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जयगाथा - 3

गतांक से आगे....

देवताओं के गुरु थे ऋषि अंगिरा के परम तेजस्वी और विद्वान पुत्र बृहस्पति और दैत्यों के गुरु और पुरोहित थे संजीवनी विद्या जानने वाले परम प्रतापी शुक्राचार्य ।
अमृत पीकर देवतागण अमर हो चुके थे । वे दानवों का वध कर देते । दानवों की संख्या कम होने लगी तब उन्होंने अपने गुरु शुक्राचार्य के निकट जाकर अपनी व्यथा कही-- दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उनको सान्त्वना दी ।
“ चिंतित न हो शिष्यों ! मैं तुम सबको पुनः जीवित कर दूँगा ।”
दैत्य प्रसन्न हो गए । शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या से उन सबको पुनर्जीवित कर देते थे, परन्तु देवगुरु बृहस्पति को यह विद्या आती न थी ।
देवताओं ने गुरु बृहस्पति के पुत्र कच के पास जाकर कहा--
“ हे ब्राह्मण देवता ! हम आपके सेवक हैं और भ्राता भी । आपको तो पता ही है कि शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या के कारण हम सभी भयाक्रांत हैं । दैत्य अब मरते ही नहीं हैं । कृपया आप शुक्राचार्य से वह संजीवनी विद्या प्राप्त करें ताकि हमारा और समस्त जगत का कल्याण हो ।”
“ मैं अवश्य प्रयत्न करूँगा ।” परोपकारी हृदय वाले कच तुरन्त ही तैयार हो गये ।
देवताओं ने कच को शुक्राचार्य के पास भेज दिया । कच दानवराज वृषपर्वा के नगर में गये तथा शुक्राचार्य के पास उपस्थित होकर उन्हें प्रणाम किया और बोले--
" मुनि अंगिरा मेरे पितामह हैं और मैं आपके मित्र बृहस्पति का पुत्र कच हूँ । आपको सादर नमन करता हूँ महागुरु शुक्राचार्य ! आप मुझे शिष्य के रूप में ग्रहण करें । मैं आपको गुरु मानता हूँ और सहस्र वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करने की अनुमति माँगता हूँ ।”
इतनी विनम्र भाषा और प्रेम से दैत्य कभी भी शुक्राचार्य से बोलते न थे । शुक्राचार्य ने प्रसन्न होकर कच की प्रार्थना स्वीकार कर ली और कच को अपना शिष्यत्व प्रदान किया । उसने अपनी कुशाग्र बुद्धि, ज्ञान तथा सेवाभाव से गुरु शुक्राचार्य और उनकी पुत्री देवयानी को प्रसन्न कर दिया ।
दैत्यों को कच के शिष्य बनाये जाने से बहुत बुरा लगा परन्तु गुरु की इच्छा का विरोध करने की उनमे शक्ति न थी । वे सब अवसर ढूँढने लगे ।
बहुत वर्ष बीत गये ।
दैत्यों को लगने लगा कि गुरुसेवा करते-करते कच अवश्य ही दैत्यगुरु से संजीवनी विद्या प्राप्त कर लेगा, अतः एक दिन कच जब पशुओं को चराने के लिए वन में गया था तो वहाँ दानवों ने क्रोध में भरकर कच को मार डाला और उसके टुकड़े-टुकड़े कर श्वानों तथा श्रृंगालो को खिला दिया ।
ऋषि पुत्री देवयानी ने जब देखा कि गउएँ सन्ध्या को लौट आयी हैं पर उनके साथ कच नहीं हैं तब उसने शुक्राचार्य से कहा--
“ पिताजी ! अवश्य ही कच को इन दुष्ट और दुरात्मा दानवों ने मार डाला है । मैं चाहती हूँ कि आप कच को पुनर्जीवित कर दें ।”
शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का प्रयोग किया और कच को आवाज दी । संजीवनी विद्या के कारण कुत्तों और सियारों का पेट फाड़ कर कच के टुकड़े एकत्रित हो गये और उनमें जीवन का संचार हो गया । जीवित होने के बाद असुरों द्वारा स्वयं को मारे जाने की घटना कच ने देवयानी को सुनायी ।
देवयानी कच के मृदु स्वाभाव और गुरु के प्रति अनन्य सेवाभाव से उसे पसंद करने लगी थी । एक दिन उसने कच से कहा—
“ क्या तुम मेरे लिए सुन्दर सुगन्धित मोगरे के पुष्पों को वेणीसज्जा हेतु लाकर दोगे ?”
