श्रापित खज़ाना - 4 Deepak Pawar द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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श्रापित खज़ाना - 4

उनके इशारे से दोनों अब चुप चाप आगे आगे और वह औरतें उनके गर्दन पर तलवार लगाकर उनके पीछे पीछे बिना बात किये पहाड़ो के मैदान से पहाड़ो की दिशा में चलने लगे थे ।

अब सकुन यह था कि दोनों कम से कम मुर्दो के जंगल से बाहर थे और दुःख यह था कि अब ना जाने कैसे इन अजीबो गरीब इन सुंदर औरत सैनिक के बीच फसकर उनके पीछे चले जा रहे थे के जैसे मानो अब वह उनके इशारों पर चलने को मजबूर थे ।

रवी ओर करण को अब तक समझ आ गया था कि जगदीश ने उन्हें किस मुसीबत में धकेल दिया था पर अब भी कुछ साफ नही समझ रहे थे दोनों । बस ओरतो के पीछे चलते हुए अपने दिमाग के घोड़े तेजी से दौड़ा रहे थे ।


कुछ देर युही चलते हुए अब वह चारो जंगल से बाहर निकल गए थे उनके आखों के सामने अब हिरी घास से घिरी बड़े मैदानी पहाड़ दिखाई दे रहे थे जिस दिशा में वह आगे बढ़ रहे थे वह इन्ही पहाड़ियों में जा रहे एक रास्ते की तरफ थी ।थोड़ी देर चलने के बाद दोनों औरते अचानक रुक जाती है और अपने अपने मुह से एक अजीब सी आवाज निकलने लगती है । मानो जैसे किसी पालतू जानवर को वह बुला रही थी । तभी घास के मैदानों में दो काले घोड़े तेजी से दौड़ते हुए आते है जिनकी सेहत देख अब रवि और करण भी अपनी आँखें फाड़ देखने लगते है यह दोनों घोड़े बड़ी शानदार नस्ल के थे और कम से कम छ फुट उचे भी तभी दोनों औरते रवि और करण की कॉलर के पास गर्दन पकड़ घोड़े पर पेट के बल चढ़ा देती है और खुद घोड़े पर बैठ जाती है हालात यह थे कि रवि अब घोड़े की गर्दन के पास पेट के बल आधा इस तरफ तो कमर के पास आधा उस तरफ लेटा था । आखिर मरता क्या ना करता करण का भी यही हाल था ।

दोनों कुछ भी समझ सके तब तक घोड़े हवाओ से बाते करने लगे उनकी रफ्तार भी इतनी तेज की रवि और करण बस जान बचाकर घोड़ो पर चिपके रह गए ।

लगातार कुछ किलोमीटर बाद अब हरा घास का मैदान खत्म हो रहा था और चट्टानी पहाड़ो का सिलसिला शुरू हो गया था ।

एक के बाद एक कई पहाड़ो के दर्रे और खाइयां के कपरे रास्तो पर घोड़े तेजी से आगे बढ़ रहे थे ।ओर अब धीरे धीरे दोनों घोड़े इन पहाड़ी के बीच बने एक गाँव में पहुचते है जहां का माहौल बड़ा ही शांत है कुछ लोग जो पुरुष है वह एक गोल पत्थर के बने बैठक पर बैठे है जहां बिच में जगह खाली है ।

यहां अब इन घोड़ो पर आए औरतों ने अपने घोडे खड़े किए और रवि ,करण को जमीन पर घकेल दिया दोनों आटे की बोरी की तरह ही धम्म के आवाज के साथ जमीन पर थे ।


अब करण उठ खड़ा होता है और रवि को भी उठता है ।यहां एक बात से वह बहौत ही ज्यादा आश्चर्य में आ जाते है जो सामने पुरुष होते है वह भी यहां निवस्त्र ही बैठे है बस कमर के पास सिर्फ थोड़ा सा चमड़े का कुछ कपड़ा टाइप लगा रखा है जो किसी लगोंट जैसा दिखाई देता है सबके बाल भी काफी लंबे है जैसे कि यहां कभी किसी ने बाल ही नही काटे ।यहां स्त्रियों से अलग पुरुष के शरीर पर भी अजीब से पेंट से पेंटिंग की गई थी जो लगता था परमानेंट थी ।।मानो वह दोनों किसी पुराने जमाने के किसी कबिलेके बीच हो ।


अब इन दोनों को देखकर सामने उचे पत्थर पर बैठा एक बुड्ढा खड़ा हो कर धीरे धीरे आगे आया और पास आकर दोनों को घूरते देखना शुरू कर दिया लगभग उन्हें चारो तरफ घूम के देखने के बाद वह उनके कपड़े तथा बालो में हाथ लगाकर देखने लगा ।

