महात्मा की खोज में (A horror story) Bhupendra kumar Dave द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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महात्मा की खोज में (A horror story)

महात्मा की खोज में
(A horror story)


‘उठो शिवा, उठो’ यह आवाज सुन मैं एकदम हड़बड़ाकर उठ बैठा। मैं गहरी नींद में था और एक सपना देख रहा था। कहते हैं कि सपने अचानक टूट जाने से वे विस्मृत हो जाते हैं। मैं भी सबकुछ भूल गया। मुझे सिर्फ इतना याद आया कि सपने में कोई महात्मा मुझे पुकार रहा था, ‘उठो शिवा, उठो’। मैंनेे पूछा था कि वे मेरा नाम कैंसे जानते हैं, तो महात्मा ने कहा था, ‘यहाँ जो भी आता है, उसका नाम ‘शिवा’ ही होता है।’
‘पर मेरा नाम सच में ‘शिवा’ है। मेरी माँ इसी नाम से मुझे पुकारती थी,’ मैंने ने कहा था।
‘उठो शिवा, उठो’ फिर वही आवाज आयी थी और मैं उठ बैठा था। मैंने अपनी आँखें मली और बाहर देखा। ऊगते सूरज की किरणें बाहर बिछी बर्फ की चादर पर पसर रही थी और सप्तरंगी होकर बिखर रही थीं। मुझे सामने की ऊँची शिखर से टकराकर गूँजती वही पुकार सुनाई दी, ‘उठो शिवा, उठो’।
यह आवाज सुन अब मुझेे कुछ न सूझा और मैं बाहर आकर देखने लगा। सामने हिमालय मुझे बुला रहा था, शक्ति दे रहा था --- उत्साह से भरे कदम आगे रखने।
मैं आगे बढ़ता हूँ और हिमालय पर लहराती ठंडी हवा मुझेे अपनी गोद में उठा बहने लगती है।
हिमालय की बर्फीली श्रेणियों में अनेक कन्दरायें हैं और इन कन्दराओं में यदा-कदा एकांत में वास करते साधु-संतों की आवाज आने का भ्रम सा होने लगता है। मैंने सुना था कि ये महात्मा सौ-दो सौ वर्ष के होते हैं। वे गुफा में रहते हैं और फल-फूल की खोज में जहाँ-तहाँ विचरण करते दिख भी जाते हैं। कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति उन्हें एक बार देख लेता है तो अपने आप को उसी क्षण से बदला हुआ महसूस करने लगता है। सुना यह भी था कि उनके शरीर से अद्भुत किरणें निकलती हैं जो देखनेवाले की आत्मा को अपने अलौकिक प्रकाश से वशीभूत कर लेती हैं और वह अद्वितीय ईश्वरीय तंत्रा में डूब जाता है।
ये किस्से एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देने योग्य माने जाते हैं। पर कालान्तर मानव जीवन इस चक्रव्यूह में यूँ फँस जाता है कि उसके कदम इन महात्माओं की खोज में निकल पड़ते हैं। मुझे भी लोगों ने इन महात्माओं के बारे में कुछेक अजीबोगरीब बातें बताई थी। मैं इन किस्सों में डूब जाता था। लोग मेंरी हँसी उड़ाते थे। मेरी खिल्ली उड़ाते और मेरी ओर हीनभावना से देखते थे। मैं हताश हो जाता था। सच है, महात्मा का होना और उन पर विश्वास करना और उनको खोज पाने की इच्छा को अपने में प्रबल होते देखना --- जीवन में हताशा के छा जाने जैसा ही तो होता है। परन्तु मैंने तो अपने जीवन में हताशा की पराकाष्ठा को ही मोक्ष मान लिया था। मोक्ष पाने में भी मोह होता है। मोह जब प्रगाढ़ हो जाता है तब मनुष्य अपनी सारी सुध-बुध खो बैठता है। लोग इसे पागलपन कहते हैं। विक्षिप्त बुद्धि के आवरण में एक धुन-सी सवार हो जाती है। मैं महात्मा की खोज में बढ़ता गया।
