गवाक्ष - 39 Pranava Bharti द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

गवाक्ष - 39

गवाक्ष

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" आपके अनुसार जीवन का क्या लक्ष्य है, उसका ध्येय क्या होना चाहिए?"

"जो सारी बातें मैंने तुमसे की हैं वे जीवन से ही संबंधित हैं मेरे दोस्त!जीवन किसी एक प्रकार की वस्तु का नाम नहीं है, सब कुछ मिलकर जीवन बनता है। उसके सभी पहलुओं को हम किस प्रकार देखते हैं ?यह हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर है। तुम जान गए हो कि पृथ्वी के समस्त प्राणियों में मस्तिष्क है किन्तु केवल मनुष्य को ही उसकी उपयोगिता रूपी उपहार प्रदान किया गया है । हमारे शरीर में प्रत्येक अंग की अपनी महत्ता है। मस्तिष्क में चेतना है, जागृतावस्था में वह पूर्ण चैतन्य रूप में होता है किन्तु मस्तिष्क सुप्तावस्था में भी काम करता है । आज के मनुष्य की यही परेशानी है, वह सोचना ही नहीं चाहता, चिंतन ही नहीं करना चाहता। किसी भेड़ चाल के समान भीड़ चलती जाती है। यदि हम मस्तिष्क का सही उपयोग करें तब हम केवल गुरु से ही नहीं प्रकृति से, किसी से भी शिक्षा प्राप्त करके जीवन को व्यवहारिक रूप में सुंदरता से जी सकते हैं । कमल के फूल को देखा है कभी?"

"जी, देखा है, वही जो कीचड में रहता है?"कॉस्मॉस ने पृथ्वी की बहुत सी चीज़ों को देख लिया था ।

"कीचड़ में रहकर भी वह अपने आपको ऊपर उठाकर रखता है। कितना सुन्दर, पवित्र, स्वच्छ रहता है ! यह प्राकृतिक है, कितना कुछ सिखाती है हमें प्रकृति, यदि हम सीखना चाहें, इसके लिए चिंतन की, जागृति की आवश्यकता है । यह जागृति मस्तिष्क से ही आएगी न ?"

" फिर इसमें कठिनाई क्या है?"

"कठिनाई यह है कि हम मस्तिष्क को कुछ अच्छा, मानव-हित में सोचने ही नहीं देते। मस्तिष्क का प्रयोग अब दूसरों की बुराई करने में, चुगली करने में, ईर्ष्या करने में होने लगा है । जब हम इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त कर लेते हैं कि हम यहाँ पर क्यों आए हैं?क्या दुखी होने के लिए?रोने के लिए ? दूसरों में त्रुटियाँ निकालने के लिए ? ईर्ष्या के लिए? अथवा, प्रेम का प्रसाद बाँटने तथा स्वयं उस प्रसाद को ग्रहण करके उससे आनंद प्राप्त करने के लिए, तब हम सहज होकर जीवन के ध्येय को सरलता से समझ पाते हैं और एक उत्साह, आनंद व अनुराग का जीवन व्यतीत करते हैं। हम क्या कभी यह सोचते हैं कि हम पृथ्वी पर क्यों हैं?जीवन का आखिर अर्थ क्या है?"

"लेकिन यह सोचने की आवश्यकता क्यों है कि हम पृथ्वी पर क्यों हैं? हम हैं तो हैं !"कॉस्मॉस ने अपनी बुद्धि के अनुसार कहा ।

"हम हैं इसीलिए हमारे इस होने का कोई ध्येय तो होना चाहिए न? कोई मकसद तो होना चाहिए न ?मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न कौंधता रहा है कि क्या कभी हम सोचते हैं कि हम क्यों हैं?हमारे जीवन का अर्थ क्या है? जीवन का ध्येय क्या है?

इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर चिंतन केवल मनुष्य ही कर सकता है क्योंकि मनुष्य की चिंतन-शक्ति अद्भुत है। जैसा मैंने ऊपर कहा कि मस्तिष्क अन्य प्राणियों में भी है किन्तु वे उसका उचित उपयोग करने की क्षमता नहीं रखते। मनुष्य ने उसका उत्कृष्ट प्रयोग करके कितने नवीन आविष्कार किए, मनुष्य ने आज इस धरती पर विज्ञान की अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त करके जीवन को सुविधाएं प्राप्त कराई हैं। सोच व सही चिंतन मनुष्य को प्रगति-पथ पर ले जाती है, यही सही सोच विकास की बुलंदियों पर पहुंचती है किन्तु मनुष्य के मस्तिष्क की गलत सोच विध्वंस भी मचा देती है इसीलिए सही सोच महत्वपूर्ण है । यही सोच सही रहे, उन्नति-पथ पर अग्रसर करे, मनुष्य को एक दूसरे में विश्वास जगाए। जीवन को जीने के लिए बहुत आवश्यक है अन्यथा जैसा तुमने कहा 'हम हैं तो हैं, नहीं हैं तो नहीं हैं । "

" तो क्या हमारे रहने, न रहने से कुछ अंतर पड़ता है ?"

