तलाश.. एक औरत के अस्तित्व की - 2 RICHA AGARWAL द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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तलाश.. एक औरत के अस्तित्व की - 2

शादी... !!

एक लड़की के जीवन में वो दौर, जब एक पल में, वो एक अल्हड़ सी , चुलबुली सी , चहकती सी लड़की अचानक ही एक समझदार, शांत, सरल औरत बन जाती है.. ।। वो दिन जिसका हर लड़की को बेसब्री से इंतज़ार होता है । बचपन से जिसके लिए उसने हज़ारों सपने देखे होते है । एक दिन सफेद घोड़े पर बैठ कर एक राजकुमार आएगा और उसको लेकर जाएगा । उसका अपना एक संसार होगा, ढेर सारा प्यार करने वाला पति, दो प्यारे बच्चे और माँ बाप के जितना प्यार करने वाले सास ससुर । बचपन से लड़की को भी तो यही सिखाया जाता है ना.. "ये तुम्हारा घर नहीं, पीहर है.. अपनी मर्ज़ी से जो करना है अपने पति के घर जाकर करना । समाज आज चाहे कितना भी आगे क्यों न बढ़ गया हो, लड़कियों के मामले में अभी भी सौ साल पीछे ही है । फिर हमारी कहानी तो सुहानी की है, जिसकी शादी को आज सत्ताईस साल बीत चुके हैं ।

सपने तो सभी देखते हैं, पर उनमें से कितने सच होंगे किसको पता होता है । मनुष्य का व्यवहार ही कुछ ऐसा है, वो उम्मीदें कभी नहीं छोड़ता । और जिनसे कोई उम्मीद भी नहीं होती उनसे भी आशाएं लगा बैठता है ।
शादी भी तो उम्मीदों, आशाओं से भरा एक बक्सा ही तो है.. !! तुम्हारी किस्मत अच्छी हुई, तो सब मिल जाएगा । किस्मत खराब तो खोने के लिए खुद के सिवा और होता ही क्या है अपने पास । कुछ ऐसा ही तो हुआ था, सुहानी के साथ भी.. जब अचानक उसके जीवन में ये नया मोड़ आया था ।
बात उन दिनों की है जब सुहानी कॉलेज में थी । हाल ही में उसके M A के एग्ज़ाम्स खत्म हुए थे और वो कंपटीटिव एग्ज़ाम्स की तैयारियों में लग गयी थी । एक महीने बाद उसका MBA का entrance exam था । सुहानी अपनी ज़िन्दगी में कुछ करना चाहती थी । चाहती थी कि उसकी भी अपनी खुद की एक पहचान हो । अपने भविष्य की वो खुद लेखिका बनना चाहती थी । उसे पता था अपने सपनो को अगर उसे पूरा करना है तो पढ़ाई ही एकमात्र विकल्प है। इसी के चलते वो कोई भी मौका गवाना नहीं चाहती थी । इसलिए पेपर खत्म होते ही वो तैयारियों में जुट गयी थी ।
हम कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें, मगर, कहते हैं, होता वही है जो होना होता है । भगवान कृष्ण की कही बात भी सही लगती है..."कर्म कर पर फल की चिंता मत कर । लेकिन मनुष्य की आशाएं, अभिलाषाएं उसे इस बात पर अमल करने से रोक ही लेती हैं । एक महीना कैसे निकला पता ही नहीं चला था । पेपर की तैयारियों में उसने खुद को झोंक ही दिया था । न खाने का होश, न पीने का । बस एक ही शिद्दत, एक ही ख्वाहिश , MBA पेपर पास हो जाने की । जैसे उसकी सारी जिंदगी, सारा भविष्य सिर्फ इसी पेपर के रिजल्ट पर टिका था । जैसे उसकी सारी ख्वाहिशें सिर्फ इसी दीवार के दूसरे किनारे पर थीं जिसके टूटते ही उसके सारे सपने सच हो जाने वाले थे।
आखिरकार आज पेपर का दिन आ ही गया ।