सपने में शिमला अमरदीप कुमार द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सपने में शिमला

"सरला!सरला?"
"हाँ, रवि!किचेन में हूँ।अभी आयी।"
"जल्दी आओ न,कुछ जरूरी बात करनी है तुझसे।"
"हाँ, बोलो।क्या बात है!"
सरला तौलिए से अपना हाथ पोछते हुए आयी और रवि का चेहरा देखकर समझ गयी कि रवि बहुत खुश है।वरना,हर दिन ऑफिस से थका-मारा आता था और पंद्रह-बीस मिनट आराम करके ही बीबी से कुछ बोलता-बतियाता था।बच्चों की खबर लेता था।

"सोचता हूँ न सरला कि हमलोग कुछ दिनों के लिए कहीं घूम-फिर आयें।कल के बाद तो राहुल कि भी छुट्टी हो ही रही है।अच्छा मौका है।"सरला की आँखें आश्चर्य और खुशी से फंटी रह गयी।और होंठों पर सुखद मुस्कान दौड़ गयी।

"अच्छा!कहाँ चलोगे?"

"हमें शिमला या मनाली चलना चाहिए।ज़िन्दगी में एक बार वहाँ नहीं गये तो क्या किया।"शिमला और मनाली का नाम सुनते ही,सरला अपने स्वप्न काल में चली गयी।वह हनीमून के लिए शिमला जाना चाहती थी।उसकी नीलू दीदी शिमला का ख़ूब बखान कर रही थी।सुंदर-सुंदर तस्वीरों से दीदी का अल्बम भरा पड़ा था।उन तस्वीरों को देखकर रोमांच से भर जाना और वहाँ कम-से-कम एक बार घूम आने का सपना देखना हर किसी के लिए मुमकिन है।
 
"अरे कहाँ खो गयी?कहाँ चलें,शिमला या मनाली?"रवि का यह ज़रा जोर से पूछने के कारण सरला कुछ विक्षिप्त हुई पर संभल गयी।सपने से बाहर आ गयी।धीरे से बोली-"तुम जहाँ चाहो।"
"अरे नहीं न सरला;तुम जहाँ कहोगी,वहीं चलेंगे।पूरा परिवार वहीं चलेंगे।मम्मी-पापा को कितना अच्छा लगेगा न?राहुल और रिया तो कभी न भूल पायेंगे इस ट्रिप को।"
"तुम आराम करो।मैं चाय लेकर आती हूँ।"सरला की चाल में खुशी झलक रही थी।बहुत ढूँढने पर दो इलायची मिली।सरला ने इलायची और अपने अतीत के स्वप्न को साथ-साथ चाय में डाला।खुशबू फैल गयी पर चाय बनाने भर के अवकाश में सरला के मन में खर्च के प्रति शंका की एक बहुत पतली रेखा भी खींच गयी।लेकिन,सुख के अनुभव ने उस रेखा को धूमिल कर दिया।
      चाय टेबल पर आ गयी।सबने अपना-अपना कप उठाया।बच्चे खुश हो गए।आज दूधिया रंग गायब था।ऊपर से इलायची की खुशबू।पिताजी बोल पड़े-"आज बहुत बढ़िया चाय बनी है बहू।मियाज खुश हो गया।"सरला की दृष्टि सास की ओर गयी और सास ने भी प्रशंसा की नज़र से देखकर मुस्करा दी।दोनों सास-बहू कम और सहेली ज्यादा थी।दिल्ली एन सी आर में क्या पड़ोसी?किसे फुर्सत और कैसी बातचीत?जो घर में है वही सुख-दुख...।

