इस सुबह को नाम क्या दूँ - महेश कटारे - 2 राज बोहरे द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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इस सुबह को नाम क्या दूँ - महेश कटारे - 2

महेश कटारे -इस सुबह को नाम क्या दूँ 2

रामरज मिसमिसाकर फूट पड़ना चाहते थे। पर जानतेथे कि इससे स्थिति तो बदलेगी नही, उल्टे उन्हीं की हानि होगी। इसलिए घूँट-सा भरकर बोले- ''देखिए मालिक ! कुछ ऐसी-वैसी चींजे जब सरेआम होने लगती हैं, तो संस्था की साख गिर जाती है।''

''सुनो शर्मा जी ! इस तरह के भाषण 26 जनवरी और 15 अगस्त को बच्चों के सामने अच्छे लगते हैं। नेतागिरी और मास्टरी का ऐसा ही दस्तूर है, क्योंकि उन्हें सुनना है और तालियाँ बजानी हैं, फिर दो-दो लड्डू लेकर घर लौटना है। आप मास्टर लोग आधी मिठाई बच्चों में बाँटते हैं और आधी आपस में....है ना ? तो धाँधली यह भी है...हमने तो कभी आप लोगों को रोका नहीं। संस्था की साख वगैरह जो कह रहे हैं आप, वो तभी तो चढ़ेगी-गिरेगी, जब संस्था बनी रहे। संस्था को चलाए रखने के लिए आज के जमाने में हमें कैसे-कैसे निपटना, सुलझना पड़ता है-हमीं जानते हैं। आप लोग तो टहलते-टहलते स्कूल गए और घूमते-फिरते लौट आए, तनख्वाह पक्की। मैं आपको दोष नहीं दे रहा- जमाना ही ऐसा है। कुएँ में भाँग पड़ी है। मतलब यह कि कंपटीशन का जमाना है-वही दुकान चलेगी, जो ज्यादा सुविधा देगी।

शर्मा जी कसमसाए- ''मालिक ! दुकान अच्छे माल से ज्यादा दिन चलती है।''

मंत्री जी ने बात लपक ली- ''वही तो कहना है मेरा। बढ़िया चीज के लिए आदमी आपके पास क्यों आएगा ? अंग्रेजी स्कूलों की कोई कमी है ? तो अपना सब-कुछ छूट पर निर्भर है। देखो ! अपना कंपटीशन माल का नहीं, छूट का है। खैर, तुम्ही, मेरा मतलब, आप ही बताइए कि हमारी पहुँच के बिना चल जाएगी संस्था ? हम ग्रांट न निकालें, तो आप लोगों की तनख्वाह हो पाएगी ? मेरा कहना यही है कि सक्सेना जी हमारे काम में दखल नहीं दे रहे है, तो हमें उनके फटे में पैर क्यों फँसाना ? अभी वे ऊपर को लिख दें कि यहाँ नकल होती है, तो खत्म न हो जाएगा केन्द्र ? क्या कर लेगें आप ? और जब आप बिना केन्द्र के होंगे, तो कौन आएगा आपके पास ? ....मेरी बात समझ रहे है। ना शर्मा जी ! तो यह सक्सेना हमारे सिर पर 20-25 दिन रहेगा। इसे झेलो भाई !''

शर्मा ने त्वरित गणित में पाया कि इस समीकरण में सिध्दान्त बराबर रोटी, रोजी और सुविधावाले अंक हैं। एक के क्रांतिकारकी गुणा या भाग से इसके परिणाम पर कोई अंतर नहीं आने वाला। अत: सम्मानपूर्वक हथियार डालने का प्रस्ताव रखना ही उचित लगा-''ठीक है, मालिक ! मैं कल से अवकाश लिये लेता हूँ।''

