सरहद - 4 Kusum Bhatt द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

सरहद - 4

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संयोग से उस दोपहर ताऊ घर में ही थे, उन्हें जड़ी बूटियों की पहचान थी। गिलोय के डंठल को कूट कर उसमें मिश्री मिला कर छोटी के सूखे हांठों पर टपकाते रहे जब तक माँ आई थी। उसका बुखार हल्का हो गया था। ताई ने माँ को खूब खरी-खोटी कही। मुझे भी हड़काती रही। तेरी पाठषाला बड़ी है या छोटी बहन? फिर ताई ने समझाया था चेतावनी देकर- तेरे अक्षर ज्ञान से किसका भला होने से ठहरा छोरी? एक नन्ही सी जान को मौत के मुंह मे डाल कर तू क्या हासिल कर सकेगी बोल! गांव भर में एक तुझे ही डिप्टी साहब बनना है क्या? चिट्ठी पढ़नी लिखने तक तुझे अक्षर ज्ञान नहीं हुआ? मैं अवाक् ताई के चेहरे पर नजर भर भी न देख पाई थी, उसकी आँखों में आग सी दिखी थी उस वक्त! फटकार रही थी माँ को ‘‘रमोली की माँॅ, तुझे बुरा लगे या भला लेकिन मैं कहती हूँ भुली, तू कसाइन ठहरी! हे राम! छोटी सी बच्ची पर भी तुझे दया ना आई।

माँ चारपाई के पाये को पकड़े छलछलाते आँसुओं को कठोरता से भीतर सोख कर अड़स कर बैठ गई थी दीवार से लगकर। ’’अब मैं तुझसे क्या कहूँ दीदी मैं तो निपट गंवार हुई, रमोली के पिता को वचन दिया ठैरा, बस उसी को निभाना हुआ। तुम तो जानती हो वे विद्वान हुए। जाते समय अंतिम बार पीछे मुड़कर यही कहा था, उन्होंने रमोली को पाठषाला जरूर भेजना रमोली की माँ, अनपढ़ लड़कियाँ भेड़-बकरियों सी आँकी जाती हैं, उनका कोई मूल्य समाज में नहीं होता। षहरों में सभी लड़कियाँ पढ़ती हैं। आजादी के बाद पहाड़ में भी क्रान्ति आयेगी। हमारे पहाड़ की लड़कियाँ भी पढ़-लिख कर प्रगति कर सकेंगी’’।

पिताजी का सपना था आजादी के बाद अपनी बिटिया को कलक्टर बनाना, उन्हें क्या पता था इस पहाड़ में लड़कियाँ  बाहर और भीतर भेड़ बकरी से ज्यादा क्या हुई।

जहाँ लड़की होना अभिषाप हो वहां आधी अधूरी षिक्षा से भी क्या होना ठहरा? पर मेरी माँ वचन की पक्की हुई। जो भी हो रमोली पाठषाला जाना नी छोड़ेगी और जब भारती बड़ी होगी तो वह भी पाठषाला जायेगी। ताई के माथे पर बल पड़े थे- पाठषाला तो तब जायेगी भुली, जब जिन्दा बचेगी....’’

माँ ने ताई के मुँह पर हथेली रख दी थी, षुभ-षुभ बोलो दीदी, हम अनाथों की रक्षा करने वाला वह प्रभु ठैरा...?

हमारी पाठषाला पाँचवी कक्षा तक ही थी, आगे पढ़ने के वास्ते बहुत दूर जाना पड़ता था, लड़के कई-कई मील, पैदल चल खिर्सू जाते थे, मुँह, अंधेरे साफे पर रोटी बाँधे निकलते षाम के झुरपुटे में घर लौटते, पहाड़ की दुर्गम चढ़ाई और घनघोर जंगल का रास्ता, ऐसी विकट स्थिति में लड़कियों को कौन षिक्षा ग्रहण करने भेजता, जंगली रास्ता जहाँ जानवरों से खतरनाक मनुश्य नाम के जानवर का आतंक रहता...!

