स्वाभिमान - लघुकथा - 28 डा.कुसुम जोशी द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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स्वाभिमान - लघुकथा - 28

*तुम आजाद हो*

प्रवीन गुस्से से भरा बैठा था, चीखता हुआ बोला "अन्तिम बार कह रहा हूं शशि ! मेरी बात तुम्हें मान लेनी चाहिये.. वरना ठीक नही होगा"।

"क्या ठीक नही होगा..बचा ही क्या है अब..इस मजबूरी और दबाव की शादी में, नही माननी चाहिये थी मुझे किसी की भी बात",

"लगता है प्रकाश और रोहन के साथ जैसे छल कर दिया हो.. ये गिल्ट मुझे अपनी नजरों में ही छोटा साबित कर रहा है", ये कहते शशि की आवाज भर्रा गई ।

"अब ये रिश्ता और नही खींचा जा सकता इन हालातों में" प्रवीन खिसयानी सी आवाज में बोला।

"सही कहा..तुम लोगों का मकसद जो पूरा नही हो पा रहा..मैं ही मूर्ख थी,जो समझ नही पाई"।

"प्रकाश के गुजरने के बाद मां बाबा और तुम साये की तरह हमारे साथ लगे रहे..रोहन को एक पल भी अहसास नही होने दिये कि उसके पिता अब इस दुनिया में नही हैं..मुझे लगा तुम्हें और तुम्हारे परिवार को जिम्मेदारी का अहसास है",

"जिम्मेदारी का अहसास नही होता तो तुमसे शादी क्यों करता..भाभी कहता था..बड़ी हो मुझसे..फिर भी अम्मा बाबा की जिद में शादी की मैंने, आज तुम हमें ही धमकी दे रही हो"।

"धमकी नही दे रही हूं..पर सात महिने में सबके चेहरे उजागर हो गये हैं, उसी का खुलासा कर रही हूं" ,

"जब से प्रकाश के ऑफिस वालो ने तुम्हें अनुकम्पा नियुक्ति देने से मना कर दिया , तब से तुम्हारा व्यवहार बदलने लगा"।

"अब मां बाबा मुझे बार बार कह रहे हैं कि ये मकान मैं तुम्हारे नाम कर दूं , जिससे तुम्हें यहां रुकने का एक मकसद मिल जाये",

लेकिन ये मैं नही कर सकती , ये रोहन के पिता की अमानत है ,और रोहन का हक है।

"तुम कुछ क्यों नही कर सकती हो",प्रवीन तिलमिलाया सा बोला।

"कर सकती हूं ना..तुम्हें आजाद कर सकती हूं, और अगले महिने प्रकाश का ऑफिस ज्वाइन कर सकती हूं", तुम अपना निर्णय लेने को आजाद हो।

***

*कभी तो "नहीं"*

"आज मेरा पोता शान्तनु चार साल का हो गया है, 'जन्मदिन पर खूब आशीर्वाद प्यार मेरे बच्चे...' आप सभी मेरे जिगर के हिस्से को अपनी शुभकामनाओं से नवाजें, फेसबुक में ये स्टेटस डालते हुये रमा की आँखें डबडबा आयी,

रमा ने जिगर के टुकड़े को अभी तक गोद में लेकर दुलार नही किया था, न पास से देखा था,

सात समन्दर पार किसी देश में उसका जन्म हुआ और बेटा उसकी प्यारी सी हरकतों को कैमरे में कैद कर व्हाट्सएप या फेसबुक के जरिये उसे भेजता है, वीडियो देख ममता उमड़ आती, दिल भर आता..कई बार फफक फफक कर रो उठती, उसका मन होता वो उड़ कर उन तक पहुंचे और बच्चे को गोद में लेकर प्यार करे,पर बेटे ने कभी उससे आने का आग्रह नही किया, शायद उसकी नौकरी या अकेले होने के कारण..,

चार साल बाद वो सीएमओ कार्यालय से रिटायर हो जायेगी, बेटी श्रव्या अपनी पढ़ाई और विवाह के बाद लदंन में बस चुकी है, वो हमेशा आग्रह करती है कि मम्मा आप के पास ढेर सारी छुट्टीयां पड़ी हैं,आप छुट्टी ले और उनके साथ अपनी छुट्टीयां बितायें...

