प्रेमम पिंजरम - 4 Srishtichouhan द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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प्रेमम पिंजरम - 4

12 जनवरी 1946,

पॉलंपल्लाईं मद्रास,

9:00 बजे, रात का समय


प्रिय डायरी,


क्या मेरे कान सुन्न हो गए है? या मेरा भ्रम है कि तुम सच मूूच में आ रहे हो? सच में! मतलब क्या यह बात सच है कि माधवन नायर , यानी कि मिस्टर विश्वनाथन अजिथ नायर का इकलौता बेटा और मेरे हृदय के मंदिर का देवता जिसे मैंने पवित्रता और निष्ठा से प्रेम किया है, वो माधवन नायर कल पॉलंपल्लाइ में आने वाला है, मतलब मेरा माधवन आने वाला है, लंदन से वापस आने वाला है, मै आज शायद सो ना पाऊ , शायद मै इस खुशी में खाना खा नहीं पाऊंगी, मुझे इस तन्मयता की वो कोमल तरुनाई में बहने का शौक हो चला है, मै पवन को बहते देख सकती हूं, मै अपने मन की बातों को सुन सकती हूं, पर मुझे अब पता नहीं कि मै क्या उसके सामने भी आ पाने की हिम्मत कर पाऊंगी ? कर पाऊंगी क्या, पता है माधवन तुम्हे तो यह पता ही नहीं होगा कि मैंने पिछले नौ सालों और तेरह महीने से तुम्हारे हर साल के मन्नत वाले धागे को समेट कर रखा है, तुम्हे शायद यह पता ना हो पर मैंने तो मीनाक्षी अम्मन मंदिर जाने की इच्छा को अभी तक अपने अंदर छुपा करके रखा हुआ है, क्योंकि मै पहली बार अम्मन मंतिरिर ( मंदिर) तुम्हारे साथ ही जाऊंगी और वहां मां मीनाक्षी के सामने माथा टेकुंगी, लेकिन मैंने एक चीज और सोची है कि मै एक तमिल राइटर के रूप में अपना काम करना चाहती हूं, मै मिशनरी स्कूल तो जा रही हूं पर वहां कई बार हमारे संस्कृति और सभ्यता का मजाक भी बनाया जाता है, हमें हर तरीके से जबरदस्ती पाश्यात सभ्यता की ओर धकेला जा रहा है, पर मुझे पता है कि जब कल तुम आओगे तो मुझे ऐसी बहुत सारी बातें बताओगे जो मेरे सपने और एक नए सोच को उड़ान से सकने में उसे साकार करने में मदगार साबित हो!


पर मुझे पता है कि मै लिख नहीं सकती , क्योंकि मेरे परिवार वालों को इसके लिए काफी कुछ आलोचना सुननी पड़ेगी, मै कॉलेज नहीं जा पाऊंगी , मुझे पता है लेकिन मै मैट्रिक्स तक पढ़ाई करना चाहती हूं, पाट्टी नहीं मानेगी, और यह भी पता है कि वह मेरी शादी के लिए लड़के भी देखना शुरू कर चुकी है, पर मुझे किसी से भी शादी नहीं करना , मुझे इतना दहेज और बिना मन मिलान वाला कोई भी संबध स्थापित नहीं करना है,

अच्छा यह सब छोड़ो, मै भी ना ! सिर्फ अपनी ही बातें करने लग जाती हूं, तुम्हे बताऊं आज जब मीनू फिर से घर में आई थी तो इस बार पाट्टी ने तो मुझे घर से बाहर निकलने ही नहीं मिला और पाट्टन भी इस बार घर में नहीं थे, वैसे मै जब कल बाहर गई थी ना तो मैंने उनकी पसंदीदा काफी बीन्स लाकर उन्हें एक तरीके से रिश्वत दे रखी थी, पर ना जाने क्यूं आज मेरी किस्मत इतनी खराब थी कि पाट्टी ने आज कोई बहाना कोई चाल , कोई भी रोना धोना नहीं सुना उल्टा मीनू को इतना डांटा , इतना डांटा कि उसे भी आज मेरे घर के पोंगल के तैयारियों में जुटा दिया,


