कविताए Nagendra Dutt Sharma द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
  • वंश - भाग 8

    आठ उस दिन की गोष्ठी के बाद आयोजकों और अन्य विशिष्ट व्यक्तियो...

  • तू भी सताया जायेगा ! - भाग - 3

    जय श्री कृष्णा ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने,प्रणतः क्ल...

  • Love Contract - 15

    रिवान और विराज दोनों रसीली बाई को घर लेकर पहुंचे । मेन गेट क...

  • हमसफर - 11

    हर रोज की तरह आस्था की दिन की शुरुवात सुबह 5 बजे ही हुयी ......

  • रिबर्थ ऑफ़ डेविल - 7

    क्लास में अभी सब एक दूसरे से बातें कर रहे थे कि तभी अचानक से...

श्रेणी
शेयर करे

कविताए

!!! व्यक्ति और संस्था !!!

एक व्यक्ति जहाँ पा लेता है अपना रोजगार
वह संस्था उसके लिए होती है जैसे घर-बार
लेकिन क्या सारे लोग करते हैं ऐसा व्यवहार
सौ में नब्बे नहीं रखते हैं कर्त्तव्य से सरोकार
आते हैं, मौज मनाते हैं, कार्य रहता दरकिनार
सुविधाएँ तो उन्हें चाहियें, जताते हैं अधिकार
करते हैं दस मेहनत तो सौ उसके हिस्सेदार
देश करे कैसे प्रगति, कैसे चलेगी यूं सरकार
बनेगी नयी राहें, कैसे खुशहाली रहेगी बरकरार
न बदला अगर नजरिया संकट आएंगे बारम्बार
इसीलिए कहता हूँ जगाओ नयी चेतना का संसार
भाईचारा बना रहे, आपस में बढे सभी में प्यार
करें कुछ काम तब, जब मिले नंबर दो का दाम
कुछ खा जाएँ,पचा जाएँ उसे, फिरभी न करें काम
बेशर्म हैं इतने, समझें चक्कर कटवाने में शान
करलो मजे जितने कर सको, सोच है नादान
उनको नहीं पता जब आता है प्रतिकूल समय
चुकानी पड़े कीमत आये विपत्ति जब असमय
जो लोग न करें निर्वाह ठीक अपने कर्त्तव्य का
नाम भी मिट जाता है जहाँ से ऐसे असभ्य का
करना चाहे जो अपना भविष्य निर्माण सफल
करे पहले वह अपनी नकारात्मक सोच विफल
नहीं यह सीख कोई, हैं ऊर्जावान कुछ विचार
जीवन में जो अपनालो, तो आनंद होगा अपार
असंभव को संभव कर देना है अपने ही हाथ में
रात्रि को प्रकाशित करना जैसे चन्द्रमा के हाथ में
व्यक्ति एक इकाई है सीमित नहीं जो दहाई तक
आंकड़ों की जैसे नहीं सीमा चली जाये सिधाई तक
व्यक्ति से व्यक्ति जुड़कर, होता संस्था का निर्माण
प्रगति से कोई देते आहुति तो कोई फूंकते उसमे प्राण
होते कई शुभाकांक्षी तो कोई स्वार्थ-लिप्सा की कटार
सींचे कोई पौधा समझके, कोई नोचे इसे हर प्रकार
निर्मित होते समूह स्वार्थों के करते हुए अत्याचार
अपने ही अर्थों को लेकर बदले होते सब के विचार
फिर होती निर्लज़्ज़ प्रतिद्वंदिता उलट जाते प्रतिमान
किसने सींचा, किसने सुखाया, कौन देखे ये दिनमान
निर्बल वृक्ष की तरह फिर होती संस्था दृश्यमान
खाते फल तोड़-तोड़ जब तक न पा जाती ये त्राण
जिम्मेदार हैं इसके कुछ ही पथभ्रष्ट स्वार्थी लोग
दुखी करें आत्माएं औरों की बिगाड़ें अपना परलोक
कोई अन्याय करने से पहले दे देना थोड़ा सा ध्यान
अंतकाल पछताने से अच्छा रख लेना हरी का मान
–नागेंद्र दत्त शर्मा

!!! प्रेरणा-स्रोत !!!

जब भी कभी भोर होते ही झरोखे से मैं बाहर देखता हूँ
उगते सूरज को तथा उसकी महिमा को, नमन करता हूँ
मेरे मन में होता है इससे, एक नवीन प्रेरणा का संचार
जन्मते हैं नए भाव, नवीन संभावनाएं , नवीन उदगार
हर दिन जैसे एक नया दिन, लाये नए संदेशों के उपहार
बनते हैं प्रयोजन कुछ नया करने को, होते स्वप्न साकार
बीते अनुभव देते हैं, नयी कल्पना, नयी सोच, नए विचार
जीवन के प्रत्येक पल में लेती नयी भावनाएं, नए आकार
जैसा होता जिसका नजरिया, वैसी ही होती उसकी उड़ान
जीवन के सतरंगी सपने सृजित करते हैं वैसे ही प्रतिमान
जीवन के हर क्षण में छिपा है एक नयी चेतना का संसार
जाने किस पल में दे जाये तुम्हे सुख और ख़ुशी ये अपार
कभी दुखों का सागर है तो कभी अति खुशियों की भरमार
कभी कल्पनाओं के गोते हैं तो कभी भावनाओं के अम्बार
बनते-बिगड़ते, संवरते-उजड़ते, अर्थ-अनर्थों के प्रतिमान
भूली-बिसरी यादें उपजती अनंत कल्पनाओं के दरमियान
ज्यूँ वृक्षों के घने झुरमुट में, नहीं कुछ दिखता आर-पार
वैसे ही हमारे जीवन-पथ में, सम्भावनाये हैं छिपी अपार
सोचता हूँ “नागेंद्र” न होता इस ब्रह्माण्ड में सूरज कभी
कैसे पोषण होता दुनिया का, होते न जीव-जंतु हम सभी

– नागेंद्र दत्त शर्मा

!!! मिलती है सजा ….!!!

