चुड़ैल का इंतकाम - भाग - 5


यह खबर पढ़ते के साथ जयन्त वहां से सीधे भागता हुआ अपने कमरे में आ जाता है और अंदर से कुंडी लगाकर उसने अपने आपको घर के अंदर ही कैद कर लिया।


3-4 दिन बीत गए लेकिन अभी तक उसके दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल आ रहा था कि.... वह उस दिन बारात में क्यो गया?चलती हुई  बाइक से वह चुडैल कैसे गायब हुई? वह चाहता तो राजीव की जान बचा सकता था। मगर....!


लेकिन यह सपना एक रात का नहीं था बल्कि यह कहानी अब हर रोज और हर रात की बन चुकी थी हर रात को यहीं सब होता और सुबह उठता तो फिर उसे कमजोरी सी महसूस होती । ऐसे होते - होते 6 दिन और बीत गए।


जनवरी के आखिरी हफ़्ते में जयन्त की माँ उस से मिलने को आती है। उसकी मां मिर्जापुर में  सरकारी विद्यालय में सहायक अध्यापिका के पर एक शिक्षिका थीं। वह अक्सर महीने के अंत मे एक बार अपने गांव अरंद अवश्य आती थीं। जैसे ही मां की नजर जयन्त पर पड़ती है तो वह देखकर चौंक जाती है , क्यो कि जयन्त का शरीर बहुत ही कमजोर और सूख सा गया था।


वह जयन्त से आश्चर्यजनक रूप से बोलतीं है।मां -" क्यो बेटा तू इतना कमजोर और दुबला - पतला कैसे हो गया, क्या हो गया तुझे ? "जयन्त -" पता नहीं मां , हो सकता है कि खेत मे ज्यादा काम की वजह से कमजोर हो गया हूं। "मां- "बेटे खेतों के काम तो तू बचपन से ही करता आ रहा है लेकिन तू पहले ऐसा कमजोर कभी नहीं दिख मुझे। तुझे देखकर ऐसा लग रहा मानो जैसे तेरे शरीर मे खून ही न हो।"


जयन्त- "मां तुझे तो मैं हमेशा कमजोर ही लगता हूँ। तू जब जब आती है मुझे ऐसा ही कहती है।"मां- "लेकिन इस बार की कमजोरी कुछ अलग नजर आ रही है...!"यह कहकर मां शांत हो जाती है। वो अंदर ही अंदर अब चिंतित हो चली थी। उसे संदेह हो गया था कि जयन्त किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आ चुका है।
जयन्त के पापा एक रात खेत मे गए थे आइए तब से आज तक लापता हैं। उस रात उन्हें खेत की तरफ सबने जाते देखा था लेकिन आते किसी ने नहीं देखा था। जितने लोग उतनी मुंह बाते। इतने वर्षों के  बाद लगभग सभी ने उनके वजूद को भुला ही दिया था लेकिन जयन्त की माँ की आंखों को आज भी उनके वापिस आने का इंतजार था।



जयन्त अपने ताऊ जी के परिवार के साथ ही यहां रहता था और घर की सारी ज़िम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभाता चला आ रहा था। उसे अपने गांव की मिट्टी से बहुत प्रेम था और अपने पिता से बहुत लगाव जिसकी वजह से वह अपने पैतृक घर को छोड़ना नहीं चाहता था।


रात को दोनों एक साथ खाना खा कर सो गए।उस रात को भी जयन्त को वही सपना दिखाई देता है तो फिर वह सुबह होते ही उस सपने के बारे में मां को बताता है ।मां उसके सपने को नजरंदाज करे बिना, वो गांव के एक ओझा जिसका नाम लल्लन ओझा था उससे से मुलाकात करती है और उसे यह सब बतलाती है और मदद करने के लिए मिन्नतें करती है ।


लल्लन ओझा -"तुम्हारे लड़के के ऊपर एक चुड़ैल का साया है जो हर रात आकर उसका खून पीती है जब तुम्हारा लड़का अर्ध चेतन अवस्था में होता है तो उसे यह सपने के जैसा लगता है। तुम उसके हाथ पर हल्दी का उबटन करना तो उस पिशाच के दांतों के द्वारा काटे और उसके पकड़ने से बने चिन्ह जो अदृश्य है वो दृश्य हो जाएंगे। "


मां -" आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। मैं कल उसे देखते ही समझ गई थी कि इसके शरीर में रक्त की कमी हो गई है। उसकी आँखों के नीचे काले रंग के गहरे और काले धब्बे बन गए हैं।
लल्लन जी आपका बहुत बड़ा एहसान होगा मुझ अबला पर।आप मेरे बेटे को उससे बचा लीजिए कुछ उपाय बताए!"


