Dasvidaniya - 3 - last part books and stories free download online pdf in Hindi

दस्विदानिया - 3 - अंतिम भाग

दस्विदानिया

(कहानी पंकज सुबीर)

(3)

इस बीच एक और घटनाक्रम हुआ था । वो ये कि एक बार राजेश और मैं अपने फाइनल के साथी लड़कों के साथ संडे को क्रिकेट मैच खेलने गये थे । उस दिन कुछ ऐसा हुआ कि मेरे मन में गाँठ पड़ गई। उस दिन लड़के राजेश को बार बार तुम्हारा नाम ले ले कर छेड़ रहे थे । हालाँकि राजेश उस सब में सहमति नहीं जता रहा था, लेकिन वो उस सबका कोई प्रतिरोध भी नहीं कर रहा था । मौन का नाम सहमति ही होता है । एक दो बार राजेश ने शायद मेरी उपस्थिति को भाँपते हुए उन लड़कों पर दिखाने के लिये गुस्सा भी किया, लेकिन वो गुस्सा भी समझ में आ रहा था कि वो नाम का ही है। मुझे उस दिन बहुत बुरा लगा। मुझे दो कारणों से बुरा लग रहा था। पहला कारण तो अब तक तुमको पता चल ही गया होगा । दूसरा कारण ये कि हमारी फैकल्टी की किसी लड़की का नाम लेकर दूसरी फैकल्टी वाले लड़के मज़ाक बना रहे थे । वो भी हमारे ग्रुप का, जिसमें हम छः लोग किसी परिवार की तरह शामिल थे । मगर मैं कुछ नहीं कह पा रहा था । उसके भी दो कारण थे, पहला तो ये कि उससे शक की सूई मेरी तरफ घूम जाती । और दूसरा ये कि वे सारे बचपन के साथी थे, मैं उनके लिये आउट साइडर था । मैं कुछ भी कहता तो हो सकता है मुझे ये जवाब मिल जाता कि तुझे क्या पता, इन दोनों का तो स्कूल के समय से ही चक्कर चल रहा है । मेरे लिये वो क्रिकेट का मैच खेल पाना तक मुश्किल हो गया था। मुझे लगा कि इतनी बड़ी बात मुझे पता तक नहीं है और मैं फिजूल ही कोशिश किये जा रहा हूँ । जब ये लड़के इस प्रकार की बात कर रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि ये बात स्कूल के समय से ही चली आ रही होगी ।

उस दिन तो मैं चुपा गया लेकिन मेरे मन में ये बात बैठ गई कि राजेश ही वो कारण है जिसके कारण मैं तुम तक नहीं पहुँच पा रहा हूँ । धीरे धीरे ये शक गहराता गया । अब मैं सामान्य नहीं रह गया था । अब राजेश की हर गतिविधि पर नज़र रखना और उसको बारीकी से आब्ज़र्व करना मेरा काम हो गया था। विशेषकर तब, जब राजेश उन लड़कों के साथ हो, या तुम्हारे साथ हो। तुम दोनों जब भी साथ होते तो मैं छिप कर या कभी सामने आकर ही तुम दोनों पर भी निगाह रखता। लेकिन तुम दोनों के व्यवहार में मुझे कहीं भी वैसा कुछ नहीं दिख रहा था जो वो लड़के कह रहे थे । इस बीच कुछ और भी बातें मेरे सामने आईं । जैसे ये कि तुम्हारा छोटा भाई जो सैकंड इयर में पढ़ता था, उसका भी नाम ले लेकर ये लड़के राजेश को छेड़ते रहते थे । तुम्हारे भाई का नाम ले लेकर ये लड़के राजेश को छेड़ते थे कि देख तेरा साला जा रहा है । साला......? मेरे लिये ये पानी सर पर गुज़र जाने वाली बात थी । बात यहाँ तक और इस क़दर बढ़ी हुई है ।