तब न जाने कितना समय बीत गया, अन्नपूर्णा की हिमाच्छादित पहाड़ियों में घूमते। बर्फ की पहाड़ियाँ विरानी के सिवा अपने आगोश में कुछ रखती ही नहीं। हताश मन जब शारीरिक थकान का हमसफर बनता है तो बुद्धि कुंद हो जाती है। लक्ष्य विलुप्त हो जाता है और कदम लड़खड़ाने लगते हैं, दिशाहीन सफर के।
बेसुध-सा मैं पूर्व में स्थित टीलों की तरफ चल पड़ा जहाँ चट्टानों ने अपने को एक सीढ़ीनूमा आकार में सजा रखा था। मेरा हर कदम अनुभवहीन पर्वतारोही की तरह भटक जाने को कुलबुलाने लगा था। किस चट्टान पर बिछी बर्फ की परत नीचे खींच लेगी, मैं समझ नहीं पा रहा था। अनजाने ही मैं उस दिशा की तरफ चल पड़ा जहाँ चुनौतियाँ देती ढलानें थीं जिनके लिये एकाग्रता व द्दढ़संकल्प की जरुरत पड़ती है। मैंने सुना था कि इस ऊँचाई पर हवाओं का दौर अनिश्चितता भरा हुआ होता है। अचानक तूफान द्रुतगति से आ धमकता है। गरजते खौफनाक तूफान के साथ बर्फीली हवायें अपने आगोश में धुंध छिपा लाती हैं। दिशाभ्रम पैदा करती प्रकृति भयावह हो उठती है और चाबुक की तरह बर्फ की बौछार करती दौड़ने लगती है जैसे दानवों से घिरे मानव के फेफड़े में साँसें अपनी क्रमबद्धता खो बैठती हैं तथा उसकी द्दष्टि अस्पष्ट आवरण में कैद हो जाती है।
तेज हवाऐं पिशाचों की तरह फुफकारने लगती हैं और चहुँओर पसरी खामोशी को अपनी चित्कारों से हताहत करने लगती हैं। खामोशी की मृतप्राय लाशों को कुचलते आगे बढ़ना, घिनौना व भयावह भरा होता है। पर मैं अंधत्व धारण किये तूफान के जबड़े के नुकीले दाँतों पर जख्म भरे कदमों से बढ़ता जाता हूँ। विश्वासघाती चट्टानें आगे बढ़ते कदमों को बेशर्मी से नीचे खींचती जाती हैं। मैं फिसलता --- अंधकूप में गिरा बाहर निकलने का प्रयास करने सख्त बर्फ को खरोंचने लगता हूँ। मेरी हताशा तूफान को और दानवी बना देती है। बर्फ की परतों को समेटता तूफान मुझे जिंदा दफनाने का मजा लेने आगे बढ़ता जाता है।
शनैः शनैः मेरी हथेली को शून्यता अपने कब्जे में लेने लगती है। नाखूनों पर खून जमने लगता है। माँस-पेशियाँ गवाह देने लगती हैं। जिस पत्थर मैं खड़ा था शायद वह भी मेरी हालत देख कँप उठा था। वह मुझे नीचे खींचता, फिसलने लगा। अब मुझे यकीन होने लगा कि मेरे जीवित रहने की कोई गुंजाईश नहीं थी। जिस ऊँचाई से मैं फिसल रहा था, उससे स्पष्ट था कि कुछ ही क्षणों में मौत अट्टहास करती सामने नजर आने लगेगीं।
मेरी दयनीय हालत देख प्रकृति सहम उठी। समय भी मेरी कराह सुन थम-सा गया और प्रकृति के एक इशारे पर हिमस्खलन रुक गया। शोर अचानक थम गया और मेरा मृतप्राय शरीर नीचे एक बर्फीली चट्टान से टिका निर्जीव बुत-सा स्थिर हो गया था।
लेकिन जीवन और मृत्यु का महायुद्ध नहीं थमा। इस युद्ध में सिर्फ एक स्थूल शरीर ही प्रहार सहता है --- वह कराहता है --- तड़पता है --- लहूलुहान हो जाता है। मेरी तो उससे भी बद्तर स्थिति थी। जीवन अपनी अंतिम साँसें गिनने लगा था। शायद मृत्यु भी मेरी हालत देख आहत हो चुकी थी। वह खुद को इसतरह तड़पता देखना नहीं चहती थी। आखिर मृत्यु में भी सहनशक्ति असीमित नहीं होती। कभी कभी वह अपना हौसला खो बैठती है और खाली हाथ लौट जाने पर विवश हो जाती है। हम हिन्दु मृत्यु को यमदेवता कहते हैं। देवताओं में दया का होना जरूरी है।
