अनमोल रिश्ते राज कुमार कांदु द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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अनमोल रिश्ते



विवाह के पंद्रह वर्ष बीत चुके थे लेकिन रमा और अंश की झोली संतान के नाम पर अभी तक खाली ही थी । अंश के काम पर चले जाने के बाद रमा को खाली घर काटने को दौड़ता । दिल में निराशा घर करने लगी थी कि एक दिन बाजार से लौटते हुए एक तीन साल की गुड़िया सी दिखनेवाली गोलमटोल छोटी सी बच्ची बस अड्डे के बाहर रोती हुई मिली । आसपास देखा । कोई न था । लोग एक नजर बच्ची की तरफ डालते और फिर अपने रास्ते आगे बढ़ जाते । रमा ने प्रेम से उस बच्ची के सिर पर हाथ फेरा और उससे उसका नाम पूछा । थोडा तुतलाते हुए उस बच्ची ने जवाब दिया ” मम्मी तो मुझे गुड़िया कहकर ही बुलाती है । ” रमा ने आसपास सब दुकान वालों से पूछा उस बच्ची के बारे में लेकिन सबने अनभिज्ञता जताई । रमा उस बच्ची को अपने साथ अपने घर ले आयी और उसे खाने के लिए बिस्किट दिया । अब वह थोड़ी शांत लग रही थी । थोड़ी ही देर बाद वह उस बच्ची के साथ नजदीक के पुलिस चौकी में थी । जरूरी पूछताछ करने के बाद वहां मौजूद अधिकारी ने कहा ” यह बच्ची लगता है अपने माँ बाप से बिछड़ गयी है और इतनी छोटी है कि कुछ बता भी नहीं पा रही है । आप इस बच्ची को यहीं रहने दीजिए । अगर इसे कोई खोजते हुए आया तो हम उसकी तस्दीक कर इस बच्ची को उन्हें सौंप देंगे । “
” तब तक आप इस बच्ची को कहां रखेंगे ? ” रमा ने उस अधिकारी से पूछ ही लिया ।
” आज तो शाम तक यह यहीं रहेगी । दिनभर में कोई नहीं आया तो हम शाम को इसे बाल सुधार गृह में भेज देंगे । ” अधिकारी ने समझाया ।
” जब तक इसके मां बाप मिल नहीं जाते ,यह बच्ची क्या मेरे यहाँ नहीं रह सकती ? ” रमा ने धड़कते दिल से पूछ लिया ।
” क्यों नहीं ? यदि आप चाहें ! बस आप अपना नाम पता मुझे नोट करा दीजिए । ” वह अधिकारी तुरंत ही मान गया था ।
रमा ने अपनी विस्तृत पहचान व नाम पता वगैरह लिखा दिया और उस बच्ची को अपने साथ लेकर घर आ गयी । उसके बाद से वह कई बार थाने के चक्कर लगा आयी लेकिन गुड़िया के माँ बाप का पता न चला । उसे घर ले आने से अंश भी बहुत खुश हुआ और रमा को उसे अपनी बेटी ही समझने की सलाह दे डाली ।
अब दोनों को गुड़िया में अपनी बेटी ही नजर आने लगी थी । दोनों बड़े प्यार से उसका पालन पोषण करने लगे । समय पंख लगाकर तेजी से अपना सफर तय करता रहा । इस घटना को लगभग सात वर्ष हो गए थे ।
गुड़िया अब पाँचवीं कक्षा की विद्यार्थी थी । पढ़ाई में बहुत ही होशियार गुड़िया अब अंश और रमा की जान बन गयी थी । दोनों अब अपनी सगी औलाद की तरह उसे चाहने लगी थी । गुड़िया भी अब उनसे घुलमिल गयी थी और बड़े प्रेम से रहती थी । रमा को मम्मी तथा अंश को डैडी कहती थी ।
बस अड्डे से लगे हुए स्कूल में ही गुड़िया पढ़ती थी । हमेशा की तरह आज भी रमा गुड़िया को साथ लेकर उसका स्कूल बैग अपने कंधे पर लादे उसका हाथ थामे पैदल ही आ रही थी । पेड़ के नीचे एक भिखारी सी नजर आ रही महिला को देखकर गुड़िया ठिठक गयी । बाल बेतरतीब ,उलझे हुए और जिस्म पर एक सस्ती सी साड़ी के अलावा एक चिथड़ा हो चुका बुर्का भी था । गुड़िया को अपनी तरफ निहारते देखकर वह महिला भी उसे ध्यान से देखने लगी और फिर जैसे उसके जिस्म में अचानक बिजली सी भर गई हो । चपलता से उठी और गुड़िया की तरफ लपकी । उसके मुंह से कांपते हुए शब्द ही निकले थे ” गु..डी… या ….! ” और पलभर में आकर गुड़िया को बेतहाशा चूमने लगी । गुड़िया एक पल को तो असमंजस में रही लेकिन फिर उसकी भी पलकों से आँसू बह निकले ।
दोनों का भावभीना मिलन देखकर रमा की पलकें भी भारी हो गयी थी । थोड़ी देर बाद संयत होने के बाद वह महिला जो कि वाकई गुड़िया की मां ही थी ने संक्षेप में अपनी आपबीती सुनाई ।
