यादों के झरोखे से Part 11 S Sinha द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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यादों के झरोखे से Part 11

यादों के झरोखे से Part 11

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मेरे जीवनसाथी की डायरी के कुछ पन्ने - शिपिंग से इस्तीफे के बाद घर वापसी , शोर जॉब

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14 अगस्त 1969


आज मैं अपने घर बाबा और भाई बहनों के साथ हूँ . करीब डेढ़ साल बाद अपनों से मिला , सभी बहुत खुश हैं . सभी के लिए कुछ न कुछ विदेशी गिफ्ट लाया था . बाबा ने मुझे बोकारो स्टील का अपॉइंटमेंट लेटर और ज्वाइन करने के लिए एक्सटेंशन लेटर देकर कहा “ जल्द से जल्द ज्वाइन कर लो , देर करने से सीनियरिटी पर असर पड़ेगा . “


18 अगस्त 1969


आज मैंने बोकारो स्टील के प्रोजेक्ट डिपार्टमेंट में मैकेनिकल इंजीनियर टेक्निकल सहायक पद पर ज्वाइन किया . यह भारत का सबसे बड़ा प्लांट निर्माणाधीन है यहाँ अभी भी हजारों नित्युक्तियाँ होनी हैं . यहाँ हमारे कॉलेज के इतने ज्यादा सहपाठी हैं कि लगता है फिर से कॉलेज वापस आ गया हूँ .

20 अगस्त 1969


आज बोकारो स्टील नगर प्रशासन से मुझे टू रूम फ्लैट अलॉट हुआ . फ़िलहाल बस एक बक्सा ले कर आया था . अब इसे धीरे धीरे फर्निश करना होगा . कल मेरे बाबा और भैया भी आ रहे हैं , कम से कम सोने का कुछ इंतजाम तो करना ही होगा . अभी तो शहर में कोई सुविधा नहीं है , एक दो छोटे मोटे कैंटीन हैं जहाँ डिनर लेता हूँ और दिन का खाना ऑफिस कैंटीन में होता है . अब तो कभी कभी लगता है कि शिपिंग छोड़ कर गलती तो नहीं की , वहां न घर की चिंता न खाने पीने की .


21 अगस्त 1969


आज बाबा और भैया आ रहे हैं . मैं कल एक चौकी और फोल्डिंग कॉट , दरी , चादर और तकिया आदि खरीद लाया था . बाबा और भैया के सोने का इंतजाम तो हो गया . खाना के लिए उन्हें ले कर कैंटीन गए . ये सब देख कर उन्होंने कहा “ अब जल्द ही तुम्हारी शादी होनी चाहिए , इस तरह के खाने से हेल्थ ख़राब होगा . तुम्हारी शादी के लिए कुछ लोग आये थे उनके बायोडाटा और फोटो मैं बाद में ले कर आऊंगा . “


“ अभी इतनी जल्दी न करें आपलोग . अभी मैं निश्चित भी नहीं कर पाया हूँ कि यह नौकरी ठीक है या नहीं . शिपिंग में सरकारी और प्राइवेट दोनों कंपनियों में बहुत वैकेंसी है , मन न लगा तो वापस चला जाऊंगा . “


“ अब शिपिंग के बारे में सोचना भी नहीं , वह भी कोई लाइफ है . महीनों या सालों तक पानी में इधर से उधर भटकते रहो . एक जगह सेटल्ड लाइफ बेहतर है . “