‘तुम ठीक सोच रहे हो, शिवा,’ किसी ने मेरे दायें कंधे पर अपना हाथ थपथपाते कहा। मेरा नाम महात्मा ही जानते थे, अतः मुझे यकीन हो गया कि वे ही मेरे पास खड़े थे।
‘हाँ, मैं ही हूँ,’ मैंने सुना। पर आवाज की लहरें रुकती कहाँ हैं? वो अद्दश्य होती हैं। कोई नहीं जानता कि वह कहाँ से आती है और किसतरफ जाना चाहती है। आवाज के उद्गम का अहसास तभी हो सकता है जब कहनेवाले के ओंठ हिलते दिखते हैं। मैंने चारों तरफ देखना चाहा। पर पथराई पलकें लाचार थीं, खुल न सकी। शायद मस्तिष्क के संदेश उस तक नहीं पहुँच पा रहे थे। मैंने डाक्टरों से सुना था कि मस्तिष्क सबसे अंत में मरता है। वह अंतिम समय तक मनुष्य को उसकी मृत्य के कष्ट से तड़पाना चाहता है।
मेरी पलकें बिचारी खुलकर करती भी क्या? मेरी आँखें चारों ओर फैले घुप्प अंधेरे में या फिर महात्मा के चकाचौघ कुछ भी न देख पायी। मेरा मस्तिष्क शून्य में निहारता, मुझे अपनी शून्यता का अहसास करा रहा था। तभी किसी ने मेरे हाथ में एक छड़ी थमा दी और कहा, ‘शिवा, इसे पकड़ो और आगे बढ़ो।’
उस छड़ी ने जैसे मेरी हिम्मत जगा दी। एक दिव्य प्रकाश चट्टान की बाईं तरफ चलता नजर आया। उस अंधकार में जैसे ही वह दिव्य प्रकाश मुझे सहारा देती चट्टान के पीछे गया तो मुझे प्रकाश की किरणों के बीचों-बीच वह चट्टान ‘बर्फानी बाबा’ की तरह दिखने लगी। उस प्रकाश से शिवलिंग की बर्फीली आकृति साक्षात् शिव का दर्शन करा रही थी। मेरी आत्मा किं-कर्तव्य-विमूढ़ सी उसे निहारती रही। उस दर्शनमात्र से जैंसे चेतना जाग्रत हो उठी और अचानक अनिश्चिंत अवस्था में भी प्रेरणा के स्त्रोत मुझमें फूटने लगे।
वह प्रकाश-पुंज अचानक चलायमान हो उठा और मुझे दायीं तरफ खींचने लगा। मैं छड़ी का सहारा लिये उसी तरफ चल पड़ा। मुझे सामने बिछी बर्फ पर पैरों की विचित्र आकृतियाँ दिखी, जैसे कोई महामानव उस राह पर चला हो। मैंने सुना था कि हिमालय पर यती ;लमजपए जीम ंइवउपदंइसम ेदवूउंदद्ध विचरण करते रहते हैं। लोग इन्हें ‘महामानव’ भी कहते हैं। कहावत है कि यती हिमालय पर भगवान की रक्षा करने विचरते रहते हैं।
मैं उन पदचिन्हों के सहारे आगे बढ़ने लगा। दूर एक सफेद बुत दिखाई दिया जो रुँएदार लबादा ओढ़े दिख रहा था। यदि वह हाथ-पैर के बल चलता होता तो एक अद्भुत प्राणी-सा लगता। वह कुछ देर बाद हिला और पहाड़ी पर ऊपर चढ़ने लगा। मैं उस भीमकाय यती के पीछे-पीछे चल पड़ा।
आगे एक गुफा-सी देख वह रुका और उसने पलटकर आकाश की तरफ देखा। तब मुझे उसका चेहरा सफेद बालों से करीब-करीब पूरा ढँका नजर आया। बस, सफेद घनी भोंहों के बाहर झाँकती दो आँखें घूरती दिख रहीं थी। ऊगते सूरज की रोशनी में वे अँगारों सी धधकती दिख रहीं थी। उन आँखों की रोशनी के सहारे वह एक अंधरी गुफा में घुस गया। उसकी रक्तवर्ण आँखें गुफा की दीवारों को प्रकाशित करने लगी। मैं उसके पीछे दबे पाँव चल पड़ा।