लल्लन ओझा -"देखो मैं तुम्हारी मदद के लिए तैयार हूं लेकिन उसके लिए तुम्हें खुद को बहुत मजबूत करना होगा। मैं जैसा जैसा कहूंगा ठीक वैसा ही करना होगा अन्यथा उस चुड़ैल की शिकार तुम भी हो सकती हो।"
मां- "मुझे अपनी जान की परवाह नहीं है लल्लन जी। बस मेरा बेटा जयन्त पहले की तरह हो जाए।"


लल्लन ओझा- "देखो कल अमावस्या की रात है। कल की रात ही उसकी जिंदगी का फैसला होगा। कल की रात उसकी शक्तियां और भी प्रबल हो जाएंगी। वह चुड़ैल चाहेगी की कल जयन्त को अपने वश में कर के हमेशा के लिए अपनी दुनिया मे चली जाए, लेकिन तुम चिंता न करना बस कल अमावस्या की रात तुम अपने बेटे जयन्त को किसी तरह ले कर यहां आना।


ताकि उस चुडैल से छुटकारा मिल जाए। फिलहाल अभी यह लाल रंग का धागा लो जो अभिमंत्रित है। इसे अपने बेटे की दाहिनी भुजा पर बांध देना, जिससे वह चुड़ैल उसके निकट भी नहीं आ सकेगी और वो अगर आस - पास होगी तो वो चुड़ैल उसे दिखाई देने लगेगी, और जैसे ही वो दिखाई दे तो ये कलश उसके सामने करने के बाद इसका ढक्कन खोल देना और यह मंत्र उच्चरण कर देना


ॐ नमो आदेश गुरु का लाज रखो अपने चेले का,

मंत्र साँचा कंठ काँचा जो न समझे वह रह जाए बच्चा।

धौला गिरी वारो चंडै सिंह की सवारी,

 जाके लँगुर है करत है अगारी।

प्याला पिए रक्त को चंडिका भवानी,

 सब उपनिषद वेदबानी में बखानी ।


भूत नाचे बेताल लज्जा रखे,

अपने भक्त का पीड़ चखे।

लिए हाथ भक्त बालिका दुष्टन प्रहारी,

सारे दुःख देत एक पल में पछारी।


पकड़ के दे ऐसा पछाड़ काँप जाए मांस और हाड़,

मत अबार तेरे हाथ में कपालमार के सीने के पार कर दे भाल।
भक्षण करले जल्दी आइकेमुक्ति मिलत तब कहीं जाइके,जाय नाहीं भूत पकड़ मारे जाँय  तुम्हरे नाम लूँ तो करे फाएँ फाएँ।
राम की दुहाई गुरु गोरख का फंदा नहीं भागेगा तो करेगा तोये ये अंधा,उड़ो उड़ो चुड़ैल वाहा।फुरो फुरो मंत्र स्वाहा ।।
 
यह मंत्र उच्चारण कर देना तो वह इस कलश में समा जाएगी और उसके बाद कलश का ढक्कन लगा देना तो वह चुड़ैल इसमें कैद हो जाएगी। लेकिन जैसे ही यह कार्य कर लो तो ध्यान रखना ठीक उसी वक़्त वयह कलश ले कर तुम लोग मेरे पास आ जाना तो फिर मैं उस चुड़ैल को हमेशा हमेशा के लिए भस्म कर दूंगा।


इस बात की सावधानी रखना की गलती से भी वह ढक्कन न खुले अन्यथा मैं उस चुड़ैल का बाल भी बांका नही कर पाऊंगा।"
मां -" बिल्कुल बाबा मैं आपके बताए अनुसार ही सारे कार्य करूंगी।"मां इतना कहकर, वह तुरंत लल्लन ओझा से वह मन्त्र एक कागज पर लिख लेती है। लल्लन ओझा को दोनों हाथ जोड़कर घर की ओर निकल जाती है।


वो घर पहुंच कर उस रात को उसे अपने ही कमरे में ही सोने के लिए कहती है जयन्त पर बारीकी से नजर रखती है। उस रात जयन्त ने कोई ख्वाब नहीं देखा। पूरी रात जागे होने की वजह से सुबह किसी वक़्त उसकी माँ को नींद आ जाती है।
"बचाओ...बचाओ... मुझे इस चुड़ैल से बचाओ।"


अचानक इस आवाज के साथ दोनों झटके से उठ खड़े होते हैं।जयन्त का मुंह खुला हुआ है औऱ पसीने उसका पूरा जिस्म भीगा हुआ है। वह सामने की तरफ देखता हुआ काँप रहा है।
जयन्त की माँ उसे गले लगा लेती है। कुछ देर बाद जब वह सामान्य होता है तो उसकी मां कहती है-


"क्या हुए बेटे तुमने वह सपना फिर से देखा क्या?"
"मां मैंने आज सपने में अजीब सा देखा। उस चुड़ैल ने मुझे और मेरे दोस्त राजीव रंजन को मारकर किसी सुनसान खेत के पास पीपल के पेड़ में एक रस्सी को गले में बांधकर लटका दिया है। मैं बार बार बचाने की आवाज लगा रहा हूँ लेकिन कोई भी मेरी मदद नहीं कर पा रहा है।"


