सात जन्म का साथी kavita jayant Srivastava द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सात जन्म का साथी

"अरे ज्योति तू ? " वर्षों बाद अपनी ससुराल की एकमात्र प्यारी सखी , और मोहल्ले की मुंहबोली ननद को, मॉल में देख कर मैं खुशी से चीख उठी

"हां भाभी मैं ! मुस्कुराती हुई बोली ..थोड़ा बदन भर आया था और चेहरे पर उम्र दिख रही थी ..पर शरीर अभी भी वही छरहरा , चर्बी का नामोनिशान नही ..!
''कैसी है तू ? और कहां है आज कल ? भूल गयी न मुझे .." तूने तो एकदम रिश्ता ही तोड़ लिया हमसे ..?
रिश्ता नही तोड़ा भाभी ..न ही आपको भूल सकती हूं .बस कॉन्टेक्ट नम्बर खो गया था और घर कभी आना नही हुआ..।"
पीछे से उसके बैग उठाये उसके पास कोई आया .."अरे तुम कहाँ रुक गयी मैं कब से वेट कर रहा था अंदर .."
अरे मेरी सावी भाभी मिल गयी थी न इतने सालों बाद तो छोड़कर कैसे आ जाती ..इनसे मिलो ये ही हैं मेरी सविता भाभी ..और वो उसने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखकर हाथ जोड़ दिए..।
मैं उसको देखकर दंग रह गयी ..उफ्फ ये तो हूबहू दीपक है ..पर ऐसा कैसे हो सकता है? कहीं ये मेरी आँखों का धोखा तो नही ?
क्या सोच रही हो भाभी ? यही न कि , ये कैसे हो सकता है ? हां ये दीपक नही हैं , भला एक मरा हुआ शख्स जिंदा कैसे हो सकता है? तो भाभी , ये प्रकाश हैं ..जिस तरह आपको आश्चर्य हुआ था न ,वैसे ही मुझे भी हुआ था ..। मैं शाम को मिलूंगी आपसे और बहुत सी बातें करूँगी ..अभी चलती हूं घर पर मम्मी अकेली हैं ..चाय तैयार रखियेगा ...! कहकर वो घर चली गयी और मैं अतीत की गलियों में..
***
ज्योति नाम था उसका , पिता गुज़र चुके थे , बड़ी बहन दीपा की शादी हो चुकी थी , और अब घर मे मात्र उसकी माँ और ज्योति ही थे, एक आकर्षक साफ्टवेयर इंजीनियर दीपक से उसकी शादी तय हुई थी बड़े ही धूमधाम से उसकी शादी हुई, मोहल्ले के प्रतिष्ठित गोयल परिवार की दुलारी बेटी थी वो मैं उनके घर विवाह की रस्मों में सम्मिलित होने गई थी शादी के लगभग पांचवे दिन ज्योति मायके आई थी पग फेरे की रस्म के लिए और फिर मुहूर्त भी नहीं था इसलिए चार दिनों बाद ही उसे जाना था ससुराल.. जब वो मायके आई थी तो मैं उससे मिलने गई थी कितनी चहकती हुई सी लगी थी ज्योति.. चमकता चेहरा दमकता सिंदूर उसका लाल सलवार सूट और भरे-भरे हाथों में लाल चूडा ..जी कर रहा था नजर उतार लूं उसकी ..बहुत खुश थी..! अभी तो जी भर के अपने पति के साथ भी नहीं रह सकी थी वह ..मुझसे काफी हिल मिल गयी थी..बोलती थी- "भाभी बस 4 दिन की चांदनी थी पांचवें दिन यहां चली आई ..आपकी याद में जो आ रही थी..." कहके खिलखिलाती हुई गले लग गई मेरे ..फिर पूरी प्लानिंग बताने लगी कि कहां घूमने जाएगी वह क्या होगा वगैरह-वगैरह 9 फरवरी को उसकी विदाई हो गई 10 की सुबह वे हनीमून पर निकले और 14 को वापस लौटे ..! 