             राहुल चाय समाप्त करने को था कि अपनी माँ से पूछ बैठा-"हमलोग कहाँ जायेंगे मम्मी?बोलिये न जल्दी।पापा कह रहे हैं कि आप जहाँ कहोगी वहीं जायेंगे।"
"दादा-दादी से पूछो न बेटा।?सब जहाँ जाना चाहेंगे,मेरी तरफ से वहीं के लिए हाँ है।" सरला चाहती तो सास-ससुर से पूछने की जरूरत ही नहीं होती।किंतु,सरला सबको साथ लेकर चलने वाली लड़की है।वह अपने सास-ससुर के साथ ठीक वैसा ही व्यवहार करती है जैसा अपने माँ-पिताजी से करती है।उसके कहने पर ही रवि ने माँ-पिताजी को दिल्ली साथ लाया।वह चाहती तो मंहगाई का बहाना कर के सास-ससुर को गांव में अकेले छोड़ देने के लिए अपने पति को बाध्य कर सकती थी।
         "नहीं,बहू!तुम जहाँ कहो।"पिताजी चुनाव सरला पर छोड़ गए।
"तब ठीक है पिताजी,हमलोग शिमला चलते हैं।"ऐसा लगा जैसे खुशियों की लॉटरी लगी हो।सबलोग एकदम खुशी झूम गये।बड़ों ने मुस्करा कर इजहार किया और बच्चों ने तालियां बजायी।
             खाना खाकर सबलोग अपने-अपने कमरे में सोने चले गए।सासु माँ को नींद नहीं आ रही थी।दूसरे कमरे में सरला भी नहीं सो पा रही थी।सुख के इस अनुभव को खर्च की शंका से दबाना नहीं चाहती थी।और रिया को ख़ुद से चिपका कर सो गई।बच्ची भी माँ में समा गयी हो जैसे।लेकिन,दूसरे कमरे में माध्वी ने अपने पति से पूछा-"ए रवि के पापा,एक बात बताइए कि हमलोग शिमला जायेंगे तो इसके लिए बहुत पैसे चाहिए न?"
       "अरे कितना खर्च होगा माध्वी?अधिक से अधिक पंद्रह-बीस हजार।इतना तो हो जाएगा न,तुम बेकार की चिंता कर रही हो।अरे यही होगा न कि मकान का किराया अगले महीने दिया जाएगा।"
"तो अगले महीने का खर्च कहाँ से आएगा रवि के पापा?"
"अरे माध्वी!तुम भी न बहुत सोचती हो।रवि ने कुछ इंतज़ाम किया होगा।वरना,प्लान बनाता ही क्यों?"
"हाँ, वो तो है।"इतना कहकर माध्वी चुप हो गयी।लेकिन,नींद न आयी।लगभग बीस मिनट हुआ होगा कि माध्वी फिर से बोल पड़ी।"ऐसा क्यों न करते हैं जी कि  हमलोग मना कर दें।अब हमारी उम्र भी तो न रही....क्या शिमला और क्या मनाली!"
   रघुवीर जी न बल्ब जलाया और अपनी पत्नी का सर अपने बाँह पर लेकर,बड़े प्यार से गाल सहलाते हुए कहा-"सोचो माध्वी,हमारी ज़िंदगी अब कितने दिनों की बची ही है।एक तो मैं तुम्हें कहीं घुमा न पाया और दो वक़्त की रोटी के सिवा क्या दे पाया हूँ।कभी-कभी सोचता हूँ तो बहुत अफसोस होता है।अब जब हमारे बच्चे हमें यह मौका दे रहे हैं तो हम मना क्यों करें?हमें अपने बच्चों का हौसला नहीं तोड़ना है।
              चार-पाँच मिनट की चुप्पी के बाद रघुवीर जी फिर बोलना शुरू करते हैं।-"आज के युग में ऐसे बच्चे कम माँ-बाप को मिलते हैं,माध्वी।सोचो न कि हमने रवि को पढ़ाया ही कितना?वो तो किसी तरह ट्यूशन पढ़ाकर-पढ़ाकर कप्यूटर की पढ़ाई पूरी की उसने।उसी के बदौलत ही उसे दिल्ली जैसे मेट्रो सिटी में एक साधारण-सी नौकरी मिल गयी।कम कमाता है लेकिन,हमारी आवश्यकताओं का कितना ख़्याल रखता है।उसकी मेहनत ही तो है जो हमें यहाँ तक लायी है कि हम भी उसके साथ शिमला का सपना देख सकते हैं।"
     पति-पत्नी की आँखे डबडबा गयी।होठों पर एक सुखद अहसास मुस्करा उठा।बल्ब का स्वीच ऑफ...।
