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फ्यू -फाइन्ड इटर्निटी विदिन - क्योंकि लाइफ की ऐसी की तैसी न हो - भाग-7

51) जब हमारा जन्म होता है, तब हमारे बाल सफेद नहीं होते हैं और न ही हमारा शरीर पाँच या छह फुट लम्बा होता है। शरीर के ढांचे की तरह इस दुनिया की प्रत्येक वस्तु परिवर्तन के आधीन है। जो बदलती नहीं है, वह सत्य नहीं है, स्पष्ट नहीं है। कई व्यक्तियों को अलग-अलग स्थितियों के साथ स्वयं का तालमेल बैठाने में तकलीफ होती है। रोज रात्रि में जिस बिस्तर पर लेटकर सो जाते हैं, सुबह वह बिस्तर और वह जगह न मिले तो तब कई लोगों की नींद हराम हो जाती है। यह लेखक ऐसे कई लोगों को जानता है, जिन्हें भोजन करते समय रोज आलू की सब्जी चाहिए। आदत को समयानुसार बनाए रखना दूसरी बात है। यह इंसान की विशेषता है। कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है, जो हमारी अपेक्षा से विपरीत व जटिल होती है। ऐसी स्थिति में सामंजस्य करना आना चाहिए। इतिहास बताता है कि गरीब व्यक्ति जब अमीर हो जाता है, तो उसे नयी परिस्थिति के साथ ढलने में कम समय लगता है, जबकि समृद्ध व्यक्ति यदि रातोरात गरीब हो जाए तो उसकी हालत खराब हो जाती है। इसका कारण शायद यह हो सकता है कि मनुष्य जो बदलाव चाहता है, उसे स्वीकार करने में वह तत्पर रहता है। इसी वृत्ति के कारण अनचाही परिस्थिति में टिकना मुश्किल हो जाता है। मुंबई की सामान्य ठंड में थर-थर काँपता व्यक्ति हाईकिंग पर जाता है तो हिमालय की अतिशय शीत को भी वह आसानी से सहज कर लेता है। सार यही है कि जिस स्थिति को मन से स्वीकार कर लेंगे तो वह स्थिति सहनीय लगेगी। परिवर्तन के बोझ को मौज समझना आरम्भ कर देंगे तो जिंदगी की समस्त समस्याएँ आने के पहले ही तिरोहित हो जाएंगी।

52) मन की भड़ास निकालना आसान है। लोकल ट्रेन में, कॉफी हाउस में, उड़पी होटल में, ऑफिस में, पान की गुमटी पर, पार्टी में... जहाँ भी मौका मिले हम सब भ्रष्टाचार की निंदा करते रहते हैं। फिर जरूरत होने पर किसी की जेब गर्म करने में हमें जरा भी शर्म नहीं आती है। भले आदमी, क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि आपके इस प्रकार के सुकृतों के कारण ही शायद भारत में भ्रष्टाचार ने अपने पैर फैलाए हैं? समुद्र के किनारे पर आती एक-एक तूफानी लहर मूल रूप से तो समुद्र के बीच शांत पानी में ही आकार लेती है। यह सही है कि भ्रष्टाचार का उन्मूलन सहज नहीं है। लेकिन यह भी सही है कि अच्छे काम वैसे भी कहाँ आसान होते हैं। नाममात्र के कष्ट उठाकर किये जाने वाले छोटे-छोटे कामों के लिए रिश्वत देकर उन्हें झटपट करा लेने की मानसिकता को बदला जा सकता है। उदाहरणार्थ ड्राइविंग लाइसेंस, फिल्म की टिकट आदि। बुखार आए तो दो दिन में स्वस्थ हो सकते हैं, लेकिन यदि मलेरिया हो जाए तो धैर्यपूर्वक इलाज करवाना पड़ता है। उसी प्रकार भ्रष्टाचार के रोग से भी धीरजपूर्वक धीरे-धीरे मुक्ति प्राप्त करनी पड़ेगी। हम सबको स्वयं से ही शुरुआत करना चाहिए। एक समय ऐसा आएगा जब यह परिवर्तन चारों ओर फैल जाएगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो शायद हमारी संतानों को सूरज की धूप के लिए व चन्द्रमा की चाँदनी के लिए भी रिश्वत देनी पड़ेगी।