काफी समय तक यही सिलसिला चलते रहा इस दौरान वहां बैठे दूसरे लोगो ने आवाज तक नही निकली थी ।

अब वह बुड्डा वापस अपनी जगह लौट गया और बैठकर पहली बार उसके मुह से कुछ शब्द निकले जिन्हें रवि और करण नही समझ सके ।

उसके बोलने के बाद एक व्यक्ति जो पीछे बैठा था वह अपनी जगह से तुरंत ही उठकर एक तरफ पहाड़ो में बने एक गुफा में गुस गया और थोडी देर बाद उसके साथ एक दूसरा बुजुर्ग बाहर चलते हुए आया और सीधे रवि और करण को देखकर उनके पास आ गया ।

यह बुजुर्ग इनमें थोड़ा अलग लग रहा था तभी वह बोला -क्या तुम इंसान हो

रवि ओर करण ने पहली बार उनकी अपनी भाषा सुनी और वह दोनों बोल गए -क्या आपको हमारी भाषा आती है ?

बुजुर्ग-हा आती है और में सुन भी सकता हु ओर समझ भी सकता हु -मुझे यह बताओ जल्दी की तुम लोग कोन हो और यहां जीवित कैसे आगये ।

बुजुर्ग की बात सुनकर अब करण बोला -मतलब जीवित का क्या ?

बुजुर्ग-मतलब यह है कि यह नागा पहाड़ी है और यहां का तिलिस्म किसी भी आज के मनुष्य को जिवित यहां तक नही आने देता । और तुम दोनों अब तक जीवित हो ।

करण - अंकल क्या फेक रहे हो मतलब यह कोई जिन्दा इंसान नही आ सकता , यार बेवकूफ समझा है क्या ,तो ये यहां पर इतने लोग आप हो जीवित नही हो क्या ?

करण की बात सुनकर अब रवि भी है में है मिलाने के लिए अपनी गर्दन हिलाता है ।

तभी बुजुर्ग वहां बैठे उन लोगो की तरफ़ उंगली उठाकर कहता है - देखो इन्हें गौर से यह इंसान नही बल्कि सर्प जाती के वह लोग है जो आधे इंसान है पर आधे सर्प एक श्राप ने उन्हें इंसान तो बना दिया है पर इंसानों की भाषा और चलन सीखने के लिये अभी वक्त है । एक पापी रानी के श्राप के चलते यह इच्छाधारी सर्प अब हमेशा के लिए इंसान के रूप में रहने के लिए मजबूर है श्राप की वजह से यह वापस अपने सर्प रूप नही धारण कर पा रहे है । और अब इस बात को कई वर्ष बीत गए है । इस वजह से अब यह सर्प यही पर इन पहाड़ियों में अपना अलग ठिकाना बना कर जी रहे है । पर इनका यह मानना था कि कोई जीवीत इंसान यहां आएगा और पापी रानी के घमंड को तोड़कर सूर्यनगर की सरहद में कैद सर्प राजकुमार और राजकुमारी को आजाद करेगा तब यह श्राप भी टूट जाएगा ।और कई सौ वर्षों कर बाद आज पहली बार तुम दोनों यहां जीवित पहुचे हो ।

उसकी बात पूरी होने के बात रवि ने पूछा -पहले अंकल जी एक बात बताओ पुछु क्या जबाब दोगे?

बुजुर्ग-हा पूछो क्या पूछना है ।

रवि-अभी तक किसी को भी हमारी भाषा नही आती थीं तो आप कैसे हमसे बात कर रहे हो?

बुजुर्ग- मेरा नाम वाली है में भी कभी इंसानों के नगरों में घूमता था जो समय के परे भविष्य में थी ।वहां मेने तुम्हरे जैसे इंसानों को ऐसी बाते करते सुना और उनके रहने बोलने की यह तरीको को मैने सीखा था । पर जब के यहां इस समयके वापस आया तब में भी पापी रानी।के श्राप का हिस्सा बन गया और पुनः कभी वापस नही जा पाया । वहां मेरा एक परिवार भी है जो इंसान है और मेरे दो बच्चें भी मजबुर रहा रानी के श्राप से पर जैसे जोम्बा ने तुम्हारे बारे में बताया मुझे उम्मीद जागी है । खैर कहानी बात में बताऊंगा पहले में पहचान करा देता हूं ।

ओर सने बैठे व्यक्ति की तरफ वाली बुजुर्ग ने इशारा करते हुए कहा कि यह राजकुमार के भाई है जिनका नाम राका है और वह जो दोनों सुंदर लडकिया जिन्होंने तुम्हे लाया है वह इनकी लडकिया है नाता ओर नैनी ।

इन्हें तुम्हारे बारे में बिता कल जानने में कोई उत्सुकता नही है क्यो की वह तो यह तुम दोनों से हस्ते हस्ते उगलवा लेंगे पर तुमसे उम्मीद यह है कि तुम राजकुमार ओर राजकुमारी को श्राप से आजाद जरूर करोगे ।

उसकी बात सुनकर करण कहता है -और अंकल इनकी बात हमने नही मानी तो ?