मीनू कह भी रही थी, " शुब्बू ! मैं मुरुगन की कसम खाकर कहती हू , पाट्टी सच में एक आसुरी है , कितनी भयंकर कालिका माता बन जाती है यह गुस्से, में" पाट्टी के रूप में नकल उतारते हुए उसने बोला, " ओह! अय्यीपा , तुम दोनों बहुत बहाना मार मारकर घर से भागने का तरकीब सोचती हो, और यह मीनू, यह मीनू तो खुद घर का काम नहीं कर पाती और तुझे भी अपने साथ लेकर जाने की बात करती है , कल पूजा है , जब तक तुम लोग दूब की माला नहीं बना लोगो पूरे आंगन और उन्झल ( झूला )के आस पास कोलम, मुद्दुलू कोलम, और लक्ष्मी पादम नहीं बना लेती तब तक तुम लोग गणेशन मंथिरिर भी नहीं जा सकती, हम लोगों ने करीब एक घंटे तक कोलम कलामकारी की फिर, मीनाक्षी विल्लाकू ( लटकने वाले दीए) और उर्लियो के बड़े बड़े बर्तन साफ किए, और उनमें पानी भरकर गुलाब की पंखुड़ियों से उन्हें सजाया और फिर उनमें तैरने वाले मिट्ठी के दीए रख दिए, और फिर घर के सारे पुराने और लकड़ी के समान निकाल दिए है, कल भोगी पोंगल है, और कल हम सब को ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाना है, गाय को हरा चारा देना है, उसके गोबर से आंगन लीपना है, और फिर मोंगरे के ढेर सारे गजरे बनाना है, आम के पत्तों के तोरण तैयार करने है, कल हमारे घर के जितने भी बैल है उन्हें नहलाना है और फिर आज हमारे घर का रंग रोगन होने वाला है, विशंभर काका आज हमारे घर को रंगने आने वाले है, खुशियों की सौगात और बाहर मेरे मन को आच्छादित कर देती है, बामलट्टम का विषय भी तैयार करना है जो कि पोंगल त्योहार के चौथे दिन यानी कि कन्या पोंगल के दिन रात्रि में होना है, जो कि कस्बे के समूह मंडपम में आयोजित होना है,


उसके लिए आज हमे कुम्हार के यहां से कई मिट्ठी के मटके , दिए और बर्तन लाने होंगे, गन्ने के जोड़े लाने होंगे, बैलो को सजाने के लिए रंग बिरंगे लटकन और नथुने में पहनाने वाले आभूषण और फिर चमकीले कपड़े भी , मैंने सारे पुराने कपड़े और लकड़ियां कल भोगी अग्नि में जलाना होगा, आज ढोल बजाने वाले लोग हमारे भैंसो के सींग से बने भोगी कोट्टम मांगने आने वाले है, उन्हें भी निकाल कर साफ करना है, और वेल्लाई पोंगल और सरकारी पोंगल के लिए मक्खन और पेयस निकाल कर भी रखना होगा, इतना सब हमे ही करना है क्यूंकि नैयर समाज के अध्यक्ष मेरे पट्टन ही है, तो हमारे घर की जिम्मेदारी हमेशा से ही ज्यादा होती है, कल मधुराई से शेखरन चित्त्रप्पन और भाविनी अत्थाई , मंझीरी और निविन भी आने वाले है, उनके लिए उनका ऊपर वाला कमरा भी साफ करना होगा और निवीन के लिए उसका चंदन इत्र उसके कमरे में छिडकना होगा, क्योंकि लाट साहेब को बगैर चंदन वाले कमरे में नींद नहीं आती है, मंझिरी मेरे साथ मेरे कमरे में ही सोएगी पर उसके लिए दो मंजिला पाया वाला बिस्तर लगाना होगा, वो मेरे साथ एक बिस्तर में नहीं सोती, और दिनभर मधूराई के अपने कॉन्वेंट स्कूल की बातें बताते फिरती है,