मंत्री जी के चेहरे पर कुछ रौनक झलकी-''आप पढ़े-लिखे लोगों में यही तो खामी है-किसी चीज को गलत कहते हो और गलत को रोकने से भाग खड़े होते हो। सही आदमी को गलत का मुकाबला करना चाहिए ना ? ....भला बुरा जैसा भी केन्द्राध्यक्ष है, वह गया, तो उसकी गैर-हाजिरी में चार्ज उप केन्द्राध्यक्ष को ही सँभालना पड़ेगा ना ? ... मैंने उन्हें भरोसा दिलाया है कि शर्मा जी थोड़े सिध्दान्त वगैरहवाले होने से कड़े जरूर है, पर आदमी भले हैं। चोर हो या साहूकार, किसी को फँसा नहीं सकते। तभी तो सक्सेना साब केन्द्र की सरकारी रकम तक बिना रसीद और लिखा-पढ़ी के दे गए हैं आपके लिए।''

शर्मा ने मन ही मन गाली बकी- साले, लाख की बिना लिखा-पढ़ी वाली रकम डाकार गए और कायदे की दो चार हजार वाली सौंपकरर हरिश्चंद्र हो रहे हो ! इसमें से कोई इधर उधर कर भी ले, तो दो-चार सौ से ज्यादा क्या कर लेगा ? और यही तो वह चाहते हैं कि डाके डाल मुहरें खुद समेंटे और कौड़ियों के छींटे छिड़क दूसरों को भी दागी बना संघाती कर लें। पर शर्मा करें तो क्या ...? नाक की नकेल तो इन्ही के हाथों में है....जरा भी पुट्ठे आड़े-टेड़े किए तो वह झटका लगेगाा कि नकलोहू बगरता दिखेगा।

शर्मा को गुमसुम देख मंत्री जी अपनापे से पोता फेरा-''देखो, हम जानते हैं कि आप ईमानदार हैं। तभी तो भरोसा है हमारा कि सब सँभल जाएगा।''

शर्मा चुप रहते हुए स्वयं को किसी आगत संगट के लिए तैयार करने लगे। मालिक जब भी कठोर से कोमल होते हैं, तब मानो भली करेंगे राम' कहकर सूली पर चढ़ाने का कोई उपक्रम होता है। यह तो स्पष्ट था कि अगले तीन प्रश्नपत्र ही कठिन हैं, जिन्हें सफलतापूर्वक निकाल लें-जाने के लिए युध्द और प्रेम की मिसाल पर हर चीज़ जायज मानी जाती है और जायज होने के चोर तर्क भी होते ही हैं, पर सबसे बड़ा तर्क लाठी के हाथ में होने का है। स्पष्ट था कि अगले कठिन मोर्चे, जिसमें साम-दाम-दंड-भेद सभी कुछ भरपूर अपनाया जाना है और इसी मुकाम पर सक्सेना दाम समेट, शर्मा को साम अथवा दंड भेद के हवाले कर गया है। इन्हीं दिनों में नकल रोकने वाले उडनदस्ते भी अधिक सक्रिय होते हैं- संचालक, संयुक्त संचालक या कहो कलेक्टर आ धमके ! उड़न दस्ते के साथ आने वाला चपरासी भी अपने को कलेक्टर से कम नहीं समझता। गरीब मास्टर क्या करे ? जो भी हो, अजगरों की इस घाटी में घुसना ही है, क्योंकि ठीक पीछे शेर गुर्रा रहा है। विनय या प्रबोध से अब कुछ होना-जाना नहीं है।

मंत्री जी ने वास्कट की जेब से लिफाफा निकाल शमा्र की ओर बढ़ाा दिया-''यह चार्ज वाला कागज है। रकम बाबू के पास है...जब तक केन्द्राध्यक्ष नहीं लौटते, आप ही सर्वेसर्वा हैं-काला पीला कुछ भी करने के लिए। ''मंत्री जी मुस्कराए ।

