एंजल नेहा Rahul Joshi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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एंजल नेहा


“आज तुम्हरी भाभी ना सिर्फ हमको देखी. बल्कि लजाते हुए अंदर दौड़ पड़ी.”...

गगन ने संतोष से कहा। दोनों जिगरी यार थे। हर छोटी-बड़ी बात आपस में साझा किया करते थे।

“का बात कर रहे हो बे, सच में का”....

संतोष ने रजनीगंधा थूकते हुए हैरानी से पूछा। ऐसा वो सिर्फ तब करता था, जब बोलना बेहद जरूरी हो जाए। नहीं तो हूं-हां से ही काम चल जाता था।

“और नहीं तो का! हम क्या झूठ बोल रहे है तुम से”... गगन ने कहा।

हालांकि ये बात अलग थी, गगन खुद थोड़ी देर तक नहीं समझ पाया था। मिश्रा जी की दूसरे नंबर की बेटी माने नेहा उसे देख के हंसी थी या उसने हंस के देखा था। कुछ देर तो वो छत पे खड़ा सोचता रहा। फिर फ़ौरन कमरे में जाकर शीशा देखा। पर चेहरे में कुछ नहीं लगा था। शीशे के आगे खड़ा गगन सोच ही रहा था कि नेहा के इस तरह खिलखिलाते हुए लजाकर अंदर भागने की वजह क्या रही होगी। तभी पिता ने पीछे से टोका....

“ये पैंटवा का चेन खुला छोड़ने का कोनो नया फैशन चल गवा का ।”.

पिता ने कहा तो गगन की नज़र पेंट की ज़िप पर गई, जो पूरी खुली हुई थी। और तो और कुछ-कुछ अंदर से धारियों वाला कच्छा भी बाहर झांक रहा था। गगन ने फौरन चेन बंद कर ली।


गगन के समझ में आ गया था। नेहा के खिलखिला के हंसने और लजाने की वजह क्या थी। पर उसने ये सब संतोष को नहीं बताया। उसका मकसद संतोष को ये बताना था कि केवल वो ही नहीं बल्कि नेहा भी उसे नोटिस करती है।

“सही है गुरु। हम तो सोचे थे तुम से ना हो पाएगा।”

“अरे होगा काहे नहीं। हमरा नाम भी गगन यादव है। मिश्रा जी की बेटी को तो ‘पटा’ के ही दम लेंगे।”..... गगन ने अपना सीना ठोकते हुए पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा।


उस दिन के बाद लगभग हर रोज़ गगन संतोष को अपने और नेहा के किस्से सुनाने लगा। हर बार बात एक ही होती, बस गगन के बताने का तरीका नया होता था। शुरू में तो संतोष बड़े चाव से सुनता था। कभी-कभार एक-दो सवाल भी पूछ लेता। मगर हर रोज एक ही बात सुनकर संतोष पक गया था। अब वो मुंह में रजनीगंधा डाले बस हूं-हूं करते रहता।

एक दिन संतोष गगन के घर पे सुबह 11 बजे पहुंच गया। यही टाइम बताया था गगन ने संतोष को, जब नेहा छत पे कपड़े डालने आती थी। दोनों दोस्त छत से छिपकर मिश्रा जी की छत की ओर देखने लगे। कुछ देर बाद नेहा आई और तार पे कपड़े लटका के बिना गगन की छत की ओर देखे नीचे चल दी। देखना तो दूर उसने तो इधर अपनी एक नजर तक नहीं डाली।

“ई का बे। तुम तो बड़ी बातें हांका करते थे। पर उसने तो हियां थूका तक नहीं.” ... संतोष ने चिल्ला कर कहा।

“ऊ का है ना तुमको देख ली होगी हमरे साथ। तभी हियां नहीं देखी। काफी शर्मीली है।”.... गगन ने फ़ौरन बात संभालते हुए इस डर से कहा कि कहीं वो झूठा साबित ना हो जाए।

संतोष ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वो जान गया कि गगन अब तक उससे झूठ बोलता आया था। वहीं गगन ने भी अपने दिल में ठान लिया कि अब वो संतोष को नेहा के बारे में तभी बताएगा जब वो पूरी तरह उसके प्यार में गिरफ्तार हो जाएगी।

रात को गगन अपने चाइनीज मोबाइल में फेसबुक चला ही रहा था, तभी उसको किसी का फ्रेंड रिक्वेस्ट आया। उसने फ़ौरन देखा किसका रिक्वेस्ट है। तो ऐंजल नेहा नाम लिखा आ रहा था। पर डीपी में फ़ोटो नहीं थी।

गगन के लिए नाम ही काफी था ये समझने के लिए कि सामने वाला इंसान कौन है। चलो देर से ही सही मिश्रा जी की बेटी ने फेसबुक पर आईडी बना के अपने शुभ कदम तो रखे। और तो और सबसे पहला फ्रेंड रिक्वेस्ट भी उसे ही भेजा था।

गगन अभी खुश ही था की उस आईडी से दो मैसेज आ गए।

“हाय”...