आज रात को पॉलंपल्लांई स्टेशन से वो लोग 11 बजे वाले ट्रेन से आने वाले है, कल ही डाकिया बाबू पत्र देकर गए है, पट्टन के चेहरे का भाव देखते ही बनता है, और पट्टी उन्होंने तो गुड के मूंगफली चिक्की भी बनानी शुरू कर दी है क्यूंकि शेखरन चित्त्रप्पन को यह मिठाई बहुत पसंद है, अभी भी पट्टन और पाट्टी अगले कमरे में बात ही कर रहे है, और मै और मीनू अभी मेरे कमरे में पुराने कागज और कपड़े अलग कर रहे है, फिर गज माला भी बनानी है, मीनू ने मुंह सिकोड़ कर मुझसे कहा,

" पाट्टी को भाविनी आत्थाई से इतना अगाध प्रेम क्यों है, कभी कभी तो लगता है कि जब भी भाविनी आत्थई आती है तो उनका स्वागत ऐसे होता है इस घर में जैसे कि वो लंदन कि महारानी क्या नाम है उस गोरी महारानी का, अरे! परसो ही तो मिशनरी वाले पढ़ा रहे थे ना, उसके बाल ! किसी लड़के की तरह है ना, जो बड़ा सा अंग्रेज़ी टोपी लगती है और वो ऊंची ऐड़ियों वाली जूती पहनती है, क्या नाम है उसका,तू बताना?" उसने मुझे हल्के से अपने कोहनी से टेस्ते हुए कहा,


" उनका नाम रानी एलिज़ाबेथ है, और भाविनी अत्थई का स्वागत तो ऐसे ही होता है, बचपन से ,क्योंकि वो पाट्टी के तांताई के साले की बेटी है, और पाट्टी खुद उनको अपनी बहू बना कर लाई थी , " मैंने कपड़ों की गठरी को एक किनारे रखते हुए कहा, अब बस कोने वाले अलमारी को साफ करना बचा था,


" अच्छा , इसबार पाट्टी भाविनी अथाई को पोंगल में कौनसा उपहार देने वाली है?" मीनू ने अब बाकी के कपड़े एक ओर कर उसकी गठरी बना दी और उसे एक पुराने बाल्टी में रख दिया,


" मेरी गठरी भी लेले, पता नहीं इस बार शायद, तीन तोले का मयूर कसुमलाई हार देने वाली है!" मैंने कुछ देर सोचते हुए कहा, यह बात सुनते ही मीनू ऐसे उछल पड़ी जैसे कि उसे किसी सांप ने काट लिया हो, मेरे हाथों से गठरी लेकर उसने उस गठरी को हवे में उछाल दिया,


" क्या कहा, वो मयूर नक्काशी वाला कसुमालाई हार, वाह यह तो वो लंदन की महारानी वो लाइजिया बेत से भी ज्यादा महंगा स्वागत, सुना है जब वो आईं थीं तो दिल्ली की सारी गली कूचे यहां तक कि नालियां भी एकदम शीशे सा चमकाई गई थी, बाप रे! बड़ा ऐश है भाविनी अथई का , " मीनू ऐसी बातें बोल रही थी जो उसने बचपन से देखी थी,


" तू बातें बहुत करती है, मीनू ! अगर पाट्टी को उन्हें कोई पोंगल उपहार देना है तो यह उनका खुद का अधिकार और मन है, और वो इस घर की बहू को यह उपहार एक रस्म के तौर पे दे रही है, तो यह तो अच्छी बात है !" मैंने उसे एक छोटी सी हसी के साथ कहा, तब तक हमारे कमरे के दरवाजे में मुझे पाट्टी की आवाज़ आती मालूम हुई, मीनू को मैंने चुप रहने का इशारा किया, और मीनू कुछ बडबडा कर चुप हो गई, और पाट्टी के कदम तालों की आवाज़ अब मेरे कमरे की चौखट के तले आकर रुक गई


" उंकल एल्ला वेलाईकलियम मूतितिर्कला इतरकितयिल निनकल इरुवरम अरताई अतकिरिरकला ? ( तुम लोगो ने काम ख़तम कर लिया जो यहां गप्पे लड़ा रही हो?" ) और