शमा्र जाल में ॅँसे कबूतर की तरह फड़फड़ाकर रह गए। ऐसी नौकरी पर लात न मार पाने की कायरताा का राग हमेशाा की तरह फिर उनके मन में बज उठा। सुबह का हौलनाक दृश्य अभी से उनकी ऑंखों के आगे था, जबकि वह पुलिस-गार्ड सहित 35-40 कर्मचारियों की सेवा-पुस्तिका और लगभग 400 परीक्षार्थियों की उत्तर-पुस्तिका पर कुछ रिमार्क लिखने के अधिकार से सम्पन्न होंगे और कुछ भी सच लिख देना उनके लिए किसी भी हद तक खतरनाक साबित हो सकता है। खुद शर्मा सहित सब जानते हैं कि वह किसी के विरू( नहीं लिख सकते...क्योंकि वह उस भीड़ के बीच होगे, जिनके पास जैसे भी हो, सुविधा पाने केक तर्क की आक्रामकता है।

भारतीय दण्ड विधान के अनुसार बलवे में कोई एक नामजद नहीं होता और संख्या-बल के राजनीतिक नियम किसी हत्या व बलात्कार तक को उचित ठहरा सकते हैं। आक्रमण का तर्क व्यक्ति के दादे, परदादे, दसदादे या सौदादे के द्वारा कुछ कहे गए या किए गए तक से जोड़ा जा सकता है। तात्कालिक लाभ की इस चौपड़ पर शर्मा नाम की गोटी को हर हाल में पिटना है तथा पिटने के पूर्व निश्चित भविष्य के साथ, महत्वपूर्ण गोटी की ऐंठवाली विदूषक भूमिका निभाते हुए कल के दृश्य में उपस्थित होना है। दूसरी गोटियों की ऑंखों में उसके प्रतिर् ईष्या का विद्रूप उपहास होगा या करूण उपेक्षा। शर्मा स्वयंवर में जुटे धुनर्धरों के सिर के ऊपर घूमती ऐसी मछली है, जिसकी ऑंख को किसी न किसी बहाने बिधना है।

मंत्री जी के हाथ से लिफाफा ले शर्मा खड़े हो चुपचाप सीढ़ियाँ उतर गए। अपने कमरे पर पहुँच उन्होंने स्वयं को आराम कुर्सी के हवाले कर दिया। भगोना चपरासी ने पानी का गिलास लाकर दिया और स्टोव पर चाय चढ़ाने चला गया। भगोना को कागजी दाँव-पेंच की बारीकी तो नहीं मालूम, पर इतना समझ गया है कि उसके साहब को बधिया करने के ब्यूह रचे जा रहे हैं।

उम्र में शर्मा से बड़ा होने के कारण वह समझाना भी चाहता है कि जिस पटरी पर दुनिया दौड़ रही है, तुम भी ढरको, सुबह-शाम राम का नाम लेते हुए ठकुरसुहाती पढ़ो और मजे करो, पर इनके माथे में जाने कौन-सा कीड़ा कुलबुलाता रहता है। ये कानून, ये नियम, इतना पढ़ा-लिखा होने पर भी नहीं समझते कि जिंदगी नियम-कानूनों से नहीं, व्यवहार से चलती है। भगोना कुछ नहीं कह पाता। जानता है कि साँड द्वारा रगेदे जाने की खींझ बछड़े पर उतरेगी।

''सुनो ! बाबू जी को बुला लाना!'' भगोना ने शर्मा का आदेश सुना।

''जी, फिर पूछा- कल गणित का पेपर है साब ?

