तानाबाना - 28 Sneh Goswami द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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तानाबाना - 28

28

दिन निकलने के साथ ही अस्पताल में चहल पहल शुरु हो गयी थी । साफसफाई करनेवाले कर्मचारी आ गये थे । इक्का दुक्का मरीज भी दीखने लगे थे । रवि एक कोने में बैठा था । उसका दिल बुरी तरह से धङक रहा था । घबराहट के मारे बुरा हाल था । लेबर रूम में धर्मशीला जितनी जद्दोजद कर रही थी, उतनी ही जद्दोजद इस समय उसके दिमाग में चल रही थी । वह बरामदे में इधर उधर टहल रहा था । मन ही मन सभी देवी देवताओं का स्मरण कर रहा था । पास में ही सभी पङोसनें इस समय साँस रोक कर खङी थी । एक घंटा बीत गया । एक एक पल कई युगों जैसा बीत रहा था । धीरे धीरे सात बज गये ।

अचानक आसमान में बादल छा गये । ठंडी मीठी हवा चलने लगी । मौसम सुहावना हो गया । रात की हुमस और सुबह से ही छाई हुई तपिश खत्म हो गयी । आज आषाढ की अष्टमी तिथि है । शुक्ल पक्ष की अष्टमी । जब कृष्ण पैदा हुआ तो अंधेरी अष्टमी थी । वह भी आधी रात की । तब बारह बजे का समय था । अब दिन के आठ बजने को है । थोङी देर में उसका कृष्ण आएगा या राधा ?

रवि को अपनी सोच पर शर्म आ गयी । हर बच्चा कृष्ण थोङा न होता है । वैसे भी उसने तपस्या कहाँ की । सुना है बहुत तपस्या करनी पङती है । तब देवता वरदान देते हैं । उसकी सोचों पर ब्रेक लगा । लेबररूम से बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी । ये आवाज । नहीं नहीं मेरा वहम है । तब तक सब औरतें लेबररुम के दरवाजे पर पहुँच गयी थी । सबने मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया । शुक्र है, बच्चा दुनिया में सही सलामत आ गया । यानि जो आवाज उसके कानों तक पहुँची थी, वह सही में उसके अपने खून की आवाज थी । उसके हाथ जुङ गये । शुक्राने में या प्रार्थना में उसे खुद नहीं पता । इतने में दरवाजा खुला और नर्स मुँह लटकाए बाहर निकली । सबके हँसते हुए चेहरे नर्स को उदास देखकर घबरा गये ।

“ सब ठीक तो है न ? “

नर्स ने इस बात को कोई जवाब नहीं दिया, अपना हाथ बढाते हुए बोली – “ तेल साबुन कपङे तौलिया जो सामान लाए हो जल्दी दो “ । झाई ने चुपचाप सामान का झोला पकङा दिया । सामान लेकर नर्स लपकती हुई फिर बंद दरवाजे के पीछे अलोप हो गयी । दरवाजा अभी बंद था एक रहस्यमयी गुफा की तरह । सब लोग उस बंद दरवाजे को ताकते हुए गुमसुम खङे रहे । आखिर चुप्पी तोङी तार ने – “ नर्स कपङे ले गयी । मतलब बच्चा तो ठीक है “ ।

“ फिर ये नर्स इतना सङी सी शक्ल बनाके क्यों घूम रही थी “ ?

रवि के कलेजे में हूक सी उठी – धम्मो । नहीं नहीं । ये अंदर से कोई बाहर आये तो कुछ पता चले । करीब दस मिनट बाद फिर से दरवाजा खुला । अम्मा जवाई के हाथों में गुलाबी तौलिये में लिपटा छोटा सा खिलौना था । उसने लाकर रवि के सामने कर दिया – ले पकङ भाई । रवि झेंप गया । चाहते हुए भी उसके हाथों ने बाहर निकलने से इंकार कर दिया । आखिर बङों का लिहाज भी कोई चीज है । इस बच्चे ने तो सारी जिन्दगी उनके साथ ही रहना हुआ । तब तक आगे बढकर झाई ने बच्चे को गोद में उठा लिया ।

रवि ने सवालिया नजरों से नर्स और अम्मा को देखा ।

“ बेटी हुई है “।

“ सच में “ ?