बहुत दिनों तक नज़र रखने का परिणाम ये हुआ कि मुझे ये पता चल गया कि तुम्हारे और राजेश के बीच में तुम्हारी तरफ से तो कुछ नहीं है, लेकिन राजेश के मन में कुछ कोमल तंतु ज़रूर हैं । उन कोमल तंतुओं को नष्ट करने का मैंने बीड़ा उठा लिया था । मौका भी जल्द ही मुझे मिल गया । उस दिन बाकी का चारों कॉलेज नहीं आये थे । केवल तुम और मैं ही थे । लैब की खिड़की से लगे हुए इमली के पेड़ की पत्तियाँ नोंचते हुए मैंने धीरे धीरे अपने मन का ज़हर उगलना शुरू किया था। मैं बोलता गया और तुम सुनती गईं, और रोती भी गईं। मैंने पूरी बात को बदल कर रख दिया था। मैंने ये नहीं कहा लड़के संजय को ऐसे ऐसे चिढ़ाते हैं,मैंने तो ये कहा कि राजेश ही लड़कों के सामने इस प्रकार डींगें हाँकता है । राजेश ही लड़कों को तुम्हारे भाई की तरफ इशारा करके कहता है कि देखो मेरा साला जा रहा है। इस बात पर पहले तो तुमने अपनी आँखें विस्फारित कर दीं थीं और उसके बाद कुछ ज़ोर ज़ोर से सिसकियाँ भरी थीं । मैंने जाने क्या क्या कहा था । ये कहा कि पूरे कॉलेज में तुम्हारी और राजेश की बातें हो रही हैं । जबकि हक़ीक़त में ऐसा कुछ नहीं था, केवल उन दस पन्द्रह लड़कों के बीच होने वाला मज़ाक था वो । मैंने ये कहा कि राजेश सबके सामने छाती ठोंक ठोंक कर कहता है कि उसने तुमको पटा रखा है (क्षमा करना इस शब्द के लिये, असल में इसका कोई अल्टरनेट नहीं मिल पा रहा । उस दौर के हम कॉलेज के लड़के इसी शब्द का उपयोग करते थे। पता नहीं आज के लड़के क्या उपयोग करते हैं।)। जबकि राजेश बेचारा तो सार्वजनिक रूप से तुम्हारे बारे में कोई बात ही नहीं करता था । मैंने ये कहा कि राजेश ये भी कहता है कि तुम दोनों के परिवारों ने तुम दोनों की शादी की बात भी कर रखी है । ये बात भी मैंने अपने ही मन से गढ़ ली थी । ऐसी, और इसी प्रकार की जाने कितनी बातें मैंने तुमसे कीं, जो मेरे शैतान दिमाग़ में कुछ तो पहले से ही तैयार थीं और कुछ तुरंत ही बनती चली गईं । क़रीब एक से डेढ़ घंटे तक मैंने तुमसे बातें कीं, इस शर्त के साथ कि तुम किसी से नहीं कहोगी कि ये बातें तुमको किसने बताईं हैं, ये बातें मैं तुम्हारा शुभचिंतक होने के कारण तुमको बता रहा हूँ । तुमने प्रामिस किया था कि तुम किसी को नहीं बताओगी कि तुमको ये सब मैंने बताया है । तुमने अपना प्रामिस निभाया भी ।

उसके बाद दो दिन तुम कॉलेज नहीं आईं थीं। दो दिन बाद जब आईं तो तुमने हम सब के सामने ही राजेश की लू उतार दी थी। क्या क्या कहा था तुमने उस बेचारे को। तुम रो रहीं थीं, चिल्ला रहीं थीं और बोलती जा रहीं थीं । राजेश कुछ समझ नहीं पा रहा था कि ये सब क्या हो रहा है । हम सबने बीच में बहुत मध्यस्थता करने की कोशिश की लेकिन तुम नहीं रुकीं। जितना भला बुरा कह सकतीं थीं उतना कह दिया । राजेश ने भी अपना पक्ष रखने की बहुत कोशिश की लेकिन तुम सुनने के मूड में थीं ही कब । सब कुछ टूटता चला गया, बिखरता चला गया ।

राजेश इस बात पर हैरान था कि ये आखिर हुआ क्या। ये सब जो हुआ उसके पीछे सूत्र क्या है। मुझे याद है अच्छी तरह से कि राजेश उस दिन शाम को मेरे कंधे पर सिर रख रख कर फूट फूट कर रोया था। धनंजय के कमरे पर। जहाँ केवल हम तीनों ही थे । वो रोता जा रहा था और एक ही बात कहता जा रहा था, मैंने किया क्या है, मेरी ग़लती क्या है।

