यादों के झरोखे से Part 4 S Sinha द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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यादों के झरोखे से Part 4

यादों के झरोखे से Part 4


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मेरे जीवनसाथी की डायरी के कुछ पन्ने - बॉम्बे में शूटिंग देखना फिर पहली नौकरी शिपिंग में मिलना

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19 दिसम्बर 1967


मैं अपने चचेरे भाई के साथ दादर के पास दोनों स्टूडियो गया . शूटिंग जितना रोमांचक होगा सोचा था वैसा कुछ मजा नहीं आया . एक स्टूडियो में डांस की शूटिंग हो रही थी , उस डांसर को मैं नहीं पहचान सका . पर दर्जनों बार एक ही शॉट को कट , रीटेक देख कर वहां से निकल उसी स्टूडियो के दूसरे रूम में गया . वहां कुछ जाने पहचाने चरित्र अभिनेता बैठ कर चाय पी रहे थे .उस समय की टॉप एक्ट्रेस मुमताज को किसी फिल्म की शूटिंग के लिए आना था . वहां शेख मुख्तार भी बैठे थे .कुछ देर तक मुमताज़ का वेट किया वे नहीं आयीं तब भाई ने कहा “ दूसरे स्टूडियो में चलते हैं . “


दूसरे स्टूडियो में शिमला या किसी अन्य हिल स्टेशन का सेट लगा था . अभिनेता चंद्रशेखर और अभिनेत्री इंद्रा बंसल की शूटिंग हो रही थी . एक झोपडी थी जिसे सफ़ेद रूई से ढक कर शिमला का सेट दिखाया जा रहा था . आस पास पगडंडी बना था जिसके दोनों तरफ भी बर्फ दिखाया गया था . किसी पंजाबी फिल्म की शूटिंग थी . कुछ देर के बाद वहां से भी बोर हो कर निकला . फिर हम दोनों भाई घर लौट आये . बड़े बाबा ने बताया मेरे बाबा ने उन्हें ऑफिस में फोन कर बताया है कि दो सप्ताह बाद पटना में मेरा इंटरव्यू है .

24 दिस्मबर 1967


मैं आज वापस पटना लौट आया . बॉम्बे में नौकरी तो नहीं मिली पर कॉन्सोलेशन में स्टूडियो की सैर और कुछ एक्टर्स के दर्शन हुए . 10 दिनों के बाद फिर एक इंटरव्यू है बिहार इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड का .


26 दिसम्बर 1967


मेरे बाबा पटना से निकलने वाले इंग्लिश पेपर “ द इंडियन नेशन “ मंगवाते थे और दादी के लिए हिंदी पेपर “प्रदीप “ . इन दोनों में नौकरी के लिए विज्ञापन न के बरारबर होते थे . बीच बीच मैं सिन्हा लाइब्रेरी जाता और वहां टाइम्स ऑफ़ इंडिया और स्टेसमैन से वैकेंसी के एड्स नोट करता . आज टाइम्स के एक कोने में 4 -5 लाइन्स का छोटा सा विज्ञापन देखा - शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया में मरीन इंजिनियर के लिए . हाँ ना करते करते उसे भी नोट कर लिया .


28 दिसम्बर 1967


आज मैंने शिपिंग कॉर्पोरेशन के लिए हैंड रिटेन एप्लीकेशन लिखा और 25 पैसे के लिफाफे में आर्डिनरी पोस्ट RMS लेटर बॉक्स में डाल दिया है .


3 जनवरी 1968


आज इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड का इंटरव्यू दे कर आया हूँ . इंटरव्यू तो लगभग सभी जगह अच्छा ही होता था पर अभी तक किस्मत साथ नहीं दे रही थी . सुना है इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में बहुत ज्यादा वैकेंसी है तो यहाँ कुछ ज्यादा उम्मीद लगाए हैं , देखें क्या होता है .


