चलो कहीं सैर हो जाए ... 2 राज कुमार कांदु द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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चलो कहीं सैर हो जाए ... 2



स्टेशन से बाहर निकलते ही बायीं तरफ अमानत घर दिखाई दिया । वैसे तो हम लोग घर से ही काफी कम सामान लेकर आये थे फिर भी आगे पहाड़ी चढ़ने में दिक्कत न हो इसलिए अतिरिक्त सामान को यहीं अमानत घर में ही जमा करने का निर्णय लिया गया ।

अमानत घर में सामान जमा कराने के लिए पहचान पत्र की फोटो कॉपी और लगेज बैग में ताला लगा होना अति आवश्यक है । खुशकिस्मती से मेरे पास पहचान पत्र की एक फोटोकॉपी थी । खुशकिस्मती इसलिए क्योंकि जम्मू स्टेशन के नजदीक फोटोकॉपी की कोई दुकान नहीं है ।सभी लोगों ने सिर्फ दो सेट कपडे छोटे थैलों में लेकर बाकि सभी सामान कुछ तालाबंद थैलों में रखकर अमानत घर में जमा करा दिया ।

स्टेशन के सामने ही सूमो और अन्य टूरिस्ट गाड़ियों की कतार लगी हुयी थी । निजी वाहन चालकों द्वारा ठगी के किस्से बहुत सुन रखे थे सो हम सामने ही मैदान में खड़ी सरकारी बसों की और बढ़ गए । दो तरह की बसें उपलब्ध थीं ।सामान्य और सेमी लक्ज़री बस । दोनों के किराये में सिर्फ दस रुपये का ही फर्क था सो हम लोग बिना देर किये सेमी लक्ज़री बस की और बढ़ गए । कुछ देर में ही बस सवारियों से पूरी भरने के बाद वहां से रवाना हुयी ।

थोड़ी ही देर में शहरी भीडभाड और कोलाहल से दुर हमारी बस नागिन सी बलखाती टेढ़े मेढ़े रास्तों पर तेजी से आगे बढ़ रही थी। शहर से बाहर बिलकुल सड़क के किनारे ही कश्मीर के पूर्व महाराजा हरी सिंह का राजमहल भी दिखाई दिया । पूर्व महाराजा का यह निवास स्थान अब एक पंच सितारा होटल में तब्दील हो चुका है। बस में बैठे बैठे ही हमने हवेली के बेहद खुबसूरत होने का अंदाजा लगाया और आगे बढे ।

कुदरत के दिलकश नज़ारे आँखों के रास्ते सीधे दिल में उतर कर आत्मिक शितलता प्रदान कर रहे थे । सड़क पर हमारे बायीं तरफ जहाँ ऊँचे पहाड़ तो वहीँ दायीं तरफ गहरी खाइयाँ दृष्टिगोचर हो रही थी ।बीच बीच में कई जगह फौजी छावनियां तो कई जगह हमारे बहादुर जवान मैदानों में अभ्यास करते भी दिखे ।बहादुर जवानों को देखते ही मन में सुरक्षा का भाव जागृत हो ऊठता था ।

एक जगह बस रुकी । आगे भी बसों की कतार थी । वजह समझने की कोशिश कर ही रहे थे की कंडक्टर ने सभी से सामान सहित निचे उतरने के लिए कहा । सभी लोग बस से उतरकर आगे बढे । आगे कुछ फौजी जवान सभी यात्रियों और उनके सामानों की गहन जांच कर रहे थे । महिलाओं के लिए अलग कतार में महिला सुरक्षाकर्मियों द्वारा जांच की जा रही थी ।सुरक्षा कर्मियों को अपने कर्तव्य का निर्वाह करते देखकर महिलाएं और वृद्ध यात्री भी अपनी अपनी तकलीफों को भुलकर सुरक्षाकर्मियों को जांच में सहयोग कर रहे थे ।

थोड़ी ही देर में हम लोग जांच पूरी होने के बाद पोस्ट की दूसरी तरफ थे । कतार में खड़ी हमारी बस भी आ गयी और सभी यात्री बस में पुनः सवार हो गए । शीघ्र ही हम कटरा पहुंचनेवाले थे ।

सामने ही त्रिकुटा पर्वत की ऊँची चोटियों का मनोरम दृश्य एक अलग ही छटा बिखेर रही थी । थोड़ी ही देर में हम एक भीडभाड वाली सड़क से होते हुए कटरा बस अड्डे पर पहुँच गए । जम्मू से कटरा की 55 किलोमीटर की दूरी तय करने में बस से लगभग डेढ़ घंटे लगे ।
शाम के लगभग 5 बज रहे थे । बस स्टेशन के समीप ही यात्रियों की सुविधा के लिए कई होटल लॉज गेस्ट हाउस वगैरह उपलब्ध है जहां यात्री विश्राम करने के बाद अपनी सुविधानुसार आगे की यात्रा शुरू कर सकते हैं लेकिन हम लोग तो यात्रा जारी रखने की ठान चुके थे ।