पर दिल डरता है रमा का, 'दामाद आदर्श क्या सोचेगें , जिस औरत का पति उसे छोड़ राजनीति में मशरुफ हो,और बेटा दुनिया के किसी देश में अपने पत्नी और बच्चे के साथ व्यस्त हो , उसके अकेलेपन में साथ सिर्फ बेटी ही दे

आज बेटे ने अपने गोद में उठाये पोते शान्तनु की फोटो भेजी और जन्मदिन पर आशीर्वाद का आग्रह किया..तो दिल भर आया,

साथ में एक मैसेज था "ममा नमस्ते, अब आप के रिटायरमेंट में चार साल का ही समय बचा है,फिर आप इतनी दूर अकेले पहाड़ों में रह कर क्या करेंगी, मैं सोच रहा हूं कि आप दिल्ली एनसीआर के पास कही फ्लैट ले कर रहें, मेरे कुछ दोस्त दिल्ली में हैं, कई अच्छे प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जो अच्छा और आपकी पॉकेट के हिसाब से हो,वो आप पता कर के बतायें कि 'आप के पास लगभग कितने का इन्तजाम है, और ये जो पहाड़ का मकान है इसकी कीमत लगभग कितनी होगी', मेरे कुछ दोस्त दिल्ली में रहते हैं वो आपकी मदद करेगें, हम लोग जब भी आयें तो मिलने में सुविधा रहेगी,

रमा को पांव के नीचे से जमीन दरकती महसूस हुई, पहली बार महसूस किया कि अपने बारे में सोचने का वक्त आ गया है,

पलायन इस उम्र में..एक अजनबी शहर..अंजान लोग..कैसे रोपित होंगी फिर से ये बूढ़ी जड़े...

नही.. नही.. वो अब ईश्वर के दिये इस नायाब सौगात "रिश्तों" के लालच में नही फंसेगी, इस 'नही' शब्द को सोचने के साथ ही उसका मन शान्त हो आया।

***

*स्वप्नजीवी*

हैलो डा. श्वेता कुछ काम बढ़ा आगे, डिपार्टमेंट में बैठ कर कितना खींच पायेंगी..बेहतर है घर ले जायें,

विभागाध्यक्ष डा. भौमिक की आवाज से चौंकी श्वेता उन्हें देखने लगी,

"रोज एक बंडल घर ले जायें, अगले दिन दूसरा..."यह कह डा.भौमिक ने अपनी बात पूरी की,

"सर रोज एक बंडल.. मजाक है क्या .."

"आप स्लो है इसलिये एक कह रहा हूं ,हम तो दो तक आराम से चैक कर लेते हैं"।

"सर आपको लगता है कि इन कॉपियों को इतने आराम से चैक किया जा सकता है?आज कल स्टूडेंट्स विशेष रुप से आर्ट्स फैकल्टी में समय पास करने आते हैं",

"अरे बाबा इतना डूब के माथा खराब करने की जरुरत नही, सरसरी तौर पर देख कर अपने हिसाब से नम्बर दो, कोशिश रहे कम से कम बच्चें फेल हों,बत्तीस तैत्तीस तो लगभग सभी को ...जो बच्चें ठीक हैं आप अपने हिसाब से.."

"आपको पता होना चाहिये कि ज्यादातर बच्चे गरीब, मजदूर, किसानों के हैं, जो दूर दराज गांवों से आकर पढाई करते हैं, और अधिकतर प्राईवेट फार्म भरते हैं"।

"सर इसका मतलब ये तो नही कि सही आन्सर के बिना ही हम इन्हें पास कर दें, सर ये तो कोई लॉजिक नही है",

सर ऐसा रिजल्ट देकर क्या हासिल होगा? सिर्फ नाम के पढ़े लिखे बेरोजगारों की संख्या में बढ़ोत्तरी... अज्ञानी को डिग्री ...जिस काम के लायक वह हैं, उनके पुश्तैनी काम धन्धें हैं, उसे करने लायक भी नही रहेगें वो, इसी भ्रम में जीयेगें की वो डिग्रीधारी हैं,

"बस मैडम..प्लीज ..जो मैं सुझाव दे रहा हूं ये ही करें, तो हमारे सेन्टर के लिये अच्छा रहेगा, आपको पता है कि ज्यादा खराब रिजल्ट के चक्कर में यूनिवर्सिटी हमारे वहां कॉपियां भेजना बंद कर दे",

ठीक है सर.. बुरा न मानिये, एवरेज नम्बर ही रखने हैं तो आप अकेले ही इस काम को सहज निपटा लेंगे.. बेहतर है आप इन कापियों को खुद ही देख लें", यह कहती हुई श्वेता विभाग से बाहर निकल आई।

डा. कुसुम जोशी