             रवि ऑफिस चला गया।इधर सरला कपड़े-लत्ते,जूता-चप्पल,थैला इत्यादि यात्रा का सामान साफ एवं व्यवस्थित करने में दिन भर लगी रही।सास के कई बार कहने पर दोपहर के बाद दो बजे खाना खाया।चार बजे तक राहुल परीक्षा देकर आ गया।सरला इतनी व्यस्त थी कि राहुल से कुछ पूछ भी न पायी।"मम्मी मैं भी आपकी मदद करूँ?मम्मी मेरी साईकल भी ले चलोगी न?राहुल अपनी उम्र के वाला सवाल पूछता जा रहा था।सरला एकदम छोटा-छोटा जवाब दे रही थी।सरला ने राहुल को छुटकी के साथ खेलने को कहा और काम में लगी रही।
          रवि ऑफिस से घर आया।आते ही राहुल दौड़कर हर रोज की तरह पापा की गोद चढ़ गया।रिया रोने लगी।"पापा मुझे भी गोद लो न।आप सिर्फ भैया को प्यार करते हैं।"इतना सुनते ही रवि कुर्सी पर गया और अपने शेर-भालू को गोद में बिठा लिया।
           "पापा जानते हैं,आज न सवाल बहुत कठिन थे।लेकिन,मैंने तो सब चुटकी में कर दिया।एकदम हंड्रेड में हंड्रेड।"राहुल का सर चूमते हुए रवि ने "बहुत अच्छा" कहकर शाबाशी दी।बच्चे अपने पापा से चिपक गए।इतने में राहुल को सबसे जरूरी बात याद आयी।"पापा, मैं तो भूल ही गया था।प्रिंसिपल सर ने पैरेंट्स मीटिंग के लिए बुलाया है।इस बार आप चलेंगें न?रुचि तो कह रही थी कि मैं तो पापा के साथ आऊँगी और अम्मू भी पापा के साथ ही आएगा।"
          रवि को कुछ शंका हुई।आजकल स्कूल में पैसों का खेल जो चलता है।"हो सकता है किसी प्रकार का फीस चुकाना भूल गया हूँ।"एक बार नहीं दो बार दिमाग पर जोर डाला तो पाया कि उसने तो सब फीस चुका दी है।उसे कुछ राहत मिली।
          "ठीक है,बेटा।इस बार पैरेंट्स मीटिंग में आपके साथ मैं ही चलूँगा।"राहुल कुसह हो गया।पापा के गले मे बाँहें डाल कर अपने प्यार का इजहार किया।"आप कितने अच्छे हो पापा।आई लव यू।"
             "ओह हो मम्मी,यह क्या किया आपने?बैग क्यों पैक किया आज?आज तो सिर्फ़ पेरेंट्स मीटिंग है न?"राहुल ने अपनी माँ को बहुत बड़ी गलती का अहसास करवाते हुए कहा।पर,राहुल के कहने के तरीके पर मम्मी को प्यार आ गया।मम्मी भी बच्चा बनने की एक्टिंग करते हुए-"छौली न मेला लाजा बेटा।मम्मा बहुत बली वाली भुलक्कड़ है।"ऐसा कहकर सरला ने राहुल के गाल चूम लिया।राहुल मुस्करा कर पापा के साथ हो लिया।
         राहुल बहुत खुश था।पापा के साथ स्कूल जो आया था।उसके पापा इतने व्यस्त रहते हैं क्या कहना।यह शिकायत उसे पापा से हमेशा रहती थी।ख़ैर, आज कोई शिकायत नहीं है।स्कूल के मुख्य द्वार पर गार्ड गार्ड ने इंट्री करवाई।ऑडिटोरियम हॉल में काफ़ी चहल-पहल थी।राहुल अपने पापा के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गया।बच्चों की महत्वकांक्षा देखते बनती है जब वह अपनी छोटी सी देह को बड़ी कुर्सी पर इस कदर रखने की कोशिश करता है कि उसपे कोई और न बैठे।बच्चों की ऐसी हरकतें किसी के लिए आनंद का विषय होता है।

            पूरा हॉल भर गया।लगभग आधे घंटे बाद सूट-बूट पहना हुआ एक लंबा-चौड़ा शरीर वाला मानव का प्रवेश हुआ।सब उसी की ओर देख रहे थे।उसने बैठने से पहले सबका अभिवादन किया।कुछ औपचारिक कार्य-व्यापार के बाद प्रिंसिपल ने अपनी बात कहनी शुरू की।
               सबसे पहले तो उसने वहाँ बैठे सभी अभिभावकों को बधाई दी।बधाई इस बात की कि उनके बच्चे अगली कक्षा में जाने के लिए तैयार हैं।बस रिजल्ट्स की देर है।मुख्य बात अब कही जाने वाली थी...।" यू विल हैव टु पे फोर्टी थाउजेंड फ़ॉर एड्मिसन इन फर्स्ट स्टैंडर्ड।" बस इतना ही सुनना था कि रवि के होश उड़ गए।प्रिंसिपल ने आगे क्या कहा पता नहीं।
            रवि जैसे-तैसे घर पहुँचा।कुछ बोलना तो दूर,किसी से आँखे भी नहीं मिला पा रहा था।क्या बोलता कि, "सरला...!"