चलो, कहीं सैर हो जाए... 6 राज कुमार कांदु द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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चलो, कहीं सैर हो जाए... 6



माताजी का दर्शन कर उनकी नयनरम्य छवि को अपनी आँखों में बसाये हम लोग गुफा से बाहर आये । गुफा के प्रवेश मार्ग के दायीं तरफ से ही निकास का मार्ग बना हुआ था । यात्रियों की कतार निकलने के लिए भी उतनी ही उतावली थी । कुछ उत्साही यात्रियों को आगे जाने का मार्ग देकर हम लोग भी कतार में ही सीढियों से निचे उतरे ।

लगभग 30 सीढियाँ उतरने के बाद कुछ कदम ही आगे बढे होंगे की बायीं तरफ कुछ पुजारी कतार में चल रहे यात्रियों को प्रसाद और माताजी की तस्वीरयुक्त सिक्के वितरित कर रहे थे । इसके सामने ही एक विशेष कक्ष बना हुआ था जहाँ पूर्व में मिले टोकन को जमा कराकर नारियल का प्रसाद वितरित किया जा रहा था । माताजी की तस्वीरयुक्त सिक्के का प्रसाद पाकर हम लोग अति हर्षित हुए और मन ही मन मंदिर प्रबंधन के इस कदम की सराहना करते हुए आगे बढे । थोड़ी ही देर में हम लोग मंदिर परिसर में ही बाहर की तरफ आ गए थे ।

दायीं तरफ निचे की तरफ कुछ सीढियाँ उतरती दिखीं । बगल में ही महादेव मंदिर की तख्ती लगी थी । माताजी के दर्शन के पश्चात तुरंन्त ही जगदीश महादेव के दर्शन का मौका हम लोग गंवाना नहीं चाहते थे । सो थकान महसूस करने के बावजूद लगभग डेढ़ सौ सीढियाँ उतरकर हम लोगों ने महादेव बाबा के दर्शन किये । यह शंकर भगवान का एक छोटा सा मंदिर था । दर्शन के पश्चात हम लोग आगे बढे ।

थोड़ी ही दूर बाहर की तरफ आने पर हमें एक दान कक्ष दिखाई पड़ा । जहां लोग अपनी मर्जी से यथाशक्ति दान की रकम देकर पर्ची कटा रहे थे । उसके बगल में ही मंदिर प्रशासन द्वारा संचालित यात्रियों के लिए मुफ्त औषधालय बना हुआ है ।

हम लोग और आगे बढ़ते कि हमें चार मजदूर एक स्ट्रेचर पर एक वृद्ध को उठाये भागते चले आ रहे दिखे। पीछे पीछे उस वृद्ध के परिजन भी थे । पता चला उस वृद्ध को दमा की बीमारी थी जो अब बढ़ गयी थी । उसे तुरंत अति दक्षता विभाग में दाखिल कर इलाज शुरू कर दिया गया । डोक्टरों और सहयोगियों का मधुर व्यवहार हमें काबिले तारीफ़ लगा । मंदिर प्रशासन के इस नेक प्रयास की हम सबने जी भरके तारीफ़ की ।

सुबह के लगभग आठ बजनेवाले थे । अस्पताल के बगल में ही भोजनालय देख हम सभी मित्र नाश्ता करने के लिए अन्दर घुसे । यहाँ हॉल में कोई कर्मचारी नहीं था । काउंटर पर पैसे देने के बाद मिली पर्ची को दिखाकर किचन के कर्मचारी से नाश्ता स्वयं ही लाना था । यहाँ से नाश्ता करके हम लोग आगे लाकर रूम तक पहुँच गए ।

यहाँ अभी भी कतार लगी हुयी ही थी । लाकर से अपना सारा सामान लेकर हम लोग मन ही मन माताजी से विदा लेकर भैरव घाटी की तरफ प्रस्थान किये । हम लोग जहां से कतार में घुसे थे उसी रास्ते से होकर आगे भैरव घाटी की ओर जाना था । दायीं तरफ वो रास्ता था जिस रास्ते से हम लोग आये थे । उस रास्ते पर न जाकर हम लोग सीधे बढ़ते रहे ।

बायीं तरफ बड़ी बड़ी प्रसाद सामग्रियों की दुकानों और निजी होटलों की कतार थी । रास्ते पर भीड़ अब कुछ अधिक ही हो गयी प्रतीत हो रही थी । कुछ दूर जाकर होटलों और दुकानों की श्रंखला समाप्त हो गयी थी । अब रास्ते में घोडेवालों की भरमार दिखाई पड़ रही थी । कुछ लोग घोडेवालों से मोलभाव करते भी दिखे ।

