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छुट-पुट अफसाने - 5

एपिसोड ५

टकटकी लगाए पूनम के चांद को निहार रही थी कि हठात चौंक गई । बादलों का एक टुकड़ा आया और चांद का मुंह पोंछ गया । फिर भी उसके चेहरे पे वही चमक बरकरार रही लगा चांद अधिक चमक उठा था और मैं ख्यालों में बह गई हूं, दू ऽऽ र तक.....

इसी पूनम के चांद की दीवानी थी गुजरी (मेरी दादी )अपनी जवानी से । चांद के बढ़ते स्वरूप को हर रात बेसब्री से तकती थी वो और पूर्ण रूप देखते ही उसकी उमंगे नाच उठती थीं । पांव थिरक उठते थे और अन्तस से मधुर स्वर लहरी गूंज उठती थी । ऐसी ही एक सांझ को जब सूरज और चांद दोनों ही आसमान पर अभी अपना अस्तित्व जमाए हुए थे और सांझ सिंदूरी थी, गुजरी ने सिर पर अपने हाथ की बनाई हुई चौड़ी लेंस लगी मलमल का चुन्नटों वाला दुपट्टा डाला और बगल में एक झोली टांगी जिनमें चार-पांच पाथियां रखीं (गोबर के सूखे कंडे) और दौड़ती हुई पहाड़ी से नीचे उतर अपनी २-३ सखियों को बुलाया और चल पड़ीं चारों जंगल की ओर पंजाबी लोकगीतों (गौंड़ )की पिटारी खोलकर ...

"उच्चियां लम्बियां टाहलियां नी ओए

विच गुजरी वाली पींग वे माइया ।"

"डिग पई नी गोरी शीशमहल तों, 

पा दयो नी ओदे माईया वल चिट्ठियां " वगैरह-वगैरह

और ऐसे ही हंसी-मजाक करतीं, ढेरों गीतों को गाती हुईं वे सब दूर से आती धूल के गुबार का इंतजार कर रही थीं। जो घोड़े गाड़ियों के आने से उठना था । असल में गुजरी का माइया (पति) रावलपिंडी से पुन्या (पूर्णमासी) की रात वापिस आता था। साथ में जो कामे (सहायक ) जाते थे, उनकी बीवियां ही गुजरी के साथ थीं । सभी हम उम्र थीं । आसमां पर से अभी सिंदूरी चादर का जादू उतरा नहीं था कि वहां के "गुसाईं जी" की कुटिया दिखी और ये सब वहां जा पहुंचीं ।

क्योंकि झोले में पाथियां वहीं के लिए थीं ।

गुसाईं जी के डेरे पर आग जलती नहीं दिखी तो गुजरी ने पूछा, 

"गुसाईं जी, यह क्या आज धूनी नहीं रमाई ?"

"शाहणी, आज कोई बीबी छोडे-पाथियां (लकड़ी-कंडे) नहीं

लेकर आई।"

गुजरी ने अपना झोला आगे कर के कहा, 

" ये लो गुसाईं जी ! लगाओ धूनी ।"

"जितनी पाथियां तूं लाई है शाहणी, उतनी बार रब्ब तेरी झोली भरे ।" गुसाईं जी ने खुश होकर कहा।

गुजरी इस आशीर्वाद से घबरा कर बोली, 

"गुसाईं जी मैं तो अपने तीनों बच्चे ब्याह बैठी हूं । मुझे कैसा वरदान दे दिया है, आपने ! मेरी तो अब सूखने की उम्र आ रही थी। यह क्या कह दिया है आपने ?"

"अब तो 'वाक्क ' निकल गया है शाहणी, फिक्र न कर ।उस रब्ब का हिसाब किसने जाना है ।" यह कह कर वो सच्चा साधु आग जलाने में व्यस्त हो गया ।

और उस खाली झोले में अब पांच बच्चे लिए गुजरी लौट रही थी । दूर से धुएं का गुबार भी दिखाई दे रहा था । ये सहेलियां वहीं ठहर गई और घोड़ागाड़ियां पास आते ही अपनें-अपने माही के पास पहुंच गईं थीं ।

उस जमाने में साधु-संतों मेंं बहुत तेज होता था। उनके न आश्रम होते थे और न ही चेले-चपाटे । केवल ईश्वर की आराधना में वे लीन रहते थे। उनका आशीर्वाद खाली नहीं जाता था। गुजरी की पैदाइश १८७० की थी। ३८ वर्ष की उम्र में उनके पांव फिर भारी हो गए। दो-दो वर्षो के अंतराल से पुन: दो बेटियां और तीन बेटे और आ गए थे परिवार में । हमारे पापा चौथे स्थान पर थे । वे ९९ वर्ष की आयु तक जीवित रहीं। और ढेरों किस्से सुनाती थीं । कभी गीत गाकर तो कभी अफसाने । लेकिन एक साधु के कहने से बीस साल बाद बच्चे होने लगे --- यह बात हमारे गले नहीं उतरती थी तब । अब समझ आती हैं, ऐसी बातें ।

बाकि, अगले हफ़्ते.....

वीणा विज'उदित

२९ नवम्बर २०१९

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