कच तुरन्त ही तैयार हो गया और वन में चला गया ।
कच को वन में अकेले जान कर दानवों ने फिर से उन्हें मार डाला और समुद्र के जल में घोल दिया, जिससे कि गुरु शुक्राचार्य उन्हें जीवित न कर सकें, परन्तु इस बार भी शुक्राचार्य ने उसके चूर्ण को समुद्र से अलग करके को जीवनदान दे दिया ।
दानव बड़े दुखी थे, एक बार पुनः अवसर पाकर उन्होंने कच को जलाकर मार डाला और इस बार जले हुए शव का चूर्ण बनाकर अपने गुरु शुक्राचार्य को ही मदिरा में मिला कर पिला दिया ।
अब दानव बड़े प्रसन्न हुए । उन्हें कच से छुटकारा मिल गया था ।
देवयानी से रहा नहीं गया । वह दुखी हो गयी । उसने अपने पिता शुक्राचार्य को पुनःकच को जीवित करने की प्रार्थना की । शुक्राचार्य ने संजीवनी का प्रयोग किया तो मदिरा में मिले कच पेट से ही शुक्राचार्य से धीरे से बोले--
“ प्रभु ! मैं आपका उदर चीरकर निकल नहीं सकता । अब मुझे जीवन प्रदान करने की इच्छा न करें । यह सम्भव नहीं कि मैं स्वयं के जीवन हेतु आपका उदर फाड़कर बाहर निकलूँ और आप मृत्यु को प्राप्त हो ।” यह कहकर उसने अपने साथ हुई घटना सुनायी ।
शुक्राचार्य ने कहा—
“ अब और कोई युक्ति नहीं है परन्तु तुम्हारे जैसा शिष्य भी मिलना असम्भव है । तुम सच्चे शिष्य हो और ब्राह्मण भी । ब्राह्मण होने के कारण मैं तुम्हें वह संजीवनी विद्या देता हूँ । इसके पश्चात तू मेरा उदर चीरकर बाहर निकल आना और मुझे बाहर आकर जीवित कर देना ।”
तत्पश्चात कच ने संजीवनी विद्या प्राप्त कर ली और शुक्राचार्य का पेट फाड़ कर बाहर निकल गया और गुरु शुक्राचार्य को उसी संजीवनी विद्या से जीवित कर दिया ।
शुक्राचार्य ने तभी से मदिरा को ब्राह्मणों के लिए वर्जित होने का शाप दिया था ।
* आज से इस संसार का कोई भी अल्पबुद्धि ब्राह्मण यदि अज्ञानता से भी सुरापान करे तो वह धर्म से भ्रष्ट होकर ब्रह्महत्या के पाप का भागी बने और इह और परलोक में निन्दित हो ।
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*यो ब्राह्मणोऽद्य प्रभृतीह कश्चिन्मोहात् सुरां पास्यति मंद्बुद्धिः ।
अपेतधर्माब्रह्महा चैव सस्याद अस्मिन्ल्लोके गर्हितःस्यात् परे च ।।
(महाभारत/ वनपर्व १/ अध्याय ७६/ श्लोक संख्या ६७)
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कच का अभीष्ट पूरा हुआ था । देवताओं की कामना संजीवनी विद्या थी जो कच ने प्राप्त कर ली थी ।
अब वापस जाने का समय आ गया था । अपने गुरु के समीप रहकर कच ने हजार वर्षो का ब्रह्मचर्य का अपना कहा हुआ वचन पूरा किया और पुनःदेवलोक जाने की अनुमति माँग ली ।
कच अपने गुरु शुक्राचार्य को प्रणाम करके चलने के लिए तैयार हो गये । शुक्राचार्य ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया और जाने की आज्ञा भी ।
देवयानी कच के सम्मुख आ खड़ी हुई और बोली--
" आप अपना अभीष्ट तो पा चुके हैं, अब मेरा क्या ? इतने दिनों तक साथ रहने के कारण मुझे आपसे प्रेम हो गया है और सम्भवतया आप भी मुझे पसंद करते हैं, इसी प्रेम के वशीभूत होकर दानवों द्वारा जब बार-बार आपको मार डाला गया, तब-तब मैंने अपने पिता को कहा कि आप को जीवित करें । मेरा यह व्यवहार आपके प्रति मेरा अगाध प्रेम दर्शाता है । अतः आप वैदिक मंत्रोच्चार सहित मुझसे विवाह करें ।”
कच ने बहुत ही विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया--
" गुरु शुक्राचार्य मुझे पूजनीय हैं, उसी प्रकार तुम भी मेरे लिए परम पूज्य हो । गुरुपुत्री होने के कारण तुम मेरी बहन के समान हो । मैंने सदैव तुम्हें बहन की तरह ही देखा है और मैं भी तो गुरुदेव के उदर में रह चुका हूँ, इस नाते तुम वैसे भी मेरी सगी बहन बन चुकी हो, अतः इस प्रकार की अप्रिय बातें मुझसे न करो ।"
देवयानी तो काम के वशीभूत थी, सो क्रोध में भर गयी । बार-बार प्रणय निवेदन करने पर भी जब कच ने उसके साथ विवाह आमन्त्रण को ठुकरा दिया तो देवयानी ने उसे शाप दे दिया--
“ आपकी यह संजीवनी विद्या कभी सिद्ध नहीं होगी ।”
कच को लगा, वर्षों का परिश्रम व्यर्थ ही गया । उसे भी क्रोध आ गया । उसने कहा--
" अपनी कामना के वश में आकर तुमने मुझे अकारण ही शाप दिया है अतः मैं भी तुम्हें शाप देता हूँ—
“ मैं तो क्या कोई भी ब्राह्मणपुत्र कभी भी तुमसे विवाह न करेगा, मुझे तुम्हारे शाप के फलस्वरुप संजीवनी विद्या सफल तो नहीं होगी परन्तु मैं जिसे यह विद्या सिखा दूँगा उसे यह अवश्य सफल हो जाएगी ।"
इतना कह कर कच वापस देवलोक को प्रस्थान कर गया ।
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उस उपवन में आज मानो आनन्द ने अपना डेरा डाल दिया था । वहाँ स्थित सरोवर से सुनयनी कन्याओं की किलकारियाँ सुनायी पड़ रही थी । वन में आज ऋषि पुत्री देवयानी और राक्षसराज वृषपर्वा की पुत्री राजकुमारी शर्मिष्ठा सहित बहुत सी कन्या जलक्रीड़ा में तल्लीन थी । तेज वायु से उनके वस्त्र आपस में मिल गये थे ।
एक प्रहर तक क्रीड़ा के पश्चात जल से निकलकर शर्मिष्ठा ने भूलवश देवयानी के वस्त्र पहन लिए । जिस कारण दोनों में भारी विवाद आरम्भ हो गया ।
देवयानी ने कहा--
" तुम्हारी मति मारी गयी है क्या ? तुम ठहरी दानव की पुत्री ! मुझ ब्राह्मणी के वस्त्र तुझे कदापि न पहनने चाहिए थे, क्या तुम्हें तनिक भी लज्जा नहीं आती ?"