नर्स ने हाँ में सिर हिलाया ।

रवि का चेहरा गुलाब हो गया । उसने जेब से पाँच पाँच के दो नोट निकाले और एक अम्मा को और एक नर्स को थमा दिया ।

नर्स ने अविश्वास और हैरानी से रवि को देखा । आजतक लङका होने पर भी एक या दो कलदार ही बधाई में मिलते थे । वह भी लङके की नानी या नाना होते तो दे देते । कभीकभार कोई दादी या दादा भी । पर किसी बाप ने पहली बार दिए थे । वह भी बेटी के होने पर और वह भी कङकता हुआ पाँच का नोट । रवि ने उनके अचरज को देखा ही नहीं । वह धम्मो को बारे में सुनना चाहता था पर कैसे पूछे, शर्म और संकोच की दीवार बीच में थी । इतने में डाक्टर आती दिखाई दी । रवि ने आगे बढकर डाक्टर के पैर छू लिए ।

“ बधाई हो । बेटी हुई है । बङी खूबसूरत है । सामान्य केस रहा । मरीज बिल्कुल ठीक है । शाम को माँ बेटी को घर ले जा सकते हो । थोङी कमजोर है, खास ख्याल रखना पङेगा “ ।

रवि ने आगे की बातें तो सुनी ही नहीं । वह दौङ गया । चंद मिनटों में ही लड्डू लेकर लौट आया । लड्डुओं का लिफाफा उसने ताई को पकङाया – “ ले ताई सबका मुँह मीठा करवा दे “।

झाई ने धीरे से कहा –“ बेचारा लङकी होने की बात सुनकर पगला गया है “ ।

अम्मा ने सबको सुना कर कहा – “ पगलाएगा क्यों ? आज आँधी आ गई है, कल बादल भी आएंगे । और परिवार में बेटा बेटी दोनों होने चाहिएं । बेटियों के बिना त्योहार कैसे बनेंगे । कन्यादान का पुन्न कैसे मिलेगा “ ।

“ सही है अम्मा । जिनके घर बेटी नहीं होती । त्योहार पर सूने बैठे रहते हैं “ ।

“ कन्यादान के बिना तो घर की देहली पवितर ही नहीं होती “ ।

“ बेटियाँ ही माँ का दर्द बटाती है । बेटों के बस का नहीं होता माँ बाप का दुख समझना “ ।

सबको बातों में मग्न देख रवि धीरे से खिसकने लगा ।

“ ओए! तू कहाँ चला “ ?

“ माँ को लेने “

“ रहन दे. मैने तङकसार ही श्याम को भेज दिया था । अब तो वो लोग आनेवाले होने हैं । तू ऐसा कर, घर जा । बीरी को कहके दो रोटी खाले और काम पे जा । जाने से पहले बहु के लिए दूध में मोटी इलायची और सोंफ डली चाय भिजवा दियो । तेरी माँ आ जाए तो मैं अजवाइन और सौंफ का पानी और कुछ खाने को बनाकर ले आऊँ ।

तबतक सब लोग बच्ची को देखने के लिए लपके । एकदम रुई का गोला । कितनी छोटी सी है । प्यारी सी नन्हीं परी ।

तभी सामने से श्याम के साथ दुरगी और मुकुंद आते दिखाई दिए । बच्ची को देखते ही दुरगी का मन नाचने को हो आया पर यह अस्पताल था जिसमें शोर करना मना था । आखिर सात साल बाद परिवार की जङ लगी थी । इस बच्ची से घर में रौनक और बरकतें आनी थी । अगली पीढी की नुमांदगी इसी से होनी थी । उसने अपने झोले से शहद की शीशी निकाली । अपनी बाली उतारकर उसकी डंडी को शहद में डुबोकर बच्ची की जीभ पर रवि से नमोनारायण लिखवाया । बच्ची चटखारे लेकर शहद खाने लगी तो सबके चेहरे पर मुस्कान छा गयी ।

इस बीच नर्स और वार्ड के लोगों ने जच्चा को वार्ड के बैड पर शिफ्ट कर दिया तो सब लोग उसे देखने गये । बच्ची को देख धर्मशीला भी बहुत खुश थी । दुरगी की गोद में बच्ची थमाकर सभी पङोसनें घर चली । सुबह से कोई न नहाई थी, न किसी ने पानी का घूंट पिया था । अब सबको नहाना धोना और खाना पीना था । रवि को काम पर भेजना था । रवि यहाँ से जाना नहीं चाहता था पर जाना तो था ही । आखिर बङों का हुकम था ।