Iktare wala jogi - 2 books and stories free download online pdf in Hindi

इकतारे वाला जोगी - 2

इकतारे वाला जोगी

(भाग दो)

घर लौटकर शुभ्रा ने बिस्तर पर लेटी हुई बीमार माँ को मंदिर का सारा घटनाक्रम यथातथ्य सुनाया । माँ ने भावशून्य दृष्टि से एक बार अपनी बेटी शुभ्रा की ओर देखा और फिर आँखें बंद कर ली । जोगी के साथ शुभ्रा के वार्तालाप का यथातथ्य वर्णन सुनकर माँ का.हृदय पंखविहीन पक्षी की भाँति तड़पने लगा और शरीर निश्चल हो गया । उसकी बंद आँखों में इकतारे की चिरपरिचित धुन के साथ दूर-बहुत-दूर जाते हुए जोगी की स्पष्ट छवि उभर रही थी और हृदय से मूक आहें निकल रही थी, जो होठों तक आते-आते कहीं गुम हो जाती थी । बंद आँखों से आँसुओं की निरंतर बह रही धारा से जिस क्रम में तकिया भीगता जा रहा था, उसी क्रम से धीरे-धीरे उसके जीवन का रस-स्रोत सूखता जा रहा था ।

आभा ने आँखें बन्द करने के पश्चात पुनः नहीं खोली, तो शुभ्रा की चिन्ता बढ़ी । उसने लगभग चीखते हुए अपने पिता नहुष और दादी को माँ के अचेत होने की सूचना दी । आभा की गंभीर स्थिति देखकर यथाशीघ्र अस्पताल ले जाया गया परन्तु चिकित्सको के बहुत प्रयास करने पर भी जब आभा की चेतना नहीं लौटी, तो सभी चिन्ता में पड़ गये । सप्ताह-भर तक अनेक सुयोग्य और अनुभवी चिकित्सक निरन्तर प्रयास करते रहे, परन्तु आभा की चेतना नहीं लौटी । अन्त में उन्होंने घोषणा कर दी कि आभा कोमा में चली गयी है ।

पूर्व घटनाक्रम का स्मरण-विश्लेषण करते-करते शुभ्रा का विश्वास दृढ़ होता जा रहा था कि उसका एकदम सटीक और सही दिशा में चल रहा है । अपने प्रयास में सफलता सुनिश्चित करते हुए शुभ्रा बहुत ही शीघ्र एक ऐसे निष्कर्ष पर पहुँच गयी, जिसने उसको विषम परिस्थिति के जंजाल से बाहर तो निकाला ही, साथ ही एक नये विचार के साथ उसके जीवन को एक नयी दिशा भी प्रदान कर दी । वह एक झटके से उठ खड़ी हुई और आँसू पोंछते हुए माँ के चेहरे पर बिखर गई बालों की लटों को हटाते हुए आत्मीय भाव से दृढ़ निश्चय के साथ कहा -

"माँ ! मैं जानती हूँ, उस रात आपने मुझे जो कहानी सुनाई थी, वह कहानी नहीं आपकी आपबीती थी । मैंने देखा था, जोगी बाबा के इकतारे पर अंकित आपकी लिखावट में राजकुमार का नाम !" कुछ क्षणों तक मौन रहने के उपरांत उसने पुनः कहना आरम्भ किया -

"माँ ! मैं आपको वचन देती हूँ, आपके जीवन में पुनः उसी रस का संचार होगा, जिसकी आप अधिकारिणी है ! मैं जान चुकी हूँ, इस रस का स्रोत कहाँ है ? आपकी कहानी का राजकुमार गणित में रुचि रखने के बावजूद जब संगीत सीखता है, तब वह केवल संगीत नहीं सीखता, उस मध्यमवर्गीय लड़की की रुचि को अपनी रुचि बना लेता है ! परोक्षतः वह उसकी रुचि को महत्त्व देने के बहाने उस लड़की को महत्त्व देता है ! राजकुमार अपने समर्पण भाव से उस लड़की के साथ-साथ उसके संगीत को ; उसके इकतारे को सामान्य से असामान्य बना देता है ! माँ ! वह लड़की कोई और नहीं, आप हैं ! इकतारे वाले जोगी गुरु आपकी कहानी का राजकुमार है ! यह सच है न माँ ?"