14 फरवरी की सुबह उसने मुझे फोन किया था.." भाभी उन्होंने मुझे वैलेंटाइन डे का गिफ्ट दिया है ..सुन्दर सी कार .." शाम को हम घर आ रहे हैं आज आप को इनसे मिलवाऊंगी आपको "मैंने भी उससे बातें करके फोन रखा शाम होने को आई किंतु ज्योति अभी तक नहीं आई थी उसके घर की लाइट भी बंद थी ..मैं काम अवश्य कर रही थी किंतु मेरा मन ज्योति में ही लगा था खाना वगैरह बना कर मैं जल्दी-जल्दी अपने कमरे में गई और ज्योति को फोन लगाने लगी ,उसने फोन नहीं उठाया हार कर मैंने फोन रख दिया सोचा हो सकता है कोई दूसरा प्लान बन गया हो बाद में दूसरे दिन सुबह मैंने आंटी के घर के बाहर थोड़ी भीड़ देखी मेरा दिल दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा मगर दूर से कुछ समझ नहीं आ रहा था तभी मोहल्ले की एक औरत किसी से बात करती हुई मेरे गेट के सामने से निकली ''अभी शादी को कितने दिन बीते थे ..बेचारी कुल 15 दिन में ही उसका सुहाग उजड़ गया ..!" यह सुनकर मेरे पांव के नीचे से जमीन खिसक गई मैं विश्वास नहीं कर पा रही थी कि जो सुन रही हूं यह सच है या फिर मेरे कानों का धोखा हे ईश्वर यह अनर्थ हो गया ..! लोगों की संवेदनाएं इस दुख की घड़ी में गोयल परिवार के साथ अवश्य थी किंतु मैं स्वयं हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी ..की उनका सामना कर सकूं , तभी मैंने पास खड़ी एक महिला को बात करते हुए सुना कि " ज्योति की सास ने बाल पकड़कर खींचते हुए उसे बाहर निकाला घर से ..' कुलच्छिनी खा गई मेरे बेटे को ..!" बहुत ही गलत हुआ उसके साथ .." ..इतनी सुंदर सुशील संस्कारी लड़की थी बेचारी एक और महिला ने कहा "ज्योति को लेकर आ रही है मिसेज गोयल ...! वे आपस में बातें कर रही थी और मैं बीते हुए वक्त में पहुंच गई थी उस चेहरे को याद कर रही थी की उस दिन वो कह रही थी कि "भाभी बस 4 दिन की चांदनी थी ..!" अनजाने में क्या कह गयी थी वो..।भारी मन से मैं घर वापस आ गई थी सब कुछ छोड़कर लेट गई और सोचने लगी कितनी चुलबुली थी ज्योति, मेरी हर नई साड़ी कैसे पहनती थी और कहती कि "भाभी बस शादी हो जाने दो फिर देखना मेरा फैशन .."और ईश्वर ने ये क्या कर दिया उसके साथ..! अभी तो उसके सजने-संवरने के दिन थे तभी मेरी सास ने आकर कहा की बहू देख ज्योति आ गई हमें मिलना चाहिए उससे चल मैंने कहा "आई माँजी " और गोयल आंटी के घर की तरफ बढ़ी है मुझे लग रहा था कि मैं उस अभागी का सामना कैसे करूंगी ? क्या कह कर छेड़ूँगी उसे ? क्या दिलासा दिया जाएगा ? उसके यह ताजे जख्म कैसे भर सकेंगे ? उफ्फ मेरी तो हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी ...अंदर से रोने की आवाजें आ रही थी ,कि दरवाजे के भीतर प्रवेश करने पर मैंने देखा .. ज्योति ने नारंगी बंधेज की मारवाड़ी साड़ी पहनी थी भरे भरे हाथों में अभी मेहंदी पूरी तरह से नही छूटी थी..