" जानते हो ! जब मस्तिष्क शांत हो जाता है तथा अन्य अवयव चलते रहते हैं तब या तो यह माना जाता है कि मनुष्य 'कोमा' में चला गया अर्थात वह इतना अशक्त हो गया कि उसका जीवन केवल निष्चल शरीर तक ही सीमित रह गया और मस्तिष्क के ठीक प्रकार काम न करने की अवस्था में उसे पागल करार दे दिया जाता है । ह्रदय व मस्तिष्क के बिना मनुष्य या तो है ही नहीं अथवा अधूरा है ।

" अरे बाबा ! बहुत गूढ़ दर्शन है !"कॉस्मॉस चकित होकर सब सुनता रहा था ।

"नहीं, केवल जागृत होने की आवश्यकता है। यह स्मृति में रखने की आवश्यकता है कि मनुष्य जीवन अमर नहीं है, केवल अपने किए हुए कार्यों से ही वह भौतिक शरीर के न रहने पर भी अमर रहता है । जीवन का प्रत्येक पल महत्वपूर्ण है, मनुष्य गुरूर में फूला रहता है और किस पल गुब्बारे की भाँति उसकी हवा निकल जाती है, उसे पता भी नहीं चलता इसीलिए जीवन का प्रत्येक पल बहुत महत्वपूर्ण है। जो कुछ भी घटित होता है, एक पल में ही होता है । जीवन की इस क्षण भृंगुरता को समझना अनिवार्य है । इसको समझने के पश्चात ही मनुष्य अपनी प्रत्येक साँस में मुस्कुराहट भर सकता है । "

"कॉस्मॉस ! हम मनुष्य दैनिक जीवन में बहुत अचेत रहते हैं अपने मस्तिष्क को कष्ट देने की आवश्यकता ही नहीं समझते। जब हम छोटे थे तब हमें सिखाया जाता था कि उतने पाँव पसारने चाहिएं जितनी जिसकी चादर होती है । "

"ये पाँव भी सोचने के दायरे में आते हैं क्या "?कॉस्मॉस चौंककर बोला।

"समझाता हूँ, इसका अर्थ है कि मनुष्य को अपनी आवश्यकता के अनुसार ही भौतिक साज-सामान एकत्रित करना चाहिए। इसमें चाहे खान-पान हो अथवा रहन-सहन !आज मनुष्य का जीवन उपभोक्तावाद पर टिका हुआ है । जितने अधिक उपभोक्ता, उतना अधिक उत्पादन तथा उतना ही अधिक तथाकथित विकास---हमारे प्रसार-माध्यम, प्रचार-माध्यम, प्रकाशन-माध्यम सब में उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। यदि हम समाज की प्रगति के बारे में सोचते हैं तब भी उचित है, तब उत्पादन के लिए अधिक कल-कारखाने खुलेंगे, आम आदमी को काम मिलेगा, वह अपने परिवार का पालन-पोषण अच्छी प्रकार कर सकेगा। परन्तु वास्तविकता इतनी सरल नहीं है। आम आदमी भी कार्य करने के स्थान पर उपभोग में अधिक रूचि लेता है। आज उपभोग की वस्तुएं खरीदने के लिए 'क्रेडिट-कार्ड्स'हैं, सरकारी, गैर-सरकारी कंपनियाँ तथा तथा बैंक आदि ऋण देने के लिए तत्पर रहते हैं लेकिन संस्कार ---इस सबमें मनुष्य के संस्कार खो जाते हैं । "

" प्रोफ़ेसर ! मेरा तो सिर चक्कर काट रहा है, ये संस्कार ---मुझे आपकी बातें बिलकुल समझ में नहीं आ रहीं। इन सब बातों का जीवन से क्या संबंध है ?"

"मैं जानता हूँ तुम्हारे लिए यह समझना कठिन है किन्तु तुम यह समझ सकते हो कि हम जीवित हैं तो संसार की सभी बातों से जुड़े रहते हैं। आधुनिक युग में मनुष्य की इच्छाएं इस कदर आसमान को छू रही हैं कि वह परेशानियों में फँसता रहता है। इसीलिए उसका जीवन कठिन होता जाता है। ”

“ये संस्कार----?”