53) शहर की व्यस्तता की मर्यादा में जी रहे हम लोग कभी भी अमर्यादित होकर नहीं जी सकते हैं। सुबह से शाम व रात्रि से मध्यरात्रि तथा मध्यरात्रि से फिर ऊषा काल तक भी मजदूरी करूँ, तब भी जिंदगी सुख का प्याला नहीं बन सकती है। शहर की लाईफस्टाईल पर खीजना हमारा स्वभाव है। इसके बावजूद गाँव में जाकर यदि वहाँ एक सप्ताह ही गुजारना हो तो हम परेशान हो जाते हैं। भले आदमी हो, तो सब कुछ आपको कहाँ मिलेगा? हर दिन को खुशनुमा बनाने के लिए आपको तमाम परिस्थितियों को सम्पूर्ण रूप से स्वीकार करना ही होगा। हलके हाथों से सहलाओ तो प्रत्येक दिन एक उत्सव है। असंतोष की लकड़ी लेकर यदि खुद को फटकारते रहोगे, तो कभी भी प्रफुल्लित नहीं रह सकोगे। प्रत्येक दिन को आनन्दप्रद बनाने के लिए, एक बात याद रखें कि सुबह का शृगांर होना चाहिए। यदि आप अनुभव करेंगे कि आज का दिन आनन्द व मौज का दिन है, तो आपको कुछ नकारात्मक पहलू भी सकारात्मक दिखने लगेंगे। आपकी मेहनत के पसीने को आदर से सलाम करने की आदत शहरी दिनों को नहीं होती हैं। लेकिन आपको अपनी मेहनत से ही आनन्दित होना है। इस छोटी-सी जिंदगी का एक और दिन जेब में हाथ डाले-डाले निकल जाए, उसके पहले ही उसे खुमारी व खुशी से स्वीकार कर लें।

54) पड़ोस की लीलाजी के घर जबसे माइक्रोवेव ओवन आया है, तबसे कमलाजी सदैव तनाव में ही रह रही हैं। लीलू के यहाँ ओवन आ गया और मेरे घर में अब तक वॉशिंग मशीन भी नहीं? कमलाजी के यहाँ ओवन जरूरी नहीं है, लेकिन उन्हें लीलाजी के संसार के साथ कदम मिलाए रखना बहुत जरूरी है और यदि सम्भव हो तो उनसे भी आगे निकल जाएँ, जो उन्हें पसंद है। देखा-देखी का हमारा स्वभाव हमें सदैव तनाव में रखता है। पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में आकर हम सबने भौतिक सुखों के पीछे दौड़ना शुरु कर दिया है। सुकरात एक बार बाजार में एेसे ही घूमने के लिए निकल पड़े और उनकी नजर वहाँ ऐशोआराम की वस्तुअों पर पड़ी। उन वस्तुओं को देखकर सुकरात ने तब उपरोक्त वाक्य बोले थे। सुकरात का यदि आज के माहौल में अवतरण हो और शॉपिंग सेंटर में मिलती एक करोड़ की लक्जरियस वस्तुएँ देखें तो शायद वे बेहोश हो जाएंगे। आवश्यकताओं के गुब्बारे में हम अनावश्यक हवा डाल-डालकर उसे फुलाए रखते हैं। इसका क्या अर्थ है? जिनकी जरूरत वास्तव में हमें है, उतनी वस्तुएँ हमारे पास हों, यही पर्याप्त है। उससे अधिक यदि कुछ मिले तो उसे हमारा सौभाग्य समझें और यदि नहीं मिले तब? आसान है, पागल की तरह तनाव में रहने के स्थान पर सन्त नरसिंह मेहता की तरह बोलना चाहिए “भलुं थयुं भांगी जंजाल’’ अर्थात अच्छा ही हुआ सब जंजाल समाप्त हो गया। सुख तब स्वतः ही उभर आएगा।