शर्मिष्ठा राजा की पुत्री थी, उसे भी क्रोध आ गया । बोली--
“ अरी मूर्खा ! मेरे पिता राजा हैं, जब वह बैठे रहते हैं तो तेरे पिता नीचे खड़े होकर प्रतिदिन उनकी स्तुति करते हैं । वही उनको धन-धान्य देते हैं जिससे तुम्हारा और तुम्हारे पिता का पालन हो रहा है । जिस वस्त्र की तू बात कर रही है वह भी मेरे पिता ने तुझे दिया हुआ है ।”
देवयानी ने शर्मिष्ठा के शरीर से अपने वस्त्र उतारने और खींचने का प्रयत्न किया, इस छीना- झपटी में शर्मिष्ठा ने देवयानी को पास ही के एक कुएँ में धक्का दे दिया और किसी बिना कुछ बताए अपने राजमहल को लौट गयी ।
देवयानी क्रोध और शोक में भर कर अश्रु बहाते हुए उस कुएँ में पड़ी थी । उसी समय किसी पशु के शिकार के लिए वन में आए हुए नहुष पुत्र राजा ययाति उस स्थान पर पहुँचे, देवयानी सहायता के लिए निरन्तर उस कुएँ से पुकार लगा रही थी । ययाति कूप के पास आए तो उन्होंने देवयानी को उस कुएँ में गिरे हुए देखा और हाथ पकड़कर बाहर निकाला ।
देवयानी ने बाहर आकर अपना परिचय दिया और कहा-
“ मैं महान दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री हूँ । तुमने मेरा हाथ थामा है अतः आज से मैं तुम्हारा पति रूप में वरण करती हूँ । मैं शीघ्र ही पिता की अनुमति प्राप्त करूँगी तब आप मुझसे विधिवत विवाह करें ।”
उसके पश्चात देवयानी क्षुब्ध अवस्था में पिता के पास पहुँची और शर्मिष्ठा से हुये अपमान की सारी बात पिता शुक्राचार्य को बताई ।
शुक्राचार्य ने कहा--
" पुत्री ! तू पवित्र ब्राह्मण की पुत्री है, मैं किसी की स्तुति नहीं करता परन्तु वृषपर्वा और स्वयं इन्द्र भी मुझे प्रणाम करते हैं । अपने क्रोध को छोड़ दो, क्योंकि यदि कोई व्यक्ति सौ वर्ष तक निरन्तर व्रत और यज्ञ करता है और दूसरा मनुष्य किसी पर क्रोध नहीं करता तो दोनों में क्रोध न करने वाला अधिक श्रेष्ठ होता है ।"
इस प्रकार शुक्राचार्य ने देवयानी को समझाने का बहुत प्रयत्न किया परन्तु देवयानी का हृदय शर्मिष्ठा के कटु वचनों से बुरी तरह बिध गया था, अतः कोई बात उसे समझ न आ रही थी ।
‘क्रोध ऐसी पीड़ा है जिसमे मनुष्य का मुख तो खुला होता है पर आँखें और कर्ण बन्द हो जाते हैं ।’
शुक्राचार्य अपनी पुत्री से अगाध स्नेह करते थे । देवयानी को क्रोधित व दुखी देख वह भी क्रोधित हो गये और होकर वृषपर्वा के पास गये, और बोले--
“ राजा ! पाप करने वाले को कई बार तुरन्त ही उसका फल नहीं मिलता, परन्तु उसका फल प्राप्त अवश्य ही होता है । तूने पहले अपने दानवों द्वारा ब्राह्मण कुमार कच का बार-बार वध कराया और अब मेरी पुत्री का वध करने के लिए उसे अपनी पुत्री द्वारा कूप में धक्का दिलवा दिया । मैं तुम्हारे नगर में अब एक पल भी न रह सकूँगा ।”
राजा वृषपर्वा ने बार-बार गुरु से क्षमा दान देने का अनुरोध किया और कहा-
“ मैंने यदि शर्मिष्ठा के द्वारा देवयानी को अपमानित करने की चेष्टा भी की है तो भीषण अग्नि मुझे जला दे । इस भूमि पर मेरा जो कुछ भी है वह सब आपका ही है और मेरे भी स्वामी आप ही हैं ।”
शुक्राचार्य ने कहा--
" यदि राजन आप देवयानी को प्रसन्न कर सके तो ही मैं आपके नगर में रुक सकता हूँ अन्यथा मैं इस नगर को अभी छोड़ दूँगा ।"
वृषपर्वा ने देवयानी के पास जाकर बड़ी ही विनम्रता से प्रार्थना और क्षमा याचना की ।
देवयानी ने कहा— “ मैं चाहती हूँ कि शर्मिष्ठा मेरी दासी बन जाए और एक सहस्त्र कन्याओं सहित मेरे साथ रहे और दासी बनी रहे ।”
राक्षसराज वृषपर्वा नहीं चाहते थे कि उनके महान गुरु उनका राज्य छोड़ कर या उनसे रुष्ट होकर वहाँ से जाएँ, अतः उसने शर्मिष्ठा को सहस्र कन्याओं सहित बुला भेजा और शर्मिष्ठा ने पिता के आदेश और सम्पूर्ण दानव जाति के सुख के लिए देवयानी की दासता स्वीकार कर ली ।
तदन्तर ब्राह्मण महर्षि गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा और आशीर्वाद के फलस्वरुप राजा ययाति का विवाह देवयानी से हुआ और विवाह के पश्चात राजा ययाति अपने साथ देवयानी और दासी के रूप में शर्मिष्ठा को हजार कन्याओं समेत अपनी राजधानी ले गये ।देवयानी से विवाह करके महाराज ययाति अत्यन्त प्रसन्न थे उन्होंने वर्षों तक देवयानी के साथ सुख भोगा ।
शर्मिष्ठा के लिए भी उन्होंने अत्यन्त रमणीय और मनोरम वाटिका में सुन्दर भवन बनवा कर रहने आदि की व्यवस्था की थी ।
*****


वसंत का समय था ।
एक दिन शर्मिष्ठा ने अपने ऋतुकाल की स्थिति में तथा एकान्त पाकर ययाति को अपने सौन्दर्य के वशीभूत कर लिया और अपने साथ समागम करने के लिए तैयार कर लिया । राजा ययाति ने धर्म अनुसरण करके उसे उचित रीति से पत्नी का स्थान दिया ।
कालांतर में शर्मिष्ठा ने देवताओं की तरह सुन्दर बालक को जन्म दिया । वह बालक बड़ा होने लगा ।
एक बार देवयानी ने उस सुन्दर बालक को देखकर उससे पिता का नाम पूछा— “ अरे पुत्र ! तू तो कितना सुन्दर है, कौन हैं तुम्हारे पिता ?”