हाथों में लाल चूड़ा और पाँव में महावर..मेहंदी और महावर ने पांवो में चढ़ी हल्दी की पीत आभा अभी तक त्यागी नही थी... उसके खुले हुए बाल उलझे और रूखे से हो उठे थे मांग में अभी भी पीला सिंदूर चमक रहा था , वो जैसी थी वैसी ही चली आयी थी और उसकी आंखों में चिर विरहन का उजड़ा हुआ रूप था..उफ्फ मार्मिक दृश्य , असहनीय..! मैं चुपचाप कमरे के एक कोने में बैठ गयी थी..! मिसेज गोयल दहाड़े मार कर रो रही थी, कि हमारी बेटी का तो जीवन ही बर्बाद हो गया..हमें पता होता तो हम अभी इसकी शादी ही नही करते ..अभी उम्र ही क्या है हमारी ज्योति की... " किन्तु ज्योति की आंखे सूखी हुई , किसी निर्विकार शून्य में गुम थी..! चेहरे पर न दुख था, न आँखों मे आंसू ..बस एक भाव था हैरत का .., मानो वो खुद से पूछ रही हो की "ये कैसे हो गया ?"
उसकी नई कार में बैठ कर जब ,वो लोग मायके आने के लिए निकले तभी गाड़ी को बैक करते वक़्त एक ट्रक ने करारी टक्कर मार दी ..दीपक तुरन्त ही निष्प्राण हो गया था जबकि ज्योति के माथे पर चोट आई बस ..मौत शायद किसी न किसी बहाने ही आती है और वही हुआ था..।
धीरे धीरे वक़्त बीतने लगा था मैं रोज ज्योति के पास जाती और उससे बातें करती , पर वो हां हूं कि अलावा कुछ नही बोलती थी.."उसने खुद को कठोर बना लिया था ,और 23 वर्ष की आयु में ही वैधव्य के दंश को झेलने हेतु तत्पर थी..। एक दिन ज्योति की डायरी मिली मुझे जिसमे उसने एक कविता लिखी थी

'सात जन्म का साथी '
"क्यों रूठ गया मुझसे
क्या हुई थी खता
क्यों छोड़ गया ऐसे
कहते हैं सात जन्म साथ रहते हैं
ये सात फेरों के साथी..
फिर क्यों अलग हुई
दीपक से ज्योति की बाती..
क्यों अलग हुए हम
क्या उसके करम थे ?
क्या न मिलेंगे हम
ये हमारे आखिरी जनम थे ?"

- दीपक की ज्योति(जो बुझ चुकी है ..!)

मैं समझ गई थी की अब ज्योति दीपक का स्थान किसी को नही दे सकती...! सवा माह ही बीते थे कि , एक दिन जब मैं उसके घर गयी तो वहां पर गोयल आंटी कुछ समझा रही थी और ज्योति बैठ कर रो रही थी..!तब ज्योति ने रोते रोते , मुझे खुद के गर्भ से होने के विषय मे बताया ..आंटी चाह रही थी कि , वो गर्भपात करवा ले, और दूसरी कहीं जगह उसकी शादी की जा सके, किन्तु ज्योति दीपक की इस आखिरी निशानी को कतई नही खोना चाहती थी..एक माँ की निगाह से देखो तो न आंटी गलत थी न ही ज्योति..। ज्योति अपने फैसले पर अडिग थी ..कुछ दिनों तक सबने उसको बहुत समझाया पर वो कुछ समझना नही चाहती थी..! और दीपक की आखिरी निशानी को दुनिया मे लाने के लिए, वो आंटी के साथ शायद किसी अन्य शहर चली गयी ..कुछ दिन तक तो उसने मुझे हाल खबर भेजी पर उसके बाद , क्या हुआ ..उसकी क्या सन्तान हुई कुछ नही पता मुझे ..! और आज यूँ मिल गयी मॉल में घूमती हुई ..सबसे बड़ी बाद इतनी खुश लगी वो ..!
