इस सुबह को नाम क्या दूँ - महेश कटारे - 1 राज बोहरे द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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इस सुबह को नाम क्या दूँ - महेश कटारे - 1

महेश कटारे - इस सुबह को नाम क्या दूँ 1

रामरज शर्मा अभी अपना स्कूटर ठीक तरह से स्टैंड पर टिका भी नहीं पाए थे कि उनकी प्रतीक्षा में बैठा भगोना-चपरासी खड़ा हो, चलकर निकट पहुँच गया-''मालिक आपकी बाट देख रहे हैं ....बहुत जरूरी में ....मैं यहाँ चार बजे से बैठा हूँ।'' भगोना ने सूचना, कार्य की गंभीरता और उलाहना एक साथ बयान कर दिया।

''क्यो ?'' स्कूटर के सही खड़े होने के इत्मीनान की खातिर उसे जरा-सा हचमचाकर परखते हुए शर्मा जी ने पूछा।

भगोना कोई उत्तर न दे चुपचाप खड़ा रहा। वह चपरासी है-उसे तो सौंपी गई जिम्मेदारी की भरपाई करनी है। यहाँ नौकरी करते-करते वह समझ गया है कि वह इधर- उधर का न सोचे, न करे। क्या पता, कौन-सा ठीकरा फूटे और उसके सिर पड़ जाए ? चेरी को चेरी ही रहना है...तौनार-बधार के रानी तो हो नहीं सकती।

''ठीक है...देखता हूँ.....तुम शाम के लिए दूध लाकर रख देना....खाना मत बनाना !'' कहकर डिग्गी में से थैला निकाल रामरज शर्मा ने भगोना को पकड़ा यिा-''सुनो ! कमरे में झाडू भी लगा देना, जो तुम अक्सर दूसरी सुबह के लिए छोड़ देते हो !'' कह शर्मा जी मुस्कराए, तो भगोना भी मुस्करा दिया।

रामरज शर्मा उन्हीं पैरों हवेली की ओर हो लिये। मन में अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क थे- ''ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी कि आज छुट्टी के दिन भी इंतजार में बैठे हैं ? मालिक द्वारा प्रतीक्षा उन्हें अक्सर किसी न किसी धर्मसंकट में डालती रही है। मालिक उनकी संस्थाा की प्रबंध समिति के मंत्री हैं अर्थात् प्रबंधक हैं। पूरी समिति उनकी अपनी है। उनके हलवाहे-चरवाहे तक प्रबंध समिति यानी कार्यकारिणी के सदस्य हैं। हालाँकि विधान के अनुसार रामरज शर्मा ''प्राचार्य'' भी सदस्य है, पर जो मालिक ने कहा, वही मत हलवाहों से लेकर लठैतों का। रामरज शर्मा ने कभी-कभार लठैतों को मत मोड़ने या अपना कोई मत बनाने के लिए उत्साहित भी किया है, जिसका अर्थ लठैत तो नहीं समझे, पर लठैतों के जरिए बात मालिक तक जरूर पहुँची है तथा किसी को स्वतंत्र मत रखने की सलाह देने का परिणाम मालिक हर बार रामरज शर्मा को प्रतीकात्मक रूप में या खुले-खुले समझा चुके हैं।

मालिक के यहाँ कोई नियम-कानून नहीं होता, इसलिए रामरज शर्मा का एक दायित्व वह रास्ता तलाशना भी होता है, जिसमें नियमानुसार नियम तोड़ा जा सके। कभी-कभार मामला ऐसा फँस जाता है कि रामरज शर्मा के हाथ में सिर्फ गिड़गिड़ाना रह जाता है- ''मालिक ! आप जो कह रहे हैं वह तो ठीक.....पर ऐसा करने से मेरी नौकरी बन आएगी।''

मालिक का सीधा उत्तर होता है- ''जब हम हैं, तो नौकरी कौन ले सकता है ? कोई अधिकारी खुट-पच्चड़ करो, तो हम देख लेंगे । हमें क्या अपनी संस्था की चिंता नहीं है ? अच्छा, हम लिखकर दिए देते हैं-ऑर्डर तो मानोगे ? ठीक !'' और तब रामरज शर्मा पापी पेट और अपनी नपुंसकताा पर मन ही मन लानतें भेजते हुए सफेद कागज पर काली या नीली कुछ ऐसी इबारत उतार लेते हैं, जो उनकी नौकरी बनाए रखने में सहायक हो सके। मंत्री जी बिना इबारत पढ़े उसके नीचे बैठ जाते हैं-ठाकुर राजेन्द्रसिंह ! इसके बाद रामरज शर्मा उर्फ प्राचार्य, हायर सैकेण्ड्री स्कूल झंगवा की जिम्मेदारी है कि वह मालिक के तात्कालिक व भविष्य के हितों की रक्षा करें।

रामरज शर्मा हवेली पहुँचे, तो पाया कि मालिक सचमुच बारादरी के आगे वाले चौतरे पर एक आरामकुर्सी में अधपसरे थे। उनसे पाँच हाथ की दूरी पर राइफल से सजा जीवनसिंह पटिया पर बैठा था। कार्यकारिणी सदस्य और हलवाहा नेतराम बगल में जमीन पर बैठा बीड़ी फूँक रहा था।

''मालिक, शर्मा जी आ गए !'' नेतराम ने बीड़ी का ठूँठ जमीन पर रगड़ते हुए सूचना दी।

दो-तीन सीढ़ियाँ चढ़ रामरज ने अपनी ओर गर्दन घुमाते मंत्री जी को अभिवादन किया-नमस्कार मालिक साहब !'' और यथासंभव दीनता के साथ प्राचार्य पद की गरिमा का समन्वय करते शेष सीढ़ियाँ चढ़ गए।