अपनी बात पूरी करने के पश्चात् शुभ्रा ने अनुभव किया कि माँ की पलकों में तथा हाथ के अग्रभाग में हल्का-सा कंपन हुआ है ! पिछले छः वर्षों में यह पहला अवसर था, जब आभा ने स्वयं किसी प्रकार की चेष्टा करने का प्रयत्न किया था । माँ की इस अस्पष्ट चेष्टा को अपने प्रश्न का सकारात्मक उत्तर मानकर शुभ्रा प्रसन्नचित्त कमरे से बाहर निकल गयी और पुनः दादी के कमरे की ओर बढ़ गयी, जहाँ से उसे अपने निश्चय को क्रियान्वित करने के लिए पहला कदम उठाना था ।

अपने पैरों पर खड़े होकर माँ के जीवन में पुनः बहार लौटा लाने के लिए शुभ्रा के अनेकानेक प्रयासों में एक प्रयास था, 'सरस्वती सुर संगम' नामक संगीत महाविद्यालय में एक संगीत शिक्षिका के रूप में पद ग्रहण करना । इस पद हेतु उस का साक्षात्कार एवं चयन कार्यस्थल से दूर दिल्ली में हुआ था ।

चयन के पश्चात् कार्यस्थल पर शुभ्रा का प्रथम कार्यदिवस 21 फरवरी था । शुभ्रा की माँ का जन्मदिवस भी 21 फरवरी था, इसलिए शुभ्रा घर से निकलकर ज्यों-ज्यों विद्यालय की ओर बढ़ती जा रही थी, उसी अनुपात में वह.माँ के जन्मदिवस पर उनके साथ ना रहने के कारण अपराधबोधजनित आत्मग्लानि से भरती जा रही थी । गहन पीड़ा से तड़पते हुए उसके होंठ अनायास ही बड़बड़ा उठते थे -

"माँ ! मुझे आज आपके साथ होना चाहिए था, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकती थी ! प्लीज ! !! माँ ! आज के इस अपराध के लिए मुझे क्षमा कर देना ! आपके जीवन के सुखद-अविस्मरणीय पलों को लौटा लाने के लिए मुझे जोगी बाबा को ढूंढना ही होगा और इसके लिए मुझे आपसे दूर जाना पड़ेगा !"

अपराधबोध की ज्वालामयी वैचारिक दुनिया में जाती हुई शुभ्रा विद्यालय के मुख्य द्वार पर कब पहुँच गयी, उसे पता ही नहीं चला । उसकी विचारश्रंखला तब खंडित हुई, जब एक चपरासी के शब्द उसके कानों में पड़े -

"मैडम ! सरस्वती वंदना के लिए सभी वंदना-कक्ष में उपस्थित हो चुके हैं, आप भी चलिए !"

"जी !"

शुभ्रा ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया और चपरासी के पीछे-पीछे चल पड़ी । वंदना-कक्ष पहुँची, तो माँ सरस्वती की प्रतिमा के साथ स्थापित दूसरी प्रतिमा को देखकर शुभ्रा के मस्तिष्क को एक अप्रत्याशित झटका लगा । वह ठिठककर रुक गयी और माँ सरस्वती की प्रतिमा के साथ स्थापित किशोरवयः बालिका की पुष्पसज्जित प्रतिमा को ध्यानपूर्वक निहारते हुए अपने स्मृति भंडार में संग्रहित चित्रों को उलट-पुलट कर उस प्रतिमा में दृश्यमान व्यक्तित्व को पहचानने का प्रयत्न करने लगी । सरस्वती-वंदना संपन्न हो जाने के पश्चात् भी शुभ्रा उस प्रतिमा को निर्निमेष निहार रहीं थी । उसको अनुभव हुआ कि वंदना-कक्ष में उपस्थित सभी लोग उसकी ओर विचित्र दृष्टि से देख रहे हैं । यथाशीघ्र.स्वयं को प्रकृतिस्थ-संयमित करके शुभ्रा ने प्रधानाचार्य से पूछा -

"मैडम, सरस्वती माँ के साथ विराजमान यह मूर्ति किसकी है ?"

"इसके विषय में मुझे ज्ञात नहीं है ! मैं जब से यहाँ आई हूँ, मैंने इसको यहीं पर ऐसे ही देखा है । मैंने कभी इसकी जानकारी करने का प्रयास ही नहीं किया !"

"मैडम, इसके विषय में मुझे कौन बता सकता है ?"

"इस विषय में तो इस मूर्ति को स्थापित करने वाले गुरुजी ही बता सकते हैं !"

"जी ! मैडम, मैं उनसे मिलना चाहती हूँ ! मुझे बता दीजिए, मैं उनसे कब ? कहाँ मिल सकती हूँ ? प्लीज ... !!!"