जाने किस झुरमुट पर बाघ सा टोहता कब झपट पड़े, बाघ नाम का जानवर तो नामोनिषान भी मिटा देता कहीं एक आध हड्डी पड़ी मिलती, लेकिन मनुश्य नाम का बाघ तो तिल-तिल मरने के वास्ते छोड़ देता है... देह लुटी सब कुछ लुटा... देह पवित्र तो आत्मा पवित्र, देह लुटने से इज्जत लुट जाती है और जिसके पास इज्जत नहीं उसे दुनिया में रहने का भी अधिकार नहीं। मास्टर जी ने किताबों से पहले यहीं पढ़ाया था हमें। हमें खुद भी यही महसूस होता रहा, जब उस सुन्दर छोरे की आँख मेरी टाँगों पर चिपकी थी, मुझे भी तो घिन आई थी खुद से! लगा था कीचड़ हो गई हूँ मैं...! कितना रोई थी कितने बुरे-बुरे स्वप्न आते थे। कई दिनों तक मन घिना गया था, सपने में भी वह मेरी टाँगों पर अपनी घिनौनी आँखें चिपकाता रहता, मैं मकड़ी की टाँगों के बीच फंसी रहती। मकड़ी के मूत से मेरी देह पर लाल-लाल दाने उगते, उसमें मवाद पड़ता, वे फूटते और कुश्ठ रोग से मेरा षरीर भरने लगता। मैं नदी में छलांग लगाने को निकलती, लेकिन नदी मुझे देखकर उफनने लगती‘‘ छीऽ... इस गन्दे षरीर को अपनी पवित्र धारा को गंदला नहीं होने दूँगी। जाऽ.... भागऽ....

बदहवाष मेरी आँख खुलती मैं भरभराकर रोले लगती, माँ को समझ नहीं आता वह कहती, ‘‘बुरा सपना देखा रमोली....  सपने, सपने ही होते हैं। बेटी सपने सच नहीं होते, भगवान का नाम लेकर सो जा, लेकिन मुझे नींद नहीं आती फिर...., मैं आकाष के अदृष्य तारे गिनती तब मुझे नींद आती। जब गहरी नींद में होती तो पौ फटने पर माँ झकझोर कर उठा देती- रमोली हेऽ नौनी उठ, धारे से पानी लाना है, देख गागर बन्ठे सब खाली पड़े हैं। गाय भैंस प्यासी हैं। रमोली..... उठ... उठ...’’ मेरी नींद नहीं टूटती तो माँ पानी की छींटे मारती!

अब सोचती हूँ माँ ने कभी क्यों नहीं कहा कि रमोली, मेरी बच्ची, तू भी प्यासी होगी, तेरे प्यास के लिये भी पानी चाहिए होगा, सचमुच रमोली प्यासी थी, लेकिन किस चीज की प्यास थी उसे मैंने कभी पूछा नहीं, पूछने का समय ही नहीं मिला। एक के बाद एक अप्रत्याषित घटना मेरी जिन्दगी की धारा को अपने मुताबिक मोड़ती रही, मैं कुछ नहीं कर पाई। याद आता रहा कि पिताजी कहते थे- मनुश्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है। अब सोचती हूँ कि वह मनुश्य होता होगा पर मेरी गिनती मनुश्यों में कहाँ ठहरी। पिताजी को याद कर मैं चुपचाप रोती रहती, माँ को पता न चले.... माँ का बड़ी मुष्किलों से अर्जित किया गया हौसला दरक जायेगा। भारती को गोद में बिठाकर षाम के समय पिताजी के आने की प्रार्थना करती। मेरे आगे से अंधेरे को चीरते जुगनुओं को पकड़ने भारती हथेली बढ़ाती, किलकारी मारती तो मैं उसे जुगनू पकड़ कर देती, अंधेरा गहराने लगता तो माँ की चिन्ता होती। माँ अक्सर अंधेरा होने पर ही लौटती, घास का पहाड़ जैसा बोझ सिर पर रखे हाथ में हरा साग लिये आती तो भारती माँ पर चिपटने लपकती। माँ को देखकर वह सिसक-सिसक कर रोने लगती लेकिन इस सब से विरक्त माँ हाथ पांव धोकर भैंस का दूध निकालने गोठ में चल देती। मैं भारती को चूल्हे के पास बिठाकर लकड़ियाँ लाकर आग सुलगाती और केतली में झटपट चाय का पानी चढ़ा देती। माँ को दूध निकालते देर होती तो मैं बाल्टी से दूध लेने को गोठ में जाती और एकाएक मेरा मन उदास हो जाता, लगता हम जैसे अभागे षायद ही इस दुनिया में हों! दुधमुंही बच्ची को बाल्टी में दूध नहीं बचता।

