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दस्विदानिया - 1

दस्विदानिया

(कहानी पंकज सुबीर)

(1)

पत्र के आरंभ में कोई भी औपचारिकता नहीं कर रहा हूँ । पत्र जिस मनोस्थिति में लिख रहा हूँ उसमें औपचारिकता की कोई गुंजाइश भी नहीं है । पता नहीं ये पत्र तुमको मिलेगा तो तुम इसको सहज भाव से ले पाओगी भी या नहीं । कुछ नहीं जानता, बस ये जानता हूँ कि तुमको पत्र लिखने के लिये बहुत दिनों से अपने अंदर का अपराध बोध दबाव डाल रहा था । काफी दिनों तक तो टालता रहा, लेकिन जब टालने से बाहर बात हो गई तो अंत में लिखना ही पड़ा । लगभग 20 सालों बाद किसी भी रूप में कोई संपर्क करते हुए ये पत्र तुमको लिख रहा हूँ । बीस साल का अंतर एक अच्छा खासा अंतर होता है । इस बीच में एक जीवन परिवर्तन के कई कई दौर देख लेता है । और इन बीस सालों में तो परिवर्तन का चक्र कुछ ज्यादा ही तेज़ी के साथ चला है । जीवन में जो तेज़ी आ गई है वो हैरान कर देती है । किन्तु, फिर भी कहीं न कहीं, कुछ न कुछ ऐसा होता है जो ठहरा होता है । तुम्हें याद होगा प्रोफेसर झा हमें फासिल्स के बारे में पढ़ाया करते थे । नहीं याद आये झा सर ? अरे वही बॉटनी के प्रोफेसर जो अपने ऑफिस में बैठ कर चुरुट पीते थे । वो हमें बताते थे फासिल्स के बारे में । कि किस प्रकार कुछ वनस्पतियाँ, कुछ कीड़े, मकोड़े, जानवर कहीं दब जाते हैं, और उसके बाद लाखों सालों तक वहाँ उसी प्रकार दबे रहते हैं । समय के तेज़ चक्र से अपरिवर्तित रहे हुए । बाद में कहीं कोई खोज करते हुए उनको ढूँढ निकालता है । और वो फासिल्स उस समय की जानकारी प्राप्त करने का सबसे अच्छा ज़रिया होते हैं । हमारे जीवन में भी कई सारी घटनाएँ, वस्तुएँ, लोग, फासिल्स बन जाते हैं । उन पर समय का कोई असर नहीं होता । जब भी कुरेदो तो उसी प्रकार सुरक्षित रखे मिलते हैं । तुम्हें याद होगा शायद कि हमारे फाइनल की परीक्षाओं के दौरान ही ख़बर मिली थी कि प्रोफेसर झा का दिल को दौरा पड़ने से निधन हो गया । झा सर को मरे आज भले ही बीस साल हो गये हैं, लेकिन उनकी वो चुरुट पीने की स्टाइल आज भी मेरे मन में फासिल्स की तरह सुरक्षित है । उसी नास्टेल्जिया में मैंने भी एक दो बार चुरुट पीने की कोशिश भी की, लेकिन वो बात नहीं आ पाई जो झा सर में आती थी । कुछ चीज़ें शायद कुछ लोगों के लिये ही बनी होती हैं । जैसे तुम्हारा वो बैंगनी, फूलों वाला सलवार कुरता, जिस पर तुम प्लेन बैंगनी दुपट्टा डालती थीं ।