“हमको तुम्हारे बालों का हेयर स्टाइल बड़ा अच्छा लगता है.”

गगन ने उस मैसेज को चार बार पढ़ा। उसे अपने आंखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। जब तक वो मैसेज का रिप्लाई करता तब तक नेहा ऑफलाइन हो गई थी। पर वो फिर भी खुश था। उसने शीशे में देखते हुए अपने बालों में हाथ फेर लिया। साथ ही उसे अपने पिता की वो बात भी याद आ गई जो उन्होंने उसकी हेयर स्टाइल देख कर कही थी।

“ये कैसा बाल कटवा के आए हो। ऐसा कोई बाल कटवाता है का.”

पिता ने गगन के तीनों ओर से टकले सर और जेल से कील की तरह ऊपर के खड़े बालो को देखते हुए कहा था। साथ ही उसको हिदायत भी दी. ..

“आगे से ऐसा बाल कटाए तो ऐसा थुरेंगे कि थोबड़ा बिगड़ जाएगा और सारी रंगबाजी धरी की धरी रह जाएगी।”

पर आज नेहा ने उसके बालों की तारीफ की तो उसने सोच लिया चाहे जो हो अब से वो ऐसे ही बाल कटवाएगा। पिता को का पता फैशनवा के बारे में, वो तो अजय देवगन के साईड से मांग निकालने वाले हेयर स्टाइल को अब तक कॉपी करते है ।..... गगन ने मन ही मन सोचा।

इस बीच गगन ने धीरे-धीरे संतोष से मिलना बिलकुल बंद कर दिया। अब उसका ध्यान फेसबुक में पूरे दिन ऑनलाइन रहकर इस बात पे लगा रहता कि एंजल नेहा ऑनलाइन कब आती है।

नेहा जैसे ही ऑनलाइन आती गगन मैसेजों की लाइन लगा देती। देर से ही सही उधर से भी रिप्लाई आ जाता था। पर गगन को ये समझ नहीं आता कि नेहा जब भी छत पर आती तो उसकी ओर देखती क्यों नहीं। और फेसबुक पर बाते करते रहती है।

“शायद कोनो देख ना ले इस मारे नहीं देखती हो। ऊपर से मोहल्ला भी तो दुष्ट लोगों से भरा पड़ा है। ससुरे बात बनाते देर नहीं लगाते।” ... गगन ने खुद को समझाया।

पिता पहले से ही गगन से बहुत परेशान थे। दिन पर दिन उसकी हरकतें बढ़ने के बाद अब और परेशान रहने लगे। दफ्तर के थके-हारे काम से लौटने के बाद पिता रात को घर पहुंचते तो लाइट नहीं रहती थी। “चलो कौन सा पंखा ठंडी हवा देता है”, सोच कर छत पर सोने जाते तो वहां गगन पहले से ही चारपाई पर लेटा पंखा झलते हुए अपने चाइनीज मोबाइल में DDLJ का एक ही गाना बार-बार सुन रहा होता।

“तुझे देखा तो ये जाना सनम प्यार होता है दीवाना सनम....”

गाने की आवाज फुल रहती। जिसके पीछे की वजह थी गगन का ये सोचना कि, गाने की आवाज मिश्रा जी की बेटी के कानों तक नहीं गई तो गाना बजाने का क्या फ़ायदा। जबकि फोन की आवाज इतनी तेज़ होती कि वो आसपास के 5-6 घरों तक साफ़ सुनाई देती थी।

खैर इसी तरह दिन बीतते गए। इसी बीच गगन ने एंजल नेहा से मिलने का प्लान बना लिया। घर से दूर पार्क में ठीक 5 बजे का समय तय हुआ। पर गगन इतना खुश था कि वो एक घंटा पहले से आकर इंतज़ार करने लगा।