*******
इतनी देर हो गयी अभी तक ज्योति नही आई , सोचकर मैंने अपने घर का दरवाजा खोल कर गोयल आंटी के मकान को ओर देखा ..! वर्षों बाद उनके घर की लाइट जल रही थी ..उत्सुक मन से मैं वहीं खड़ी उसका इंतेज़ार कर रही थी ..तभी गेट खुला और सामने से ज्योति एक प्यारी सी बच्ची और बेटे को लेकर मेरी ओर आती दिखी ..!
"देखा भाभी! कहा था न मैंने की शाम को मिलती हूं आपसे ..और देखिए अपनी फौज के साथ आ गयी आपसे मिलने .."
हां ज्योति तू तो सपना हो गयी थी मेरे लिए ..तुझे नही पता आज मैं कितनी खुश हुई ..एक तो तुझसे मिलने की खुशी और दूसरी तुझे खुश देखने की ..!
हां भाभी जानती हूं ..दरअसल मैं भी सिर्फ आपसे मिलने की बेताबी से भागी आयी ..जब मैने प्रकाश को आपके बारे में बताया तो वो तुरन्त मुझे यहां लेकर आए .!
बच्चो को बुलाकर मैंने उसके बेटे के साथ खेलने में लगा दिया ..और ज्योति को चाय पानी देकर ,अधीरता से उसका हाथ हाथों में लिया और बोली अब बता कैसी है तू ?
मैं ठीक हूं भाभी ..जब यहां से गयी तो कोई सहारा नही था , पापा की पेंशन के अलावा , पर वो भी तब तक जब तक मम्मी के साथ हूं .. मैंने समय के सदुपयोग के लिए बच्चो को ट्यूशन पढाना शुरू कर दिया , वक़्त आने पर मुझे दीपक की निशानी मिल गयी ..मानो दीपक खुद मेरी गोद में आ गए हों ..वैसी ही मुस्कान, वैसी ही हरी आंखें ..! मैंने भविष्य की सोच , नर्सिंग की ट्रेनिंग की , देखते देखते तीन साल बीत गए , मैंने एक हॉस्पिटल में जॉइन भी कर लिया , बस इसी तरह जिंदगी चल रही थी ..।
बहुत अच्छा , मैं बहुत खुश हूँ तेरे लिए ..पर प्रकाश ? वो कैसे मिले तुझे ? ...वो तो एकदम दीपक जी जैसे हैं ..उनके बारे में बता न कुछ !
और ये गुड़िया तुम्हारी और प्रकाश की बेटी है ? मैंने बिटिया का गाल छूकर पूछा..