उस कैशोर्य बालक ने राजा ययाति की ओर इशारा कर दिया । इससे देवयानी को सत्य का पता चल गया ।
वह शर्मिष्ठा पर अत्यन्त क्रुद्ध हुई ।
“ दुष्टा ! तूने सदा ही मेरे साथ छल किया है ।”
शर्मिष्ठा ने कहा- “ सखी का स्वामी ही तो सखी की सभी दासियों का भी स्वामी होता है, अतः राजा ययाति मेरे भी धर्मपति हैं इसमें कुछ भी गलत नहीं है ।”
देवयानी अत्यन्त दुखी हुई । उसे लगा था शर्मिष्ठा ने दासी होकर उसके साथ विश्वासघात किया और स्वयं उसके पति भी इस पापकर्म में तत्पर हुए ।
वह राजा ययाति को क्षमा न कर सकी और सब कुछ छोड़कर अपने पिता के पास चली गयी ।
राजा ने उसे रोकने का बहुत प्रयत्न किया परन्तु वह न रुकी और पिता शुक्राचार्य के समीप जाकर सब कहानी सुना दी ।
क्रोध में भरकर शुक्राचार्य ने राजा को शाप दे दिया कि जिस यौवन के अधीन तुमने यह अपराधपूर्ण कार्य किया है वह यौवनावस्था अब न रहेगी और तुम तत्काल ही वृद्धावस्था को प्राप्त करोगे ।
भला यौवन सदा किसके साथ रहता है ? शाप के कारण राजा ययाति ने डरावनी वृद्धावस्था प्राप्त कर ली । ययाति अपनी यह अवस्था देखकर बहुत दुखी थे, वह तो चिरयुवा रहना चाहते थे । उसने शुक्राचार्य से कहा-
“ भगवन ! असुरराज की वह पुत्री मुझसे ऋतुदान माँग रही थी तथा समस्त शास्त्र और धर्मसम्मत जानकर ही मैंने यह कार्य किया था, कामवश नहीं । वैसे भी मैंने राज्य में घोषणा कर रखी है कि कोई भी मनुष्य मुझसे कुछ भी माँगेगा, मैं उसे अवश्य दूँगा । आप ने ही शर्मिष्ठा को अपनी पुत्री के साथ मुझे सौंपा था । शर्मिष्ठा मेरे अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का वरण करने को तैयार ही नहीं थी, अतः मैंने उसकी इच्छापूर्ति की । यह मैंने किस प्रकार से अधर्म किया कृपया आप ही मुझे समझाइए ।”
शुक्राचार्य का क्रोध काँपते हुए वृद्ध व जर्जर ययाति को देखकर मन्द पड़ गया था उन्होंने कहा—
“ राजन ! मेरा शाप तो असत्य नहीं हो सकता परन्तु इतना अवश्य कहता हूँ कि यदि चाहो तो सहस्र वर्ष तक किसी दूसरे से युवावस्था लेकर अपने इच्छापूर्ति कर सकते हो और वृद्धावस्था को उसकी देह में डाल सकते हो । तुम्हारे तो सभी पुत्र युवा हैं, अपने किसी भी पुत्र से उसकी युवावस्था प्राप्त करो और यौवन के सुख का भोग करो ।”
ययाति दुखी मन से नगर में लौट आए । देवयानी से उनके दो पुत्र थे, यदु और तुर्वसु तथा शर्मिष्ठा से तीन- दुह्यु, अनु और पुरु ।
नगर पहुँचते ही उन्होंने पुनः यौवन प्राप्ति की इच्छा की तथा अपने पुत्रों को बुलाया और बोले-
“ मेरे प्रिय पुत्रों ! मुनिवर शुक्राचार्य के शाप से मैं असमय ही वृद्ध हो गया हूँ । मेरे सम्पूर्ण शरीर में झुर्रियां पड़ गयी हैं शरीर शिथिल हो गया है तथा बाल श्वेत हो गये हैं, किंतु यौवनावस्था से मुझे अभी तृप्ति नहीं मिल सकी है । यदि तुम लोगों में से कोई भी मुझे अपनी युवावस्था देकर मेरा बुढापा ले-ले तो मैं हजार वर्ष के बाद पुनः तुम्हें यौवन वापस कर दूँगा और अपनी वृद्धावस्था वापस ले लूँगा ।”
“ यदु ! क्या तुम...?” यदु ने मुँह फेर लिया ।
तुर्वसु और दुह्यु ने भी कहा—“ नहीं-नहीं, सहस्र वर्ष की वृद्धावस्था...? हमें तो क्षमा ही करें ।”
अनु ने कहा-- “ पिताजी ! आप से मैं बहुत प्रेम करता हूँ परन्तु आपका शाप स्वयं ले लूँ और अपना यौवन आपको दे दूँ, ऐसा मैं नहीं कर सकूँगा ।
अब ययाति ने पुरु की ओर देखा—
देवात्मा पुरु ने कहा— “ मेरा तो यह अस्तित्व ही आपके कारण है पिताश्री, जब आपका हृदय ही इतने वर्षों के सांसारिक भोगों से तृप्त न हो सका तो इसका अर्थ है, यह यौवन व्यर्थ ही है; इससे मुझे भी तृप्ति कहाँ मिलेगी ? यदि मैं आपको अपनी युवावस्था दे सकूँ तो मेरा सौभाग्य ही होगा । मैं सहर्ष तत्पर हूँ, मैं अपनी यह यौवनावस्था आपको देता हूँ ।”
उसने प्रेमपूर्वक पिता के शाप रूपी कुरूप बुढ़ापे को स्वयं पर ग्रहण कर लिया और बदले में राजा ययाति ने पुनः यौवन प्राप्त कर लिया और विषय-भोगों का प्रसन्नतापूर्वक उपयोग किया ।
इस प्रकार उन्होंने सहस्र वर्ष तक यौवनावस्था का पुनः आनन्द प्राप्त किया ।
संभवतः इसी काल में इक्ष्वाकु और नाभाग से सूर्यवंश प्रारम्भ हुआ । ययाति सहस्र वर्षों की लंबी यौवनावस्था पूर्ण हो जाने के पश्चात अपने पुत्र पुरु के पास आए और बोले--