बात उसी बैंगनी सलवार कुरते से शुरू की जाए तो मेरे लिये आसान होगा । क्योंकि मुझे तो अभी भी ये तक नहीं पता कि तुमको कुछ पता भी था या नहीं । तुम्हें मैंने पहली बार उसी बैंगनी सलवार कुरते में देखा था । मुझे अब तक अच्छी तरह याद है कि तुमने शंकू के आकार की बैंगनी बिंदी भी लगाई थी । किसी कारण के चलते मैं पहली बार में सैंकंड इयर क्लियर नहीं कर पाया था और जब क्लियर किया तब तक मेरे साथ के सब स्टूडेंट आगे निकल चुके थे । तब आज की तरह सेमेस्टर तो होते नहीं थे, तब तो ये था कि फैल हुए तो गया पूरा साल। दूसरी बार में जब सैंकंड इयर क्लियर करके फायनल आया तो क्लास में अपने से एक साल जूनियर स्टूडेंट्स के साथ बैठना पड़ा था मुझे । उनमें तुम भी थीं । जब फायनल की पहली ही क्लास अटैंड की थी मैंने, तो उस पहली ही क्लास में तुम नज़र आईं थीं । साँवले से भी कुछ अधिक साँवला रंग, बैंगनी सलवार कुरता, बैंगनी दुपट्टा और बैंगनी बिंदी । हो सकता है कि किसी को गहरे साँवले रंग पर बैंगनी रंग पहनना अच्छा न लगे । हो सकता है कि इसे ड्रेस सेंस के हिसाब से इसको बहुत ऑड कॉम्बिनेशन भी कहा जाता हो, पर यक़ीन जानो मेरे लिये तो वो ही परफेक्ट कॉम्बिनेशन था । गहरे साँवले रंग पर छाया हुआ गहरा बैंगनी रंग । जैसे शीशम के साँवले गहरे तने पर बोगनबेलिया की बेला छाई हुई हो । मैं देखता ही रहा बस देखता ही रहा । साँवले रंग में इतनी खूबसूरती हो सकती है ये मुझे पता ही नहीं था। और ये कहने की तो ज़रूरत नहीं है कि बैंगनी रंग उस दिन के बाद से मेरे लिये सबसे फेवरेट हो गया था । मेरे सीधे हाथ की किसी उँगली में एक अँगूठी हुआ करती थी। वो पुखराज की अँगूठी थी । सैंकंड इयर में मेरे लुढ़क जाने के बाद माँ ने किसी ज्योतिषी से पूछ कर मेरे लिये बनवाई थी । बताया गया था कि मेरा गुरू कमज़ोर है इसलिये अँगूठी पहनना ज़रूरी है । उसी पुखराज की अँगूठी को इस प्रकार से आँख के पास एँगल बनाता रहा कि उसमें तुम्हारा अक्स नज़र आता रहे । गुरू को मज़बूत करने के लिये पहनाई गई अँगूठी उस दिन मेरे शुक्र को मज़बूत करने का काम करती रही । मेरी दुनिया उस पीले पुखराज में नज़र आ रहे तुम्हारे बैंगनी अक्स को देख देख कर बैंगनी पीली हो गई थी ।

पूरी क्लास में घुलने मिलने में कुछ समय लगा था मुझे । हालाँकि सब जूनियर ही थे लेकिन फिर भी साथ के स्टूडेंट्स तो थे नहीं । उस क्लास में कुछ स्टूडेंट्स तो ऐसे भी थे जो स्कूल से ही साथ साथ पढ़ते चले आ रहे थे और अब कॉलेज में भी ग्रुप का ग्रुप साथ में ही था । मैं उनके लिये बाहरी था । मगर फिर धीरे धीरे मैं उनमें एडजस्ट हो गया । तुमसे भी बात चीत शुरू हो गई थी । मगर उतनी नहीं । तुम्हारे ग्रुप के लड़के तुम्हारे साथ ज्यादा घुलमिल कर बातें कर लेते थे । मेरे मन में एक हिचक थी । एक छोटे क़स्बे के बीस साल पहले के उस स्टूडेंट के मन में वो हिचक स्वाभाविक होती थी । भले ही कॉलेज को एड था लेकिन संस्कार कोएड के नहीं थे । और मेरे मामले में तो शायद एक चोर भी मन में था जो हिचक पैदा करता था ।

राजेश हीटर तुम्हारे सबसे क़रीब हुआ करता था । सबसे पहले तो मुझे इस नाम ने ही परेशान कर दिया था । बाद में नाम वाले से भी परेशानी हुई । राजेश के नाम के साथ लगे हुए हीटर शब्द से मैं हैरत में पड़ गया था । तुम सब तो स्कूल के समय से ही सहपाठी रह चुके थे इसलिये एक दूसरे के बारे में सब कुछ जानते थे । मगर मुझे तो पता नहीं था कि ये हीटर क्या बला है । तुम लोगों से ही पता चला था कि राजेश बचपन में कूलर को हीटर कहता था और इसी कारण तुम लोगों ने स्कूल के दिनों में ही उसका नाम राजेश हीटर रख दिया था । इसलिये भी क्योंकि तुम्हारे ग्रुप में दो राजेश थे । दोनों राजेशों को अलग अलग कैसे किया जाए इसलिये राजेश सोनी को राजेश हीटर कर दिया गया था । तो राजेश हीटर तुम्हारे सबसे क़रीब था । पता चला कि तुम दोनों के परिवारों में भी आपस में खूब अच्छी जान पहचान है । राजेश के परिवार की ज़ेवरों की दुकान थी, और तुम्हारा परिवार उस दुकान का पुराना ग्राहक था । इस कारण तुम दोनों में खूब घुटती थी । ये घुटना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था ।

