भीगे पंख - 11 Mahesh Dewedy द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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भीगे पंख - 11

भीगे पंख

11. मोहित और सतिया दो

सतिया की मीटिंग में आज बड़ी भीड़ थी। वह अपने हृदय में भरा हुआ क्षोभ, प्रतिशोध एवं तद्जनित विष का वमन कर रही थी। उसकी उत्तेजक बात सुनकर भीड़ तालियां पीटने लगी थी एवं सतिया और जोश में भरकर बोलने लगी थी,

‘‘मीटिंग में जो भी मनुवादी हों, वे उठकर चले जायें।..... अब बचे हुए दलित भाइयों-बहिनों से मुझे कहना है कि तुम्हारी लडा़ई इन्हीं ब्राह्मणवादियों से हैं। इन्हींनंे तुम्हें हजा़रों साल से अछूत बना रखा है और तुम्हारी माॅओं बहिनों पर अत्याचार करते रहे हैं। अब तुम सबको हमारे साथ मिलकर इस ब्राह्मणवाद का नाश करना है। ब्राह्मणवादियों को उससे भी बुरे दिन दिखाने हैं जो इन्होने तुम्हें और तुम्हारे पूर्वजों को दिखाये हैं। ये सरकारी नौकरियों में रिज़र्वेशन का विरोध करते हैं- हमें इनकी ऐसी हालत कर देनी है कि ये रिज़र्वेशन हमसे मांगें.... आजतक इन्होंने हमें जूते की नोक पर रखा है, अगर हम संगठित हो जायें तो आगे से इन्हें जूते की नोक पर रखेंगे।’’

तभी भीड़ से जोशपूर्ण आवाज़ आई, ‘हम ब्राह्मण-ठाकुर-बनियों को अवश्य जूते की ठोकर लगायेंगे।’

उसी समय भीड़ के दाहिने कोने में कुछ हलचल हुई और तडा़तड़ पथराव होने लगा। भीड़ तितर बितर होने लगी तो सतिया का रुख और तीक्ष्ण हो गया था,

‘‘भाइयों! इन बदमाशों की ईंट का जवाब पत्थर से दो। इन गुंडों से डरकर काम नहीं चलेगा- इनका डटकर मुकाबला करना होगा और इन गुंडों को नेस्तनाबूद करना होगा .....’’

सतिया का स्वर अफ़रातफ़री में खो रहा था क्योंकि अपनी प्राणरक्षा हेतु श्रोता इधर उधर भाग रहे थे। तभी एक पत्थर आकर सतिया के सिर में लगा और वह वहीं मूर्छित हो गई थी। तब तक पुलिस आ गई और उसने लाठियां भांजकर और कुछ लोगों को बंदी बनाकर स्थिति पर नियंत्रण कर लिया था। पुलिस ने सतिया को अपनी गाडी़ में लिटाकर अस्पताल पहुंचा दिया था।

दूसरे दिन दिल्ली के सभी समाचार पत्रों में यह घटना मुख पृष्ठ पर छपी थी। कई समाचार पत्रों में इस घटना पर सम्पादकीय भी छपे थे जिनमें कुछ ने घटना का कारण अनुसूचित जातियों के उत्थान के प्रयत्न के प्रति उच्चजातियों की असहनशीलता को बताया था और कुछ ने सतिया की असंस्कृत, उकसाने वाली एवं विषैली भाषा को घटना का कारण बताया था। इनमें से एक सम्पादकीय को मोहित अपने छात्रावास के कमरे में बैठा हुआ पढ़ रहा था,

‘‘...जनतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है परंतु दूसरों को अपमानित करने और गालियां देने का अधिकार किसी का नहीे बनता है। कु. सतिया अब दलित राजनीति में जानी-मानी नेता बन गईं हैं, उन्हें अगडी़ जातियों के प्रति अपने आक्रोश को संयत भाषा में व्यक्त करना चाहिये। कहा जाता है कि कु. सतिया को स्वयं एवं उनके परिवार को उनके मूल निवास के ग्राम मानिकपुर में तरह तरह की यातनायें झेेलनीं पडी़ं थीं और उन्हें ग्राम से निर्वासित भी कर दिया गया था, परंतु इसके लिये भारत में निवास करने वाले अगडी़ जातियों के सभी व्यक्तियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है और न उन्हें भरी जनसभा में अपमानित किया जाना उचित कहा जा सकता है। इस तरह के भाषण जातीय विद्वेष के जनक हैं और उन्हें रोका जाना समाज के हित में आवश्यक हैे। कु. सतिया को भविष्य में अगड़ी जातियों के विरुद्ध विषवमन करने से रोकने के लिये कठोर कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिये। हो सकता है कि कु. सतिया इस प्रकार के उत्तेजक भाषण से तात्कालिक राजनैतिक लाभ प्राप्त कर लें, परंतु लम्बे समय में यह विषवमन न केवल समाज के लिये विध्वंसकारी साबित होगा, वरन् कु. सतिया के राजनैतिक भविष्य के लिये भी घातक सिद्ध होगा। कहावत है कि आसमान की ओर थूकोगे तो अपने मुंह पर ही आकर गिरेगा।’’