गुफा की दीवारें उस महामानव की लाल आँखों को प्रतिबिंबित करती असंख्य लाल माणिक-मोतियों सी दमक रहीं थी। गुफा के तल पर बहती जलधारा भी खून की बहती नदी-सी दिखने लगी। उसके छींटों में लसलसाहट थी जिससे मेरे शरीर पर घनौनी छुअन का आभास होने लगा। गुफा के अंदर की घुटन से मेरी साँसें किलबिलाने लगी और सारे बदन पर सिहरन-सी उठने लगी। उस समय यदि वह महामानव पलटकर मेरी तरफ देखता तो मेरे पेरों तले की जमीन खिसक जाती और मैं धराशाही हो जाता। मैंने हाथ से छड़ी कसकर पकड़ ली और द्दढ़ता से आगे बढ़ने लगा।
अब हम गुफा की काफी गहराई में पहुँच गये थे, लेकिन वहाँ से भी गुफा का जैसे कोई अंत नहीं दिख रहा था। अब तो जमीन पर बिछे कंकड़-पत्थर तक दमदमाने लगे थे। मेरी आँखें इस चकाचौध को बरदास्त नहीं कर पा रहीं थी। उस महामानव के हर कदम की आवाज दीवारों से टकराकर भीषण घ्वनि का आकार ले रहीं थी। मैं आगे बढ़ने की हिम्मत हार-सा जाता, पर जब पीछे मुड़कर देखा तो भयावह अंधकार मुझे और भी खुँखार प्रतीत हुआ। मेरा लौटना नामुमकिन हो चुका था।
उस गुफा के अंदर ‘काल’ का वास था और काल का हरइक पल सदियों-सा विस्तृत होता है। मुझे अपना शरीर वृद्धावस्था की गिरफ्त में जकड़ा-सा लगने लगा। हर कदम एक मृत्यु के बाद का पुनर्जन्म का सा कालखंड़ भारी लग रहा था। काल के इस भयावह स्वरूप की कल्पना हम आम आदमी नहीं कर सकते। यहाँ आत्मा द्वारा त्यक्त मृत शरीर चलता नहीं --- मात्र लड़खड़ाता है या यूँ कहिये कि एक ठूँठ पेड़ आँधी का सामना करते समय असहाय-सा अपनी एक-एक जड़ को उखड़ते देखता है --- हर टूटती जड़ असह्य पीड़ा देती अपना संबंध मूल काया से तोड़ती जाती है और हर चरमाराती शाखायें खंड़हर की टूटती ईटों की तरह इमारत की भव्यता को खंड़ित करती भुरभुराकर नीचे बिखरती जाती हैं।
काल की अंधेरी गुफा में हम मानव चलते नहीं हैं --- बस, बहते जाते हैं, उन पत्थरों की तरह जो आपस में टकराते घिसते जाते हैं और अपने स्वयं का आकार बदलते देखते रहते हैं। कालान्तर कुछेक को कोई चिकना पत्थर मिल जाता है और वह उसे उठाकर मंदिर में रख देता है और उसे शिव मान लेता है। यह भाग्य सबको नहीं मिल पाता।
मुझे तो कुछ होश ही न था। ऐसी अवस्था में मानव अपने भाग्य का स्वयं निर्माता नहीं होता। घुप्प अंधकार में कुछ रोशनी हो तो भाग्य चमक सकता है अन्यथा नहीं। आशा में जुगनू की तरह कुछ स्वतः की रोशनी होती है, पर भाग्य कोयले के टुकड़े सा होता है जो हीरा बनने की लालसा में सदियों गहराई में दबा पड़ा रहता है।
यह विचार आते ही मैंने महसूस किया कि मनुष्य विषम परिस्थिति में भी सोचना बंद नहीं करता, बल्कि उसकी सोच उसकी चेतना को सुप्त होने नहीं देती। चेतना कभी मरती नहीं, वह पराचेतना में समाहित हो जाती है, ठीक उसी तरह जैसे आत्मा, परमात्मा में।
मैं अब पूर्णतः घबरा उठा था, पर चेतना के इस आध्यात्म रूप को यादकर प्रार्थना का सहारा पाने की कोशिश करने लगा। पर क्या परमात्मा इस अगम्य गुुफा में आकर मेरी मदद कर सकते हैं?