अच्छा तुम्हें ये तो लग रहा होगा कि अचानक ये मैं बीस साल पुराना किस्सा कहाँ ले बैठा हूँ । असल में उसके पीछे भी एक कारण है। कुछ दिनों पहले मैंने दो फिल्मे देखी थीं । उनमें से एक फिल्म का नाम था दस्विदानिया (दूसरी फिल्म का ज़िक्र पत्र में आगे कहीं आएगा) । उस फिल्म का हीरो एक लिस्ट बना कर वो सारे काम करता है जो वो करना चाहता है । मुझे ये थीम बहुत पसंद आई थी । हम सब अपने अपने जीवन में एक लिस्ट हमेशा बनाते रहते हैं । और उस लिस्ट में कुछ काम ऐसे होते हैं जो टॉप प्रायारिटी पर होते हैं । हमारे अंदर एक धधकती हुई इच्छा हमेशा विद्यमान रहती है कि काश हम इन कामों को कर सकें । काश, इसलिये कि हम इन कामों को करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं । और ये इच्छाएँ, काश बन कर हमेशा हमारे साथ चलती हैं । दस्विदानिया का हीरो अपने जीवन के इन्हीं सारे काशों की लिस्ट बना कर मरने से पहले उन्हें पूरा करता है । मैंने भी वैसी ही कोई लिस्ट बनाई हो ऐसा तो नहीं है और न ही दूसरा कारण भी मेरे साथ है । मगर फिर भी कुछ इच्छाओं को पूरा करने की मन में आई । जो मुझे लगता है कि मेरे जीवन के सबसे बड़े काश हैं । वे काश जो फासिल्स की तरह मेरे जीवन में कहीं कहीं जमे हुए हैं । और उसी कारण ये पत्र लिख रहा हूँ ।

तो हुआ ये कि फायनल करने के बाद पूरी क्लास पीजी की अलग अलग कक्षाओं में बँट गई थी । कुछ स्टूडेंट्स पढ़ाई छोड़ भी गये थे । हम छः स्टूडेंट्स ने सबसे टफ सब्जेक्ट लिया था । रसायन में मास्टर डिग्री । हम छः, जो थे तीन लड़के और तीन लड़कियाँ। ऐसा किसी फिल्मी गणित के चलते नहीं हुआ था कि तीन लड़के और तीन ही लड़कियाँ । वैसे भी तुम्हारे अलावा जो बाकी की दो थीं वो लड़कियाँ थी हीं कब, वो तो बहनजियाँ थीं। मोटे फ्रेम का चश्मा लगाने वाली बेला और हर दम पढ़ाई की बातें करने वाली मीना। हाँ लड़के हम तीनों ठीक ठाक थे । मैं, राजेश हीटर और तीसरा धनंजय । मुझे रसायन हमेशा से ही डराता था और उसीमें मेरे सबसे कम नंबर आते थे । लेकिन मेरे पास तो कोई ऑप्शन भी नहीं था । क्योंकि तुमने रसायन में पीजी करने का निर्णय पहले ही ले लिया था और तुम्हारे कारण ही राजेश हीटर ने भी रसायन लेने का निर्णय लिया था। ये दोनों ही कारण मिलकर तीसरा कारण बने मेरे रसायन लेने का । रसायन में पीजी के अपने कॉलेज के पिछले रिजल्ट भी डरावने थे । हमसे ठीक पहले के साल में जो पाँच स्टूडेंट्स पीजी कर रहे थे वे सब के सब फेल हो गये थे । और इस साल वे सारे समाज शास्त्र में एमए कर रहे थे । रसायन शास्त्र का विभाग पीजी के अपने खराब रिजल्ट के कारण पूरे कॉलेज में बदनाम था । जब मैंने रसायन में पीजी का फार्म भरा तो मुझे भाँति भाँति के लोगों ने भाँति भाँति से डराया था । लेकिन मेरे अंदर तुम्हें लेकर जो रसायन और उस रसायन से जो शास्त्र बन रहा था उसने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं भी रसायन में पीजी करूँ । मुझे बहुत बोरिंग लगता था काग़ज़ पर हाइड्रोक्लोरिक एसिड और सोडियम हाइड्राक्साइड की रासायनिक क्रिया को दिखाना जिसमें पानी और नमक बनता था । पानी और नमक बन जाये वहाँ तक भी ठीक, लेकिन समीकरण में साम्य स्थापित करो कि एक भी एटम कम न हो जाए । जो कम हो गया तो समीकरण असंतुलित हो जाएगा ।

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