जब भैंस हरी घास से तृप्त होती तो थोड़ा ज्यादा दूध निकलता। कभी आध सेर ज्यादा हुआ तो माँ चावल या झंगोरा डाल कर खीर बनाती। दूध बेचकर माँ चाय पत्ती, चीनी, गुड़, तेल का जुगाड़ करती। पिताजी होते तो हमें ये दिन नहीं देखने पड़ते- माँ का चेहरा कहता। पर माँ छोटी के वास्ते तो दूध होना चाहिए न ‘‘मुझे नन्हीं भारती पर बहुत दया आती।

स्मृति में समय का टुकड़ा कौंध रहा है जब पन्द्रह साल की उम्र में मेरी डोली इसके आंगन में उतरी थी। सुना था कि इसने विवाह के लिये मना किया था, अड़ गया था कि मुझे शादी नहीं करनी। पढ़ रहा था कॉलेज में, मैं भी नहीं करना चाहती थी पर मेरी कौन सुनता माँ ने कहा था कि अच्छा घर बार है रमोली तू सुखी रहेगी। पर कितनी देर सुखी हुई मैं? पन्द्रह दिन मेरी देह भोग कर अचानक लापता हो गया था कमबख्त! गाँव में जैसे पाला मार गया था, लोग इधर-उधर खोजने लगे थे और मेरे सास-ससुर तो जैसे जड़ हो गये थे कि ऐसे क्या हो गया मति मारी गई जगदीश की! इतनी खूबसूरत कर्मठ मीठे सुभाव वाली लड़की को छोड़कर चला गया! बच्चा अब भरभरा कर रोने लगा है अब इसको दूध पिलाना ही होगा आखिर अपने ही जिगर के टुकड़े को क्यों सजा दे रही हूँ मैं! अब दिखने भी लगी है ठण्डे पानी की बावड़ी, बैठती हूँ यहाँ पर, पहले हाथ मुंह धुलाकर दूध पिलाती हूँ, फँछा खोलती हूँ, फिर दिमाग सरगोशियां करने लगा है-कहीं चुपके-चुपके नीचे आ रहा हो तो?

नहीं मुझे डर की आवाज पर कान बंद रखने हैं फँछा उतार कर पहाड़ के भीटे पर अड़स जाती हूँ-पहले दूध पिला लूँ, फिर देखती हूँ नीचे... पसीने में लिथड़ा मुँह धुलाती हूँ। ब्लाउज के बटन खोलती हूँ, चिड़िया की चोंच सा मुँह खुलता है बच्चे का! पूरा ब्लाउज दूध से गीला हो गया है। बच्चे के मुँह में स्तन लगाती हूँ, आँखों में देखती हूँ इन निर्मल चमकती आँखों में कृतज्ञता का भाव देखकर कलेजा मुँह को आने लगा है। माँ के विश्वास की दीप्ति इस कोमल चहेरे पर रोशनी बन झरने लगी है। मेरी आँखों में देखते हुए मेरा बच्चा सुकून से भर उठा है, दोनों हाथों से स्तन कस कर पकड़े हुए हैं कि कहीं मां छुड़ा न ले। मेरी आँखों में धुआँ भरने लगा है, एक बावड़ी पास है, दूसरी आँखों में उमड़ रही है। बूंद-बूंद टपक कर बच्चे का गाल भिगो रही है। मेरे हृदय की आस्था पर पत्थर पड़ने लगे है-ईश्वर होता तो एक नन्हें बच्चे को माँ का दूध भी नसीब न होता? शायद ईश्वर होता ही नहीं कोई देवी देवता भी नहीं?

