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वेशभूषा



किशन बेहद गरीब युवक था । धन संपत्ति के नाम पर उसके पास थोड़ी सी उपजाऊ जमीन और एक गाय थी । खेती किसानी में मन नहीं लगता था । अपनी ही परती पड़ी जमीन में गाय को चरने के लिए छोड़कर वह बाँसुरी के मीठे तान भरने लगता । धीरे धीरे बाँसुरी वादन में वह इतना निष्णात हो गया कि उसकी बाँसुरी की धुन सुनते ही क्या इंसान क्या पशु सब सुध बुध खोकर उसके समीप आ जाते लेकिन उसे भी किसी का भान कहाँ रहता था ? वह तो अपने में ही मगन रहता !
धीरे धीरे उसकी ख्याति राजा के कानों तक जा पहुँची । उसे बुलावा भी आ गया राजदरबार से । डरते डरते किशन राजदरबार में पहुँचा । दरबारी संगीतकार की मधुर धुन पर राजनर्तकी सुन्दर नृत्य कर रही थी । किशन को देखते ही राजा मुस्कुराया ," आओ नौजवान ! तुम संगीतकार तो लग नहीं रहे हो । फिर भी ईतनी ख्याति ! लगता है तुमने अपने लोगों से अपना मिथ्या प्रचार करवाया है जो हमारे कानों तक भी पहुँच गया है । अपने आपको साबित करने के लिए हमें भी अपनी काबिलियत के जलवे दिखाओ ! "
किशन ने कहा ," महाराज ! मुझे माफ़ करें ! मेरा संगीत बिकाऊ नहीं कि कहीं भी शुरू हो जाऊँ ! मेरा संगीत मेरे ह्रदय की गहराइयों से निर्झरित होता है जो किसी के भी दिल में सीधे प्रवेश कर जाता है । "
दरबारी संगीतकार ने उसकी खिल्ली उड़ाई, " महाराज ! अनाड़ी लोगों के बीच कुछ ऊल्टी सीधी धुन बजाकर इसने खुद को महान संगीतकार प्रचारित करवा दिया है । मेरी मानें तो समाज में अपनी मिथ्या ख्याति फैलवाने के जुर्म में इसे सजा होनी चाहिए । "
राजा को भी संगीतकार की बात जंच गई । बोले ," नौजवान ! अगर अपने जान की सलामती चाहते हो तो तुम्हें हमारे दरबारी संगीतकार से मुकाबला करना ही होगा । "
किशन बेचारा ! मरता क्या न करता ! साजिंदे सज्ज हो गए । पूरा दरबार संगीतकार की मधुर धुन से आल्हादित हो गया । सभी वाह वाह कर उठे । दरबारी संगीतकार ने गर्व मिश्रित मुस्कान से किशन की तरफ देखा । राजा ने ईशारा किया । अब किशन की बारी थी । किशन ने बाँसुरी उठाई । माथे से लगाकर उसे नमन किया और फिर उसे होठों से लगा लिया । किशन के बाँसुरी की मधुर धुन दरबार में गूंज उठी ! दरबार में सन्नाटा फ़ैल गया । सभी मंत्रमुग्ध से अपनी जगह जड़वत हो गए थे । तभी अचानक दरबार के प्रवेशद्वार से बगल की गजशाला से हाथी , अस्तबल से घोड़े और गौशाला से गायों का एक बड़ा सा रेला दरबार में प्रवेश कर गया । दरबार में हड़कंप मच गया लेकिन पशुओं को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था । वो सभी सम्मोहन की अवस्था में प्रतीत हो रहे थे । इस अचानक आये पशुओं के रेले से चिंतित व घबराये हुए राजा ने किशन को बाँसुरी की धुन रोक देने के लिये कहा । एक पल को किशन रुका और राजा से बोला ," महाराज ! अब दरबारी संगीतकार से कहिये कि वो अपने संगीत के दम पर इन पशुओं को कुछ समय तक यहाँ रोके रहें । "
अब संगीतकार ने अपना कौशल दिखाना शुरू किया । सभी पशु जैसे सम्मोहन की अवस्था से बाहर आ गए । सभी पशुओं में दरबार से बाहर निकलने की होड़ सी मच गई । अब किशन के अधरों पर मुस्कान फ़ैल गई थी ।
माजरा समझते ही दरबारी संगीतकार किशन के पैरों पर गिर पड़ा ," महाराज ! मुझे माफ किजिए । मुझसे भूल हो गई । मैं आपकी वेशभूषा पर चला गया था यह जानकर भी कि किसी को भी उसकी वेशभूषा से नहीं आंकना चाहिए । मुझे अपना शिष्य बनाकर मुझे अनुग्रहित कीजिये । "
राजा भी उठकर किशन के पास आया और उसका हाथ पकड़कर ससम्मान उसे अपने पास एक ऊँचे से आसन पर बैठाकर कहा ," नौजवान ! हम तुम्हारी प्रतिभा से अचंभित हैं । कृपया दरबारी संगीतकार के इस आसन पर बैठकर इस आसन को सम्मान प्रदान करें । "
किशन ने मुस्कुराते हुए राजा से कहा ," महाराज ! आपके इस स्वर्ण सिंहासन पर बैठकर मुझे वह अनुभूति , वह ख़ुशी नहीं प्राप्त हो सकती जो मुझे उस पेड़ की छाँव में उसकी जड़ों पर बैठकर प्राप्त होती है । यदि आप मेरा सम्मान ही करना चाहते हैं तो कृपया राज्य भर में यह मुनादी पिटवा दें कि किसी भी इंसान को उसकी वेशभूषा देखकर प्रताड़ित न किया जाय । काबिलियत का सम्मान हो न कि वेशभूषा का । "
" तुम जैसा चाहोगे वैसा ही होगा ।" कहते हुए राजा ने उसकी बात मान ली । अब राज्य में पूरी प्रजा के साथ सरकारी कर्मचारियों के व्यवहार में बहुत बदलाव आ गया था । अधिकारी अब बड़े और छोटे अमीर और गरीब में भेदभाव नहीं करते थे ।क्या पता कल कोई गरीब की वेशभूषा में क्या हो ?

राजकुमार कांदु

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