ग्राम का नाम पढ़ते ही मोहित के मन और हृदय दोनों के तार झंकृत हो उठे थे; यद्यपि बात अपने में आश्चर्यचकित करने वाली थी परंतु उसे यह बात मानने का कोई कारण नहीं दिखाई दिया कि यह उसकी अपनी सतिया के अतिरिक्त कोई और सतिया हो सकती है। पर उसके मन में आश्चर्यमिश्रित आशंकाएं अवश्य उठ रहीं थीं- क्या सतिया नेता बन गई है?.....कैसे वह गांव से निकलकर दिल्ली पहुंची होगी?..... कैसे उसने दलित राजनीति में प्रवेश किया होगा?..... और फिर कैसे वह भाषण देना सीखी होगी? मोहित की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। पर मोहित का रोम रोम सतिया के प्रति सम्वेदनाग्रस्त हो रहा था सतिया घायल है और अस्पताल में भर्ती है, उसे अवश्य ही काफी़ चोट लगी होगी। सतिया का पता भी लगा तो इस हाल में? मोहित के नेत्रों में अश्रु छलछला आये थे। वह तुरंत तैयार होकर आटो लेकर अस्पताल को चल दिया। एक ओर इतने दिन बाद सतिया से मिलने की बात सोचकर उसका मन तरंगित हो रहा था तो दूसरी ओर वह घोर आशंका से ग्रस्त हो रहा था कि पता नहीं सतिया से किस हाल में मिलन होगा।

मोहित जब अस्पताल पहंुंचा, तब वहां प्रतिदिन चलने वाली गहमागहमी पूरे जोश में प्रारम्भ हो गई थी- मरीजों़ और उनके साथ आने वालों की भीड़, सफे़द कपडों़ में दौड़ते से डाक्टर, हरे कपडों़ में टहलते वार्ड ब्वाय, और सफे़द डे्स पर कसी बेल्ट बांधे हुए नर्सें- हर ओर नज़र आ रहे थे। पूछताछ करके जब मोहित सतिया के वार्ड के बाहर पहुंचा, तो उस समय एक सीनियर डाक्टर जिन्हें दस-बारह जूनियर डाक्टर घेरे हुए थे, राउंड पर थे। अत चपरासी ने मोहित को वार्ड के बाहर ही रोक दिया। मोहित के मन में अब एक असमंजस का भाव आने लगा कि सतिया अब उसके गांव वाली सतिया तो रही नहीं है जो प्रत्येक अवसर पर उसका आश्रय ढूंढती थी, अब तो वह कु. सतिया के नाम की जानी मानी नेता हो गई है- पता नहीं अब सतिया की उसे देखकर क्या प्रतिक्रिया होगी और फिर उसके साथी भी तो वहां होंगे जो पता नहीं एक ब्राह्मण की उपस्थिति को कैसे लें? मोहित को वह रात्रि भी याद आयी जब अंधेरे में डरी हुई सतिया उससे अपने निकट कुछ देर रुके रहने की याचना करती रही थी और सामाजिक उलाहनाओं के भय से मोहित उससे अपने को छुड़ाकर उसकी झोपडी़ से भाग लिया था। उस दिन के बाद काफी़ समय तक सतिया मोहित का सामना करने से बचती सी रहने लगी थी और मोहित भी उसकी निगाहों का सामना करने में लज्जा अनुभव करता रहा था। आज वह घटना भी उसके हृदय में असमंजस उत्पन्न कर उसकी धड़कन को तेज़ कर रही थी।

‘‘मो...हित’’- मोहित को कक्ष में घुसते देखकर सतिया के मुंह पर आश्चर्य और आह्लाद का जो भाव आया और जिस मिठास से उसने मोहित को पुकारा, सतिया के सिरहाने बैठा युवक उसे देखकर आहत हुए बिना न रह सका। मोहित अपने को सतिया द्वारा पुकार लिये जाने से न केवल आश्वस्त हो गया था वरन् प्रसन्नता के अतिरेक में उसके हृदय मे सतिया को बांहों में लिपटा लेने हेतु हल्का सा कम्पन भी हुआ था, परंतु अजनबी व्यक्ति की उपस्थिति में वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था और अपने भावातिरेक को दबाने का प्रयत्न करते हुए सामने खड़ा था। उसकी इस स्थिति को सतिया पूरी तरह समझ रही थी, अत उसने पास में पडी़ कुर्सी की और इंगित करते हुए कहा,

‘‘बैठो मोहित। यहां कैसे आये?’’

सतिया के शब्दों में आत्मविश्वास झलक रहा था जिससे प्रभावित हुए बिना मोहित न रह सका। वह अपने में उतना आत्मविश्वास नहीं जुटा पा रहा था और उसने संकुचित स्वर में उत्तर दिया,

‘‘मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहा हूं। आज सुबह अखबार में तुम्हें चोट लगने की खबर पढ़कर तुम्हें देखने चला आया। अब कैसी हो?’’

