तलाश.. एक औरत कि अस्तित्व की - 3 RICHA AGARWAL द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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तलाश.. एक औरत कि अस्तित्व की - 3

सुहानी आज सुबह जल्दी उठ गयी थी । दरअसल पेपर की चिंता में उसे रात भर नींद ही कहाँ आयी थी । जल्दी से तैयार होकर उसने घर के मंदिर में जाकर पूजा की । वो आज इतनी मगन थी जैसे चाहती हो की भगवान जी को अपने साथ ही ले जाएगी पेपर देने ।पूजा कर के जल्दी से उसने अपना बैग उठाया, माँ के हाथ से दही शक्कर खाया और एग्ज़ाम देने के लिए निकल गयी ।
"माँ, माँ, कहाँ हो ?" एग्जाम देकर आयी सुहानी माँ को देखते ही उनसे लिपट गयी थी, खुशी से चहकते हुए बोली, "मिठाई नहीं खिलाओगी ? बहुत अच्छा पेपर हुआ है। इस बार तो MBA के लिए बेस्ट कॉलेज मुझे ज़रूर मिल ही जाएगा ।" इतना बोलकर वो ख़ुशी से झूम उठी। ऐसा लग रहा था मानो आज उसने अपने सपनों की ओर जाने वाली पहली सीढ़ी चढ़ ली हो । जैसे उसके और उसके सपनों की बीच आने वाली पहली दीवार को आज उसने गिरा दिया हो । सुहानी के आँखों की चमक आज देखने लायक़ थी । माँ भी सुनकर बहुत खुश थीं , होती भी क्यों न..? उनकी बेटी ने अपने सपनों की ओर आज पहला कदम जो बढ़ा लिया था । माँ ने सुहानी को मुँह-हाथ धोने को बोला और खुद किचन में चलीं गयीं।आज तो रात के खाने में सुहानी की मनपसंद पालक पनीर ही बनने वाली है।
माँ बेटी का रिश्ता थोड़ा अलग होता है। बेटियाँ जब बड़ी हो जातीं हैं तो वो अपनी माँ की सखी, सहेली ज़्यादा बन जातीं हैं। सुहानी कि साथ भी ऐसा ही कुछ था। वो अपने मन की बात अपनी माँ से कर लिया करती थी। वो आगे क्या करेगी, क्या पढ़ना है उसको, कैसे अपने सपने पूरा करेगी, जॉब कि बाद कहाँ घूमने जाएगी, क्या क्या ख़रीदेगी , ज़िंदगी को लेकर उसकी सोच, उसकी तर्क , भविष्य को लेकर उसकी योजनाएँ , सब वो बेझिझक अपनी माँ से बतिया लिया करती थी। घर में जब एक भी सदस्य तुमको समझने वाला, तुमको सुनने वाला, तुम्हारा हर परिस्थिति में साथ देने वाला मिल जाता है, तब खुद में, किसी भी परिस्थिति से जूझने की ताक़त व होसला स्वतः ही मिल जाती है। सुहानी के हर सपने में उसका माँ का बखूबी साथ मिला था उसे।
परिस्थितियाँ चाहें कैसी भी हों इंसान सपने देखना कभी नहीं छोड़ता। उनके सपने , उनकी उम्मीदें , सपनों के पूरा होने की आशाएँ ही तो इंसान को जीने की वजह देती हैं । सुहानी भी तो इसी उम्मीद में सपने देख रही थी । खुद की पहचान बनाने की ख्वाहिश , सिर उठा कर जीने की तमन्ना , यही सब तो थे , कहीं ना कहीं उसके ज़िंदा रहने की वजह । कहते हैं , जैसे जैसे इंसान अपने सपनों की क़रीब जाने लगता है, वैसे वैसे ही उसकी बेचैनी भी बढ़ने लगती है । सुहानी का पेपर बहुत अच्छा हुआ था और उसे पूरा भरोसा था की इस बार उसका सिलेक्शन ज़रूर हो जाएगा । अब बस उसे अपने रिज़ल्ट का इंतज़ार था ।