" पुत्र ! मैंने तुम्हारे यौवन द्वारा विषयभोग और आनन्द प्राप्त किया परन्तु यह कामनाएँ कभी भी तृप्त नहीं होती, जिस प्रकार अग्नि में घृत डालने से अग्नि और भी अधिक प्रज्ज्वलित होती है उसी प्रकार कामनाएँ भी अधिक से अधिक बढ़ती चली जाती हैं । इस पूरी पृथ्वी पर जितना भी धन, स्वर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं; वह सभी यदि एक ही मनुष्य को मिल जाए तब भी वह सन्तुष्ट नहीं हो सकता है । सांसारिक तृष्णा का त्याग ही परम सुख है अतःअब मैं इस तृष्णा का त्याग करके परमात्मा की भक्ति में लगूँगा । तुम मेरे सबसे आज्ञाकारी पुत्र हो । सबसे छोटे होने के बाद भी मैं नहुष पुत्र ययाति तुम्हें राज्य सिंहासन पर विराजमान करता हूँ ।”
इसके पश्चात उन्होंने विधिपूर्वक पुरु का राज्याभिषेक किया तथा स्वयं वन को चले गये ।
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ययाति पुत्र यदु से यादवों का वंश चला ।
तुर्वसु से यवन उत्पन्न हुए ।
दुह्यु से भोज तथा अनु से म्लेच्छ जातियों का प्रादुर्भाव हुआ।
राजा पुरु से आरम्भ हुआ वह यशस्वी वंश जिसे पुरुवंश कहा जाता है ।
पुरुवंश में मतिनार नाम के महाप्रतापी राजा हुए, जिन्होंने राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ किया तथा तंसु सहित चार महातेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया ।
तंसु के पुत्र थे ईलीन, जिन्होंने अपने बाहुबल से एक समय सारी पृथ्वी जीत ली थी ।
ईलीन के पाँच पुत्र हुए, जिनमें सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हुए महाप्रतापी दुष्यन्त ।
दुष्यन्त और शकुन्तला से महान शक्तिशाली और यशस्वी भरत उत्पन्न हुए जिनसे भरतवंश जाना जाता है ।
महाराज दुष्यन्त को महान प्रतापी कुरुवंश का विस्तार करने तथा उनका नाम इतिहास में अमर रखने का श्रेय जाता है । राजा दुष्यन्त अत्यन्त पराक्रमी थे तथा उस कालखंड में सम्पूर्ण पृथ्वी के पालक भी ।
कहा जाता है कि उनमें राज्य में किसी को पृथ्वी पर हल चलाने की भी आवश्यकता न होती थी, क्योंकि पृथ्वी बिना बोए और जोते ही भरपूर अनाज पैदा कर देती थी । सभी अत्यन्त सुखी थे तथा पापकर्म कोई भी न करता था । उनके राज्य में चोरी और भूख का कोई भी भय न था । व्याधि-बीमारी किसी को न होती थी तथा अकाल मृत्यु भी कोई नहीं मरता था । सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्म और कर्म का स्वेच्छा से पालन करते थे अतः कोई मनुष्य वर्णसंकर संतान भी उत्पन्न नहीं करता था । सभी देवताओं की आराधना करते थे तथा राजा के आश्रय व दान पर निर्भर होकर निवास करते थे ।
दुष्यन्त सभी प्रकार की अस्त्र-शस्त्र कला के ज्ञाता थे ।
एक समय की बात है राजा वन में शिकार के लिए निकले । सैकड़ों सैनिक योद्धा दलबल सहित उनके साथ थे ही । सुदूर चलते हुए राजा अपने समस्त योद्धाओं समेत एक बियाबान जंगल में पहुँच गये और सैकड़ों हिंसक पशुओं का आनन्दपूर्वक शिकार करने लगे ।
एक हिंसक पशु का पीछा करते हुए राजा अपनी तीव्र गति से काफी आगे अकेले ही निकल गये थे और उनके सैनिक चाहकर भी राजा की तेज गति के समक्ष उनका साथ न दे सके । राजा अकेले थे तथा भूख-प्यास से व्याकुल भी । थोड़ा आगे बढनेपर राजा ने एक अत्यन्त मनोहारी वन में प्रवेश किया ।
वह क्षेत्र बड़ा ही व्यवस्थित था तथा उद्यान जैसा प्रतीत होता था । ऐसा लगता था, जैसे कोई उस क्षेत्र की निरन्तर देखभाल करता हो । चारों और सुगंधित वायु बह रही थी । घने फलदार और छायादार वृक्षों से अटा पड़ा था वह वन प्रदेश । तीव्र हवा से फूलों भरी डालियां राजा पर पुष्पवर्षा कर रही थी तथा धरती पर पुष्पों से कालीन सा बिछ गया था।राजा उस उत्तम शोभा को निहार कर अपनी भूख-प्यास भूल गये तथा सुध खो बैठे थे । समीप ही मालिनी नदी बहती थी ।
उस के तट पर ही अग्निहोत्र और आश्रम देख राजा दुष्यन्त को बहुत हर्ष हुआ । वह आश्रम महात्मा कण्व का था, जहाँ ऋषियों का समूह सम्भवतः निवास करता होगा ऐसा सोचकर राजा दुष्यन्त उस ओर चल पड़े । राजा की सारी सेना भी तब तक वहाँपहुँच चुकी थी । राजा ने सबको वही रुकने का संकेत किया तथा स्वयं आश्रम में प्रवेश कर गये । आश्रम के अन्दर महर्षि समेत कोई भी दिखलाई न पड़ा तब राजा ने पुकारा-
" अरे ऽऽ कोई है यहाँ पर ?"