उसकी कहानी के अनुसार उसका नाम सलमा था । उसका पति शराबी था व अक्सर उसके साथ गाली गलौज और मारपीट करते रहता था । उसकी मारपीट व गाली गलौज से त्रस्त पड़ोसी रहमान के सहानुभूति के दो शब्द उसे अच्छे लगने लगे और फिर एक दिन रहमान के साथ वह अपने पति के घर को छोड़ कर भाग गई । साथ ही गुड़िया भी थी । रात भर बस से सफर करने के बाद सुबह उसकी बस इसी बस अड्डे पर पहुंची थी । रहमान को गुड़िया कबाब में हड्डी जैसी लग रही थी । संयोग से सलमा सोई हुई थी और इसीका फायदा उठाकर रहमान गुड़िया को बस अड्डे में कहीं छोड़कर आ गया था । उसके आते ही बस शुरू हो गयी थी अपने गंतव्य की ओर । बस शुरू होते ही सलमा की नींद खुल गयी थी । देखा गुड़िया नहीं थी । रहमान से पूछा .। कुटिलता से मुस्काते हुए वह बोला ” अब उसकी क्या जरूरत ? और उस कमीने की निशानी के लिए तुम क्यों इतना परेशान हो रही हो ? मैं हूँ ना ? मुझ पर भरोसा रखो । “
थोड़ी देर रोने के बाद सलमा ने खुद को समझा लिया था ‘ कोई बात नहीं ! अल्लाह बड़ा निगहबान है । अब वही उसकी हिफाजत करेगा । ‘
उस बस से दिल्ली पहुंचकर रहमान ने उसे एक घर में ठहरा दिया और फिर वापस कभी नहीं आया । बाद में उसे पता चला रहमान उसे यहां बेच गया था । अब वह जिस्मफरोशी के दलदल में फंस चुकी थी ।
कोठेवालों के हाथों की कठपुतली बनी सलमा सात साल तक शहर दर शहर जिस्म की मंडियों में घूमती रही और फिर कुछ दिन पहले ही वह किसी तरह उस नरक से निकलने में कामयाब हुई थी । बस से सफर करते हुए इस शहर में आते ही गुड़िया उसके दिलोदिमाग पर हावी हो गयी । वह यहीं उतर पड़ी और कई दिन तक इधर उधर भटकती रही थी । अब उसके पास जो नकदी थी वह खत्म हो चुकी थी । हताश और मायूस होकर बस अड्डे के बाहर उसी पेड़ के नीचे बैठ गयी थी जहां गुड़िया ने उसे देख लिया था और अब दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया था । ‘
उसकी रामकहानी सुनकर रमा का दिल भर आया था । एक बारगी तो उसे सलमा पर बहुत गुस्सा भी आया था लेकिन उसकी करुण गाथा सुनकर वह रहमदिल महिला द्रवित हो गयी ।
उसे नाश्ता वगैरह कराकर रमा ने भारी मन से सलमा से कहा ” गुड़िया तुम्हारी अमानत है । अपने जिगर के टुकड़े की तरह हमने उसकी देखभाल की है । फिर भी वह तुम्हारा खून है । तुम चाहो तो उसे ले जा सकती हो । “
अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कंपकंपाते स्वर में सलमा बोल पड़ी ” बहन ! गुड़िया को एक नजर देखने की ख्वाहिश थी अल्लाह ने वह भी पूरी कर दी । अब मेरा क्या है चंद दिनों की मेहमान हूँ । मुझे लाइलाज बीमारी ने जकड़ लिया है और मैं नहीं चाहती कि मेरी बच्ची एक बार फिर से यतीम हो जाये । ” कहते हुए वह अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए रमा के कदमों में झुक गयी थी ।
उसे कंधे से पकड़कर उठाते हुए रमा का गला भी भर आया था ” नहीं सलमा बहन ! गुड़िया अब यतीम नहीं है और न कभी होगी । वह हमारी बेटी थी , है और रहेगी । “
कृतज्ञता के भाव चेहरे पर झलक पड़े सलमा के और दोनों हाथ जोड़कर वह जाने के लिए तैयार हुई ही थी कि गुड़िया फफक पड़ी । रमा ने भी लपक कर उसका हाथ थामते हुए उसे रुकने का ईशारा किया और बोली ” मैं नहीं जानती बहन तुम्हारा और मेरा क्या रिश्ता है । लेकिन हां ईतना अवश्य जानती हूं कि तुम्हारे और हमारे दरम्यान गुड़िया की वजह से एक अनोखे रिश्ते ने जन्म ले लिया है और वह है इंसानियत का अनोखा रिश्ता । हां ! इंसानियत का रिश्ता ही सभी रिश्तों से अनोखा होता है । अब तुम्हें कहीं भटकने की जरूरत नहीं । तुम अब हमेशा के लिए यहां रह सकती हो । हमारा घर छोटा भले हो सलमा लेकिन दिल इतना बड़ा अवश्य है जिसमें तुम्हारा भी गुजारा बड़े आराम से हो जाएगा । “
सलमा की नजरों में अब कृतज्ञता और खुशी के आँसू छलक पड़े थे ।

राजकुमार कांदु