भेद - 3 Pragati Gupta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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भेद - 3

3.

“जब शादी होकर आई तो मेरा अधिकतर समय जेठुतियों के काम करने और उनको लाड़-प्यार करने में गुजरता था| महेंद्र भी मेरी शादी के आठ साल बाद हुआ| तब उनकी बड़ी बेटी पंद्रह साल की थी| सारे रिश्तेदार बोलते भी थे। जेठानी के बच्चों को खूब लाड़-प्यार कर....तब तेरी गोद हरी होगी। तेरी बड़ी दादी को मैं जीजी पुकारती थी।.....

जीजी तो बेटियां जनने के कारण हमेशा ही शोक में रहती थी। उनको तेरे बड़े दादा का कड़वा बोलना बहुत चोट पहुँचाता था| कभी-कभी तो कई-कई दिन तक कमरे से बाहर ही नही निकलती थी| मैं उनका खाना ले जाकर भी उनके कमरे में देती थी| तेरे बड़े दादा जब भी उन पर हाथ भी उठाते थे। खूब रोती थी। उनके रोने की आवाज़ें खूब कमरे से बाहर आती....पर वह भी बहुत जिद्दी थी| जो नही करना होता...नही करती।...

अपनी तीनों बेटियों को कमरे से बाहर निकालकर कमरे की कुंडी अंदर से चढ़ा लेती। ऐसे में बेटियों को कौन संभालता....घर में आगे-पीछे सभी को मैं ही दिखती थी| बेटियों को माँ से ज़्यादा मेरे पास ही रहना अच्छा लगता था| तेरे बड़े दादाजी के व्यवहार की वजह से दादी का स्वभाव बहुत चिड़चिड़ा हो गया था| औरतों के साथ मार-पीट मुझे भी नहीं पसंद थी| पर हमारे समय में उम्र में छोटे घर के बड़ों से कुछ नहीं बोलते थे|"

"बड़ी दादी जब ऐसा करती थी तब बड़े दादाजी कहां होते थे?

"बड़े दादा जी भी बहुत ज़िद्दी और क्रोधी थे। उनके दिमाग में अपनी बेटियों या अपनी पत्नी की कोई कीमत नही थी। सच कहूं बेटा तो उनके दिमाग में औरत की ही कोई कीमत नही थी। पूरे घर में ऐसा कोई नहीं था जैसे तेरे बड़े दादाजी थे| तेरी बड़ी दादी से लड़-भिड़ कर एक बार घर से निकलते तो दो-दो दिन तक घर नही लौटते। तेरे दादाजी ख़ुद कई बार उनको ढूँढने निकलते और उनको मनाकर घर वापस ले आते| पूरे घर को संभालते-संभालते तेरे दादाजी भी बहुत थक जाते थे| सुनते थे कि उनके...चल छोड़ बेटा तू नही समझेगी..."

"क्या नही समझूँगी दादी? मैं सब समझती हूं।आप मुझे एकोएक बात बताओ। मुझे सब सुनना है।" सृष्टि ने दादी के मनावने करते हुए कहा|

"बेटा! देख घर की बातें घर में ही रहनी चाहिए। यह राज मैंने सालों साल अपने घर में ही रखा बेटा। तेरी माँ और पापा को भी पता है| तू भी बाहर किसी को मत कहना। तभी बताऊंगी। यह बात तुझे भी बहुत अच्छे से समझ आ जानी चाहिए..कि जब तक घर की बातें घर में दबी-ढकी रहती हैं...घर बना रहता है|"

सारा-सारा दिन दादी का चुपचाप रहकर ही गुजरता था| तभी तो सृष्टि उनकी काफी सारी बातों की राज़दार ख़ुद-ब-ख़ुद बन जाती थी। सालों साल से दोनों के एक साथ सोने की वज़ह से बहुत बनती थी। जब सृष्टि को अपनी कोई बात मनवानी होती....वह दादी की ओट लेकर अपने सब काम करवाती।

"हाँ दादी पक्की बात। नही बताऊंगी किसी को भी...गॉड प्रॉमिस। अब आप सब बातें बताओ।" सृष्टि ने अपनी बात बोलकर सिर सहमति से हिलाया|

सृष्टि के कान तो वास्तव में अपने माँ-पापा की बातों को सुनने के लिए तरस रहे थे| ताकि उनकी लड़ाइयों का कोई समाधान हो| दादी ने पुनः अपनी बात शुरू की|

"अच्छा बताती हूँ बेटा। सब्र कर। रात के ग्यारह बजे रहे है। तेरे साथ-साथ मुझे भी नींद नही आ रही। वह तो शुक्र है कि कल शनिवार है। तेरी छुट्टी है। अब थोड़ी देर बाद हम दोनों सोएंगे| परसों तेरी छुट्टी है न। तो कल रात वापस बची हुई बात करेंगे। बस तू याद रखना मैंने अपनी बात कहाँ पर छोड़ी है| " दादी ने कहा।

"ठीक है दादी। जैसा आप कहोगी वैसा ही करेंगे।" सृष्टि ने दादी की बात को ऊपर रखते हुए कहा। तभी सृष्टि को कुछ याद आया तो उसने दादी से पूछा...