‘क्यों नहीं! शिवा?’ यह आवाज बाहर से नहीं आयी थी, वह मेरे अंतः से उठी थी।
और तत्क्षण मुझे गुफा की दूसरी ओर से प्रकाश की किरणें अंदर आती दिखाई दी जो कह रहीं थी कि गुफा की दूसरी ओर खुला आकाश है। सूरज की किरणों ने गुफा में प्रवेश कर एक नये द्दश्य को आलोकित कर दिया। भीतर गुफा में एक विशाल कक्ष था और सूर्य की किरणें दीवार पर लगे पत्थरों से परावर्तित हो उस कक्ष को प्रकाशित कर रही थी। मैं एक उभरी चट्टान के पीछे छिप गया।
महामानव जिसे हम ‘यती’ कहते है, अब सामने बिछे मृगछाल पर बैठ गया था। मैं उसे अपलक देखने की कोशिश करने लगा। मैं एक पल भी छूटने नहीं देना चाह रहा था। थकान ने मुझे दबोचना चाहा, पर मन उस अलौकिक मूर्तिस्थ आत्मा को निहारते रहने की पिपासा लिये मुझे सचेत रखने का प्रयास करता रहा।
उस महामानव के ओठ हिले और एक शब्द निकला। ध्वनि की लहरें उठी और भीतरी दीवार से टकराकर प्रतिघ्वनित होने लगी। वह ध्वनि प्रतिध्वनित होती धीरे-धीरे ‘ओम्’ का स्वरूप लेने लगी। ओठ फिर हिले और ‘ओम्’ पुनः प्रतिध्वनित हो उठा। उच्चारित शब्द क्या थे मैं नहीं सुन पा रहा था। मेरा मन वैज्ञानिक प्रयोग करने उतावला हो उठा। मैंने अपनी छड़ी पटककर एक ध्वनि उत्पन्न की। नतीजन ‘ओम्’ की ध्वनि और भी प्रखर हो उठी। महामानव यह सुन विचलित हो उठा और उसकी आँखो से जैसे चिन्गारियाँ निकलने लगी। मैं किसी अनहोनी की आशंका से घबरा गया। महामानव की गहरी साँसें फुफकारती-सी लगने लगी। उसका शरीर एक पारदर्शी कवच-सा हो गया और उसमें सारी माँस-पेशियाँ पिघलने लगी। कब्र से निकली एक खोपड़ी मात्र उसके शरीर से जुड़ी दिख रही थी। उस खोपड़ी के जबड़े से जुड़े दाँत स्पष्ट दिख रहे थे और उसका जबड़ा लगातार हिलता हुआ जोर जोर से ‘ओम’ उच्चारित करने लगा था। ओम् की प्रतिध्वनि उस कक्ष की दीवारों से टकराकर घोर नाद कर रही थी और गहरी साँसों के साथ शरीर का माँस इस तरह से उतर रहा था जैसे फूटी बाल्टी का पानी शनैः शनैः नीचे उतर रहा हो। इस भयानक प्रक्रिया को होते देख मैं भ्रमित हो गया। ‘क्या यह सभव है?’ मेरे मन ने पूछा। महामानव के शरीर का सारा माँस सामने समतल चट्टान पर जमा होने लगा था।
देखते ही देखते सारा माँस उतर गया और पारदर्शी कवच के अंदर उसका अस्थिपंजर-शरीर रह गया जिससे जुड़ी उसकी खोपड़ी की आँखों के खोखले से प्रकाश की किरणें फूट रहीं थी।
शरीर के सारे माँस के ढेर का वह बीभत्स चित्र देख मेरे मुख से चीख निकल पड़ती पर तभी मेरी घिग्गी बंद हो गई। वह बीभत्स द्दश्य और विकराल हो उठा जब जबड़े से खून के फव्वारे उठने लगे और उस महामानव का सारा खून वहाँ रखी चट्टाननूमा कढ़ाई में जमा होने लगा।