" संस्कार हमें अपने वातावरण, अपने माता-पिता, अपने गुरुजनों से प्राप्त होते हैं, उनके लिए धन अथवा ‘क्रेडिट –कार्ड’ की आवश्यकता नहीं होती। वे सहज रूप में हमारे भीतर प्रविष्ट करते हैं, सरल जीवन जीने की कला सिखाते हैं । जोअपने पास है, उससे मनुष्य संतुष्ट हो जाता है, वह किसी से ईर्ष्या या तुलना नहीं करता। वह उसमें संतुष्ट हो जाता है जो वह परिश्रम से प्राप्त करता है। लेकिन आज की समाज व्यवस्था से प्रभावित मनुष्य समाज में अपनी इज़्ज़त का दिखावा करने के लिए पहले भौतिक वस्तुओं के प्रति आकर्षित होकर ऋण लेता है फिर उसे उतारने की चिंता में अपना स्वास्थ्य बिगाड़ लेता है। इससे उसके संबंधों पर भी प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी ऎसी स्थिति में वह एकाकी भी पड़ जाता है। इससे समाज में वह अपना आदर भी खो देता है और मानसिक शन्ति भी। "

"क्या यह स्थिति सबके साथ होती है ?"कॉस्मॉस को प्रोफेसर की बातें सुनकर भय लगने लगा था ।

" यूँ तो कमोबेश सबके साथ इस प्रकार की घटनाएं होती हैं किन्तु मध्यम वर्ग का आदमी इनसे अधिक प्रभावित होता है। अमीर और अमीर होता जाता है, गरीब अपनी भौतिक इच्छाओँ की पूर्ति न हो पाने पर असहज तथा निराश रहता है, वह अपने परिवार की तथा अपनी इच्छा पूर्ण न कर पाने में अपने आपको असमर्थ पाता है और जीवन भर ग्लानि से घिरा रहता है। "

"आप बार-बार जागृति और चेतना की बात करते हैं यह किस प्रकार आती है?"

"जहाँ जड़ता न हो, वहाँ चेतना होती है । चेतना यानि इसकी स्मृति रहना कि हम जीवित हैं । कण-कण में जानने की जीवंत शक्ति है, जीवन का लक्षण जिज्ञासा का बना रहना है। चेतना है, तभी बदलाव है, चेतना का लक्षण ही स्वात्मा की चेतना है । प्राणिमात्र क्या पेड़-पौधे सभी में तो बदलाव होते हैं, इनमें चेतना है किन्तु अभिव्यक्ति नहीं है। जड़ व्यक्ति किसीका सम्मान नहीं कर सकता, जहाँ चेतना है, वहीँ पर प्रेम, आदर आदि संवेदनाएं हैं। देखो न! मनुष्य के भीतर कितनी शक्तियां हैं, दर्शन की, जिघ्रण की, श्रवण की, महसूस करने की ---और भी बहुत सी लेकिन इनकी उपयोगिता तभी है जब मनुष्य सचेत हो, जागृत हो। "

"तो ध्यान क्या है?"

"अपने भीतर झाँकना, अपने आपसे एकता महसूस करना ही ध्यान है शरीर को महसूस करने के बाद चेतना आती है। हमें भान होता है कि हम इस शरीर से भिन्न हैं, हम तो आत्मा हैं। इस ज्ञान के पश्चात हमें कोई दुःख, परेशानी, जिज्ञासा रह ही नहीं जाती । "

"यह जीवन एक बहम सा लगता है प्रोफ़ेसर !"

"नहीं, जीवन बहम नहीं, यह आस्था है, आस है, विश्वास है। यह ईश्वर प्रदत्त एक आशीष है जिसको यदि हम जीना सीख सकें तो अपने पीछे सुगंध की बौछार बिखेरकर, इस दुनिया में अपने आने को सफल बनाकर जाते हैं। "

"इसका अर्थ है इस पृथ्वी पर जन्म लेना बहुत सौभाग्य की बात है?"

"बिलकुल, जन्म लेना सौभाग्य है, मनुष्य के रूप में जन्म लेना उससे बड़ा सौभाग्य है और अपने जीवन को कुशल चेतना से जीकर एक उत्सव बनकर, पुष्पों की सुगंध सा जीकर चले जाने और भी बड़े सौभाग्य की बात है । "

"आपके अनुसार मनुष्य जन्म बहुत महत्वपूर्ण है, मुझे भी यहां बहुत आनंद आ रहा है, नवीन सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं, नवीन संवेदनाओं ने मेरे भीतर प्रवेश किया है लेकिन फिर भी मैं बहुत दुविधा में हूँ ---”

क्रमश..

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