सतिया अपनी प्रसन्न्ता को छिपाने का कोई प्रयत्न किये बिना बोली,

‘‘तब तो मुझे चोट लगना बड़ा शुभ रहा। मैं तो बिल्कुल ठीक हूं और आज ही अस्पताल से छुट्टी भी हो जायेगी।’’

सतिया का तन-मन मोहित को देखकर पुलक से भर रहा था और वह चाहती थी कि मोहित देर तक उसके पास बैठे और उससे घुलमिलकर बातें करे, परंतु तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति के कारण औपचारिकता के आगे सम्वाद का विषय ढूंढ नहीं पा रही थी। मोहित भी सतिया के पास बैठकर देर तक बात करना चाहता था परंतु एक तो यौवनावस्था के आगमन से उत्पन्न स्वाभाविक संकोच और दूसरे उस युवक की उपस्थिति के कारण वार्ता का विषय उसकी पकड़ में भी नहीं आ रहा था। फिर कुछ सोचकर मोहित बोला,

‘‘कहां रहती हो? क्या तुम्हारे माता पिता भी दिल्ली में ही हैं?’’

‘‘हां, हम सभी दिल्ली में ही हैं’’, उसके द्वारा बताये पते को मोहित याद कर लेे, ऐसे निहित उद्देश्य से सतिया विस्तार से बताने लगी, ‘‘बंगला नम्बर 194 बी., करोलबाग के आउट हाउस के एक कमरे में रहती हूं, अम्मा और बापू भी साथ हैं।’’ फिर कुछ सकुचाहट के साथ जोडा़, ‘‘दोनो कमरे इन्हीं पलंग पर बैठे युवक की ओर इशारा करते हूए विमलसिंह जी के हैं। दूसरे कमरे में विमलसिंह जी रहते हैं। मैं इन्हीं की पार्टी में काम करती हूं।’’

मोहित के आगमन पर सतिया के मन में उठे उछाह का अनुभव विमलसिंह तीक्ष्णता से कर रहा था और उसके मुख पर जाग्रत ईष्र्या के भाव को संयत करने के उद्देश्य से सतिया उसकी ओर देखकर बोली,

‘‘यह हैं मेरे गांव के मोहित शर्मा।’’

मोहित का परिचय सुनकर विमलसिंह की नाक में एक हल्का सा कम्पन हुआ जो उसमें किसी भी ब्राह्मण से मिलने पर उत्पन्न वितृष्णा के फलस्वरूप हुआ करता था- बस इस बार उस कम्पन का तरंगदैघ्र्य सामान्य से अधिक था। यद्यपि वह कुछ बोला नहीं परंतु अनादर के प्रति अतिसम्वेदनशील मोहित के मन ने उसके मौन को स्पष्टत पढ़ लिया था। उसे लगा कि उसकी उपस्थिति विमलसिंह को अवांछनीय लग रही थी और ऐसी परिस्थिति का दृढ़ता से साहसपूर्वक सामना करने की क्षमता की कमी के कारण वह सतिया के लम्बे सान्निध्य की अपने मन की इच्छा के विपरीत बोला था,

‘‘अच्छा सतिया! मुझे यूनिवर्सिटी जाना है। अब तुम भी आराम करो। मैं चलता हूं।’’

सतिया अपने केा अपनी इच्छा का स्वामी समझती थी और विमलसिंह के अनेक उपकारों के होते हुए भी उसकी इच्छा के विरुद्ध वह मोहित को रोक सकती थी परंतु तभी बाहर से डाक्टर आता दिखाई दे गया और परिस्थिति का घ्यान कर वह प्रकटत बोली थी,

‘‘ठीक है, परंतु कालेज से फुर्सत होने पर घर आ जाना। अम्मा और बापू भी तुम्हें देखकर प्रसन्न होंगे।’’

सतिया के शब्दों और उसके नेत्रों दोनो में आग्रहपूर्ण निमंत्रण का भाव था, जिससे मोहित अभिभूत था ओर विमलसिंह आशंकित।

‘‘उूं-हूं, आज मन नहीं है।’’

उस रात्रि में सतिया के कमरे में आते ही विमलसिंह ने उसे बांहों में भरकर चारपाई पर लिटा दिया था और उसके वक्ष पर हाथ रख रहा था, तभी सतिया ने अपनी अनिच्छा प्रकट कर दी थी। सतिया दिन ढलने से पहले अस्पताल से घर आ गइ्र्र थी और दिन भर के थके हारे उसके माता-पिता शाम को जल्दी ही खा-पीकर अपने कमरे में सोने लगे थे। अस्पताल में मोहित के प्रति सतिया का उछाह देखकर विमलसिंह के मन में जो ईष्र्या जागी थी, वह उसे असामान्य रूप से कामुक बना रही थी- सम्भवत वह अपने को आश्वस्त करना चाह रहा था कि सतिया केवल उसी की है। सतिया के मना करने पर विमलसिंह ने उसे और जो़र से बांहों में भर लिया था और उसके मुंह पर अपना मुंह ले जाकर अपने तपते होंठ उसके होठों पर रखने लगा था। सतिया ने पहले तो अपने होंठ हटाये और फिर विमलसिंह के बल लगाने पर उसे झटक दिया था। जिस तरह आग पर रखे दूध पर आता उफा़न ठंडा जल छिड़क देने से एकदम थम जाता है, उसी तरह विमलसिंह की उत्त्ेाजना का उफ़ान एकदम थमकर शंका, ग्लानि एवं क्षोभ में परिवर्तित हो गया था। वह चुपचाप चारपाई से उठा और बल्ब का स्विच आन कर नीचे चटाई पर बैठकर एक किताब पढ़ने का दिखावा करने लगा था।