मिलती है सजा हर कदम पे क्यों तुझे तेरे ईमान की।
मौत होती है हर दिन ‘नागेन्द्र’ क्यों तेरे अरमान की।।
सुकूने-जिंदगी तो जैसे हो गया हो एक ख़्वाब आजकल।
गाज़ गिरती है हमेशा छत पर क्यों तुम्हारे मकान की।।
कितने ही चाँद-सूरज रोज हर दामन में ही खिलते होंगे।
क़द्र क्यों नहीं होती है दोस्त सिर्फ़ तेरे जैसे इन्सान की।।
ज़ालिम हैं लोग देते जो ताना औरों को हर-इक बात पर।
करते सच को काला नही करते बात अपने गिरेबान की।।
करें कितना भी इल्म जाया हम इस ज़ालिम जमाने पर।
हो जाती दवा भी बेकार इस मर्ज़ पे हक़ीम सुलेमान की।।
क़ाश ऐ ख़ुदा तूने बेफ़साद सच्चे इन्सान ही बनाये होते।
सच्चाई तो अब रहगयी है जैसे तस्वीर एक श्मशान की।।
काश कि हर इन्सान फूल सा खिलके फूल सा ही हँसता।
क्यों न हो जिंदगी थोड़ी ही पर हो इज्ज़त और शान की।।

— नागेन्द्र दत्त शर्मा


!!! अकेलापन !!!

ये एकांत !
या कहो अकेलापन सा
काटता है दूर से ही
घोर अशांति में
चुभता है ज्यूँ एक तीर
निकल कर धनुष से –
कंटक से भी प्रलयंकारी –
बींधता है जो
हर पल मन को
और पीड़ित की
चीख-पुकार तक
सुन नहीं पाता है
ज्यूँ कोई और
बिंध जाती है
अदृश्य आत्मा तक
फिर सन्नाटा !
सन्नाटे में तो –
प्रकोप और भी
द्विगुणित हो जाता है
और यह शरीर
निर्जीव सा
एक मांस का लोथड़ा मात्र
दिखाई देता है
चेहरा जो मन का दर्पण है –
संज्ञाहीन जान पड़ता है
मगर फिर भी जीवन
जो क्षण भंगुर है
इस पार्थिव मिटटी को
लेकर चलता है
नीरसता को ही –
अपनी जिंदगी का
एक अंग मानकर
हृदय से लगाए रखता है
कितना अशांत !
कितना हत तेज !
सिमटा सा
अपनी ही दुनिया में
जैसे यह पागलपन का
बोध कराता है

- नागेन्द्र दत्त शर्मा

!!! करिश्मा ये कैसा कुदरत ने…!!!

करिश्मा ये कैसा कुदरत ने दिखाया है आज
खिली धूप में पानी कितना बरसाया है आज
सुबह आसमां पे बादल का कतरा भी न था
कैसे कुछ ही देर में सूरज को छिपाया आज
पहले हलकी बौछार फिर आसमान कैसे फटा
तड़तड़ाते ओलों से सबको कैसे दौड़ाया आज
रस्ते भर गए चारों ओर ओलों के बहते पानी से
सड़क पे चलना हुआ कठिन कैसे फंसाया आज
गिरे पत्ते पेड़ों से किस कदर ओलों की बौछार से
मानों बिछोना पत्तियों का जमीपे बिछाया आज
सुबह घर से निकला तो था मौसम एकदम साफ़
जब लौटने लगा बारिस ने कैसे भिगोया है आज
समझ न पाया हे प्रभु कैसी तेरी अजब जादूगरी
बसा तू कण-कण में कैसा ये दृश्य रचाया आज
– नागेन्द्र दत्त शर्मा

!!! आम आदमी !!!

आम आदमी झेल रहा है आज मंहगाई की मार
कोशिशे सरकार की भी सब क्यों होगयी बेकार ?
फैल गया देश में चहुँ ओर चोर-बाज़ारी का जाल
लूटता है पहले वही जिस पर करो पूरा ऐतबार
कोशिशे सरकार की भी सब क्यों होगयी बेकार ?
कीमतें फल-सब्जियों की छूने लगी आसमान
दाम कम करने के लिए तो कोई भी नहीं तैयार
कोशिशे सरकार की भी सब क्यों होगयी बेकार ?
ग़रीब आदमी जूझ रहा जिंदगी बचाने को आज
दाल चावल भी सारे बिकवा रहा सटटा-बाजार
कोशिशे सरकार की भी सब क्यों होगयी बेकार ?
अब गुजारा होगा कैसे इस माहौल में यूँ “नागेंद्र”
ख़ुदकुशी किसानों की, जैसे चौंकाती है बार-बार
कोशिशे सरकार की भी सब क्यों होगयी बेकार ?

–नागेंद्र दत्त शर्मा