बाबू Abhishek Hada द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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बाबू

कहानी: बाबू

वो दिखने में सीधा साधा था लेकिन मस्ती करने में शैतान का दादा। बेशर्म इतना की कोई कितना ही टोका-टाकी करे उस चिकने घड़े पर कोई असर ना होता था। पर जब भी कोई उसे बाबू कहता तो वो बहुत ज्यादा चिढ़ जाता था।

वैसे बाबू कोई ऐसा नाम न था जिससे चिढ़ा जाए, आज भी एक ही गाँव मे बाबू नाम के आपको कई बच्चे जवान और बूढ़े मिल जाऐंगे। पर उसे इस नाम से बचपन से ही घृणा थी। जब कभी वो पढ़ाई नही करता था, तो माँ अक्सर यही कहती थी कि पढ़ाई कर ले वरना जो काम बाबू करता है वो काम तुझसे करवाऊँगी। और बाबू के कामों से दीनू को सख्त नफरत थी। रोजाना गाँव की सड़कों की झाड़ू निकालना। नाली साफ करना। गाय भैंसो का गोबर साफ करना और भी साफ सफाई से जुड़े काम बाबू के ही जिम्मे थे।

दीनू के पापा इस मामले में ठीक थे। वो उसे डांट देते थे पर कभी भी ऐसे नही कहते थे कि तुझसे बाबू का काम करवाउंगा। पर जब कक्षा 5 में फेल हो गया तो परिणाम देखते ही दीनू के पापा ने गुस्से में कहा कि तुम्हारी माँ ठीक कहती है तुमसे बाबू का काम ही करवाना पड़ेगा।

सुनते ही दीनू का कलेजा काँप गया क्योंकि पापा की बातों पर उसे पूर्ण विश्वास था। वो जो कहते थे वो करके ही मानते थे पर दीनू ने सोचा कि उसके पापा इतने बुरे भी नही हो सकते कि अपने सबसे छोटे और सबसे लाडले बेटे के साथ ऐसा करे। पर उसका ये अनुमान गलत साबित हुआ।

अगले दिन ही उसके पापा ने उसे सुबह 6 बजे उठा दिया तो वो चैक गया बिना एक पल की देर किए जल्दी से हाथ मुँह धोकर बोला - जी कहिए, पापा।

उन्होंने आँखो के इशारे से उसे साथ चलने को कहा। दीनू चुपचाप उनके पीछे-पीछे चल दिया। वो उसे स्टोर रूम की और ले गए। वहाँ से एक झाड़ू उठाने को कहा। झाड़ू का नाम सुनते ही दीनू के होश फाख्ता हो गए। और बाबू का चेहरा उसकी आँखों में आ गया। पर दीनू ने कुछ नही कहा। वो अभी पापा की बात का विरोध करना तो चाहता था पर वो नही कर सकता था क्योंकि माँ गाय के बाड़ें में गई हुई थी और वो 8 बजे से पहले नही आती थी। किसी भी बात का विरोध करने के लिए पहले किसी का समर्थन प्राप्त होना जरूरी है इस बात को वो बखूबी जानता था। और माँ भले ही अपने बेटे से कुछ भी कहे पर अपने बेटे से ऐसा काम तो वो शायद कभी नही करवाएगी।

सोचते हुए उसने पिता के निर्देशों का पालन करना उचित समझा। उसने एक झाड़ू उठाई। तब पापा उसे घर के पीछे बने गोदाम में ले गए जहाँ कहीं महीनों से झाड़ू नही लगी थी।

पापा ने कहा पूरे साल बहुत मस्ती कर ली अब थोड़ा काम भी करो तब पढ़ाई की कीमत पता चलेगी ये पूरा गोदाम मुझे एक घंटे में साफ चाहिए।

क्या ?? - दीनू के मुँह से न चाहते हुए भी अचानक से निकल गया।

क्या का क्या मतलब ? क्या नही हाँ कहो। और हाँ माँ के आने से पहले पूरा गोदाम साफ चाहिए। अगर यह काम पूरा नही हुआ तो . . .