फिर भय ने अपना फन उठा लिया मैं बच्चे के मुँह से स्तन छुड़ाती हूँ, पर वह दांतों के नीचे दबा देता है। मेरी कराह निकल जाती है, बच्चा अपने हिस्से का दूध छोड़ना ही नहीं चाहता! और मेरा भय अजगर सा लपेटे हुए हैं, थोड़ा आगे सरकती हूं, यहाँ नीचे दिखता है गधेरा, वहां पत्थरों के बीच पानी चमक रहा है, किनारे हरी घास है कुछ जानवर चीटियों जैसे दिखाई दे रहे हैं। अगर इनमें हमारे भी हुए तो? अगर वह जंगल न जाकर इधर ही चराने आया हो तो? मेरी रीढ़ की हड्डी फिर बर्फ की लकीर में तब्दील हो रही है। पर भीतर से यकीन भी नहीं। अगर वह यहाँ आता तो मुझे देख लेता, वह यहाँ नहीं है मतलब कहीं नहीं है तब भी नहीं था जब उसकी खबर मिली थी कि वह जोगी हो गया।

खबर सुनकर सासू को लकवा मार गया था, और मैं....? मैं तो जैसे आकाश में उड़ान भरती धड़ाम जमीन पर गिर पड़ी थी! शादी की पहली रात को भी कहीं नहीं लगा था कि वह विवाह नहीं करना चाहता! शायद मुझे देखकर उसकी धारणा बदल गई हो, उसने कहा भी था। जब लाल साड़ी में तब भी चील सा झपट्टा मारने को आतुर भोग की अपार लालसा में भरा हुआ उसका स्पर्श (लाल दुशाले का घूंघट किये मैं) सहमी सिकुड़ी सी बैठी थी, डर भी था और खुशी भी। मन में कितने ही भावों का आलोड़न हो रहा था स्पर्श के लिए भी सिहरन थी। पता नहीं पहला शब्द क्या होगा, मैं तो लज्जा के मारे आँख नहीं उठा पा रही थी, उसने भी मुझे पहली बार ही देखा था। लड़के-लड़कियों को विवाह से पहले देखने का रिवाज नहीं।

बज्जर पड़े इस रिवाज को। रिवाज होता तो मैं देख पाती चहेरे के एक-एक भाग चीन्ह पाती, नहीं... नहीं... मैं बहुत शर्मीली या सीधी सादी लड़की नहीं थी, मेरे भीतर बहुत कुछ था जो मैं डंके की चोट पर कह सकती थी, पर शब्द साथ नहीं देते थे, घायल चिड़िया सा फड़फड़ाते रहते कंठ के मध्य! तो उस पहली रात को इसने मेरा घूंघट खोला था, तो फुसफुसाया था कुछ। फिर कुछ दिन बाद जब मैंने हंसते हुए पूछा था कि उस रात क्या फुसफुसाये थे? तो मुझे बाँहों में भरकर फिर पलंग के पाये पर बिठाकर मेरी ठुड्डी छूते हुए मेरे आँखों में देखते हुए गाने लगा था-चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो खुदा की कसम तुम लाजवाब हो...! माँ ने ठीक ही कहा था-रमोली घर-बार अच्छा है सुखी रहेगी तू! आशीष से भरकर सिर में हाथ रखा था, पर नहीं न फला माँ का आशीष! कालेज से ही चुपचाप जाने कहाँ चला गया! मेरी सोच को तो जैसे लकवा ही मार गया-इतना प्यार करने वाला मालिक अचानक सूखे कुएं में छोड़कर चला गया?

‘‘क्यों...?’’ हर दिन हर पल इस क्यों का जवाब खोजती मैं खेती बाड़ी पानी पंदेरा जानवरों के संग प्रेतात्मा सी डोलती रही, सास की हालत दिनों दिन खराब और खराब होती रही और सातवें महिने उन्होंने मुझे अजीब सी दृष्टि से देखा और आँखें मूंद ली! उस दृष्टि को मैं अब तक भूल न पाई! क्या था उस दृष्टि में उम्मीद का आस्वासन, अपराध बोध, या शिकायत या तीनों का मिला रूप.....क्या था जिससे मैं भीतर तक हिल गई थी, अपने दुख के बोझ के साथ उस दृष्टि का बोझ लेकर मैं तिल-तिल मर रही थी!

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