''अच्छा, आ गए शर्मा जी ? चलो ठीक है ! अरे भाई, इम्तहाज के समय में तो आप लोगों को हेडक्वाटर्रर पर ही रहना चाहिए। खैर ....घर-गिरस्ती भी देखनी पड़ती है...हम तो बड़ी चिंता में थे....आप आ गए, अब कोई चिंता नहीं। ''मंत्री ने अपनापन प्रकट करते हुए सामने पड़ी कुर्सी पर बैठने का संकेत किया।

इन कुर्सियों को देखते ही रामरज के मन में कोई काँटा-सा कसक जाता है। उन्होंने बड़े मन से ये सोफानुमा कुर्सियाँ विद्यालय के स्टाफ रूम के लिए खरीदी थीं। महीने-भर के भीतर-मंत्री जी के यहाँ कुछ ऐसे मेहमानों का आगमन हुआ, जिनके बैठने-बिठाने को गरिमामय बनाने केक लिए यही कुर्सियाँ उपयुक्त समझी गई। तब से दो साल बीत गए, कुर्सियाँ विद्यालय की ओर नहीं लौटीं। दो एक बार रामरज ने दबे स्वर में स्मरण दिलाया, तो मंत्री जी की चढ़ती भौहों के तेवर भाँप उन्होंने इश्यू रजिस्टर पर खानापूरी कर दीं।

हाँ मालिक ! क्या हुकुम है ? '' जबरिया मुस्कान के साथ रामरज शर्मा ने पूंछा।

प्रबंधक जी के चेहरे पर करूणा और सहानुभूति छलक आई-''अरे, वो अपने सक्सेना साहब हैं ना-केन्द्राध्यक्ष, अचानक बीमार पड़ गए। वैसे भी वह तो क्या कहते हैं...ब्लड प्रेशर के मरीज हैं। हमारी बात का मान रखते हुए ही यहाँ के लिए केन्द्राध्यक्ष बनकर आए थे। भले आदमी हैं-सब-कुछ आपके स्टाफ पर ही छोड़ दिया था कि नियमानुसार जो करना है, करो। सुनते हैं, कल की परीक्षा के बाद आपने उनसे कुछ कह सुन दिया था। अरे भाई ! वे बाहर केक आदमी हैं .......मेहमान हैं। आपके किसी लड़के ने कहीं नकल-वकल कर ली, तो कौन-सा पाप हो गया ? सक्सेना साहब पर दोष लगाने की क्या जरूरत थी ? अब ये नकल-वकल अकेले यहीं तो नहीं हुई....सब दूर चल रही है। लड़के पास होने के लिए ही तो पढ़ते हैं....फिर आप भी सहायक केन्द्राध्यक्ष हैं....ऐसी चीजों का ध्यान आपको भी रखना चाहिए।''

रामरज उनके चेहरे पर ऑंखें टिकाए सुन रहे थे। प्रबांक जी कहीं और देख रहे थे। रामरज उनकी इस आदत से परिचित है कि मालिक कमजोर के मर्म पर हल्की सी चोट कर उसे लाचार बना बिल्ली और चूहे का खेल खेलते हैं।

''मैं ठीक कह रहा हूँ ना ?'' प्रबंधक जी रामरज की ऑंखों में झाँक उठे। रामरज समझ गए कि अब वह किसी भी क्षण उन पर कैसा भी वार कर सकते हैं।

मालिक, पूरी बात शायद आपको पता नहीं है। केन्द्र पर हर लड़के से दो हजार की वसूली हुई है। देने वालों को नकल की छूट है। कुछ लड़के गरीब हैं...दे नहीं सकते। उन्हें दबाया और परेशान किया जाता है। उनकी उत्तर पुस्तिका खराब करने की धमकी दी जाती है। आप जानते हैं कि इतना भ्रष्टाचार मैं नहीं सह पाता-इसलिए परीक्षा के समय मैं बाहर निकलता ही नहीं। मान लेता हूँ कि ऑंखों की ओट में कुछ भी होता रहे, पर कल कुछ लड़के मेरे पास आए थे... रो रहे थे। गरीब लड़के हैं....कैसा भी सही, मैं उनका मास्टर हूँ, संस्था का प्रधान हूँ। लड़कों के प्रति मेरी कुछ जिम्मेदारी बनती है ना ? सक्सैना तो धाँधली मचाए है !'' रामरज ने भरसक विनम्रता के साथा सफाई दी।

प्रबंधक जी ने नाक का बढ़ा हुआ बाल झकाा मारकर उखाड़ा और उसे चुटकी में बत्ती की तरह बँटते अपनी ऑंखें जरा चौड़ी कर दीं- आपकी संस्था में कोई बाहर से आकर क्यों धाँधली कर लेगा ?''

''बाहरवाला आए, तो धाँधली ही कता है, क्योंकि उसे चले जाना है।'' रामरज ने कार्य कारण का तर्क रखा।

''देखों शर्मा जी ! हम तो एक बात जानते हैं क वसूली सेस छूट या तो सबको मिले या किसी को नहीं। नियम सबके लिए बराबर होना चाहिए। इस साल तुमने गरीब कहकर दस छोड़े, तो अगले साल बीस खड़े हो जाएँगे। व्यवस्था ही भंग हो जाएगी। लड़कों को नकल के लिए तो केन्द्र चाहिए तो केन्द्र के लिए पैसा चाहिए। गलत काम से कोई सेंत-मेंत तो ऑंखें मूंदेगा नहीं ? हम तो यह जानते हैं कि आपको मेहमान का आदर करना चाहिए।''