नही भाभी इसी ने तो मुझे प्रकाश से मिलवाया , ये प्रकाश की बेटी है ,इशु ..जिस हॉस्पिटल में मैं जॉब करती थी वहीं ये पैदा हुई थी ..बच्ची के जन्म के तुरन्त बाद उसकी माँ की ओवर ब्लीडिंग के कारण मौत हो गयी ..! उस रात मेरी ही ड्यूटी थी..जब बच्ची बहुत रो रही थी तब मैंने ही उसको सम्हाल रखा था ,बच्ची की हालत नाजुक थी इसलिए ये हॉस्पिटल में एडमिट कर ली गयी थी .. उसकी माँ का शव लेने जब इसकी फैमिली आयी तो पिता के स्थान पर हस्ताक्षर करते हुए शख्स को देख मुझे चक्कर आने लगे ..मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नही हुआ ..उफ्फ वही चेहरा , वही मुस्कुराहट , वैसा ही रंग , वैसे ही बाल बस फर्क था तो आंखों का ..प्रकाश की आंखें दीपक की आंखों सी ..हरी नही थी ..काली थी ..। मैंने किसी तरह खुद को संयत किया और ये बात किसी को जाहिर नही की ..! मैं उनसे बात करने में कतराती थी पर उनकी बेटी अब साल भर की होने को आई थी पर वो अक्सर बीमार रहती और वो उसको लेकर हॉस्पिटल आते..! एक दिन मैं ड्यूटी पर नही थी ,और इशु किसी के हाथ से इंजेक्शन नही लगवाती थी , तो हार कर प्रकाश इसको लेकर मेरे क्वार्टर पर आए, चिराग ने दरवाजा खोलते ही कहा " अरे मम्मी देखो पापा आ गए ! " और प्रकाश से लिपट कर रोने लगा ,मैं बुरी तरह डर गई कि अब क्या होगा, मुझे प्रकाश को सब कुछ बताना पड़ा , मम्मी ने भी दीपक की तस्वीर उसको दिखाई ..प्रकाश सब समझ गए... मेरा उनसे इस तरह कतराना भी ..! तभी इशु इंजेक्शन लगते ही नींद से जागी और मुझे देखते ही मेरी गोद मे आने को मचलने लगी ..! मैंने इशु को चिपका रखा था और चिराग रोते रोते प्रकाश की बाहों में सो गया था ..! मम्मी चिराग और ईशु दोनो की हालत देखकर अंदर चली गयी ..! समय बीतता गया आज तक उनकी बेटी को ये नही पता कि मैं उसकी माँ नही हूं ..! और ये मेरा बेटा है चिराग ..! मेरा चिराग जिसे जलते रहने देने के लिए मैंने अपनी जिंदगी को अंधेरों में कैद करना चाहा था ..! उसकी खातिर ही प्रकाश के उस चेहरे को मुझे रोज देखना पड़ता है जो मेरा दीपक नही है बस उसकी आकृति है।
पर प्रकाश के आने के बाद मेरी जिंदगी में उजाले आ गए हैं..एक जीने की वजह है ..हालांकि हमने शादी नही की है हम बच्चों की खुशी के लिए दोस्त बनकर साथ रहते हैं ..मेरे बेटे को उसका नाम और पिता का साया मिल गया है और इशु को माँ की ममता की छांव ..! बस इतनी सी ही कहानी है ....अरे ये क्या आप तो रो रही हैं ? ज्योति ने मुझे देखकर कहा
ज्योति की बातें सुनती हुई मैं भावुक हो उठी थी ..एक शब्द भी नही बोल सकी .. "बहुत अच्छा किया तुम दोनों ने" ..सिर्फ इतना बोलकर मैंने अपने मनो भाव छिपा लिए ..!
ज्योति ने अन्य बातें कर मुझसे विदा ली ..अगले दिन वो वापस चली गयी ..उसके जाने के बाद भी मैं उसके ही विषय मे सोचती रही ..! मन उधेड़बुन में रहा ..इस बार ज्योति को खत लिखना बेहद जरूरी था ..जो मैंने लिख ही डाला पूरे अधिकार के साथ ..!
मेरी प्यारी ज्योति ..