दीनू के मुँह से दुबारा क्या निकलने वाला था पर उस बार किसी तरह उसने स्वयं को रोका और उस क्या को हाँ मे तब्दील करते हुए कहा - हाँ पापा

दीनू ने घड़ी देखी 7 बजे चुके थे। उसे इस मामले में ज्यादा अनुभव नही था। इसलिए जल्दी से झाड़ू चलाने लगा। सबसे पहले कमरे का दरवाजा बन्द किया। लेकिन झाड़ते ही कमरे में धूल उड़ना शुरू हो गई और दीनू को घुटन सी होने लगी। उसने दरवाजा खोल दिया साथ ही खिड़कियाँ भी खोल दी। और झाड़ू चलाने लगा। जैसा उसने माँ को अक्सर चलाते देखा था। आधा घंटा बीत चुका था और उसने आधे से ज्यादा कमरा साफ कर दिया था। सोचा थोड़ा आराम कर लूँ। क्योंकि आज पहली बार वो 6 बजे उठा था। और आँखे बन्द करके एक कोने में बैठ गया।

8 बजे दीनू के पापा आए। कमरे में उसे सोता देखते ही चिल्लाये- दीनू !

दीनू झट से खड़ा हो गया। घड़ी में देखा 8 बज चुके थे। और दीनू ने अपना काम पूरा नही किया था।
अब सिवाय माफी माँगने के दीनू के पास कोई उपाय न था। बिना एक पल की देर किए वो पापा के पैरो में गिर पड़ा। - पापा मै ये काम नही कर सकता। मैं अब से पढ़ाई करूंगा पापा। आप दोनो की हर बात मानूंगा। पर मुझसे बाबू के काम मत करवाइये।

उसके पिता ने बस ‘ठीक है’ कहा। और वहाँ से चले गए। बाद में दीनू सोचने लगा। अगर नींद न आती तो पूरा कमरा साफ कर देता और यूँ माफी नही माँगनी पड़ती।

उस दिन के बाद से उसे बाबू के नाम से चिढ़ हो गई। उसे लगने लगा कि ये सब बाबू की वजह से ही है अगर बाबू इस गाँव में ना होता तो शायद उसके पापा के दिमाग में ऐसा विचार कभी नही आता।

पर बस यही एक वजह नही थी। स्कूल खुले तो दीनू के स्कूल में कई बच्चों ने प्रवेश लिया उन्हीं में से एक लड़के से स्कूल के पहले दिन ही बैठने की बात पर बहस हो गई। गुस्से में लड़का बोला - बाबू नाम है मेरा, मुझसे लड़ने की कोशिश मत करना, पछतायेगा।

बाबू का नाम सुनते ही सारी क्लास हँस पड़ी। पर बाबू कुछ समझ नही पाया। चुपचाप वहाँ से चला गया। कुछ बच्चे जिनका काम ही दूसरे बच्चों को चिढ़ाना है वो बाबू को चिढ़ाने लगे। पहले पहल तो बाबू चुप रहा क्योंकि उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि ये सब उस पर क्यों हँस रहे है ? बाद में कक्षा में उसके शुभचिंतक सहपाठी ने उसे बताया तो उसे अच्छा नही लगा। पर वो शांत ही रहा।

आने वाले त्रैमासिक और अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं में उसके सबसे ज्यादा अंक आए। और वक्त के साथ कक्षा के बच्चों ने उसे चिढ़ाना बन्द कर दिया क्योंकि बाबू केवल पढ़ाई में ही नही खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों में भी आगे था। पर दीनू वैसा का वैसा ही था।

वो अक्सर अपने अध्यापकों से डफर, मंदबुद्धि, कमअक्ल, नासमझ नालायक जैसे शब्द सुनता रहता था। और कक्षा में बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे।