5 फ़रवरी 1968


आज शिपिंग कॉर्पोरेशन से इंटरव्यू लेटर आया है . 19 तारीख को कलकत्ता में इंटरव्यू है . फिर कलकत्ता जाने के लिए पैसे की समस्या उठी . जगह जगह अप्लाई करने के लिए पोस्टल आर्डर , ड्राफ्ट , पोस्टेज खर्च आदि के लिए बार बार बाबा से पैसे मांगने में शर्म आती है , ऊपर से आने जाने का खर्च सभी कम्पनी नहीं देती है . मैंने बाबा को कहा इस बार मैं RMS के बॉगी में जमीन पर या बोरे पर बैठ कर नहीं जाऊँगा , भले इंटरव्यू छोड़ना पड़े . घड़ी घड़ी चश्मा उठा कर डाक सॉर्टर मुझे देख कर हँसता है . इत्तफ़ाक़ से आज शाम भैया आ गए , वे तो नौकरी में थे और मेरी समस्या सुलझ गयी . मन में ख्याल आया शायद इस बार किस्मत शुरू से साथ दे रही है , काम बन जाये .


19 फ़रवरी 1968


आज कलकत्ता में शिपिंग कॉर्पोरेशन में इंटरव्यू दे कर आया हूँ . इंटरव्यू में पूछे गए बेतुके सवालों से मुझे निराशा हुई . कहीं ऐसे सवाल इंजिनियर के इंटरव्यू में पूछे जाते हैं - कैन यु डांस , कैन यू सिंग , फ्रेंच स्टूडेंट्स आंदोलन क्यों हो रहा है ..... आदि . मैंने समझ लिया यहाँ भी कुछ नहीं होने वाला है . मैं वापस पटना की ट्रेन में बैठा सोच रहा हूँ कि पटना चल कर शिपिंग मिनिस्टर को खत लिखूँगा .


22 फ़रवरी 1968


एक सादे पेपर पर हैंड रिटेन लेटर यूनियन शिपिंग और ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर , भारत सरकार के नाम लिखता हूँ . इस लेटर को मैंने केंद्रीय मंत्री श्री वी के आर वी राव के नाम लिखा . फिर मैं 25 पैसे के लिफाफे में RMS लेटर बॉक्स , पटना जंक्शन में ड्राप कर आया हूँ . नौकरी वाले सभी आवेदन जिनमें कोई बैंक ड्राफ्ट या पोस्टल आर्डर नहीं देने होते मैं पटना जंक्शन RMS में ही ड्राप करता हूँ ताकि ये जल्दी ट्रेन से अपने गंतव्य स्थान पहुँच जाएँ . बाकी को जी पी ओ से रजिस्टर्ड पोस्ट करना होता है .


.20 अप्रैल 1968


आज मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं है . शिपिंग कॉर्पोरेशन से अपॉइंटमेंट लेटर मिला है . घर में सभी खुश हैं . दो सप्ताह के अंदर ही कलकत्ता में रिपोर्ट करना है . पर सच तो यह है कि शिपिंग के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है न ही मैंने जहाज के बारे में कोई खास सब्जेक्ट मैकेनिकल इंजीनियरिंग में पढ़ा था . अंदर से भयभीत था कि मैं काम ठीक से कर पाऊँगा . भैया भी आये थे उन्होंने समझाया कि ऐसा कुछ नहीं है इंजिन्स , बॉयलर , पाइप , पम्प आदि तो तुमने पढ़ा है बाकी काम के लिए वहां नैविगेशन ऑफिसर्स होते हैं . और वैसे भी शुरू के कुछ महीने तुम्हें ट्रेनिंग दी जाएगी .


4 मई 1968


आज कलकत्ता में ब्रिटिश इंडिया स्ट्रीट में शिपिंग कॉर्पोरेशन के दफ्तर में आया . मैंने अपना नियुक्ति पत्र ऑफिस में दे कर अगले निर्देश की प्रतीक्षा कर रहा था . थोड़ी देर में मुझे एक लेटर दिया गया जिसके अनुसार मुझे रक्षा मंत्रालय के गार्डन रीच शिप बिल्डिंग एंड रिपयेर वर्कशॉप में रिपोर्ट करना था . मैंने वहां से गार्डन रीच जाने की जानकारी ली और निकल पड़ा . मैं अपना सामान हावड़ा स्टेशन के क्लॉक रूम में रख कर आया था .


एस्प्लेनेड से 12 B नंबर की बस से गार्डन रीच वर्कशॉप पहुंचा . वहां कैप्टेन बत्रा को रिपोर्ट किया . उसने ट्रेनिंग का एक शेड्यूल दिया जिसके अनुसार वर्कशॉप के अलग अलग डिपार्टमेंट में ट्रेनिंग लेनी थी . बत्रा बड़ा कड़ियल मिजाज का खड़ूस लगा मुझे .

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