55) एक समय ऐसा था कि रोज सुबह जब अखबार देखते थे, तब उसमें पहले यही मालूम करते थे कि आज पंजाब में कितने मरे? मृतक की मौत के प्रति मलाल होना तो दूर, हमें उनके लिए थोड़ी-सी अनुकम्पा जागृत नहीं होती थी। अब पंजाब के आँकड़े तो नहीं आते, लेकिन जमाने में हो रहे अनाचार के प्रतिबिम्ब के समान लूट, खून, चोरी, बलात्कार जैसे ढेरों समाचार हम रोज पढ़ते हैं। हम इंसान अपनी इंसानियत गँवा चुके हैं। जीने का यह अर्थ नहीं है कि ऑलप्रूफ होकर हम दिन फिर महीने और फिर वर्ष वैसे ही खर्च कर दें। जीने का अर्थ है, भावनाओं को जीवंत रखते हुए जीना। घर के व्यक्ति के प्रति सौ प्रतिशत स्नेह है, तो यह बहुत अच्छी बात है। अनजान व्यक्ति के लिए कोई अनजाने हैं, उसी प्रकार आप भी कई व्यक्तियों के लिए अनजाने हैं। आज कोई अन्य तकलीफ में है, लेकिन कल सम्भवतः आपको किसी की मदद की जरूरत पड़ सकती है। मानव की पहचान दिलाने के पश्चात् कवि कहता है कि मानव को दें, उसका इतिहास, उसका उफनता हास्य और उसकी प्रफुल्लित श्वास।

56) हर कोई सुन्दरता का चाहक होता है। लेकिन उन्हें चाहक नहीं भोगी कहा जाता है। सौंदर्य को समझने और उसे देखने के लिए खास नजर होना जरूरी है। तब उसके लिए खुद सुन्दर बनना जरुरी है। इंसान के मन में आने वाले अनेक कुविचारों के कारण इंसान सुन्दरता का आनन्द प्राप्त नहीं कर पाता है। मानव पर प्रकृति ने यह एक बड़ा उपकार किया है कि उसने जिसका भी सृजन किया है, वे सब अपने ढंग से सुन्दर हैं व मनोहर हैं। मानव अनेक प्रकार के राग-द्वेष, ईर्ष्या, जूठ, वासना आदि दुर्गुणों से जब भरा रहता है, तब वह जिसे भी देखता है, वह उसे कुरूप ही दिखाई देता है। एक छोटे से पत्थर में या अंधकार में भी सौंदर्य होता है। सागर में ज्वार-भाटे के समय लहरों में जो सौंदर्य छिपा होता है, वह सौंदर्य सागर में तूफान के आने के समय भी होता है। उसका कारण इतना ही है कि तूफान के स्वरूप को पहचानकर, उसे मान्यता प्रदान कर यदि उसे स्वीकार कर लें, तो तूफान भी सौंदर्य से भरा हुआ लगता है। इसलिए सौंदर्य प्राप्त करने के पहले सौंदर्य बनना पड़ता है।

57) हर उम्र का अपना एक तकाजा होता है, और वह अपने साथ कुछ निश्चित स्वभाव लेकर आता है। बचपन में जो गोटियाँ, गिल्ली-डंडा, माचिस-सिगरेट के खोखे, फिल्म के छोटे पोस्टर्स जैसी चीजे प्रिय लगती हैं, वहीं यौवन के आगमन पर घूमना-फिरना, खाना-पीना, नाचना-कूदना और व्यवसाय में जोखिम उठाना जितना अच्छा लगता है, वह वृद्धावस्था में उतना प्रिय नहीं लगता। वृद्धावस्था में सब कुछ अर्थहीन लगता है, यहाँ तक कि जीना भी असार लगता है। ईश्वर व प्रकृति की सर्वोपरिता उस समय मानसपटल को अपने नियंत्रण में ले लेती है। समय के साथ आवागमन करने वाली इस मानसिकता का हमें मान रखना चाहिए। बालकों की धमाल-मस्ती को बड़ों द्वारा कभी सिरदर्द समजने की भूल नहीं करना चाहिए। युवाओं को भी वृद्धों के प्रति उचित सम्मान देने की भावना विकसित करनी चाहिए। यदि इतनी समझ भी स्थापित हो जाए तो घर की चारदीवारी में उत्पन्न होने वाली कई समस्याएँ अदृश्य हो जाएंगी। एक बात याद रखें कि मानव मात्र की अकल को भी उम्र के स्वभाव का एक आधारभूत आवरण ही समझे। यह आवरण अर्थात् जीवन जीने का मूल साधन। यह कभी शरारती है, कहीं निरंकुश, कहीं गम्भीर, कहीं शांत और कहीं परिपक्व है।