सतिया कुछ देर तक चुपचाप चारपाई पर लेटी रही थी और फिर उठकर अपने कमरे में चली गई थी- आज उसका मन सचमुच नहीं था। उसका मन तो मोहित में रमा हुआ था, जिसको पाने की कामना बचपन से उसके मन में बसी हुई थी और विमलसिंह के साथ कामसुख का अनुभव प्राप्त होने के पश्चात वह कामना और उद्दाम ही हुई थी। जिस प्रकार समुद्र की लहरों पर तैरने वाला व्यक्ति उूपर विचरने वाली मछलियों से तो खेल सकता है परंतु गहराई में बसने वाली सीपी का मोती प्राप्त नहीं कर सकता है, उसी प्रकार विमलसिंह उसकी उद्वेलित कामेच्छा को तो शांत कर देता था, पर उसके मन में बसी मोहित की मूरत केा विस्थापित अथवा ओझल नहीं कर पाता था। मोहित की मूर्ति सतिया के मन का मोती थी- शुभ्र्र, धवल परंतु अलभ्य। मोहित के सान्निध्य का कल्पनालोक उसका अपना संसार था, जहां विमलसिंह का प्रवेश वर्जित था। हां, विमलसिंह के सान्निध्य के अनुभव ने मोहित के सान्निध्य के काल्पनिक सुख को शारीरिक तृप्ति के सुख के साथ भोगने की उत्कंठा सतिया के मन में जगा दी थी। आज युवा मोहित को देखकर सतिया तन और मन दोनों को मोहित में समा देने को आतुर हो रही थी।

सतिया कई दिनों तक मोहित के आने की प्रतीक्षा करती रही थी परंतु न तो मोहित आया और न उसकी कोई खबर आई थी। उन दिनों विमलसिंह द्वारा सतिया के साथ रात्रि-संसर्ग के प्रयत्न असफल रहे थे, और तब एक रात्रि विमलसिंह ढाबे से देशी शराब पीकर आया था और सतिया के लाख मना करने पर भी उसने बलपूर्वक अपनी कामपिपासा शांत की थी। सतिया को उस समय स्वयं आश्चर्य हुआ था, जब उसका मन न होने पर भी उसके शरीर ने विमलसिंह का साथ दिया था; और फिर वही पुरानी दिनचर्या प्रारम्भ हो गई थी- अंतर केवल इतना आया कि अब सतिया कामक्रीडा़ के प्रति और उग्र हो गइ्र्र थी। अब विमलसिंह को प्रारम्भ नहीं करना पड़ता था क्योंकि अवसर मिलते ही सतिया उस पर झपट पड़ती थी- यह मोहित के न आने से उभरे आक्रोश का परिणाम था।

अब राजनैतिक सभाओं में सतिया द्वारा दिये जाने वाले भाषण भी सवर्णों के प्रति और उग्र हो गये थे- इनमें सतिया ब्राह्मणों को दलितों का प्रथम शत्रु घोषित करती थी। वह गांधी को मनुवादी बताकर उन्हें दलितों के विरुद्ध षणयंत्रकारी होना बताती, अम्बेडकर को एकमात्र दलित हितचिंतक एवं एकमात्र सम्विधान निर्माता बताती और सवर्णाें के प्रति ऐसी अपमानजनक भाषा का प्रयेाग करती थी जो दलित-अस्मिता को रुचिकर लगे और उनमें प्रतिकार की उत्तेजना जगाये।

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सतिया के माता-पिता सतिया और विमलसिंह के सम्बंधो के विषय में सब जान गये थे परंतु परिस्थितिवश और सतिया के स्वभाव का ध्यान कर उन्होने अपने आंख व कान बंद कर रखे थे। विमलसिंह के कारण ही उन्हें दिल्ली जैसे महानगर में सहारा मिला था और उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में सुधार भी हो रहा था। विमलसिंह की पार्टी फल-फूल रही थी और उसको इतना चंदा मिलने लगा था कि संगठन के विस्तार के साथ-साथ स्वयं के छोटे-मोटे सुख साधनों की आपूर्ति भी आसानी से हो जाती थीं। वह सतिया के परिवार की आर्थिक सहायता भी और अधिक करने लगा था। अब सतिया की रातें अबाध ढंग से विमलसिंह के कमरे में ही बीतती थीं। सतिया की माॅ ने सतिया से एक आध बार दबी ज़बान से कहा भी था,

‘‘तुम और विमलसिंह ब्याह कांयें नाईं कर लेत हौ?तुम और विमलसिंह विवाह क्यों नहीं कर लेते हो?’’

