हिम स्पर्श - 31

जीत की हथेली अनायास ही खुल गई। वह खुली हथेली को देखता रहा। उसे लगा जैसे उसकी बंध मुट्ठी से कुछ फिसल गया हो, सरक गया हो, छुट गया हो।  

“क्या था जो अभी अभी हाथों से छूट गया?” जीत चारों दिशाओं में, ऊपर, नीचे, उसे खोजता रहा।  किन्तु ना तो वह उसके हाथ आया ना वह समझ पाया कि जो छूट गया वह क्या था। जो छूट गया वह कहीं विलीन हो गया। जीत निराश हो गया। 

वफ़ाई मौन थी। जीत के मुख पर परिवर्तित होते रहे भावों को देख रही थी, उसे समझने का प्रयास कर रही थी।

“जीत, कहाँ हो? कहीं किसी का स्मरण तुम्हें विचलती तो नहीं कर गया?” वफ़ाई जीत के समीप गई। 

जीत ने आँखें खोली, सामने वफ़ाई को पाया। अचंभित सा रह गया, जीत।

“यह सहज है जीत, कि कभी कभी हम यहाँ होते हुए भी यहाँ नहीं होते हैं। और जहां नहीं होते हैं वहाँ नहीं होते हुए भी होते हैं।“

“किन्तु ऐसा होता क्यों है?”

“यह होना, ना होना कुछ भी हमारे बस में नहीं है। यह प्राकृतिक है, स्वाभाविक है। उसके कारणों में क्यों पड़े हम?”

“तो क्या करें हम?”

“हम कर भी क्या सकते हैं? कुछ नहीं। हमें कुछ करना भी नहीं चाहिए। बस, जब जब ऐसी क्षण आए तब तब उन क्षणों का आनंद लेते रहना चाहिए। वह क्षण का भार लेकर नहीं चलना चाहिए।“

“वफ़ाई, यही तो समस्या है। उन क्षणों से भय नहीं लगता किन्तु उन क्षणों का भार विचलित कर देता है। सब कुछ छिन्न भिन्न कर देता है।”

“एक उपाय है इसका, सीधा एवं सरल। तुम कहो तो मैं कहूँ।”

“कहो।“

“जीत, हमें ऐसे क्षणों में रो लेना चाहिए।“

“यदि रो न सके तो?”

“तो उसे किसी को बता देना चाहिए। दोनों विकल्प है, अब पसंद तुम्हारी।“

“वफ़ाई, तुम सुनोगी क्या उन बातों को?”

“मैं तो अधीर हूँ तुमसे बात करने को, तुम्हारे अतीत को जानने को। तुम हो कि बताते नहीं हो।“

“बता तो दूँ....।” जीत रुक गया।

“तो तुम मुझे सब कुछ बताने जा रहे हो। वाह जीत, आओ बैठो।“ वफ़ाई उत्साह से भर गई। उसे मन तो हुआ कि जीत का हाथ पकड़कर उसे झूले तक ले जाऊं। वफ़ाई ने अपनी अभिलाषा को वहीं छोड़ दिया। झूले पर जाकर बैठ गई, जीत की प्रतीक्षा करने लगी।

“जीत, तुम मुझे सब बता रहे हो ना?” वफ़ाई ने पुन: पूछा।

“हाँ भी, नहीं भी।“ जीत झूले के समीप आ खड़ा हुआ। वफ़ाई जीत की तरफ मूड गई।

“हाँ और ना, दोनों?”

“हाँ का अर्थ है मैं तुम्हें यह बताने जा रहा हूँ कि मैंने यह चित्रकला कैसे सीखि। ना का अर्थ है मैं तुम्हें अभी वह बात नहीं कहूँगा कि मैं सब कुछ छोड़कर यहाँ कैसे आ गया।“

“तुम जो उचित समझो वह बता दो। जीत, मैं अधीर हूँ इन बातों को जानने के लिए।“

“वफ़ाई, मैं भी नहीं जनता था कि चित्र कैसे बनाया जाता है। मुझे भी सीधी रेखा तक खींचना नहीं आता था। मुझे रंगों की भी कोई समझ नहीं थी। रंगों के मिश्रण, रंगों से उत्पन्न होते भावों आदि का कोई ज्ञान नहीं था।“ जीत क्षण भर के लिए रुका।

“जीत, तुम बिना रुके कहते रहो। मैं एकाग्रता से सुन रही हूँ। तुम कहते रहो, मैं सुनती रहूँ तो रस क्षति नहीं होगी।“