उस एक घटना से हम सब के बीच का वो सब कुछ खतम हो गया जो हम सबको बाँधे हुआ था। रसायन के विद्यार्थी थे सो जानते थे कि एटॉमिक बॉण्डिंग के बारे में। किस प्रकार इलेक्ट्रान्स और प्रोटान्स के अफेक्शन के कारण अलग अलग एटम संपर्क में आते हैं और एक दूसरे से जुड़ जाते हैं । जुड़ कर एक नया अणु बनाते हैं । जैसे हाइड्रोजन के दो और आक्सीजन का एक परमाणु मिलकर पानी बना देते हैं । हमें ये भी पता था कि जो जुड़ते हैं वो विखंडित भी हो जाते हैं किसी बाहरी फोर्स के कारण। हमारे रिश्तों में वो बाहरी फोर्स मैं था। हम सबके बीच एक प्रकार का सूनापन आ गया था उस घटना के बाद । हमारी समोसों की, गानों की सारी गतिविधियाँ बंद हो गईं। मैंने जिस उद्देश्य को लेकर वो सब किया था वो भी पूरा नहीं हुआ। कुछ दिनों बाद पता चला कि तुम्हारी शादी तय हो गई है । परीक्षा के बाद तुम शादी करके इन्दौर चली जाओगी । तुम्हारी शादी भी इन्दौर से ही होगी लड़के वालों की इच्छानुसार ।

परीक्षाएँ हुईं, हम सब भारी मन से हमेशा के लिये अलग हो गये । उसे हमेशा के लिये ही कहा जाएगा । क्योंकि पीजी भी हो चुका था । अब तो आगे रास्ते अलग अलग होने ही थे । हम सब मिलकर कितना रोये थे उस आखिरी दिन । हमारे जीवन के सुनहरे दिन खतम हो रहे थे और सामने एक संघर्षों से भरा जीवन नज़र आ रहा था । और हम अलग अलग चल दिये । अलग अलग उन रास्तों पर जो कोहरे और धूल से ढँके थे, जिन पर आगे का कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था कि ये रास्ते कहाँ लेकर जाएँगे ।

रोया मैं एक बार और था, तब, जब मैं और धनंजय तुम्हारी शादी अटैंड करके इन्दौर से लौट रहे थे । राजेश शादी में नहीं गया था । बस की सबसे पिछली सीट पर बैठा मैं अचानक धनंजय की गोद में सिर रख कर फूट फूट कर रो पड़ा था । बस रात के अंधेरों को चीरती हुई चली जा रही थी और मैं रो रहा था । मैं तुम्हें हमेशा के लिये खो चुका था ।

राजेश और मैं अब भी उसी शहर में रहते हैं । धनंजय यहाँ से तभी चला गया था। बेला और मीना का कुछ पता नहीं कि वो कहाँ हैं । तुम्हारे बारे में बस इसलिये पता है क्योंकि तुम्हारा भाई मिलता रहता है । उसीने बताया कि तुमने शादी के बाद पीएचडी की कार्सीनोजेनिक पदार्थों (कैंसर उत्पन्न करने वाले) पर और उसके बाद वहीं इन्दौर के कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हो गई हो। तुम्हारा ईमेल भी उसीने दिया था। राजेश और मैं उतने ही पक्के दोस्त हैं अभी तक भी। मिलते हैं, परिवार के साथ घूमने जाते हैं। फिल्में देखते हैं। होटल जाते हैं, जहाँ राजेश पीता है और मैं केवल चखना खाकर उसका साथ देता हूँ। बाद में दोनों साथ खाना खाते हैं। अक्सर राजेश उस घटना का जिक्र कर बैठता है। पूरी हैरत के साथ कि आखिर वो क्यों हुआ था, क्या हुआ था। वो घटना उसके जीवन की एक पेचीदा गुत्थी है, जो आज इस पत्र के साथ ही सुलझ रही है। जिंदगी न मिलेगी दोबारा, ये फिल्म राजेश और मैंने साथ ही देखी थी। उसका वो सीन जब दोस्त कन्फेशन करता है कि उसने दोस्त की गर्लफ्रेंड को अपने प्रेम के चलते उससे अलग कर दिया था, देख कर मुझे अपना सीन याद आ गया। उसी दिन मैंने तय कर लिया था कि राजेश के सामने उस घटना की सच्चाई खोल दूँगा। और तुम्हारे सामने भी ।

पत्र समाप्त कर रहा हूँ इस आशा के साथ कि तुम राजेश को माफ कर देना.........नहीं नहीं तुम उससे माफी माँग लेना । गलती उसकी तो थी ही नहीं । इस ईमेल की कॉपी राजेश और धनंजय को भी भेज रहा हूँ, बेला और मीना का ईमेल यदि तुम्हारे पास हो तो इसकी कॉपी उनको भी फारवर्ड कर देना । तुमको तो मैं बरसों पहले खो चुका था, आज पूरी तरह से खो रहा हूँ और आज शायद राजेश को भी खो रहा हूँ । कॉलेज के सुनहरे दिनों की अंतिम याद को खो रहा हूँ । विदा....या शायद अलविदा, दस्विदानिया ।

तुम सबका ही

समीर राजवैद्य

(समाप्‍त)

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