सदा खुश रहो ..! तुम्हारी जिंदगी में हमेशा खुशियां अपनी रौनक फैलाती रहे ..! तुम जैसी बहादुर लड़की मैंने आज तक नही देखी ..पति के जाने के बाद भी तूने अपनी हिम्मत नही हारी ..दीपक की आखिरी निशानी को दुनिया मे लाकर तूने एक माँ और एक पत्नी का फर्ज अदा किया ..! अब बारी है एक बेटी का फर्ज अदा करने की ..प्रकाश बहुत सुलझा हुआ लड़का है ,और मैंने उसकी काली आँखों मे , उन हरी आंखों सी चाहत देखी है ..! जाने तूने अब तक कैसे नही देखी ..उसकी बेटी को सीने से लगा कि रखने वाली स्त्री के लिए उसके मन मे सिर्फ सम्मान तो नही हो सकता ..कहीं न कहीं प्रेम का अंकुर भी अवश्य फूट चुका है वरना वो अब तक तुझ संग ये बेनाम रिश्ता क्यों ढो रहा होता..किसी अच्छी सी लड़की को देख घर नही बसा लेता अपना? आंटी के मन को समझ ,उन्हें भी अपनी बेटी के बसे हुए घर को देखने की चाहत होगी ..मेरी बातों पर गौर करना ..मैं जानती हूं , और मैंने तेरी वो डायरी भी पढ़ी थी ,जिसमे तूने दीपक के लिए " सात जन्म का साथी " करके कोई कविता लिखी थी ..जब दीपक तेरी जिंदगी को गुमनाम अंधेरों में छोड़कर चला गया तब क्या प्रकाश ने तेरे अंधेरे रास्तों पर उम्मीदों की किरण नही दिखाई ? तेरे सूनेपन में बारिश की फुहारों सी शीतलता नही दी ? क्या जब चिराग उसको पापा कहता है तब तुझे खुशी नही मिलती ? क्या वो इस जन्म में तेरा साथ देने के लिए ईश्वर द्वारा नही भेजा गया है ? एक बार ठंडे दिमाग और शांत मन से सोच ..और फिर बता ..क्या आजीवन यूँ ही दोस्त बन कर रह सकोगे तुम दोनों ? जिंदगी की गाड़ी को चलाने के लिए ,प्रेम की डोर का होना बहुत जरूरी है ..तुम दोनों अपने बच्चों की खुशी के लिए नही ..अपनी खुशी के विकल्प के रूप में भी एक दूसरे को जरूर देखना ..! एक बार जो अनहोनी हो गयी उसको जीवन भर ढोती रहेगी तू ? मैं चाहती तो तुझे फोन करके या उस दिन ही तुझसे ये बातें कह सकती थी पर लिखी हुई बातें सीधे दिल की गहराई मे उतर जाती हैं जैसे तेरी लिखी वो कविता मेरे दिल मे उतर गई थी और हां...एक बात और मुझे कोई अधिकार तो नही ..पर अगर तुझे मेरी बात थोड़ी भी सही लगे तो इशु का नाम रोशनी रख देना ,और प्रकाश के बारे में जरूर सोचना ..याद रखना अनकही, और बिना लिखी बातों को याद रखना आसान नही , तो जो जिंदगी तेरे हाथ की लकीरो मे ईश्वर ने कभी लिखी ही नही थी ..उनको संजोने की गलती मत कर ..एक नई रोशनी भरी राह तेरा इंतज़ार कर रही है सात फेरों का साथी यदि बीच राह में छोड़कर चल दे ,तो क्या दूसरा कोई व्यक्ति उन अंधेरी राहों में रोशनी नही बिखेर सकता ? क्या वास्तव में वो सच्चा सात जन्म का साथी नही कहलायेगा ? तुम्हारे निर्णय की प्रतीक्षा में
तुम्हारी भाभी
-सावी
इसके कोई हफ्ते भर बाद उसका फोन आया..ज्योति ही थी ..उसने कहा " भाभी 15 तारीख को रोशनी का दूसरा जन्मदिन है ..! आपकी बात मान ली है मैंने हमें आपका आशीर्वाद चाहिए और आपको आना ही होगा..! " उसकी आवाज की खनक और अधिकार की लय बता रही थी कि , उसे सात जन्म का साथी का मर्म समझ लिया है,मन ही मन उसे ढेरों आशीर्वाद देती हुई मैं खुशी में बस इतना ही बोल पायी " हां हां क्यों नही ! बस तू हमेशा खुश रह ..मैं जरूर आऊँगी ,आज ही तेरे भइया से बोलती हूं कि मेरा टिकट करवा दें। "
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कविता जयंत श्रीवास्तव