“मैं प्रयास करूंगा।“

“ठीक है, मैं तैयार हूँ। और हाँ, झूले पर बैठकर बातें कर सकते हो।“

जीत ने वफ़ाई के आमंत्रण की उपेक्षा की, वह खड़ा ही रहा।

“यह मकान खरीदने के पश्चात मैं निश्चिंत हो गया। कुछ ही दिनों में एकांत से मन भर गया। तब विचार आया कि क्यों ना मैं सारे संसार के संपर्क में रहूँ? इस हेतु मैंने नया ई-मेल बना लिया। प्रत्येक घंटे के बाद मैं अपने ई-मेल को देखता रहता था कि किसी ने मुझे कोई संदेश तो नहीं भेजा। कई दिनों तक मेरा इन-बोक्ष खाली रहा। मैं निराश हो गया।

मैंने ई-मेल देखना ही छोड़ दिया। किसी से संपर्क होने की आशा भी छोड़ दी। मैं पुन: एकांत से घिर गया। मैं ई-मेल को लगभग भूल ही गया था।" जीत दूर कहीं गगन को देख रहा था, किसी अज्ञात में खो चुका था।

“जीत, फिर क्या हुआ?” 

जीत ने नि:श्वास लेते कहा,”एक दिन मैंने यूं ही ई-मेल देखा और पाया कि किसी गेलिना बाबोक ने मुझे कोई ई-मेल भेजा है। मुझे आश्चर्य हुआ। यही पहली जीवित व्यक्ति थी जिसने मुझे ई-मेल भेजा था। मैं अधीर हो गया, ई-मेल और उसे भेजनेवाले के विषय में जानने के लिए। मैंने उसे शिघ्रता से खोला और पढ़ने लगा।

‘हेय जीत, मैं गेलिना बाबोक, स्त्री, 65, स्वीडन से। मेरी मित्रता स्वीकार करोगे? अपने विषय में विस्तार से कुछ कहो। तब तक मैं यहाँ के सौन्दर्य की तस्वीरें भेज रही हूँ। मुझे आशा है तुम्हें पसंद आएगी।‘

ई-मेल में 3 सुंदर तस्वीरें थी। एक, समुद्र के तट की थी जिसमें नारिएली लगी हुई थी, नीला समंदर और नीला गगन था। दूसरी, हिम से आच्छादित पहाड़ों की थी। तीसरी, अत्यन्त ऊंचाई से गिरते जल प्रपात की थी।

मैं उसे बारंबार देखता रहा, निहारता रहा। तस्वीरें इतनी सजीव थी कि जैसे सागर, हिम, पहाड़, जल प्रपात, यह सब मेरे सामने ही हो। मैं उसके होने की अनुभूति के रस को मरुभूमि में रहते हुए भी पिता रहा। मैं आँखें बंध कर कई क्षणों तक उसका आनंद लेता रहा।

वफ़ाई, सुखी इस मरुभूमि में रहते हुए भी रस से भरे विश्व की अनुभूति करना मुझे रोमांचित कर गया।

पैंसठ वर्ष की एक अज्ञात स्त्री जो दूर किसी अज्ञात स्थल पर रहती हो, जो मुझ से मित्रता चाहती हो, एक सुखद अनुभूति थी वह क्षण मेरे लिए।“ जीत थोड़ा रुका। वफ़ाई की तरफ देखा। वह जीत को ही निहारती रही थी, एक ध्यान होकर जीत को ही सुन रही थी। जीत को लगा जैसे वफ़ाई भी समय के उस पड़ाव पर चली गई हो।

जीत ने आगे कहा,”मैंने गेलिना की मित्रता स्वीकार कर ली। उसे ई-मेल का प्रत्युत्तर देने लगा। कुछ शब्द लिखने के पश्चात मैं रुका और सोचने लगा कि मैं भी मरुभूमि की तस्वीरें भेजूं तो?

मेरे मन ने मुझे रोका,

नहीं जीत, सुखी मरुभूमि की तस्वीरें मत भेजो। वह सुंदर स्थल पर रहती है। उसे मरुभूमि की तस्वीरें विचलित कर सकती है। हो सकता है कि मित्रता समाप्त ही हो जाय। तुम उसे प्रकृति के सौन्दर्य से भरी तस्वीरें भेजो जो उसे पसंद आए।

मन में द्वंद चालू हो गया।

मेरे पास ऐसी तस्वीरें है ही नहीं। मुझे वह वस्तु भेजनी चाहिए जो उसके पास नहीं हो। हिम, सागर, पहाड़ आदि का सौन्दर्य तो उसके पास है ही। उसके पास रेत अथवा मरुभूमि की सुंदरता नहीं है। मैं उसे रेत से भरे मरुभूमि की तस्वीरें ही भेजूँगा।