एक दिन बाबू ने क्लास में सबसे पूछा - बताओ पढ़ने वाला बाबू कौन है

सब बच्चे एक साथ बोले - तुम

और झाड़ू वाला बाबू

सब एक साथ बोल - दीनू

सुनते ही दीनू का दिमाग खराब हो गया। वो एक दो बच्चों से लड़ गया। प्रिंसीपल तक शिकायत पहुँची। आखिर दीनू के पापा को स्कूल में बुलाया गया। दीनू को आखिरी चेतावनी दी गई । और उसे पढ़ाई में ध्यान देने के लिए कहा गया। पर चिकने घड़े पर पानी कभी ठहरा है ? इस बार परीक्षा परिणाम आया तो दीनू फिर से फेल हो गया ।
जिस दिन परीक्षा परिणाम आया पापा ने उसे घर से बाहर निकाल दिया। पर शायद दीनू की किस्मत ज्यादा अच्छी थी। वो दरवाजे के बाहर बैठा था तभी उसकी दीदी और जीजा जी उसे उनके घर की तरफ आते दिखे। वो दौड़ कर उनके पास गया। वो डरता डरता दीदी के साथ घर में घुसा। दीनू के पापा जमाई जी के कारण अपना गुस्सा पी गए। और दीनू से कुछ नही कहा।

बाद में दीनू की माँ ने दीनू की बहिन सरिता को सारी बात बताई तो सरिता ने कहा कि मैं इसे शहर ले जाती हूँ। इनके दोस्त का एक हाॅस्टल है जहाँ बहुत अच्छे से बच्चों की पढ़ाई और देखभाल की जाती है। इनकी जान पहचान है तो पैसे भी कम लगेंगे और हम महीने में दो तीन बार जाकर देख भी आया करेंगे।

पापा सुनते ही मान गए पर माँ की जान तो अपने बच्चे में ही अटकी होती है। वो नही मानी पर जब दीनू के भविष्य के बारे में सोचा तो दिल पर पत्थर रख कर उसे भेजने के लिए तैयार हो गई।

अगले सत्र से उसे शहर के हाॅस्टल में डाल दिया गया। दीनू बड़ा खुश था। उसे माँ बाप की डाँट-डपट से मुक्ति मिल गई थी। और साथ ही उसे चिढ़ाने वाले बच्चे भी नही थे।

पर उसकी यह खुशी ज्यादा टिक नही पाई। हाॅस्टल का वार्डन बहुत ही सख्त मिजाज आदमी था। वो सभी को डांट डपट कर रखता था। दीनू को मौज मस्ती करने का कोई मौका नही मिलता था। पर वो मौके पैदा कर लेता था।
कक्षा के कुछ बच्चे उसकी बदमाशियों से परेशान होने लगे। और उन्होंने प्रिंसीपल से उसकी शिकायत कर दी। पर जैसे कि उसकी तो आदत बन चुकी थी ये सब सहन करने की। उसने हमेशा की तरह मासूम सा चेहरा बना कर सब दोस्तो और प्रिसीपल से माफी मांगी और आगे से ऐसा न करने की कसम खाई।

पर उसकी बदमाशियां फिर भी न रूकी। अब बच्चे उस से कम ही बात करते।

लेकिन उसकी बदमाशियों पर रोक तब लगी जब कक्षा में नए टीचर आए। उनका नाम रामबाबू वर्मा था। सभी उन्हे बाबू सर के नाम से जानते थे।

बाबू सर को दीनू के बारे में दूसरे शिक्षकों से पता चल गया था। स्कूल के सभी शिक्षक उसे मूर्ख और बदमाश बच्चा मानते थे और उसे सुधारने की कोशिश करना समय की बर्बादी। पर बाबू सर छात्रों के प्रति समर्पित शिक्षक थे। वे केवल मात्र शिक्षा देना ही शिक्षक का कत्र्तव्य नही मानते थे। उनके अनुसार सच्चा शिक्षक अपने विद्यार्थी को केवल किताबी ज्ञान ही नही देकर ऐसा ज्ञान दे जो उसके पूरे जीवन काम आए।