25 सितंबर 1969


आज मेलबॉर्न से डॉर्थी का लेटर आया है , इधर बहुत बीजी होने से उसे नहीं लिख सका था , इधर खुद इतना परेशान था , अब जा कर दुनियादारी कुछ कुछ समझ आने लगी थी , घर से कॉलेज वाली अपनी पुरानी साइकिल ले आया हूँ , उसी से सुबह सुबह 7 . 30 मेन बिल्डिंग जाना होता है , इतनी जल्दी रेस्टॉरेंट या कैंटीन में किसी दिन कुछ नाश्ता मिल जाता है तो कभी नहीं भी , मेन बिल्डिंग से जीप से प्रोजेक्ट साइट जाते हैं , जाने का टाइम तो पक्का है , आने का कोई ठिकाना नहीं , कभी आधी रात या उसके भी बाद , यह प्लांट रूस की मदद से बन रहा है , कभी कभी रसियन इंजीनियर से लिफ्ट ले लेता तो वह मेन बिल्डिंग छोड़ देता , वहां से साइकिल ले अपने फ्लैट आता , कभी हॉर्लिक्स पी कर सो जाता तो कभी चाय बिस्कुट और कुछ बनाना सीखा ही नहीं और बनाने का समय भी नहीं , छुट्टियों के दिन भी प्लांट जाना पड़ता कंस्ट्रक्शन का काम जोरों से था ,

19 अक्टूबर 1969


बड़ी मुश्किल से दो दिनों की छुट्टी और पूजा का क्लोज्ड हॉलिडे मिला कर तीन दिनों के लिए घर आया था , बाबा भैया सभी मुझे शादी के लिए प्रेशर दे रहे थे , मैंने UPSC की तैयारी करने को सोचा था , कुछ साफ़ सुथरा वाइट कॉलर जॉब , मैंने एक साल के लिए ना कह दिया ,

1 जनवरी 1970


नए साल में छुट्टी ले मैं दो दिनों के लिए घर आया था , खाने पीने की दुर्व्यवस्था के चलते मेरा हेल्थ गिर रहा था , बाबा भैया सभी ने कहा कि अब तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए , कॉम्पिटिशन शादी के बाद भी दे सकते हो , फ़िलहाल लगन नहीं है , मई जून में मुहूर्त देख कर शादी ठीक कर देंगे , कम्पीटिशन की तैयारी के नाम पर मैंने फिर ना कह तो दिया पर तैयारी के लिए समय भी तो चाहिए , मुश्किल से कभी समय मिलता तो इतना थका होता कि किताब उठाने का मन नहीं करता , सोचता इस से अच्छी तो शिपिंग की नौकरी थी पे भी तीन गुना ज्यादा और रहना खाना पीना सब फ्री , एक लाभ यहाँ यही था कि जब छुट्टी मिलती कॉलेज के कई दोस्तों के साथ बैठ कर गप्पें कर सकता था या फिर ताश की महफ़िल में कैसे दिन बीत जाता पता ही न चलता है ,


8 मार्च 1970


आज रविवार को मैं लंच के लिए होटल जाने के लिए तैयार हो रहा था कि कॉल बेल बजा , दरवाजे पर भैया अधेड़ उम्र के किसी व्यक्ति के साथ खड़े थे , भैया तो 80 किलोमीटर दूर रामगढ़ में नौकरी करते थे , अक्सर आया करते पर दूसरे सज्जन को नहीं जानता था , मैंने नमस्ते कर उन्हें अंदर बुलाया , उन्होंने मिठाई का पैकेट टेबल पर रखते हुए कहा “ ये बाबा के फ्रेंड हैं , मैं तुमसे मिलने आ रहा था तो ये भी साथ हो लिए , “


“ ठीक है , हम लोग पास के रेस्टॉरेंट में चल कर लंच कर लें फिर बैठ कर बातें करेंगे , “


भैया ने अपने बैग से एक बड़ा सा लंच बॉक्स निकाल कर कहा “ तेरी भाभी ने देवर के लिए भेजा है , इसमें इतना है कि हमलोगों के खाने के बाद भी बहुत बच जायेगा , “


लंच के करीब एक घंटा बाद वो सज्जन चले गए तब भैया ने कहा “ ये साहब अपनी बेटी के लिए तुम्हें देखने आये थे , अगली बार आऊंगा तो बायोडाटा और फोटो लेता आऊंगा , “


मैंने कहा कि अभी एक साल रुक जाते तो भाई ने कहा “हिम्मत है जा कर बाबा को मना कर . उन्होंने इनकी लड़की से तेरी शादी का मन बना लिया है . तुम्हें बताने आये थे . वे सिन्हा साहब थे हो सकता है फिर जल्दी ही वापस आएं . “


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