स्वाभिमान - लघुकथा - 2 Kamal Kapoor द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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स्वाभिमान - लघुकथा - 2

निजता-बोध

मुग्ध मन से गुलदान में फूल सज़ा रही थी सुमन किडोर-बेलबजी।द्वार खोला तो दिल खिल उठामाँ-पापा खड़े थे सामने।वह माँ से गले मिलने के लिये आगे बढ़ी परंतु उन्होंने उसे परे धकेल दिया और दनदनाते हुए भीतर गईं।

तू अपना घर छोड़ कर क्यों आन गई सुम्मी?”तल्ख़ स्वर में पूछा उन्होंने।

अपना घर नहीं,पराया घर छोड़ कर अब अपने घर आई हूँ माँ!”सहज स्वर में कहा सुमन ने तो माँ भड़क उठीं,” लड़की जिस घर में ब्याह कर जाती है ,वही आख़िरी साँस तक उसका घर होता है समझी?”

नहीं समझना मुझे ।आपको पता है माँ कि दिन -रात ससुराल वाले गालियों के साथ ताने देते थे मुझेकुछ इस तरह ,’गली की कुत्तियाँ-बिल्लियाँ तक बच्चे जन रही हैं और एक तू है कि चार साल में एक वारिस तक ना दे पाई इस घर को हमें ना चाहिये ऐसी बाँझ बहूमैं सब बातें आपके उस बेगैरत दामाद को बताती तो वह बेहयाई से कहता,’ ठीक ही तो कहती हैं मम्मी मैंने जी-जान से सेवा की उन सबकी, अपनी सारी की सारी कमाई भी उनके हाथ में धरती रही ।बदले में ज़रा सा प्यार और सम्मान तक मिले मुझे।

तेरा उस घर में रहना ही तेरी इज़्ज़त है बेटा! तू क्यों नहीं समझती कि इस समाज में पति की छांव के बिना जीना श्राप है औरत के लिये। तेरी माँ हूँ।ग़लत सीख दूँगी क्या तुझे?”

उफ़ माँ! मैं क्या-क्या बताऊँ अब आपको। पति नाम का वह प्राणी एक नंबर का चरित्रहीन भी है सबूत हैं मेरे पास। औरऔर बेवजह हाथ भी उठाता है वह मुझ पर।

तो तलाक़ देने की ठान कर आई है?” नीम-रस -सी कड़वाहट थी माँ के स्वर में।

नहीं दूँगी उसे तलाक़कभी नहीं ।उस साँड को खुला नहीं छोड़ूँगी ,किसी और लड़की की ज़िन्दगी तबाह करने के लिये

अब आप ही समझाएँ इस बेवक़ूफ़ लड़की को जी ! मैं तो हार गई,” हताशा में डूबा स्वर था माँ का।

देखो बिटिया! किसी भी इंसान की ज़िन्दगी और उसका वज़ूद इतनी माँग तो करते ही हैं उससे कि उन्हें पूरी इज़्ज़त दी जाये! तुम आर्थिक, मानसिक और जैविकतीनों रूपों में सशक्त हो सुम्मी! मुझे तुम पर गर्व है कि तुममें निजता-बोध है। तुम्हारे आत्म-सम्मान और स्वाभिमान की इस जंग में मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ बच्चे!” पापा ने सुमन के शीष पर आशीष का हाथ धरते हुए स्नेहिल स्वर में कहा।

***

अंतत:

सुबहपति नवीन कह कर गये थे कि शाम को तैयार रहना ,‘ इंडिया गेटघूमने चलेंगे और खाना भी बाहर खायेंगे सो नवीन की पसंद की गुलाबी शिफॉन की साड़ी पहन कर और मोगरे की कलियों की वेणी लगाये नेहा आतुर मन से उनका इंतज़ार कर रही थी।चाय भी बना कर फ्लॉस्क में भर कर धर दी थी लेकिन सारे उत्साह पर जैसे सायबेरिया की बर्फ़ - सी जम गई ,जब उसने ऑफ़िस से लौटे पति के होंठों पर खिली रहने वाली सदाबहार मुस्कान को ग़ायब पाया और माथे पर खिंची परेशानियों की रेखाओं को पढ़ा

दफ़्तर में कोई परेशानी वाली बात हुई क्या? सब ठीक तो है नवीन?” फ्लॉस्क से प्याले में चाय ढालते हुए नेहा ने पूछा तो वह एक ठँडी साँस ले कर बोले , “ कुछ ठीक नहीं है नेहा! बाबू जी अस्पताल में हैं ।दिल का दौरा पड़ा है उन्हें।

ओह ! आपको किसने बताया? फ़ोन आया वहाँ से?”

नहीं! मिश्रा जी ने बतायाआज दोपहर ही लौटे हैं वे लखनऊ से।

कुछ पल कमरे में मौन पसरा रहा,जिसे नवीन ने ही तोड़ा ,” तुम मेरा सूटकेस तैयार कर दो नेहा! औरएटीएमकार्ड भी दे दो मैं आज ही निकल जाऊँगा

आप जायेंगे ? वहाँ ? उस घर में? जहाँ से एक तरह से धक्के दे कर निकाला गया था हमें और आपने क़सम खाई थी कि उस चौखट पर कभी क़दम रखेंगे। भूल गये?” कसैले स्वर में कहा नेहा ने

कुछ नहीं भूलायह भी नहीं कि ग़लतियाँ उनकी नहीं , मेरी बल्कि हमारी ही थीं। क्या कैसे और क्योंउन बातों को दोहराने की ज़रूरत है और ही उचित वक़्त। मुझे जाना है बसजल्दी से जल्दी।अंगद के पाँव की -सी दृढ़ता थी नवीन के स्वर में

आत्मसम्मान और स्वाभिमान नाम की भी कोई चीज़ होती है नवीन! क्या राई भर भी नहीं बचा आपमें जो……

नेहा की बात पर तुरंत कैंची चलाते हुए तड़प कर कहा नवीन ने,” मान ,अपमान, आत्म -सम्मान , अभिमान और स्वाभिमानये सब ऐसी भावनाएँ बल्कि दुर्भावनाएँ हैं जो मन में ढेरों ज़हर घोल कर रिश्तों के बीच दीवारें खड़ी कर देती हैं।इस सच से सदा अनजान रहे हम। चलो मान भी लिया जाए कि मेरा स्वाभिमान आहत होगा तो होने दो ! माता -पिता के सामने इस बेमानी से स्वाभिमान की कोई औक़ात नहींकाश! मैं पहले ही समझ पाता

और अगले ही पल वह फ़ोन कर रहे थे,” सुरंजन ! मुझे लखनऊ की एकएयर-टिकट् चाहिये दोस्त! हाँ, आज रात की हीहाँ-हाँ

अरे! ऐसे कैसे? रुकिये तो तनिक,” ऊँचे स्वर में कहते हुए नेहा ने उसके हाथ से फ़ोन छीन लिया और फिर नर्म तथा नम्र स्वर में बोली,” हैलो सुरंजन भाई! एक नहीं दो एयर-टिकट्स लीजियेगा।

आहा! अंततः …” ये दो शब्द कह कर दर्द की धुँध से लिपटी उन घड़ियों में भी मुस्कुरा उठे थे नवीन।

***

कमल कपूर