पर सतिया ने प्रश्न को हवा में उडा़ दिया था और उसका उत्तर देना भी आवश्यक नहीं समझा था। सतिया की मनस्थिति, उसके जीवन के कटु अनुभवों एवं विमलसिंह के सान्निध्य ने उसे सामाजिक मान्यताओं के बंधन से इतर स्तर पर पहुंचा दिया था। माॅ के प्रश्न पर उसकी चुप्पी में ही उसका उत्तर निहित था ओर उसकी माॅ यह जान भी गईं थीं। उस उत्तर को स्वीकार करने के अतिरिक्त उनके पास कोई विकल्प नहीं था। लाज, हिचक, एवं समझौता सतिया के व्यक्तित्व से परे हो चुके थे- वह अपनी मान्यताओं, अपनी इच्छाओं, अपनी लालसाओं के लिये किसी भी सामाजिक अथवा नैतिक नियम को ताक पर रख सकती थी, एवं अपने प्रतिशोध हेतु सारे समाज को तहस-नहस कर सकती थी।

उसके आमंत्रण पर मोहित अभी तक नहीं आया था, इससे उसका अंतर्मन आहत हो रहा था और वह उतना ही अधिक विष-वमन कर रही थी।

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मोहित को प्राय सतिया की घनी कमानीदार भौंहों के मघ्य स्थित उसके बडे़ बड़े नेत्रों की झील सी वह गहराई याद आती रहती थी, जो उसने उसके द्वारा घर आने का आमंत्रण देते समय देखी थी और प्राय रात्रि के एकांत में मोहित उस गहराई में खो जाने को उतावला हो जाता था और निश्चय करता था कि कल वह अवश्य सतिया के घर जायेगा, परंतु सबेरा होते होते उसके अनिश्चय उस पर हाबी होे जाते थे। जाने का अवसर आते ही उसे एक अनजान भय सताने लगता था कि पता नहीं वहां पहंुचने पर क्या अनहोनी घटित हो जाये। उसे लगता कि यदि उसके पहंुचने पर विमलसिंह वहां उपस्थित मिला तो कहीं उसकी अपमानजनक एवं हिंसात्मक प्रतिक्रिया न हो?; और यदि वह उपस्थित नहीं मिला और सतिया अकेली मिल गई तो क्या वह स्वयं को यौवन-मदमाती सतिया के साथ एकांत के क्षणों में सामान्य रख पायेगा? किसी भी युवती के साथ का एकांत उसने केवल कल्पना में भोगा था, कभी भी यथार्थ में नहीं।

इस उूहापोह में दिन बीतते गये और शरत, शिशिर एवं हेमंत व्यतीत हो गये और वसंत आ गया। वसंत ऋतु के अपने यौवन पर आते ही इम्तिहानी हवायें चलने लगीं थीं। ये हवायें विद्यार्थियों के लिये परीक्षा की सन्निकटता का संदेश लेकर आतीं हैं और उनके मन में पढा़ई पूरी न कर पाने की छटपटाहट एवं परीक्षा का भय उत्पन्न कर उनकी उद्विगनता बढा़ देतीं हैं। इन हवाओं की ठंडक सूर्य की किरणों की कुनकुनाती गर्मी में लिपटी रहती है जो युवाओं के तन और मन को स्पर्श कर उनमें प्रमाद का प्रवाह भी करती है एवं उनकी विपरीतलिंगी मिलन की इच्छा को प्रबल कर देती है। होली का त्योहार इसके लिये अग्नि में घृत का काम करता है।

बीती रात मोहित देर से सोने गया था- गणित के प्रश्नों में उलझ जाने के कारण उसे समय का पता ही नहीं चला था। होली की छुट्टियां होने के कारण उसने शीघ्र सोने का यत्न भी नहीं किया था। फिर सोने का समय निकल जाने के कारण नींद बिल्कुल उचट गई थी और बिस्तर पर लेटे हुए मोहित दिवा स्वप्न देखता रहा था। उसे घूम फिरकर उस होली की याद बार बार आती रही जब वह भरतपुर में नवीं कक्षा का छात्र था और होली की छुट्टी में गांव गया हुआ था। गांव की गली में सतिया सामने आ पडी़ थी। सतिया देर तक मुस्कराते हुए मोहित के होंठों पर उभरती मूंछों की रेख को एकटक निहारती रही थी और फिर निर्भीक बोल पडी़ थी,

‘‘मोहित! अब की बार मैं भी खेलूंगी होली तुम्हारे साथ।’’

मोहित उसके साहस पर आश्चर्यचकित था और अवाक होकर उसे देखते हुए बस इतना बोल पाया था,

‘‘किसी ने देख लिया तो?’’, परंतु सतिया के आमंत्रण भरे नयनों में निहारकर उसकी सतिया के संग रंग में सराबोर होने की आकांक्षा उद्वेलित हो गई थी।

फिर होली वाले दिन एकांत देखकर सतिया मोहित की हवेली के फाटक के निकट स्थित एक कोने में आकर खडी़ हो गई थी- एक फटा पुराना फ्रा़क पहिने हुए जिसके छिद्रों से उसके छोटे छोटे गोल गोल वक्ष यहंा वहां झांकते से दिखाई पड़ जाते थे। मोहित ने उसे देखकर अपनी पिचकारी में लाल रंग भरकर इधर उधर देखकर चोरी से पूरी पिचकारी उसके वक्षस्थल पर चला दी थी। फ्रा़क का झीना कपडा़ सतिया के बदन पर चिपक गया था और उसमें उसके कटिप्रदेश और जंधायें भी झांकने लगीं थीं, जिन्हें सीधे देखने का साहस मोहित नहीं जुटा पा रहा था। सतिया उसे रंग लगाने को आगे बढी़ थी कि मोहित की माॅ की आवाज़ सुनाई दी थी और वह ठिठक गई थी। मोहित की माॅ को सतिया के हाव भाव अटपटे लगे थे और उन्होने डाॅटते हुए कहा था,