बस स्टेशन में ही यात्रा पर्ची का काउंटर देख हम सभी लोग कतार में खड़े हो गए । शीघ्र ही हमारे नाम और शहर के नाम अंकित यात्रा पर्ची हमारे हाथों में थी ।

बस अड्डे से बाहर आते ही हम लोग सामने ही बाणगंगा रोड से आगे बढ़ने लगे । यूँ तो वहां बाणगंगा तक के लिए ऑटो की सुविधा उपलब्ध होती है लेकिन हम लोगों को कोई जल्दी नहीं थी सो पैदल ही निकल पड़े । रास्ते में चाय वगैरह पीते हम लोग आधे घंटे में ही यात्रा के मुख्य प्रवेश द्वार के सम्मुख थे । यह प्रवेश द्वार बड़े ही खुबसूरत सफ़ेद पत्थरों से बना हुआ है । यह दर्शनी ड्योढ़ी के नाम से मशहूर है । यहाँ सुरक्षाबलों द्वारा हमेशा निगरानी की जाती है । यात्रियों और उनके सामान की सघन जाँच के बाद आगे जाने दिया जाता है ।

जाँच के बाद अन्दर प्रवेश करते ही वहाँ मेले सा माहौल दिखा । यहाँ अपने सभी साथियों का ध्यान रखना नितांत आवश्यक है । बिछड़ने पर संपर्क का कोई साधन जो नहीं है। घोषणा कक्ष से उद्घोषक की आवाज लगातार गूंज रही थी । यहाँ बिछड़ों को मिलाने का यही एकमात्र जरिया है ।

काफी भीडभाड नजर आ रही थी । हम सभी एकदूसरे का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ रहे थे । रास्ते के दोनों तरफ सजी धजी दुकानें यात्रियों की भीड़ और बीच बीच में खड़े डोली वाले अफरातफरी का माहौल बना रहे थे । अखरोट तथा अन्य मेवातों से सजी बड़ी बड़ी दुकानें फोटो स्टूडियो वगैरह ग्राहकों को आकर्षित कर रही थीं और नतीजतन सभी दुकानदार व्यस्त थे ।

बाणगंगा नदी का उद्गम स्थल नजदीक ही है। एक पतली सी पानी की बहती धारा ही आगे जाकर बाणगंगा नदी का आकार प्राप्त कर लेती है। इसी बहती धारा के किनारे मातारानी के अनन्य भक्त और मशहूर म्यूजिक कंपनी टी सीरीज के मालिक गुलशन कुमार के नाम से यात्रियों के लिए नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था की जाती है । यहाँ इसे लंगर कहते हैं । सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक यात्रियों की भीड़ लंगर खाने के लिए लगी रहती है ।

हम और आगे बढे । एक तरफ कतार से घोड़े ही घोड़े दिख रहे थे । यहाँ से मातारानी का धाम जिसे भवन के नाम से जाना जाता है लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । कमजोर बीमार वृद्ध यात्रियों की सुविधा के लिए मंदिर प्रशासन की तरफ से तय किये गए नियमों और दर के मुताबिक यात्री डोली अथवा घोड़े भी उपलब्ध होते हैं जिनकी सहायता से जरूरतमंद लोग अपनी यात्रा जारी रख सकते हैं ।

सभी कुछ देखते समझते हुए हम लोग धीरे धीरे आगे बढ़ते बाणगंगा नदी के उद्गम स्थल तक पहुँच गए । कहा जाता है कि भैरव का वध करने के बाद माताजी ने यहीं आकर तीर चलाकर बाणगंगा की उत्पत्ति की थी और इसी के पानी से केश धोकर अपने आवेग को शांत किया था । इसी मान्यता के चलते महिलाएं यहाँ अपने केश धोती हैं और कुछ तो नहा भी लेती हैं ।

महिलाओं और पुरुषों को नहाने के लिए अलग अलग कुंड बनाया गया है । ऊपर से आते हुए स्वच्छ निर्मल जल की धारा को कुंड में गिरते देख हम लोग भी नहाने का मोह ना छोड़ सके । लगभग 7 बजनेवाले थे । हम लोग कुण्ड के शीतल जल में उतरते ही एक बार तो काँप उठे लेकिन थोड़ी ही देर में जल की शीतलता का आनंद उठाने लगे । रास्ते की थकान पल भर में गायब हो चुकी थी ।
अब अन्धेरा घिरने लगा था लेकिन मंदिर प्रशासन की तरफ से रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था थी । हम और आगे बढे ।

क्रमशः