मैंने पाया कि अब मेरा बदन बुरी तरह से कँप रहा था। मेरे छड़ी हाथ से छूट गई और घूमती हुई नीचे गिर पड़ी। शुक्र था कि वह महामानव की तंत्रा में दखल पैदा नहीं कर सकी। वह अपनी जगह से उठा और एक नरभक्षी की तरह अपने ही माँस के लोथड़े अपने जबड़े से चबाने लगा। देखते ही देखते वह अपना सारा माँस निगल गया। खुद का माँस खाते नरभक्षी को देख मेरा सिर चकराने लगा।
खोपड़ी पर बने आँख के खोखले से निकलती किरणों ने उस च्ट्टान का बारीकी से निरिक्षण किया जैसे कोई टार्च जलाकर ढूँढ़ रहा हो कि कुछ खाना बच तो नहीं गया है। पूरा मुआयना कर, संतुष्ट हुआ वह अब कक्ष में घूमने लगा।
मैं जहाँ छिपा था, उस ओर वह बढ़ा तो क्षण भर के लिये मैं मृतप्राय हो गया। लेकिन वह मेरे करीब आने के पहले ही रुक गया क्योंकि वहीं पास वही बड़ा कटोरानूमा पत्थर था जिसमें उसका रक्त जमा था। वह उस कटोरे के पास पहुँचा और जानवरों की तरह उस पर छुककर रक्त पीने लगा। उसके जबड़े से जुड़ी जीभ दिख तो नहीं रही थी पर रक्त पीने की ‘लपलप’ आवाज मैं स्पष्ट सुन सका था। जैसे जैसे वह खून पीता जाता, अस्थिपंजर में माँस-पेशियाँ बनती जा रही थी। पूरा शरीर बन जाने पर मैंने देखा कि उसकी लम्बी जीभ अचानक बाहर निकलकर पत्थर के कटोरे को बिल्ली की तरह चट रही थी। उसी लम्बी जीभ को उसने अपने चेहरे पर फेरा और आँखें मय पलकों के पूर्ववत बन गईं। फिर कुछ देर वह उसी जीभ से चाट-चाटकर गंभीरता से अपने पूरे शरीर को व्यवस्थित करता रहा।
पूर्णरूप धारण करने पर उसने साँप की फुँफकार पैदा की और वह चार फुट जीभ उसके ओठों में सिकुड़ती चली गई। अब वह पूर्ववत सफेद घने बालों और झुर्रियोंवाला यती बन चुका था। वह आगे बढ़ा और उसके कदम उसे गुफा के अंतिम छोर पर ले आये। मैं उसके पीछे था। बाहर आते ही उसका वृद्ध शरीर अचानक युवा हो उठा। मैंने भी जैसे ही गुफा के बाहर पैर रखा तो एक भीषण गर्जना के साथ गुफा का वह अंतिम सिरा बंद हो गया। महात्मा की दी हुई छड़ी सदा के लिये मुझसे बिदा हो गई --- बंद गुफा में छूअ गई।
‘यती’ अद्दश्य हो चुका था और मैं भी उस गुफा से बाहर आकर अपने को चुस्त-तंदरुस्त पा रहा था। मेरे चारों ओर बर्फ की बारिश हो रही थी और बर्फीली हवायें पूर्ववत बह रही थी। मैं पर्वत की शिखर पारकर नीचे आ चुका था जहाँ चारों ओर घना जंगल मुझे अपने आगोश में लेने आतुर खड़ा था।
हिमालय की तराई में मुझे वहाँ एक वृद्ध साधु दिखा। मेरी बातें सुनकर उसने कहा, ‘बेटा, जिसे तुमने देखा है वह अनादि काल से हिमालय में भ्रमण कर रहा है। वह यती नहीं साक्षात् यमदेव है। वह एक है --- अजर अमर है --- वह अपने को सदा युवा रखता है। जिसे इसके दर्शन हो जाते हैं वह भी अजर अमर हो जाता है। तुम अब निश्चिंत हो जावो, शिवा।’ इतना कह, वह साधु अद्दय हो गया।
..... भूपेन्द्र कुमार दवे
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