थोड़ी ही दूर पर एक दोराहा था । एक रास्ता सीधे और दूसरा रास्ता बायीं तरफ चढ़ाई पर था । सीधे जानेवाला मार्ग हेलीपैड की ओर जाता था जो वहां से तीन किलोमीटर दूर था । वैष्णोदेवी के लिये चलायी जा रही हेलीकाप्टर सेवा सांझी छत तक ही यात्रियों को पहुंचती है । सांझीछत से भवन तक का तीन किलोमीटर का फासला यात्रियों को स्वयं ही पैदल या घोड़े पर तय करना होता है ।

इस रस्ते के मुकाबले भैरव घाटी का मार्ग काफी कठिन और खड़ी चढ़ाई वाला है । माताजी के दर्शनों के बाद भैरव घाटी जाकर बाबा भैरव नाथ के दर्शन करना अति आवश्यक है । ऐसी मान्यता है की भैरव बाबा के दर्शन किये बिना माताजी की यात्रा फलित नहीं होती ।

इस मान्यता को बल देने के लिए एक कहानी प्रचलित है । इस कहानी के अनुसार आज के कटरा शहर से दो मिल दूर हंसाली नाम का एक गाँव था । इस गाँव में पंडित श्रीधर नाम के एक निर्धन निस्संतान ब्राह्मण रहते थे । पंडित श्रीधर माता जी के परम भक्त थे । माताजी का पूजन व्रत नियमित व विधि विधान से करते थे । एक बार नवरात्रि व्रत के समापन के दिन पंडितजी ने नौ छोटी कन्याओं को भोजन के लिए बुलाया । यूँ तो पंडितजी पुरे गाँव के लोगों को भोजन कराना चाहते थे लेकिन आर्थिक कारण से मजबूर थे ।

भोजन करने के बाद सभी कन्या पंडित श्रीधरजी को आशीर्वाद दे चली गयीं । एक छोटी सी कन्या वहीँ बैठी रही । कन्या के चहरे से अप्रतिम तेज झलक रहा था । पंडितजी खासे प्रभावित दिख रहे थे सो विनम्र निवेदन कर उस कन्या से वहां बैठे रहने का कारण पूछा ।

कन्या जो की वास्तव में माता वैष्णोदेवी ही थीं पंडितजी की भक्ति और श्रद्धा से प्रसन्न होकर स्वयं कन्या का रूप धर वहाँ पधारी थीं कन्या रूप में ही श्रीधर को आदेश दिया ” आसपास के सभी गाँव के लोगों को कल माताजी के भंडारे का न्यौता दे आओ ।”

पंडितजी कसमसाये ” ऐसा कैसे होगा ? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है । मैं एक निर्धन ब्राह्मण भला इतने अधिक लोगों के भोजन का प्रबंध कल का कल कैसे कर सकता हूँ ? मुझे माफ़ करिए ।”

कन्या हौले से मुस्करायी और सुमधुर वाणी में बोली ” आपको कुछ नहीं करना है । बस आप सभी ग्रामवासियों को भोजन के लिए आमंत्रित कर आइये और सारा कुछ मुझ पर छोड़ दीजिये । सब ठीक हो जायेगा । मुझ पर भरोसा रखिये । ”

उस छोटी सी कन्या के आभामंडल के वशीभूत पंडितजी तुरंत ही उस कन्या के कहे अनुसार आसपास के गाँव में गाँव वालों को कल के प्रायोजित भंडारे के लिए न्यौता देने चल पड़े ।

हंसाली गाँव से करीब के ही बारह अन्य गांव के सभी लोगों को अपने घर पर आयोजित माताजी के भंडारे की जानकारी दी और उन सबसे पधारने और भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया ।

शाम हो गयी थी । त्रिकुटा पर्वत की तलहटी में स्थित अपने गाँव वापस आते हुए पंडित श्रीधर जी बाबा भैरवनाथ के आश्रम के सामने से गुजरे । बाबा भैरवनाथ गुरु गोरखनाथ के शिष्य थे । भैरवनाथ कई सिद्धियों और तांत्रिक शक्तियों का मालिक था । असीम बलशाली और मायावी था बाबा भैरवनाथ ।

बारह गाँव के सारे लोग कल मेरे यहाँ भोजन करेंगे तो क्यों न इन साधुओं को भोजन कराके थोडा और पुण्य अर्जित कर लिया जाये । यही सोचकर पंडितजी बाबा भैरवनाथ के आश्रम में प्रवेश कर गए और प्रणाम कर उन्हें अपने आने का प्रयोजन बताकर अपने घर पधारने और भोजन करने का आग्रह किया ।

क्रमशः