यह कहते कि साथ जयन्त दुबारा अपनी मां के गले लग जाता है।उसे उस वक़्त डरा हुआ देखकर उसकी माँ उसे लल्लन ओझा वाली बात नहीं बताती है। पूरे दिन उसकी माँ उस पर कड़ी नजर रखती है।


जैसे ही सूर्यास्त होता है उसकी मां जयन्त से कहती है-"बेटे जाओ और जल्दी से स्नान कर के आओ। तुम्हे कुछ ज़रूरी बात बतानी है।"
यह सुनकर जयन्त नहाने के लिए चल जाता है। वो थोड़ी ही देर में नहा कर आ जाता है।


जयन्त की माँ लल्लन ओझा के द्वारा बताई हल्दी लेपन की प्रथम विधि को करती है। ऐसा करते ही थोड़ी देर के बाद जो सामने परिणाम आया वो सब देखकर दोनों के होश फ़ाख्ता हो गए।
जयन्त के दाहिने हाथ और गले में जो दांतों के द्वारा काटने के निशान थे वो साफ - साफ दिखाई दे रहे थे।


जयन्त की मां ने जयन्त को अब सब कुछ बताया जो कुछ लल्लन ओझा ने कहा था और फिर वो धागा जयन्त की दाहिनी भुजा पर बांध दिया।
लेकिन उन दोनों को यह मालूम नहीं था की दीवारों के भी कान होते हैं। उसी कमरे के किसी कोने में उन दोनों की बाते और उपाय कोई सुन रहा था।
यह सब बातें जो जयन्त की मां ने उसे बताई थी , वो सब बातें वह चुड़ैल वहीं पास में बैठी हुई सुन रही थी। धागा बांधते ही कुछ क्षण के पश्चात वह दृश्य होकर अचानक सामने आ जाती है और फिर जयन्त जैसे ही उस कलश को उठाने की कोशिश करता है उसके पहले ही वह पिशाच उस कलश को कहीं दूसरी जगह छिपा देता है और अदृश्य हो जाता है।


काफी मशक्क़त के बाद उन्हें वह कलश घर के किसी कोने में प्राप्त होती है। जयन्त की माँ जैसे ही उस मिट्टी के कलश को उठाने के लिए बढ़ती है कि तभी अचानक वह कलश हवा में 4 फ़ीट ऊंची उड़ती है और धरती पर गिर कर टूट जाती है।


यह दृश्य देखकर दोनों डर जाते हैं और जयन्त की मां लल्लन ओझा को यह पूरी घटना फोन पर बताती है। उसकी पूरी बात सुनने के बाद लल्लन ओझा कहते हैं-"देखो घड़ी में रात के 8 बजे का वक़्त हो चला है। ठीक 3 घंटे बाद उसकी शक्तियां इतनी प्रबल हो जाएंगी की उसका सामना करना मुश्किल हो जाएगा। जितनी जल्दी हो सके यहां मेरे पास पहुंचो तक मैं दूसरे कलश को उसे कैद करने योग्य बनाता हूँ।"


"जी लल्लन जी हम बस 20 मिनट में आपके पास पहुंच जाएंगे।"यह कहते ही जयन्त की माँ  फोन रखकर तुरंत अपने घर से पड़ोस के गाँव कैथल में लल्लन ओझा के घर के लिए अपनी कार में बैठ कर जयन्त के साथ निकल पड़ती है।
लल्लन ओझा पड़ोस के गांव कैथल  का ही रहने वाला था जो जयन्त के गांव अरंद से 5 किलोमीटर की दूरी पर ही था। जयन्त कार ड्राइव कर रहा था तो बाजू में उसकी माँ बैठी नही थी।अभी गांव से निकले मुश्किल से 2 किलोमीटर ही हुआ था कि तभी अचानक किसी की आवाज आई-"अरे मुझे कहाँ लिए जा रहे हो। मुझे उतार तो दो कम से कम।"


यह शब्द सुनते ही दोनों के दोनों चौंक जाते हैं और एक साथ बोल पड़ते हैं- "त...तुम कौन हो औऱ कर के अंदर कैसे आई?"
"खुद ही पलट कर क्यों नहीं देख लेते की मैं कौन हूँ।"

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यह आवाज जयन्त को जानी पहचानी लगती है। इस से पहले की वह समझ पाता कि यह आवाज किसकी हो सकती है कि तभी उसकी माँ पीछे पलटने को हुई। यह दखकर जयन्त जोर से चीखा-"नहीं...बिल्कुल नहीं! माँ भूलकर भी पीछे मत देखना। यह वही शातिर चुड़ैल है जिसने नाक में दम किया हुआ है। भूल से भी पीछे देख लिया तो यह अपने मनसूबों में कामयाब हो जाएगी।"
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क्रमश..........


इस कहानी का अगला भाग बहुत ही जल्द।

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