शूब्बु ! तुझे आज स्टेशन जाना है , रात को ग्यारह बजे, कोचवान बंशी भी तेरे साथ जाएगा और हा इस मीनू को भी ले जाना , आज रमेश कुमार भी मद्रास से आ रहा है, उसी ट्रेन में, इसकी मां ने मुझे कहा था तुम दोनों को बता दू, दो तांगा घर के बाहर खड़ा होगा, एक खाली जाएगा जिसमें शेखरन और भाविनी और मंझिरी , निविन आएंगे एक में उनका सामान, तो तुम लोग आते वक़्त उस समान वाले तांगा में आजाना, उंकाल मनातिल की तत्ताई तता ? (समझ में आ गया ना?" )

पाट्टी ने घूरते हुए हम दोनों के तरफ देखा और उसमे से तो ज्यादा बार मीनू की तरफ,

"पाट्टी,!! इंकल उक्कू अतू किताईत्ततू !(पाट्टी! हम समझ गए, ) हम वहां वक़्त पर पहुंच जाएंगे , और आपके बहू बेटे और मेरे रमेश चित्रप्पंन को भी सही सलामत लेकर आ जायेंगे, आपको मेरे ऊपर भरोसा नहीं है क्या पट्टी?" मीनू बीच में कूद कर बोली, इस पर , पाट्टी ने थोड़े गुस्से से मीनू की तरफ देखा,


" वाह री मीनू! तू तो बहुत जबान लड़ाती , और शुब्बू! यह तो है ही मुहफट, तू इसके जैसे नहीं बनना, और हा आज तुम दोनों वक़्त पर वहां चली जाना, और मीनू जितना बात करती है उतनी अच्छी कोलम भी बना लिया कर, तेरे घर का कोलम अरिवी बिगड़ गया है, कन्नाडी ! थोड़ा काम काज पे भी ध्यान दो! समझे, चलो रात को स्टेशन भी जाना है ना?" और ऐसा कह कर पाट्टी कमरे से अपना भारी भरकम निर्देश देकर चली गई,


" यह पाट्टी को मुझसे कोई पुराने जन्म की दुश्मनी है क्या, हर समय मुझे कुछ ना कुछ सुनाती है! अब स्टेशन ही तो जाना है कौनसा हमे लंदन जाना है माधवन के पास है ना, शुब्बू ? उसमे भी इतना निर्देश और मुझे तो अपनी चील जैसी आंखों से बार बार घुरे जा रही थी, जैसे आंखें ना हुई कोई संधिग्ध आदमी हूं मै, कोई चोर पता नहीं, सुन रात को 10:30 बजे तैयार निकलना, हम आधे घंटे पहले चले जाएंगे!" मीनू ने मुझसे कहा और उसके चेहरे की चमक से मुझे दाल में कुछ काला नज़र आया ,


" क्यों भई, मीनू हम वहां आधे घंटे जल्दी क्यों जायेंगे? कोई और भी आने वाला है क्या?" मैंने उसके दिमाग में चल रही बातें जानने की कोशिश की,


" वो वहां पर श्रीनिवासन भी आने वाला है उसकी कोई मौसी आने वाली है, ना तो...!" थोड़ी शर्म के साथ उसने मुझे इशारे दिए और मै उसके इशारे को समझ हस पड़ी तो मैडम को यह जरूरी काम करना है आधे घंटे पहले स्टेशन जाकर,


" अच्छा तो अगर पट्टी नाही बोलती स्टेशन जाने को तो क्या करती? तू फिर ?" मैंने मीनू को छेड़ा ,


" पाट्टी को मैंने ही मा से कह कर बुलवाया यह बात, और रमेश चित्रप्पन संयोग से आज आने ही वाले थे तो मैंने यह सब योजना बनाई कि आज कुछ भी हो तुझे भी लेकर जाऊंगी और पाट्टी को मनाना है तो बस मेरी मां को थोड़ा मक्खन लगा दो होगया काम और क्या, तो आज रात 10:30 बजे तैयार रहना, ठीक है ना? "


रात 10:30, आज मुझे तैयार रहना है मतलब मेरे पास अब सिर्फ आधा घंटा है, क्यूंकि यह डायरी लिखते मुझे एक घंटा हो चुका है और मीनू मुझे शाम पांच बजे यह बात बोलकर गई है, आज के लिए इतना ही,


तुम्हारी शुब्बू!