दुष्यन्त के बार-बार किए जाने वाले शब्दों को सुनकर तापसी वेषधारी एक सुकन्या आश्रम से बाहर निकल पड़ी । वह सुन्दरी कन्या लक्ष्मी के समान रूप यौवन वाली और सदाचारी जान पड़ती थी । उस कन्या ने सम्मान भाव से सर झुकाकर राजा का अभिवादन किया और बोली-
“ हे अतिथि देवता ! आपका महर्षि कण्व के आश्रम में स्वागत है । कहिये ! मैं आपकी किस प्रकार से सेवा करूँ जिससे आप को प्रसन्न कर सकूँ । कृपया अपना परिचय दें और आपके यहाँ पधारने का कारण भी बताइये ।”
दुष्यन्त ने उत्तर दिया—
“ हे सुन्दरी कन्या ! मैं राजा ईलीन का पुत्र दुष्यन्त हूँ, और महर्षि से मिलने का इच्छुक हूँ । कृपया मुझे बताइये कि वह कहाँ हैं ?”
कन्या ने बड़ी विनम्रता के साथ उत्तर दिया—
" महाराज दुष्यन्त को मैं प्रणाम करती हूँ, मेरा नाम शकुन्तला है और मेरे पिता महर्षि कण्व फल आदि लेने हेतु आश्रम से बाहर गये हुए हैं । कृपया आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें । वह लौटते ही होंगे ।
राजा दुष्यन्त तो मुग्ध हो चुके थे शकुन्तला के सौंदर्य पर, तनिक ठहर कर बोले – “ हे शुभलक्षिणी ! तुमने अपूर्व रूप पाया है । मैंने आज तक कभी ऐसे रूप- गुण का दर्शन नहीं किया है । मैंने अपने मन सहित सम्पूर्ण इंद्रियों को सदैव वश में रखा है परन्तु आज मेरा हृदय तुम पर आसक्त हुआ जाता है और मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाने के लिए तुम्हारा वरण करता हूँ । कृपया अपना पूर्ण परिचय प्रदान करो ।”
शकुन्तला ने विनम्रता के साथ ही हँसते हुए उत्तर दिया—
“ महाराज ! मैं परम तपस्वी महात्मा कण्व की पुत्री कहलाती हूँ । महर्षि स्वयं ब्रह्मचारी तथा कठोर व्रतधारी हैं, निसन्देह मैं उनसे उत्पन्न नहीं हूँ ।
" ...तो शीघ्र बताओ सुन्दरी ! कौन हो तुम ? वह वृत्तान्त मैं अवश्य ही सुनना चाहता हूँ ।" दुष्यन्त ने आतुरता से पूछा;
शकुन्तला ने कहा --
“ दीर्घ कथा है आर्य ! जैसा कि पिताश्री कण्व से मैंने सुना है कि बहुत पहले महर्षि विश्वामित्र अत्यन्त कठोर तपस्या कर रहे थे । विश्वामित्र की प्रतिभा से इन्द्र भली भॉंति परिचित थे, इन्द्र को लगा... इस कठोर तपस्या के बल से ऋषि विश्वामित्र स्वयं स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान न हो जाएँ । ऐसा जानकर इन्द्र ने मेनका को बुलाया और विश्वामित्र को तपस्या से विचलित करने का आदेश दिया, इन्द्र ने मेनका के साथ वायुदेव को भी सहायता के लिए भेज दिया ।
वन में पहुँचकर अप्सरा मेनका ने मुनि विश्वामित्र को भीषण तप करते हुए देखा तथा वही समीप में विभिन्न प्रकार से नृत्यादि क्रीड़ाएं करने लगी ।
एक दिन जब ऋषि विश्वामित्र की समाधि टूटी तो उन्होंने सुन्दर गीत गाती हुई और मोहक रति क्रियाएँ करती हुई अद्भुत सुन्दरी मेनका को देखा । उसी समय वायुदेव ने अनन्य सुन्दरी मेनका के शरीर से उसका वस्त्र उड़ा दिया । बिना वस्त्रों के अप्रतिम सौंदर्य को विश्वामित्र ने देखा और काम के अधीन हो गये । वह मेनका के समीप गये और मेनका में उनका अनुराग हो गया । मेनका तो यही चाहती थी जिससे कि इन्द्र का आदेश पूर्ण कर सके ।
तदन्तर विश्वामित्र और मेनका ने दीर्घकाल तक वहाँ विहार किया तथा विचरण करते हुए विश्वामित्र ने अपनी सारी अर्जित तपस्या को खण्डित कर दिया । उनकी वर्षों की तपस्या नष्ट हो गयी थी ।
तत्पश्चात मेनका ने मालिनी नदी के किनारे मुझ शकुन्तला को जन्म दिया और वापस इन्द्रलोक को चली गयी । उसका कार्य समाप्त हो गया था ।
मेरे पिता विश्वामित्र ने ग्लानि में डूब कर पुनः समाधि लगा ली । मुझे पक्षियों ने पाला । महर्षि कण्व ने मुझे देखा और आश्रम में ले आए।उन्होंने अपनी पुत्री के समान मुझे पाला है । इस प्रकार मैं शकुन्तला; महर्षि कण्व की पुत्री हूँ, मैं तो जन्म से ही परतंत्र हूँ अतः आपसे विवाह के लिए कोई वार्ता नहीं कर सकती । मेरे पिता से ही आप मेरे साथ विवाह के लिए बात कर सकते हैं ।”
दुष्यन्त चकित थे और प्रसन्न भी; हर्षित होकर बोले--
" सुन्दरी ! तुम तो एक क्षत्रिय की पुत्री हो, मैं अभी तक तुम्हें ब्राह्मण मान कर मन ही मन ग्लानि से भर रहा था । अब तो तुम्हारे और मेरे विवाह में लेशमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता, अतः मेरी अर्धांगिनी बन जाओ साथ ही इस पूरी पृथ्वी की महारानी भी । मैं तुरन्त ही गंधर्व विवाह द्वारा तुम्हारा वरण करता हूँ ।”
“ महाराज ! अपने तपस्वी पिता की आज्ञा के बिना मैं किस प्रकार आपसे विवाह कर सकती हूँ ?” शकुन्तला भयभीत थी ।