"आपने यह तो बताया ही नही...बड़े दादा जी वकालत नहीं करते थे तो क्या करते थे? उनका और उनके परिवार का खर्च कैसे चलता था।"

दादी को सृष्टि जितनी नासमझ लगती थी...वह नहीं थी| आज यह बात उन्होंने ख़ुद महसूस की| उसके प्रश्नों में कहीं भी बचपना नहीं था| उम्र के इस पड़ाव पर कोई सुनने-सुनाने वाला मिल जाए इससे ज़्यादा खुशी की बात बुजुर्गों के लिए कोई नहीं होती| दादी ने अपनी बात पुनः शुरू की....

"तेरे बड़े दादाजी जी का काम करने में दीदा नहीं लगता था....और तेरे दादाजी के लिए परिवार बड़ी चीज़ थी| उनको अपने भाई से लड़ाई-झगड़ा करना नहीं था| सो उन्होंने अपने भाई को रुपयों-पैसों की कमी महसूस ही नही होने दी|.... यही तो वज़ह थी कि समय के साथ ज़रूरत पड़ने पर ज़मीने बेचनी पड़ी| ख़ैर तुझे बड़े दादा जी के बारे में और भी बहुत कुछ बताऊंगी| पहले उस पुश्तैनी घर के बारे में सुन। जहां हमारा सवेरे से रात तक का समय गुज़रता था। जो बाद में बिक गया था|....

हमारा बहुत बड़ा घर था। आजकल तो ऐसे घर बनते ही नहीं हैं....न ही देखने को मिलते है। बीचों बीच बहुत बड़ा-सा आंगन था। जिसके चारों ओर दस  कमरे बने हुए थे। छत पर भी पाँच कमरे बने हुए थे। तीन एक तरफ....और दो दूसरी तरफ। घर के सभी बच्चों को ऊपर के कमरे दिए हुए थे|” अपनी बात बताते-बताते दादी अचानक ही बोली....

“मेरे महेंद्र का बचपन भी शायद इतने सारे कमरों के बीच कहीं खो गया होगा|...इतना बड़ा घर इतने नौकर-चाकर| मैं अकेली स्त्री सभी को संभालने वाली|” एकाएक ही दादी को शून्य में ताकते देख सृष्टि ने कहा....

“कहाँ खो गई दादी आप|”....

“कहीं नहीं बेटा....आगे सुन| घर के बीचों-बीच आंगन में एक बड़ा-सा नीम का पेड़ था। जहां खूब छांव रहती थी| जिसके नीचे हमेशा ही दो से तीन चारपाई पड़ी रहती थी। नीम के पेड़ के नीचे इतनी ठंडी हवा होती थी कि हम फल-सब्जी काटने से लेकर छोटे-बड़े सभी काम उसी पेड़ के नीचे बैठकर करते थे।....

गाय व भैंस के लिए भी एक बड़ा-सा कमरा होता था। घर की गाय-भैंस का ही  खूब दूध,दही व घी होता था। घर के लोग हो या नौकर-चाकर खाने-पीने की किसी को भी कोई कमी नही थी। देसी घी के परांठे खाये जाते थे। हमको को तो याद ही नही आता...हमने कभी नए ज़माने के घी-तेल खाये हो। ख़ैर घर की औरतों का अधिकतर समय रसोई के कामों में ही गुजरता था|”

"दादी! आपको देसी घी बहुत अच्छा लगता है। तो आप माँ से कहकर अपना खाना उसमें बनवा लिया करो। प्लीज आप अपना मन मत मारा करो।"

सृष्टि के बहुत मासूम तरीके से अपनी बात बोली तो उस पर दादी को बहुत लाड़ आया और वह बोलीं...

"नही बेटा.. ऐसा कुछ भी नही। तेरे को अपने समय की बातें बताने लग गई तो सभी पुरानी बातें याद आ गई। मुझे सब अच्छा लगता है। घर में जो भी बने सभी को चुपचाप खा लेना चाहिए। तेरी माँ भी तो अकेले ही सब संभालती है। कॉलेज की लड़कियों को भी पढ़ाने जाती हैं| हम तो सिर्फ़ घर के ही काम देखते थे| सोच कर देख उसको कितनी दिक्कत आएगी.....अगर सबके लिए अलग-अलग तरह का खाना बनाना पड़ेगा।"