‘‘सतिया, अपने लोगों में जाकर होली खेल।’’

यह सुनकर सतिया का चेहरा तमतमा गया था और वह गर्दन झुकाये वहां से खिसक ली थी। मोहित भी लज्जावनत होकर वहां से चल दिया था परंतु वह कनखियों से सतिया के रंग से नहाये मांसल बदन को निहारने का लोभ सम्वाण नहीं कर सका था।

प्रातकाल उठने पर भी मोहित के मन में रात्रि के स्वप्नों का खुमार शेष था जो उसे सतिया की याद दिला रहा था। उसने सोचा कि सतिया ने उसे अपने यहां बुलाया तो था ही, और होली के अवसर पर मिलने की प्रथा भी है, तो क्यों न होली के बहाने मिल आया जाये? यदि वहां कमलसिंह उर्पिस्थत भी हुआ और उसने मोहित के आगमन को संदेहपूर्ण निगाह से देखा, तो भी सतिया के माॅ-बाप तो उसका हृदय से स्वागत करेंगे हीं। मन में द्वंद्व होते हुए भी वह साहस बटोरकर सिटी बस से चल पडा़ और मन में अनेक कल्पनायें संजोये हुए अपरान्ह में सतिया के कमरे के दरवाजे़ पर पहंुच गया। दरवाजे़ की कुंडी अंदर से बंद थी। दरवाजा़ खटखटाने के पूर्व मोहित का हाथ एक बार ठिठका, परंतु फिर उसके हाथ ने दरवाजे़ पर हल्की थाप देने का साहस जुटा ही लिया। कुछ पलों के विलम्ब से अंदर की कुंडी खटक की ध्वनि के साथ खुल गई और फिर रंग खेलने के उपरांत सद्यस्नात सतिया मोहित के सामने खडी़ थी- अपने गदराये बदन पर बासंती रंग की साडी़ लपेटे हुए। यद्यति वक्ष साडी़ से ढके हुए थे परंतु मोहित केा लगा कि वह ब्लाउज़ नहीं पहिने हुए है और वह घबराकर पीछे मुड़ने लगा कि सतिया प्रसन्नता के अतिरेक में मुस्कराकर बोली,

‘‘अरे मोहित तुम हो! अंदर आ जाओ।’’

मोहित के अंदर आ जाने पर सतिया ने दरवाजे़ की कुंडी फिर अंदर से यह कहते हुए बंद कर दी थी कि दरवाजा़ अपने आप खुल जाता है और बाहर से धूल आती है। फिर मोहित केा चारपाई के सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया था। दरवाजा़ बंद कर देने पर पहले तो मोहित को लगा कि कमरे में पूर्ण अंधकार हो गया है क्योंकि पीछे की दीवाल की एकमात्र खिड़की परदे से भलीभंाति ढकी हुई थी, परंतु फिर आंखों के अभ्यस्त हो जाने पर उसे सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगा था। कमरे में एक कुर्सी, एक छोटी सी मेज़ और एक चारपाई के अतिरिक्त एक बड़ा सा टीन का बक्सा रखा हुआ था। खूंटी पर सतिया के अंगवस्त्र टंगे हुए थे और एक आले में बाल काढ़ने हेतु शीशा और कंघा रखे हुए थे। टीन के बक्से के उूपर दलित राजनाीत की कुछ पुस्तकें और पत्रिकाएं रखीं हुईं थीं। चारपाई पर नीले रंग की चादर बिछी हुई थी और नीले रंग का ही तकिया रखा हुआ था। मोहित सतिया के द्वारा दरवाजा़ बंद कर देने पर हतप्रभ हो गया था और कुर्सी पर बैठकर बगलें झांकने लगा था, परंतु सतिया का उत्साह उसके हाव भाव से स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था और वह पूर्ण आत्मविश्वास के साथ उसके सामने चारपाई पर बैठ गई थी। उसने सचमुच ब्लाउज़ नहीं पहिन रखा था एवं उसके बदन पर साडी़ उसी तरह लिपटी हुई थी, जैसे कि उसके गांव में अधिकतर स्त्रियां बिना ब्लाउज़ के साडी़ लपेटे रहतीं थीं। मोहित को सतिया के हिलने डुलने पर साडी़ के यहां-वहां हट जाने पर बदन का कोई न कोई मांसल भाग दिख जाता था और उसके तन में सनसनी फैल जाती थी और मन में उतनी ही घबराहट पैदा हो जाती थी। अपनी घबराहट को नियंत्रित करने के उद्देश्य से मोहित ने सतिया से पूछा,

‘‘अम्मा और बापू कहां हैं?’’

सतिया ने होठों पर हल्की सी स्मित लाकर उत्तर दिया,

‘‘होली का रंग खेलने के बाद वे तो काम पर निकल गये हैं और विमलसिंह एक होली मिलन में गये हुए हैं।’’

यह सुनकर मोहित का तनाव और बढ़ने लगा, जिसे भांपकर सतिया बोली,

‘‘मोहित! क्या बात है? क्या अभी भी मुझे छूने में घबराते हो?’’