सुंदर विचार है, जीत। तुम यही करो।

मैंने मरुभूमि की तीन चार तस्वीरें खींची और ई-मेल से भेज दी। घंटों तक गेलिना के प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा करता रहा। उसका कोई जवाब नहीं आया। मैं निराश हो गया।

दूसरे दिवस गेलिना का ई-मेल आया। मैंने अधीरता से उसे खोला, पढ़ने लगा। गेलिना ने अदभूत जवाब दिया था। उसने कुछ चित्र भेजे थे।“

जीत के शब्द सुनकर वफ़ाई उत्तेजना से बोल पड़ी, “ओह, क्या बात है?” वह उत्साह से खड़ी हो गई।

“वफ़ाई, मैंने भी इसी तरह प्रत्याघात दिये थे। जैसे तुम अभी उछल पड़ी हो मैं भी वैसे ही उछल पड़ा था।“

“जीत, वह चित्र किसके थे? क्या था उन चित्रों में?” वफ़ाई ने पूछा।

“वह अविश्वस्निय थे, अदभूत थे, अविस्मरणीय थे। वह चित्र मरुभूमि के थे। मैंने मरुभूमि की जो तस्वीरें भेजी थी उसी के चित्र थे वह सब।“

“ओह, जीत। तुम अदभूत बात कह रहे हो।“

“मुझे उन चित्रों ने आकृष्ट किया। मुझे वह चित्र भा गए। मैंने ई-मेल में लिखा, तुमने जो चित्र भेजे हैं वह अदभूत है, अनुपम है। यह चित्र किसने बनाए हैं?”

‘वह चित्र मैंने बनाए हैं” गेलिना का जवाब आया था।

“ओह, कितना सुंदर! क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ? मैं चित्रकला सीखना चाहता हूँ। क्या तुम मुझे वह सिखाओगी?” मैंने उसे विनती करी।

“जीत, यह तो अत्यंत रोचक घटना है। तो तुमने गेलिना से चित्रकला सीखि? आगे कहो कि गेलिना ने तुम्हें यह सब कैसे सिखाया, वहाँ दूर रहते हुए भी।“ वफ़ाई ने पूछा।

“वफ़ाई, उसने जवाब दिया कि मैं सीखा सकती हूँ किन्तु इन्टरनेट अथवा ई-मेल के माध्यम से नहीं। यदि तुम उसे सीखना चाहते हो तो तुम्हें मुझे साक्षात मिलना होगा। गेलिना ने कुछ और चित्र भी भेज दिये।

मैंने भी लिखा,”यह तो संभव नहीं होगा। यह तो मेरी बिनती को तुम नकार रही हो। मैं निराश हुआ हूँ।“

गेलिना ने लिखा,’नहीं जीत। मैं नकार नहीं रही हूँ। मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती। चित्रकारी मेरा उत्कट आवेग है, मेरी उत्कट भावना है। यदि कोई मेरे चित्रों के विषय में बात करता है तो मैं रोमांचित हो जाती हूँ। तुमने ना केवल मेरे चित्रों में रुचि दिखाई है अपितु तुम उसे मुझ से सीखना भी चाहते हो। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। यह मेरा सम्मान है, मेरी कला का सम्मान है। मैं तुम्हें अवश्य सिखाऊँगी। निराश मत हो।“

“जीत, फिर क्या हुआ। गेलिना का व्यक्तित्व अदभूत है।“ वफ़ाई झुले से खड़ी हो गई।  

“उसके पश्चात गेलिना का कई दिवस तक कोई ई-मेल नहीं आया। मैं खूब निराश हो गया।“

“स्वाभाविक है, जीत।“

“वफ़ाई, इस मरुभूमि में गेलिना मेरी पहली मित्र थी, एक मात्र मित्र थी। समय व्यतीत होता गया। मैं गेलिना और उसके स्मरणों को भूलता गया। मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं ई-मेल से दूर ही रहूँगा।

अनेक दिवस समय के पंख लेकर कहीं दूर उड़ गए।

एक सुंदर प्रभात में मैं गगन को निहार रहा था जो काले बादलों से समृध्ध था। कहीं दूर क्षितिज में वर्षा हो रही थी और यहाँ तक वर्षा किसी भी क्षण आ सकती थी। गगन, बादल और दिशाएँ मुझे आनंदित कर रही थी।