बुजुर्ग-तो शायद ये लोग तुम्हें भुज कर खा जाए या तुन्हें पापी रानी के हवाले कर फिर उससे राजकुमार ओर राजकुमारी की रिहाई का सौदा करेंगे ।

रवि कहता है -अरे यार लग गई पर अंकल हम ही क्यो कोई दूसरा भी हो सकता है राजकुमार और उसकी राजकुमारी को रिहा करवाने वाला ।

बुजुर्ग- कोई भी मुर्दो के जंगल को पार कर अब तक जिंदा नही लौटा है पिछले 500 सालो में ओर वह भी इंसान।

बुजुर्ग की बात सुनकर दोनों एक दूसरे के चेहरे की तरफ देखने लगे कुछ देर खामोशी के बाद उसी बुजुर्ग ने उन्हें अपने साथ वहां से जस गुफा में चलने के लिए कहा जहां से वह खुद आया था ।

अब रवि और करण दोनों ही वाली नामके इस बुजुर्ग के पीछे चलने लगे गए ।

अब तक दोनों को यह समझ आ गया था कि जगदीश ने उन्हें कैसी मुसीबत के हवाले किया था और अब यहां से उन्हें बाहर निकलना था ।

अब तक दोनों गुफा के अंदर थे एक तरफ वाली पत्थर के बने एक टेबल पर बैठा था वही रवि ओर करण उसके सामने थे अब तीनो वहां सामने बैठे थे और वाली उन्हें कुछ खाने के लिए दे रहा था जो थोड़ी आनाकानी के बाद दोनों खा लेते है और कुछ ही देर बाद दोनों की आखों में जबरदस्त नीद की हालत बन जाती है और दोनों वही नींद में लुढक जाते है ।


अब एक दिन बित चुका है और झील के किनारे अभी भी जगदीश और प्रोफेसर प्राण अपने लोगो के साथ रवि और करण की खोज करने में लगा था ।

वह प्रोफेसर को यह बताता है कि अब एक ही रास्ता है फ्रोफेसर उस प्राचीन खजाने को ढूढने का वह यह है कि अब हम अपनी टीम के साथ रवि और करण जहां से गए है वहा उनके पीछे जाएंगे और खज़ाना हासिल करेंगें।

उसकी बात से प्रोफेसर डर जाता है और उसको समझाता है कि वह क्या है कोई जानता नही,हमे रवि और करण का इंतजार करना चाहिए । हो स्कर्ट्स है वो वापस आ जाये ।

प्रोफेसर की बात जगदीश नही मानता है और उसे अपने कुछ अच्छे मजबूत लोगो के साथ तैयारी करने को कहते हुए अपनी सिगार झेब से निकलते हुए उसे जलता है और धुँवा निकलते हुए झील को अपनी आँखों से निहारने लगता है ।


नागा पहाड़ी के पहाड़ो में अब रात गहरा रही थी और आसमान में तारे साफ साफ देखे जा सकते थे चाँद की रोशनी इतनी की वह किसी लाइट की जरूरत ही नही थी । गुफा के अंदर रवि और करण की आँख खुलती है और दोनों हड़बड़ाकर उठ जाते है और अपने आस पास वाली को ढूंढते है पर वाली वहां नही होता है । तभी करण को वहां आसपास किसी तरह का आवाज सुनाई देता है और वह रवि को चुप रहने का इशारा करते हुए गुफा से बाहर धीरे धीरे बिना आवाज के निकलता है । जैसे ही दोनों बाहर निकलते है वैसे ही दोनों की आँखे बड़ी हो जाती है दोनों जैसे पत्थर बन जाते है और साँसे रुक जाती है सामने मंजर देख ।

उनके सामने एक विशाल काय सर्प जो अपना फन फैलाकर सीधे खड़ा था वह चांदनी रात में चमक रहा था उसकी ऊँचाई ही 10 फुट से ज्यादा थी और किसी बड़े से पेड़ के जैसा मोटा शरीर उसे और भी भयानक बना रहा था उसके सामने वाली और नागापहाड़ो का मुखिया खड़ा था हालांकि यह लग रहा था कि शायद कोई बात हो रही थी पर यहां इतने बड़े सर्प को देख रवि और करण की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई थी जिससे वहां क्या हो रहा है वह जानना तो दूर दोनों को अपनी साँसे लेना भी मुश्किल हो रहा था ।