''हाँ, क्यो ....? तुम्हें गणित में क्या दिलचस्पी है ? '' शर्मा ने थोड़ा हँसकर मन का बोझ हल्का करने की चेष्टा की।

''कुछ नहीं ! इसलिए कहा कि इसी पर्चे के लिए ज्यादा मारामारी होती है।''

''होती है, ताो होने दो। होनी को कौन टाल पाता है ? '' शर्मा ने भगोना के साथ स्वयं को भी दिलासा दिया।

''हाँ साब ! सो तो है।'' भगोना इस तरह सिर हला उठा, जैसे पूरा भरोसा न होने के बावजूद उसे काटने के लिए कोई सर्वकालिक तर्क न होने की दशा में इस अर्ध्दसत्य को स्वीकार करने की विवशता हो। इसी समय बाबू जी ने आकर नमस्कार किया।

''लो भगोना, तुम्हारे जाने की जरूरत नहीं रही। ये खुद आ गए।'' कहकर शर्मा ने बाबू को कुर्सी पर बैठने का संकेत किया।

''सर ! वो केन्द्राध्यक्ष कैश दे गए हैं....आप सँभाल लें...कल के लिए डयूटी-चार्ट भी तैयार करना है...किस टीचर को किस कक्ष में रखा जाए ?'' बाबू ने बैठते ही टुकड़ो-टुकड़ों में नोटशीट बोल दी।

''डयूटी-चार्ट तैयार तो कर लिया होगा न आपने ? शर्मा ने टटोलती नज़रों से बाबू की ओर देखा।

''सर ! वो कच्चा तैयार किया है .... मंत्री जी ने कहा था कि नवावबसिंह बनवा देगें, सो उनके साथ बैठकर....फाइनल तो आप ही करेंगे। दस्तखत आपका होना है।'' बाबू ने कैफियत बताई।

नवाबसिंह का नाम और सूरत आते ही शर्मा की नस तड़क उठी। इस आदमी की आचार-संहिता में कुछ भी अकरणीय नहीं है, बशर्ते किसी दूसरे को हानि हो। स्वयं मंत्री जी को यह बहुत शातिर ढंग से धोखा दे चुका है। उस समय मालिक इसे संस्था से निकालने पर आमादा थे और शर्मा ने इसे बाल-बच्चों का हवाला देकर बचाया था, क्योंकि एक गुण तो मालिक में है कि जो उनकी प्रजा में शुमार हो, मुँह में तिनका दाब ले, उसकी जान बख्श देते हैं।

''सर ! कल वैसे भी मुसीबत वाला पेपर है। लड़के मानेंगे नहीं।'' बाबू जी की आवाज़ में बाढ़ में उफनती नदी तैरकर पार करने की बाध्यता जैसी घबराहटल थी।

''आप तो अपना रिकॉर्ड टन्न रखिए....बस !''

''साब ! लड़के बेइज्जती कर सकते हैं, आपकी....और....''

शर्मा कुर्सी पर सीधे हुए-''देखो बाबू जी ! मैं एक परिणाम पर पहुँचा हूँ कि मास्टर एक निरीह नौकर है। उसे इज्जत-विज्जत जैसी भारी चीजों का बोझ अपने कंधों पर नहीं लादना चाहिए। वह थानेदार नहीं है कि डंडा, कानून और शरीर के जोर पर इज्जत को खाद-पानी देता रहे। यह मान लो कि हम नौकरी कर रहे हैं। मालिक को राम मानो और जैसे वह चाहें, वैसे रह लो। इस बीच क्या ऑंधी-तूफान आता है...देखते हैं।'' शर्मा ने मुस्कराहटल से वातावरण हल्का बनाने का प्रयास किया।

बाबू फिर भी आश्वस्त नहीं हुआ-''दिक्कत यह है साब कि स्टाफ खुद नकल कराता है। कुछ लड़के स्टाफवालों के हैं, कुछ कार्यकारिणी वालों के। वो पुलिस-जीप में आनेवाला डिप्टी का लड़का है ना ! कल के लिए उसने गणित वाले शर्मा जी को सूट का कपड़ा दिया है।''

''ठीक है यार !....कल की कल देंखेगे। खामखा अभी से मगजमारी क्यों करें ? कैश अपने पास ही रखिए। भुगतान कैसा भी हो, रसीद जरूर लगाते चलना।''