अभी 5 ही बजे थे। न जाने संतोष कहां से टपक आया।

“अबे कहा हो बे आज कल। न फोन उठाते हो न मिलते हो, सब ठीक तो है न” ... संतोष ने गगन से पूछा।

गगन ने हां-हूं में उत्तर दिया। जैसे आज संतोष के बदले उसके मुंह में रजनीगंधा हो।

गगन मन ही मन संतोष को भागाने के बहाने तलाशने लगा। पर संतोष मक्खी की तरह गगन से चिपक गया था। इंतजार करते-करते 6 बज गए। गगन जान गया कि हो न हो नेहा, संतोष को उसके साथ देख कर वापस घर चली गई होगी। इसलिए गगन भी पार्क से बाहर जाने लगा। संतोष ने रजनीगंधा का पैकेट फाड़ा कर मुंह में डाला और वो भी गगन के साथ हो लिया।

पार्क से अभी दोनों निकले ही थे। गगन की नज़र सामने से बाइक पर जाते हुए एक लकड़ा और लड़की पर गई। दोनों चिपक के बैठे थे।

“शर्म भी नाही है इनको। बताए तो कैसे चिपक के बैठे हैं।”..... गगन ने कहा।

“हूं”… संतोष के मुंह में रजनीगंधा था तो उसने इतना ही कहा।

“पर हमरी नेहा ऐसी बिलकुल ना ही है। कितना लाज शर्म है उसमें” ...

गगन अभी बोल ही रहा था कि अचानक उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। ये लड़की कोई और नहीं बल्कि मिश्रा जी की बेटी नेहा ही थी। उसके साथ गली का कमलेश था। जिसके बालों का स्टाइल एकदम अजय देवगन की फ़िल्म दिलजले की तरह था।

गगन जोर-जोर से रोड पर ही रोने लगा।

“का कमी रह गई थी हमरे प्यार में”

संतोष ने इशारों से जानना चाहा कि अच्छे भले इंसान को एकदम से ऐसा क्या हो गया जो वो इस तरह रोने लगा। वो भी रोड के बीचों-बीच। हालांकि संतोष को इशारे से पूछने में थोड़ी मेहनत करनी पड़ी। पर वो रजनीगंधा थूकने से बच गया था।

गगन ने लंबी सांस खींचकर एंजल नेहा का पूरा किस्सा संतोष को सुना दिया। जब गगन ने संतोष के चेहरे की ओर ताका, तो उसे लगा जैसे संतोष हंसी रोकने की कोशिश कर रहा हो।

“हंस काहे रहे हो बे” ... गगन ने पूछा।

संतोष अभी भी हंसी रोकने की कोशिश कर रहा था।

“बताते हो या लतियाएं अभी।”... गगन ने अपने आंखों से आंसू पोछते हुए फिर से पूछा।

संतोष को जैसे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसका चेहरे अभी भी वैसा ही था हंसी दबाते हुए।

“अबे साला”.... एकदम से गगन को जैसे कुछ याद आ गया हो। उसने अपने सर में हाथ रखते हुए बोलना चालू रखा...

“कहीं ऊ फेसबुकवा पर एंजल नेहा नाम का आईडी तुम्हरी तो नहीं है बे”... गगन ने हैरानी से पूछा।

“आक्-थू..”...

संतोष ने मुंह से रजनीगंधा थूक दिया। और जोर से हंसते हुए बोला.. “बिल्कुल सही पकड़े हैं।”

गगन के तो होश ही उड़ गए ये सोचकर कि इतने दिनों से वो जिसे मिश्रा जी की बेटी समझ रहा था, वो मिश्रा जी की बेटी नहीं बल्कि संतोष था।


रात को “तुझे देखा तो ये जाना सनम” के बदले आज “सुन रहा है ना तू रो रहा हूं मैं”, बज रहा था। वो भी कम आवाज में ताकि गाने को गगन के अलावा कोई और न सुन पाए। और
जो 5-6 घरों के लोग रोज़ “तुझे देखा तो ये जाना सनम” गगन की मेहरबानी से सुनते थे, वो आज यादव जी की छत की तरफ बार-बार झांक रहे थे। और तो और कितनी बार तो मिश्रा जी की बेटी नेहा भी ग्रिल पर आ कर झांक चुकी थी। इस उम्मीद में की गाना अभी बजेगा। उसको भी ये गाना बहुत पसंद था। हालांकि वो बात अलग थी, वो ये गाना सुन कर गगन को नहीं बल्कि कमलेश को मिस किया करती थी।


End