मोहित यह सुनकर लज्जित हो गया क्योंकि उसे वह घटना याद आ गई जब एक रात्रि सूंडी़ का खेल खेलते हुए वह अपने को छिपाने के उद्देश्य से दौड़ते हुए अनायास सतिया की झोपडी़ में घुस गया था, और अंधेरे में डरी हुई सतिया द्वारा उसे पकड़कर रोकने के प्रयास के बावजूद वह अपने को छुडा़कर भाग गया था क्योंकि उसे डर था कि कोई उसका सतिया द्वारा छुआ जाना देख न लें। मोहित को बचपन में भी सतिया को छूने की वर्जना अनुचित लगती थी और कालांतर में तो मोहित ने विज्ञान पढकर वैज्ञानिक जीवन दर्शन भी अपना लिया था- आज वह एक मानवतावादी नास्तिक था। वह अपनी मान्यताओं में जाति-पांति के साथ धर्म के बंधन से भी उूपर उठ गया था। उसका विश्वास था कि ईश्वर की कल्पना चाहे समाज में अनुशासन, समरसता, एवं शांति लाने के उद्देश्य से की गई हो, परंतु उसका दुरुपयोग प्राय स्वार्थ सिद्ध करने, भयजनित प्रभुत्व स्थापित करने, एवं अंधविश्वास उत्पन्न कर शोषण करने के उद्देश्य से किया जाता रहा है; और यह स्वार्थचक्र हिंदू, इस्लाम, ईसाई आदि सभी धर्माे मंे निरंतर घूमता रहा है। धर्म और आस्था प्राय सामाजिक एवं राजनैतिक षणयंत्रों का अमोघ अस्त्र बनकर रह गये हैं। सतिया के प्रश्न के उत्तर में अपनी इन मान्यताओं को रखने की तीव्र अभिलाषा होते हुए भी मोहित के मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे क्योंकि एक तो बंद कमरे में सतिया से एकांत-मिलन उसमे नियंत्रणविहीन उत्तेजना उत्पन्न कर रहा था और दूसरे उसे संकोच लग रहा था कि सतिया इसे आत्मश्लाघा न समझ बैठे। मोहित ने अपने जीवन में इससे पूर्व कभी भी किसी युवती की इतनी निकटता का ताप नहीं सहा था। सतिया का उन्मुक्त भाव एवं उच्छृंखल वक्ष उसकी जिह्वा को सुखाये दे रहे थे। उसकी चुप्पी को सतिया समझ रही थी और वह मंद मंद मुस्करा रही थी। अपने कल्पनालोक के प्रेमी को अपने इतने निकट इस मनोदशा में पाकर उसका मन और उच्छंृखल हो रहा था। जोखिम में आनंद लेने वाले अपने स्वभाव से प्रेरित होकर सतिया अचानक बोल पडी़ थी,

‘‘अच्छा, अगर मैं तुम्हें अभी छू लूं, तो पुन पवित्र होने के लिये तुम नहाओगे तो नहीं?’’- और यह कहने के साथ ही सतिया ने आगे झुककर मोहित का हाथ अपने हाथ में पकड़ लिया था। ऐसा करते समय उसकी धोती छाती पर से नीचे खिसक गई थी। सतिया की कोमल गर्म हथेली के स्पर्श एवं उसके मचलते वक्ष के उन्मुक्त दर्शन से मोहित के शरीर का रोम रोम वीणा के कसे हुए तार सम खडा़ होकर झंकृत होने को मचल उठा था- उसके गुप्तांगों में असह्य तनाव उत्पन्न हो गया था। सतिया अपना अगला कदम उठाने से पूर्व मोहित की आंखों में आंखें डालकर उसे सम्मोहित कर रही थी कि तभी बाहर सांकल खटखटाने की अनवरत ध्वनि होने लगी थी और उसे सुनकर मोहित इतना घबरा गया था कि सांकल की प्रत्येक खटखटाहट के साथ वह स्खलित होता रहा था।

मोहित को लगा कि सतिया संाकल की खटखटाहट के साथ मोहित का स्खलन भांप गई थी और उसके होठों की स्मित बढ़ गई थी। वह मोहित का हाथ छोड़ कर आराम से चारपाई से उठी थी और अपनी साडी़ ठीक कर उसने निसंकोच दरवाजा़ खोल दिया था। अंदर मोहित को बैठा देखकर विमलसिंह का चेहरा तमतमा गया था। मोहित को आशंका हुई थी कि कहीं विमलसिंह उस पर अथवा सतिया पर आक्रमण न कर बैठे और उसका रक्षा तंत्र सक्रिय हो गया था कि तभी विमलसिंह बिना कुछ बोले उस कमरे से निकलकर दूसरे कमरे की ओर चला गया था। मोहित को लगा कि सतिया उसे स्पष्टीकरण देने हेतु उसके पीछे जायेगी ओर वह जाने हेतु अपनी कुर्सी से उठ खडा़ हुआ था, परंतु मोहित केा आश्चर्य हुआ जब सतिया विमलसिंह के पीछे जाने के बजाय मोहित से बोली थी,

‘‘मोहित, बैठो न। अभी तो कुछ बातें ही नहीं हुईं हैं।’’

परंतु मोहित ऐसी असहज स्थिति में था कि ‘‘आज चलता हूं, फिर कभी आउूंगा।’’ कहकर चुपचाप चल दिया था। विमलसिंह के वापस आ जाने के कारण सतिया ने भी उसे रोकने की ज़िद न की थी।

मोहित ने भौतिक विज्ञान में पढा़ था- ‘आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धांत के आधार पर यह निष्कर्ष निकला है कि जो वस्तु जितने अधिक वेग से चलेगी, समय उस पर उतने ही कम वेग से गुज़रेगा; और यदि कोई वस्तु प्रकाश के वेग एक सेकंड में 3 लाख किलोमीटर से चलने लगे तो समय उस पर स्थिर हो जायेगा- अर्थात वह व्यक्ति एक ही समय में सभी स्थानों पर उपस्थित रह सकता है और अनंत काल तक जीवित रह सकता है, परंतु कठिनाई यह है कि इतना वेग प्राप्त कर लेने पर उस वस्तु का भार अनंत हो जायेगा और अनंत भार की वस्तु को अपने स्थान से हिलाना भी सम्भव नहीं है।’ सतिया के घर से लौटने के बाद मोहित की मनोदशा कुछ ऐसी ही हो रही थी जैसे सतिया के घर में घटित घटना का प्रभाव उसके मन पर प्रकाश वेग से प्रवाहित हो रहा हो अर्थात असीम भार का होकर स्थिर हो गया हो। वह चाहे होस्टल में हो, क्लास में हो, या अन्यत्र हो, उसका मन इस चिंता एवं तद्जनित ग्लानि से मुक्त नहीं हो पा रहा था कि विमलसिंह ने उन्हें बंद कमरे में पाकर पता नहीं उनके बारे में क्या सोचा होगा और सतिया उसे स्खलित होते पाकर पता नहीं उसके बारे में क्या सोच रही होगी? तद्जनित ग्लानि के कारण वह सतिया के घर पुन जाने का साहस न जुटा सका था।

उधर मोहित के जाने के बाद विमलसिंह ने सतिया से ईष्र्या एवं द्वेष भरे स्वर में पूछा था,

‘‘यह क्यों आया था?’’

उत्तर में सतिया ने बस इतना कहा था कि मैने बुलाया जो था। सतिया के स्वर में इतनी निर्भीकता और स्वच्छंदता का भाव तैर रहा था कि विमलसिंह आगे कुछ भी बोलने का साहस न कर सका था। सतिया के स्वर ने उन दोनों के आपसी सम्बंधों की सीमा रेखा को भी स्पष्ट कर दिया था। राजनैतिक क्षेत्र में विमलसिंह की सहायता से प्रगति पथ पर प्रशस्त सतिया अब विमलसिंह की छाया मात्र नहीं रह गई थी, वरन् एक स्वतंत्र राजनैतिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हो गई थी। सतिया और विमलसिंह के व्यक्तित्व मंे इतनी समानतायें थीं कि वे एक दूसरे के समानांतर तो चल सकते थे परंतु एक दूसरे में समाहित नहीं हो सकते थे- दोनांे अपनी प्रत्येक सोच और अपने प्रत्येक स्वार्थ को सर्वोपरि मानते थे, दोनों का सामाजिक उद्देश्य अगडी़ जातियेंा के अत्याचारों से दलितों को मुक्त कराना था और दोनों का राजनैतिक उद्देश्य येन केन प्रकारेण स्वयं सत्ता, सम्पत्ति एवं शक्ति प्राप्त करना था। अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्ति के लिये दोनों को सत्यनिष्ठा अथवा साधनों की शुचिता से कोई सरोकार नहीं था। उनकी मान्यताओं के अनुसार सफलता स्वयं ही साधनों के औचित्य को निर्धारित करती है और विफलता उनके अनौचित्य को।

मोहित सतिया और विमलसिंह की राजनैतिक गतिविधियों और उनके सवर्णों के प्रति किये जाने वाले विषवमन को ध्यान से समाचार पत्रों में पढा़ करता था - उसे उनके सामाजिक उद्देश्य के औचित्य में कोई संदेह नहीं था परंतु उनके द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया सामाजिक वैमनस्यता एवं विघटन को बढा़ने वाली लगती थी।

अगले वर्ष मोहित को आई. ए. एस. की प्रतियोगिता में बैठना था, अत वह प्रयत्न कर अपना ध्यान प्रतियोगिता की पढा़ई में लगाने लगा और प्रथम प्रयास में ही आई ए. एस. में चयनित हो गया था। तब अपनी सफलता की प्रसन्नता केा सतिया से बांटने का लोभ वह सम्वरण न कर सका था और नेशनल एकेडेमी आफ़ एडमिनिस्टे्शन, मसूरी में प्रशिक्षण हेतु जाने से पूर्व एक बार वह सतिया से मिलने उसके घर पर गया था, परंतु दरवाजे़ पर ताला लटकता पाकर वह निराश होकर वापस लौट गया था।

सतिया से मिलन की इच्छा मन में दबाये हुए दूसरे दिन वह मसूरी चला गया था।

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