58) शायद इस दुनिया में ऐसा व्यक्ति मिलना मुश्किल है, जिसे अपने बचपन के साथ प्रेम न हो। बुद्धि की धरती पर समझदारी के अंकुर फूटे और फिर उसमें जवाबदारी के पत्ते पनपें, तब तक की जिंदगी अर्थात बचपन की जिंदगी ईश्वर की हमें एक अमूल्य देन है। जगत का कोई भी सुख बचपन के सुख के समक्ष तुच्छ है। उन दिनों की निर्दोषिता, उन दिनों का उल्लास बाद में फिर जिंदगी में कभी नहीं मिलते हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बचपन का वास्तविक मूल्य हमें बड़े होने के बाद ही समझ में आता है। लेकिन तब हमारे पास ऊपर लिखी पंक्तियों या ऐसी ही कुछ उक्तियों को गुनगुनाने के अलावा दूसरा कोई मार्ग बचता नहीं है। बचपन का मूल्य ठीक से समझने के पश्चात् हमारे पास एक करने लायक काम फिर भी बचता है। अपने बच्चों के नयी पीढ़ी के बच्चों के बचपन को यादगार बना देने का उसे सुन्दर, मोहक व आकर्षक बना देने का काम। जो माता-पिता अपनी संतानों के बचपन को यदि अनमोल नहीं बना सकें तो निश्चित ही वे अयोग्य माने जाएंगे। बचपन को सुन्दर बनाने के लिए भौतिक सम्पत्ति की आवश्यकता नहीं रहती है। वहाँ जरूरत रहती है प्रेम की, समय की व समझदारी की। माता-पिता यदि इतना करें तो बालक को उसके टूटे हुए खिलौना और फटे कपड़ों में भी स्वयं को राजा होने का अहसास रहेगा और दुनिया के प्रत्येक बालक को राजा बनने का अधिकार है।

59) किसी मुद्दे को एक निश्चित आकार लेने में एक निर्धारित समय लगता है। इस समयावधि में धीरज रखना ही पड़ता है। सुबह सूरज का आगमन होता है और शाम से पहले उसकी विदाई नहीं होती है। यह सत्य जितना शाश्तव है, उतना ही शाश्वत है जीवन का दोहरा व्यवहार। सुख और दुःख का आना-जाना निश्चित है। फर्क मात्र इतना ही है कि उनके आने-जाने पर हमारा नियंत्रण सम्भव नहीं है और हम यह भी नहीं जानते कि कब सुख छूमंतर हो जाएगा और कब दुःख टपक पड़ेगा। यही अनिश्चितता मनुष्य के जीवन को रंगीन बनाती है और संगीन भी बनाती है। जीवन के मर्म को समजने के लिए इन दोनों स्थितियों का अनुभव जरूरी है। अकेला व मुक्त सुख किसी को मिलना सम्भव नहीं होता है। सुख की मात्रा एक सीमा तक बढ़ सकती है और दुःख की मात्रा मानसिक कमजोरियों के कारण बिना वजह भी असीम बढ़ती रहती है। सुख नहीं घटाया जा सकता है, लेकिन दुःख अवश्य घटाया जा सकता है। कुछ समझदारी से जीवन जिएँ तो जीवन के आनन्द को अधिक आनन्ददायी बना सकते हैं, जिससे दुःख कम कष्टप्रद लगेगा। बदलते समय के साथ बदलते रहें और दुःख की चिन्ता कर दुःखी होने से किसी का भी भला नहीं हुआ है और हमारा भी नहीं होगा। तो फिर जाने दो, क्यों झंझट को अपनी ओर से आमंत्रित करते हो।