ओ मेरे हृदय, तुम क्यों आनंदित हो? मैंने मेरे ह्रदय से पूछा था।

प्रकृति सदैव कुछ संकेत देती रहती है, उस का अनुसरण करो। तुम्हारे साथ कुछ सुंदर घटना होने वाली है यही कारण है कि मैं आनंदित हूँ। मेरे हृदय ने उत्तर दिया था।“

“फिर?” वफ़ाई अधीर थी।

“मेरे अधरों पर स्मित था। मैं सहज ही धरती को नमन कर बैठा।

मेरा फोन गीत गाने लगा। वह गेलिना का फोन था। मैंने उत्साह से फोन लिया, बातें करने लगा।

वह कह रही थी,“जीत, मैं भारत आ रही हूँ, अगले सप्ताह। तुम्हें मिलने की भी योजना है। मैं कच्छ आ रही हूँ। तुम मेरे स्वागत के लिए तैयार तो हो न?”

मैं फोन के इस तरफ नि:शब्द था। उत्तर मैं मैं कुछ कह नहीं सका।

“तुम मौन क्यों हो? जीत, मेरे आने की बात सुनकर तुम ….।” गेलिना कह रही थी।

“नहीं, नहीं। ऐसी कोई बात नहीं है।“

“तो? क्या बात है?”

“यदि यह सत्य है कि तुम भारत आ रही हो तो यह सत्य से भी अधिक सुंदर है, मेरी कल्पना से भी अधिक मधुर है, मेरे विश्वास से भी अधिक सबल है।“

“केवल भारत ही नहीं, कच्छ भी आ रही हूँ। विशेष रूप से तुम्हारे पास आ रही हूँ। तुम्हारे लिए आ रही हूँ।“

“मेरे लिए?”

“हाँ तुम्हारे लिए। मैं तुम्हारे साथ कुछ दिवस रहूँगी। उस समय मैं तुम्हें चित्रकला सिखाऊँगी।“

“ओह ईश्वर। यह सुनने में अत्यंत मधुर लग रहा है। किन्तु क्या तुम सत्य कह रही हो अथवा मेरा उपहास कर रही हो?” मैंने भी संदेह से पूछा था।

गेलिना ने फोन काट दिया था। कई क्षण तक मैं विस्मय से फोन को देखता रहा। मैं सोचता रहा कि गेलिना ने मेरे साथ कोई खेल खेला होगा। कोई इतनी दूर से मुझे मिलने आए, मुझे चित्रकला सीखाने हेतु मेरे घर तक आए, मेरे साथ रहे। यह सब मुझे उपहास ही लग रहा था। मैंने गेलिना की भारत यात्रा के विषय में सोचना छोड़ दिया।

दूसरे दिवस मैं ई-मेल देख रहा था। गेलिना का मेल था। उसमें उसकी भारत यात्रा की टिकटें थी। मुझे तब भी विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने हवाई यात्रा के PNR जाँचे और पाया की वास्तव में गेलिना भारत आ रही है।

मेरे लिए वह क्षण सुखद थे। बादलों ने मेरे गगन में प्रवेश कर लिया था। वर्षा की बूंदें मेरे तन को, मेरे मन को और मेरी इस मरुभूमि को स्पर्श करने लगी थी।“

जीत उन क्षणों के स्मरणों में खो गया। मौन हो गया। वफ़ाई भी उस मौन में बसे रोमांच को अनुभव करने लगी।

अनेक क्षण व्यतीत हो गए। जीत के मौन की समाधि को वफ़ाई ने भंग किया,”जीत, गेलिना भारत आई थी? यहाँ रुकी थी?”

“हाँ, वफ़ाई। गेलिना भारत आई थी। एक दिवस गेलिना का संदेश आया,’जीत, मैं भारत में हूँ और संध्या तक कच्छ आ रही हु।‘

मैं अधीर हो गया, संध्या होने की प्रतीक्षा करने लगा। संध्या के समय मैं और गेलिना साथ थे। मेरे लिए यह एक सुखद आश्चर्य था कि एक स्त्री स्वीडन से यात्रा कर मेरे घर तक आई थी, मुझे मिलने आई थी, मुझे चित्रकला सीखने आई थी। वह अकल्पनीय था, किन्तु सत्य था। हाँ, गेलिना और मैं साथ साथ थे।“

“वाह जीत, यह तो रसप्रद है। तुम आगे कहो, सब कुछ कहो। मैं उत्सुक हूँ।“ वफ़ाई के अधरों पर स्मित था, मुख पर आनंद।

“मैं तुम्हें समय के उस काल खंड में ले चलता हूँ। तुम उसे अपनी आँखों से देखो, स्वयं ही उसे अनुभव करो।“

 

-- व्रजेश दवे

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