“ सुकुमालिनी शकु ! आपके पिता ऋषि कण्व अवश्य ही दयालु प्रवृत्ति के हैं, वह हम पर दया करेंगे ।“ दुष्यन्त ने समझाया ।
शकुन्तला हँसी और उसने हाथ जोड़ते हुए उत्तर दिया-
श्रीमन् ! ब्राह्मणों का प्रहार उनके तीक्ष्ण क्रोध के द्वारा ही होता है। वे शस्त्र धारण नहीं करते परन्तु वे अपने क्रोध से वैसे ही अपराधियों को नष्ट कर सकते हैं जैसे अग्नि और सूर्य अपने तेज से और राजा अपने शस्त्रों से शत्रुओं का नाश करते हैं ।
राजा दुष्यन्त ने अनेक प्रकार से शकुन्तला को धर्म की शपथ लेकर समझाया तथा उसी आश्रम में शकुन्तला के साथ गंधर्व विवाह किया ।
शकुन्तला बिना पिता की आज्ञा के विवाह हेतु तैयार न थी परन्तु दुष्यन्त की अधीरता और निरन्तर आग्रह के कारण गंधर्व विवाह एवं एकान्तवास हेतु तैयार हो गयी ।
दुष्यन्त मन्त्रमुग्ध थे । वह शकुन्तला के साथ विवाह करके उसे साथ ले जाने को तैयार हुए, परन्तु महर्षि कि आज्ञा आवश्यक थी और महर्षि अभी तक आए नहीं थे । उनको भी लौटने में आज कुछ अधिक ही समय लग रहा था ।
राजा की पूरी सेना प्रतीक्षा कर रही थी । राजा ने भी महर्षि कण्व की बहुत समय तक प्रतीक्षा की, जब बहुत समय तक मुनिवर आश्रम में नहीं पहुँचे तब दुष्यन्त ने शकुन्तला को प्रेमपूर्वक विश्वास दिलाया और वहाँ से जाने को तत्पर हुए ।
चलते समय दुष्यन्त ने कहा--
" मेरी प्राणप्रिये ! मैं अपने समस्त अर्जित गुणों की शपथ लेता हूँ । शीघ्र ही महर्षि की अनुमति लेकर तुम्हें पूरे मान-सम्मान से राज्य भवन में ले जाऊँगा तथा महारानी बनाऊँगा ।”
इस प्रकार शकुन्तला से वियोग कर दुष्यन्त अपने नगर को चले गये । शकुन्तला भय और लज्जा से मूक अपनी स्थिति से विकल थी । महर्षि कण्व के आश्रम में आने के पश्चात भी कुछ कह पाना उसके लिए कठिन हो रहा था । अपने छुपकर किए गये कर्म पर मनुष्य को जो लज्जा और भय होता है, कदाचित वैसा ही भय शकुन्तला के हृदय में भी भीषण कोलाहल मचा रहा था ।
महर्षि आश्रम में लौटे । शकुन्तला दुखी विलाप करती थी । ऋषि ने उसे ढांढस बंधाया और बोले-
" पुत्री निर्भय होकर सारी बात बता; मैं तेरा पिता तुझे अभय देता हूँ ।"
शकुन्तला ने धीरे से उत्तर दिया--
“महाराज दुष्यन्त दैवयोग से यहाँ पधारे और उन्होंने मुझे पत्नी रूप में स्वीकार किया है । आप तो सर्वज्ञ हैं, मैंने भी उन्हें स्वामी के रूप में स्वीकार किया है पर आप की आज्ञा नहीं ली है । कृपया मुझे आदेश दें कि मेरा धर्म क्या है ?”
महर्षि कण्व ने दिव्य दृष्टि तथा योगबल से सब कुछ जान लिया और कहा-
" क्षत्रिय हेतु गंधर्व विवाह श्रेष्ठ है, दुष्यन्त स्वयं भी धर्मात्मा है इससे योग्य पति तुम्हें नहीं प्राप्त हो सकता था, अतः इस सम्बन्ध में संताप ना करो, मैं तनिक भी कुपित नहीं हूँ । मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि पुरुवंशी नरेश सदा धर्म की स्थापना में संलग्न रहेंगे और तुझसे उत्पन्न पुत्र के नाम से उनके वंश का नाम होगा । वह परम प्रतापी और समस्त धरती का स्वामी होगा ।”
समय बीतता रहा । शकुन्तला के गर्भ से दुष्यन्त के समस्त गुणों से परिपूर्ण पुत्र का जन्म हुआ ।
कहते हैं कि देवताओं ने उस पर पुष्प वर्षा की थी तथा स्वयं इन्द्र ने उसके जन्म पर चक्रवर्ती सम्राट होने का आशीर्वाद दिया था ।
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बालक बड़ा होने लगा, हिंसक पशुओं के साथ खेलना उसके लिए प्रतिदिन की चर्या का अंग था ।
महाराज दुष्यन्त ने अभी तक शकुन्तला की कोई भी खोज-खबर नहीं ली थी अतः शकुन्तला व्याकुल थी । महर्षि कण्व ने बालक की बारह वर्ष की अवस्था में ही उसके हृदय में समस्त वेदों और शास्त्रों का विद्याज्ञान प्रकाशित करा दिया और शकुन्तला को पुत्र के साथ महाराज दुष्यन्त के पास भेजने का निश्चय किया ।
शीघ्र ही शकुन्तला दुष्यन्त के पास पहुँच गयी, राज्यसभा में पहुँचकर शकुन्तला ने अपने पुत्र को संकेत किया कि वह अपने पिता को प्रणाम करे...बालक ने वैसा ही किया । शकुन्तला ने दुष्यन्त से कहा—
“ महाराज यह आपका ही पुत्र है, आपने कण्व ऋषि के आश्रम में मेरे साथ गंधर्व विवाह के पश्चात मुझे भुला ही दिया । ”
“ विवाह ! पुत्र ! क्या कहती हो असत्य भाषण करने वाली तपस्विनी स्त्री ! मैं तो तुम्हें जानता ही नहीं, मेरा तुमसे कभी भी कोई सम्बन्ध नहीं रहा है ।”
उसी सभा में उपस्थित महात्मा ऋषियों और सभासदों के समक्ष ही दुष्यन्त ने शकुन्तला का बहुत अपमान किया और और पुत्र समेत वहाँ से चले जाने के लिए कहा ।