बाबू सर ने उसके व्यवहार का कुछ दिन तक अवलोकन किया। उसके बाद एक दिन कक्षा खत्म होने के बाद उन्होंने उसे अकेले में बुलाया। और उससे कुछ बाते की। और चमत्कार दीनू अगले दिन से ही पढ़ाई पर ध्यान देने लगा।
जब बाकी शिक्षकों ने ये परिवर्तन देखा तो सभी शिक्षक आश्चर्यचकित रह गए। जो काम स्कूल के सभी शिक्षक डाँट-फटकार और मार पीट से नही कर पाए वो काम बाबू सर ने कुछ ही दिनों में बिना डाँट-फटकार और मारपीट के कर दिया।

तब बाबू सर ने उन्हें बताया कि हम हमेशा बच्चों के दुर्गुण उन्हे बताने में लगे रहते है। कभी भी उन्हे उनके गुणों के बारे में नही बताते है। हमेशा उनके सामने एक भय का वातावरण बना कर रखते है। हम बिना उनके व्यवहार का अवलोकन किए उनको सुधारने का प्रयत्न करते है। इसी कारण असफल हो जाते है। मैने उसके व्यवहार का अवलोकन किया। और उसे प्यार से समझाया।

मैने दीनू से बस इतना ही कहा कि तुममें एक बहुत अच्छा समझदार दिमाग वाला बच्चा नजर आता है। तुम अपना यही दिमाग अगर थोड़ा सा भी पढ़ाई में लगाओ तो एक अच्छे बच्चे बन सकते हो। तुम भी मेरे बच्चे की तरह हो मै यही चाहता हूँ कि तुम अच्छे से पढ़ाई करो। और शायद तुम्हारे मम्मी पापा भी यही चाहते होंगे। तुम अगर पढ़ाई नही करोगे तो पता है क्या करना पड़ेगा ? या तो कहीं मजदूरी करोगे या किसी के घर नौकर बन कर रहोगे। मै चाहता हूँ कि तुम कम से कम इतनी पढ़ाई तो करो कि ज्यादा कुछ नही तो कम से कम किसी आॅफिस के बाबू तो बन सको।

रामबाबू सर ने एक एक बात सही कही। हर शिक्षक को अपने कमजोर छात्रों को इसी प्रकार समझाना चाहिए पर दीनू पर बाबू सर की बाकी सब बातों का इतना असर न हुआ जितना उनकी आखिरी लाइन का हुआ। दीनू सोच में पड़ गया। क्या गाँव का बाबू बनने के लिए भी पढ़ाई करनी पड़ती है ? हे भगवान अगर मैं बाबू के बराबर भी नही पढ़ पाया तो मेरे मम्मी पापा की गाँव में इज्जत मिट्टी मिल जायेगी। मै तो बाबू से भी ज्यादा पढ़ाई करूंगा। ताकि उससे अच्छी नौकरी कर सकूँ। मुझे बाबू नही बनना है। और उससे ज्यादा ही पढ़ना है।

आखिर जिस नाम से उसे सबसे ज्यादा चिढ़ थी वही शब्द उसके व्यवहार को सुधारने में सहायक बना। इस बार जब परिणाम आया तो वह द्वितीय श्रेणी में पास हो गया। और अगले सत्र में प्रथम श्रेणी में पास हुआ। हालांकि उसे इस दौरान पता चल गया कि उस दिन जो बाबू बनने की बात रामबाबू सर ने की थी वो एक क्लर्क की बात कर रहे थे। पर उसने कभी पढ़ाई में ध्यान ही नही दिया कि वो समझ पाता की बाबू का मतलब कुछ और भी हो सकता है। आज वो सच में एक आॅफिस में अपर डिवीजन क्लर्क यानि कि बाबू है। और आज भी उस समय को याद कर उसे हँसी आ जाती है।

हॉरर और प्रेम से अलग ये रचना कैसी है ? अपने कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं।