हिम स्पर्श - 32

“गेलिना जी, यह मेरा सौभाग्य है कि आप यहाँ हो।“ जीत ने गेलिना का स्वागत किया।

“यह तो मेरा सौभाग्य है कि भारत जैसे अदभूत देश को देखने का मुझे अवसर मिला है. कच्छ प्रदेश को भी। वास्तव में भारत भ्रमण की मेरी योजना थी ही। तुम्हारा आमंत्रण मिला और मैं यहाँ दौड़ी चली आई।“गेलिना भी उत्साह से भरी थी।

गेलिना झूले पर बैठ गई और जीत के घर को देखने लगी। वह मन ही मन बोली,”यहाँ से अथवा…” गेलिना झुले से उठी इधर उधर घूमी। दीवार के समीप, झूले से आठ दस फिट की दूरी पर एक स्थान पर रुक गई,”हाँ, यही ठीक रहेगा।“ गेलिना के अधरों पर स्मित था।  

जीत गेलिना को, उसके हाव भाव को देख रहा था किन्तु कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।

“जीत, चलो प्रारम्भ करते हैं।“ गेलिना ने आदेश दिया।

“क्या?” जीत ने पूछा।

“चलो चित्रकला प्रारम्भ करो। कहाँ है वह सब साधन जो चित्रकला के लिए लेकर रखने को मैंने कहा था।“

“सब तैयार है।“ जीत सब सामान ले आया।

“तुम्हारा चित्राधार यहाँ रखो। यहाँ रंगों को रखो, यहाँ तूलिकाएं रखो, चलो प्रारम्भ करते हैं।” गेलिना व्यस्त हो गई।

“किन्तु, गेलिना जी, आप अभी अभी तो आई हो। यात्रा से थकी हुई हो। थोड़ा विश्राम कर लो फिर करते है। अथवा कल से प्रारम्भ करते हैं।“

“नहीं, जीत। समय दौड़ता रहता है। कई काम करने हैं, बहोत कुछ सीखाना है।“

“गेलिना जी, मैं शीघ्रता से सीख लूँगा। आप निश्चिंत रहो।“

“जीत दो बातें हैं। एक, तुम चित्रकला कितनी जानते हो और सिखनी की तुम्हारी गति कितनी है? मुझे संज्ञान नहीं इस बात का।  दूसरा, मेरे पास यहाँ रुकने के लिए केवल चार दिवस ही है। इन चार दिवस में मुझे यह कला तुम्हें सिखानी हैं और यहाँ के सौन्दर्य को देखना भी है। तुम मुझे मरुभूमि की अनुभूति करवाओगे ना? तो चलो, प्रारम्भ करो।“

“फिर भी गेलिना जी थोड़ा विश्राम..।“ जीत की बात गेलिना ने काट दी।

“नहीं। विश्राम के लिए समय नहीं है। और यह “जी” क्या होता है?”

“ओह, हम भारतवासी किसी के भी नाम के पीछे ‘जी’ जोड़ देते हैं। इस प्रकार उस व्यक्ति का सम्मान करते है। आप तो मुझसे बड़ी हो, मेरी दादी जैसी हो तो मैंने ‘जी’ का प्रयोग किया।“

गेलिना हंस पड़ी।

“ओह मेरे पुत्र, मैं दो सुंदर बच्चों की दादिमा बन गई। एक स्वीडन में और एक यहाँ।” वह फिर से हंसने लगी। “किन्तु तुम मुझे गेलिना ही कहोगे, केवल गेलिना। और मित्र हैं हम, तो तुम मुझे आप नहीं किन्तु तुम से संबोधित करोगे। ठीक है?” गेलिना के मुख पर मधुर भाव थे, अधरों पर अलौकिक स्मित था।

गेलिना ने चित्राधार लगा दिया। रंग, केनवास, तुलिकाएँ, पानी, रकाबी आदि उचित स्थान पर रख दिये।

वह झूले पर जा बैठी और सभी वस्तुओं का निरीक्षण करने लगी।

“वाह, सभी वस्तुएं अपने स्थान पर है। चलो प्रारम्भ करते हैं।“ संतुष्ट हो कर गेलिना ने जीत की तरफ देखा,”पेंसिल कहाँ है?”

“यहाँ है, यह रही।“जीत ने गेलिना को पेंसिल दी।

“तुम्हारा अभ्यास अब प्रारम्भ होता है। ध्यान से सीखना। केवल सीखने पर ही ध्यान देना होगा, बाकी सभी विचारों को मन से विदा कर दो।“

जीत, गेलिना से एक चित्त होकर सीखने लगा।

“प्रथम, केनवास पर सरल सा चित्र बनाओ।“ गेलिना सीखाने लगी।

“कैसे और कौनसा चित्र रचना है? मुझे कुछ नहीं आता। मैंने कभी नहीं किया।“ बालक की भांति जीत व्याकुल हो गया।

“निश्चिंत रहो। पेंसिल लो और चतुष्कोण, त्रिकोण, गोल अथवा कोई भी आकार जो तुम बना सको उसे बनाओ। कोई विशेष नियम नहीं है, कोई बड़ा विज्ञान नहीं है इसमें।“

जीत ने दो-तीन छोटे छोटे चतुष्कोण एवं गोल बनाए। जीत ने अपना प्रथम चित्र बना कर गेलिना को देखा। वह जीत को सस्मित देख रही थी।

लगता है मैं प्रथम कक्षा में हूँ और गेलिना मेरी शिक्षिका है। जीत के मुख पर शिक्षिका के लिए विस्मय के भाव थे।

गेलिना ने उन भावों को पढ़ा, मन ही मन आनंदित हुई। जीत अभी भी गेलिना के प्रतिभाव की अपेक्षा में उसे निहार रहा था।

“अति सुंदर, मेरे पुत्र। तुम चित्रकार बन सकते हो। स्वयम पर विश्वास रखना।“गेलिना ने स्मित दिया।  

“ओह, क्या यह सत्य है?” जीत ने पूछा।

जीत ने जो आकार रचे थे वहाँ गेलिना ने पेंसिल से कुछ निशानियाँ की।

“यहाँ देखो। यदि तुम इस रेखा को थोड़ा अंदर की तरफ खींचते तो अधिक सुंदर बनता। इस चित्र में थोड़ा सा परिवर्तन करने पर अधिक सुंदर बनेगा, क्या तुम ऐसा करोगे?” गेलिना ने एक आकार में थोड़ा परिवर्तन कर दिया। वह सुंदर लगने लगा। “अब तुम करके दिखाओ।“

“मैं कर सकता हूँ, करता हूँ।“ जीत ने भी आकृतियों को परिवर्तित किया। उन आकारों को पुन: देखकर बोला,” वाह। मैं चित्र बन सकता हूँ।“ वह आनंद से नाच उठा।

“सुंदर। जीत अब इस केनवास को अनेक नये आकारों से भर दो।“ गेलिना दूर जाकर झूले पर बैठ गई; गगन, बादल, पंखी एवं क्षितिज को निहारने लगी। जीत अपने कार्य में व्यस्त हो गया।

कुछ समय पश्चात जीत ने अपना काम पूरा किया। केनवास अनेक आकारों से भर गया था।

“आगे क्या करूँ?” जीत ने गेलिना से पुछ।

“वह रकाबी लो और किसी एक रंग की टिकिया उस में डाल दो।“

“यहाँ तो अनेक रंग है, कौन सा रंग लूँ?”

“यह तुम्हें पसंद करना है। स्वयं निर्णय लो।“

जीत विचार में पड़ गया। आस पास द्रष्टि करने लगा। उसकी द्रष्टि गेलिना पर जा अटकी। जीत ने निर्णय कर लिया,” मैं नारंगी रंग पसंद करता हूँ।“ जीत ने कहा।

“अच्छी पसंद है। तुमने नारंगी रंग ही क्यों पसंद किया? कोई अन्य रंग क्यों नहीं?”

“तुमने नारंगी रंग की कुर्ती जो पहेनी हुई है। मेरा प्रथम चित्र, उसका यह नारंगी रंग और उस चित्र की प्रेरणा अर्थात गेलिना। यह चित्र से मुझे सदैव तुम्हारा स्मरण रहेगा।“ जीत ने कारण बताया।

“बुध्धीमान बालक हो तुम। चलो अब रंग की टिकिया रकाबी में रखो। तूलिका को पानी में डुबाओ। यदि तूलिका में अधिक पानी हो तो उसे झटक देना। पानी की मात्रा थोड़ी सी ही रखना।“

“गेलिना, इतनी उतावली मत बनो। मैं अभी नया नया विध्यार्थी हूँ और इतनी तेज गति से मैं सीख नहीं पाऊँगा। क्या फिर से कहोगी? धीरे धीरे कहना।“

गेलिना ने सब बातों का पुनरावर्तन किया, जीत ने अनुसरण किया।

“आगे क्या करना है?” जीत ने पूछा।

“पानी की कुछ बूंदें रंग पर डालो। अधिक पानी नहीं डालना है, थोड़ा ही डालना। केवल रंग की टिकिया को घन से प्रवाही करना है।“ गेलिना जीत के काम को निहारती रही। जीत ने पूरा और उचित अनुसरण किया।

“पूरा रंग घुल जाने पर इन आकृतियों में रंग भर दो।“ जीत ने वही किया।

“इसे देखो। रंग गाढ़ा लग रहा है। एक स्थान पर चिपक गया है। इस का मैं क्या करूँ?” जीत ने रंग भरने का प्रयास किया।

“कुछ नहीं, बस थोड़ा पानी और डाल दो।“

“वाह, सुंदर। अब ध्यान से सुनो। पानी और रंगों के मिश्रण का अभ्यास करते रहो। समय रहते सीख जाओगे। आवश्यकतानुसार रंग और पानी का मिश्रण करना है और कागज पर खींची आकृतियों को रंगों से भरना है। यदि सूखा चित्र करना हो तो पानी थोड़ा चाहिए और चित्र प्रवाही करना हो तो रंग में पानी अधिक चाहिए। कितना सरल है यह।“ गेलिना समझाती रही,”चित्र को सूखने दो, थोड़ा पानी डालो। ना, वह नहीं, हाँ वह रंग भरो। चित्र पर तूलिका धीरे धीरे चलाओ।“

जीत वैसा ही करता रहा। जीत ने सभी आकृतियों में भिन्न भिन्न रंग भर दिये।

जीत ने अपना प्रथम चित्र, रंगों के साथ पूर्ण कर दिया। वह उसे लंबे समय तक निहारता रहा। वह प्रसन्न था।

“आधी जीत तो सुंदर प्रारम्भ से ही प्राप्त हो जाती है। अभिनंदन जीत।“ गेलिना ने जीत को प्रोत्साहित किया। जीत ने स्मित दिया।  

“चलो अब दूसरा चित्र बनाओ।“

“दूसरा कौन सा चित्र बनाऊँ? कैसे बनाऊँ?”

“पहले तो चित्राधार पर केनवास बदल दो। भीगी तूलिका से उसे भिगो दो।“

जीत ने केनवास भिगो दिया।

“अब भिन्न भिन्न रंगों से उस पर चित्र बनाने का प्रयास करो। जैसे जैसे केनवास सूखेगा, सभी रंग अपने रंग बदलने लगेंगे। उस बदलाव का निरीक्षण करो। अब बिना पेंसिल से सीधे तूलिका से ही चित्र रचना है तुम्हें।“

जीत सीधे ही तूलिका से चित्र बनाने लगा। उसने भिन्न भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न रंग भर दिये।

“यह तो सरल है।” जीत प्रसन्न हो गया।

“अब एक ही स्थान अथवा एक ही आकृति में एक से अधिक रंग का प्रयोग करो।“ जीत ने वैसा ही किया। धीरे धीरे चित्रकारी सीखने लगा, जीत।

तीन दिवस से जीत गेलिना से चित्र सीख रहा था। गेलिना ने जीत को गगन, पंखी, बादल, सूरज, चंद्र, वर्षा, तारें आदि अनेक चित्र बनाना सीखा दिया। जीत ने भी पूरी निष्ठा से उसे सीखा। जीत को अब एक कला का ज्ञान था, चित्रकला। वह प्रसन्न था।

 

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Hetal Thakor 2 महीना पहले

Avirat Patel 3 महीना पहले

Nikita 3 महीना पहले

Nita Shah 3 महीना पहले

Amita Saxena 7 महीना पहले