौलिए का काम करती हैं। अम्मा मुझ पर कड़ी दृष्टि रखती थी।फिर भी कभी -कभार कोई घटना घट ही जाती थी।
जब मैं सात साल की थी तो पड़ोस के एक लड़के ने मुझे अठन्नी दिखाकर आँख दबाई ।मुझे कुछ समझ में नहीं आया,पर अच्छा नहीं लगा।मैंने अम्मा को जाकर यह बात बता दी ।थोड़ी देर बाद दोनों की अम्माओं में घमासान छिड़ा हुआ था ।नौवीं में मेरे साथ फिर एक घटना हुई थी।मैं किताबों को सीने से चिपकाए पैदल ही कॉलेज की तरफ जा रही थी कि साइकिल सवार एक लड़के ने जोर से मेरे सीने पर हाथ मारा और भाग गया।मेरी किताबें नीचे गिर गईं।मुझे कुछ समझ ही नहीं आया कि उसने मेरी किताबें क्यों गिराई?अम्मा के बताने पर समझ में आया कि उसका उद्देश्य कुछ दूसरा था।मैंने फिर उस लड़के को बहुत बददुआएँ दीं।उसके मर जाने की कामना तक कर डाली।
अम्मा ने तोता- मैना के साथ सतियों की भी कहानियाँ सुनाई थी।उसकी कड़ी हिदायत थी कि लड़की को सिर्फ पति से ही प्रेम करना चाहिए ,चाहे वह कोढ़ी,बीमार,अत्याचारी कैसा भी हो?
और विवाह से पहले प्रेम का ख्याल भी पाप है।
मैं अम्मा को हर बात बता देती थी ,बस एक बात उससे छिपाई थी कि मेरे सपनों में ,मेरी कल्पना में एक राजकुमार था, जो मुझसे सच्चा प्रेम करता था।हालांकि यह प्रेम दैहिक नहीं था,फिर भी उससे विवाह तो हुआ नहीं था, तो अम्मा की नज़र में तो पाप ही था।मुझे विश्वास था कि मेरा राजकुमार ही मेरा पति होगा और वह औरतखोर नहीं होगा।
हालांकि अम्मा के हिसाब से हर मर्द औरतखोर होता है।बस किसी का पता चल जाता है किसी का नहीं चलता।'पकड़ा गया सो चोर'!
--"लेकिन अम्मा बाबूजी तो ऐसे नहीं ..राम नहीं थे ...कृष्ण नहीं थे।उपन्यासों और फिल्मों के हीरो ऐसे नहीं होते,फिर तुम कैसे कह सकती हो कि हर मर्द औरतखोर होता है...!"
अब मैं इंटरमीडिएट में थी और अम्मा से तर्क करने लगी थी।अब उसकी हर बात मुझे सही नहीं लगती थी।मेरा विवेक जागृत हो चला था।
--जिसको मौका न मिले ,एकांत न मिले,पसंदीदा स्त्री न मिले वह सत्यवान या फिर जिसमें साहस की कमी हो , घर- परिवार, समाज -संसार का लिहाज़ हो या फिर रूप -रंग ,धन- दौलत, ताकत -शौर्य की कमी हो या फिर धर्म भीरू हो,वह सत्यवान!एकनिष्ठ ,पत्नीव्रती!वैसे सिर्फ पत्नी पर ही आश्रित रहने वाले भी देहखोर की श्रेणी में आ सकते हैं क्योंकि वे अपनी पत्नी को मादा से ज्यादा नहीं समझते।
तुम्हारे बाबूजी इतने सीधे -सच्चे हैं न !मुझसे प्रेम भी बहुत करते हैं पर एक दिन उनकी देह की जरूरत को नकार दूं।अस्वस्थता के कारण या बच्चों की माँ के साथ सोने की जिद के कारण उनके कमरे में न सोऊँ तो दूसरे दिन सुबह से ही खाना -खर्चा बंद।बच्चों की जिम्मेदारी तक नहीं उठाते।मुँह सूज जाता है।बातचीत बंद कर देते हैं।यह सिर्फ मेरी ही बात नहीं, हर औरत की यही दास्तान है।पति की इच्छापूर्ति से इनकार करते ही औरत को उसकी औकात दिखा दी जाती है। मर्द देह पाकर ही खुश होता है।अपने प्रेम को भी देह के माध्यम से ही प्रकट करता है!किसी मर्द की पत्नी मर जाती है तो वह दूसरे विवाह में देरी नहीं करता है।भले ही वह घर- गृहस्थी,बच्चों या अकेलेपन की दुहाई दे,पर वास्तव में उसे स्त्री -देह की ही आकांक्षा होती है ....तो फिर वह देहखोर हुआ कि नहीं ।
--मैं शादी नहीं करूँगी अम्मा।किसी देहखोर को खुद पर हावी नहीं होने दूँगी।खूब पढूंगी ....नौकरी करूंगी।तुम्हें अपने पास रखूंगी।
अम्मा हँसने लगती ---देहखोर का पता देखकर थोड़े हो पाता है। फिर हर लड़की को शादी करनी होती है और सब कुछ सहना होता है।यही उसकी नियति है और यही परम्परा है।
--मैं नहीं मानती इस नियति और परम्परा को!लड़की अपना भाग्य खुद निर्मित कर सकती है। अपना पति,भर्ता,कन्त खुद बन सकती है।
अम्मा ने आश्चर्य से मुझे देखा ।उसकी समझ में कुछ नहीं आया था।मैंने उसे समझाया--देखो अम्मा, पति का अर्थ 'रक्षक' होता है पर वह स्त्री का भक्षक बन जाता है।पति को भर्ता भी कहते हैं यानी भरण- पोषण करने वाला।स्त्री आत्मनिर्भर बनकर अपना भरण पोषण भी कर लेगी और अपनी रक्षा भी।पति कन्त(प्यारा)भी कहलाता है पर कितनी स्त्री को मनपसंद कन्त मिलता है।शादी के लिए तो जाति -धर्म ,कुल -गोत्र जाने क्या-क्या देखा जाता है!दोनों के खानदानों के स्तर के मेल पर जितना ध्यान दिया जाता है,उतना लड़के लड़की के मेल पर नहीं।दोनों की कद- काठी,रूप -रंग,विचार- भावना ,रूचि -अरुचि,पसन्द नापसन्द पर ध्यान देने के बजाय धन- दौलत, पद -कद उपहार -दहेज पर ध्यान दिया जाता है।इसी कारण अक्सर शादियां बेमेल होती हैं और दम्पति में वह प्रेम नहीं पनप पाता,जो गृहस्थ का आधार होता है।
---बाप रे !बहुत ज्ञान हो गया है तुमको।इतने ज्ञान के साथ सामान्य जीवन नहीं जी पाओगी!
अम्मा चिंतित हो उठी।तभी पड़ोस की एक औरत चीखती हुई घर में घुसी।उसने बताया कि अर्चना ननिहाल में किसी मुसलमान लड़के से फंस गई थी और उसके साथ भागकर उसने शादी कर ली है।
मैंने लम्बी साँस ली -ओह,तो वह फिर किसी देहखोर के जाल में फंस गई।