शकुन्तला ने सब यत्न किए, उन्हें भॉंति-भॉंति से स्मरण कराने का प्रयास किया, अनेक उपायों से उन्हें समझाया, ईश्वर के दण्ड का भय भी दिखलाया परन्तु राजा दुष्यन्त कठोर ही बने रहे । वह न तो शकुन्तला को पत्नी मानने को तैयार थे और न ही उस बालक को अपना पुत्र ।
तपस्विनी शकुन्तला अत्यन्त दुखी हो गयी, उसने तो राजा दुष्यन्त को महात्मा स्वरूप जानकर ही उनका वरण किया था । उसे क्या पता था कि अब राजा दुष्यन्त इस प्रकार का असत्य भाषण करके उसे व्यथित कर देंगे । पहले तो स्त्री स्वभाववश उसे बड़ी लज्जा आयी, परन्तु उससे भी अधिक उसे राजा पर क्रोध आने लगा ।
उसने कहा-- * “ देवता साक्षी हैं राजन ! पत्नी के गर्भ से पुत्ररूप में उसके पति का स्वरुप ही जन्म लेता है, जन्म देने वाली नारी का जायात्व ही इसी में है । पुराणवेत्ता ज्ञानी सब जानते हैं ।
**‘पुत्’ नाम के नरक से पिता का त्राण मात्र पुत्र ही तो करता है, यह स्वयम्भु ब्रह्मा जी ने कहा है ।”
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*भार्यां पतिः सम्प्रविश्य स यस्माज्जायते पुनः ।
जायायास्तद्धि जायात्वं पौराणाः कवयो विदुः । ।१/७४/३७
**पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुतः ।
तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा । ।१/७४/३९
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शकुन्तला ने राजा दुष्यन्त को समझाते हुए कहा --
पति जीवित रहते हुए ही संसार में हो, मृत्यु को प्राप्त हो गया हो या कि नरक में पड़ा हो; एक साध्वी स्त्री सदा ही उसका अनुसरण करती है । यदि पतिव्रता स्त्री पहले ही मर जाय तो वह परलोक में भी अपने पति की प्रतीक्षा करती है और पहले पति मर जाय तो बाद में भी उसकी अनुगामी होती है ।अतः राजा हो या साधारण मनुष्य, उसकी कामना ऐसी पतिव्रता स्त्री की ही होती है जो इह और परलोक में भी उसका साथ देती है ।
राजा को चेतावनी देते हुए उस तपस्विनी शकुन्तला ने कहा—
सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, हृदय, यम, दिवस, रात्रि तथा धर्म से मनुष्य अपना पाप कभी छुपा नहीं सकता है, यह उसे ध्यान रखना चाहिए ।
( शकुन्तला ने राजा को नीति विषयक जो बातें कहीं, वह सब नीति वचनों के रूप में महान ग्रन्थ महाभारत के आदिपर्व के अन्तर्गत आनेवाले सम्भवपर्व के चौहत्तरवें अध्याय में विद्यमान हैं । महामुनि भगवान वेदव्यास ने उन्हें रच कर अमर कर दिया । ये नीतिवचन सदा ही मानव जीवनदर्शन के लिए मार्गदर्शक का कार्य करने में सक्षम हैं । इन्हीं का विस्तार करके अनेक लेखकों और कवियों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं ।)
दुष्यन्त कुछ भी मानने को तैयार ही न थे । शकुन्तला रुष्ट थी, अमर्ष और क्रोध में भरकर वह वहाँ से जाने के लिए जैसे ही तैयार हुई, तभी आकाशवाणी हुई--
" राजा दुष्यन्त ! शकुन्तला का अनादर न करो ।यह तुम्हारी पतिव्रता पत्नी है और यह बालक तुम्हारा और शकुन्तला का ही पुत्र है । इसे आदर सहित स्वीकार करो ।"
आकाशवाणी सुनकर दुष्यन्त सहित समस्त राज्यसभा प्रसन्न हो गयी और राजा ने कहा--
“ मैं अपनी पत्नी और पुत्र को भली प्रकार जानता हूँ और पहचानता भी हूँ, परन्तु शकुन्तला के कहने मात्र से यदि मैं यह मान लेता तो आप सभी इन पर सन्देह करते । अतः देवताओं की वाणी सुनने के बाद अब मैं इन्हें स्वीकार करता हूँ ।”


(अनेक कहानियों और नाटकों में कवियों ने अपनी कल्पनाशक्ति के अनुसार दुष्यन्त द्वारा शकुन्तला को अंगूठी दिए जाने और मछली के पेट से अंगूठी प्राप्त होने पर शकुन्तला को पहचानने सम्बन्धी दृश्य लिखे तथा दिखाए हैं परन्तु मूल महाभारत में ऐसी कोई घटना वर्णित नहीं है ।)
उसके बाद दुष्यन्त ने शास्त्रों और अपने रीति रिवाजों के अनुसार पुत्र को सारे संस्कार करवाए और शकुन्तला को समझाते हुए कहा-
" प्रिये ! मैंने तुम्हारे साथ गुप्त रूप से गंधर्व विवाह किया था जिसे प्रजा नहीं जानती थी, अतः तुम्हारी और हमारे पुत्र की पूर्ण शुद्धि के लिए ही देवताओं द्वारा यह उपाय कराया गया है । मैंने जो कटु वचन तुमसे कहे हैं उनके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ ।”
शकुन्तला ने राजा को क्षमा कर दिया ।
इसके बाद पुत्र का नामकरण 'भरत' करके पुत्र को दुष्यन्त ने युवराज बना दिया । कालांतर में भरत चक्रवर्ती सम्राट हुए, ऐसा माना जाता है कि भरत के नाम पर पूरे देश का नाम 'भारतवर्ष' हुआ ।
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