शुभ्रा की आतुरता देखकर प्राचार्या ने मुस्कुराकर कहा -

"तुम उनसे यहीं, इसी समय मिल सकती हो !" तत्पश्चात् चपरासी को पुकारकर आदेश दिया -

"यह मैडम गुरु जी से भेंट करना चाहती हैं, उनसे अनुमति लेकर इनकी भेंट करा दो !"

"जी मैडम !" चपरासी आज्ञा शिरोधार्य करते हुए शीघ्र ही गुरु जी से अनुमति लेकर आ गया और उनसे भेंट कराने के लिए शुभ्रा को अपने पीछे-पीछे आने का संकेत किया । संकेत पाते ही शुभ्रा चपरासी के पीछे-पीछे चल दी । कुछ दूर चलने के पश्चात् वह एक अति सामान्य कक्ष के द्वार पर जाकर रुक गया और शुभ्रा को अंदर जाने का संकेत किया । संकेत पाकर आश्चर्य और अज्ञात आशंका जनित भययुक्त शुभ्रा ने ज्यों ही कमरे में प्रवेश किया, सामने मुस्कुराते हुए इकतारे वाले जोगी को देखकर विस्मय से उसके नेत्र फैल गये । उसको ऐसा लगा, ईश्वर मूर्त रूप धारण करके धरती पर साक्षात अवतरित हो गए हैं। उसको अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था, इसलिए बार-बार आँखों को मलते हुए उन्हें और अधिक शक्ति से खोलकर देखने का प्रयत्न कर रही थी । कुछ क्षणों के इस उपक्रम के पश्चात् उसके चेहरे पर हँसी और प्रसन्नता के भाव सहित आँखों में चमक आ गयी और साथ ही साथ आँसू उमड़ पड़े । वह जोगी गुरु के आसन की ओर दौड़ पड़़ी । आगे बढ़ते हुए उसने कहा -

जोगी बाबा ! मुझे क्षमा कर दीजिए ! प्लीज !!"

"बेटी उठो और मुझे बताओ किस अपराध के लिए तुम क्षमा चाहती हो !" जोगी गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा ।

जोगी की अमृतमयी वाणी ने शुभ्रा में नयी आशा-उत्साह का संचार किया । वह स्वयं को प्रकृतिस्थ करते हुए तत्क्षण बोली-

"जोगी बाबा ! मेरी माँ पिछले सात वर्ष से कोमा में है । कहने को तो वह जीवित हैं, लेकिन उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं रह गया है । आप नहीं जानते, आपको ढूंढने के लिए मैं कहाँ-कहाँ भटकती फिरी हूँ ! मुझे पूरा विश्वास है, एक आप ही हैं, जो मेरी माँ को स्वस्थ कर सकते हैं ! जोगी बाबा ! प्लीज ... आप मेरे साथ चलिए और मेरी माँ को स्वस्थ कर दीजिए ! प्लीज !!! बस एक बार ... !"

"धैर्य रखो ! शांतिपूर्वक विस्तार से मुझे बताओ, क्या हुआ है ?" जोगी के निर्देशानुसार शुभ्रा ने सारा घटनाक्रम विस्तारपूर्वक बताया दिया । अंत में शुभ्रा ने आग्रहपूर्वक एक बार पुनः कहा -

जोगी बाबा ! आप एक बार मेरी माँ के पास चलकर अपने इकतारे की सहायता से संगीत का वही सुर सजा दीजिए, जिससे आपकी साँसे चलती हैं । मुझे विश्वास है, आपकी स्वर-साधना के साथ आपके इकतारे का तंत्रीनाद मरी माँ के लिए औषधि सिद्ध होगा ! उसे सुनकर मेरी माँ बिल्कुल स्वस्थ हो जाएगी !"

"बेटी मैं तो नित्यप्रति स्वर-साधना करता हूँ । श्रेष्ठतर यह होगा कि तुम अपनी माँ को यहाँ ले आओ !" जोगी का सुझाव शुभ्रा को उचित लगा । उसका प्रथम लक्ष्य अपनी माँ को स्वस्थ करना था, इसलिए उसने तत्काल जोगी के आश्रम से घर के लिए प्रस्थान किया ।

तीसरे दिन सुबह सात बजे शुभ्रा माँ को लेकर इकतारे वाले जोगी के विद्यालय रूपी आश्रम में पहुँच गयी । इकतारे वाले जोगी के निर्देशानुसार आभा के निश्चेष्ट शरीर को आश्रम के एक कक्ष में साधारण तख्त पर लिटा दिया गया । कुछ ही क्षणोंपरांत वहाँ पर जोगी बाबा उपस्थित हो गये और आभा के निश्चेष्ट शरीर का निरीक्षण-परीक्षण करने लगे । आभा के निश्चेष्ट शरीर को देखते ही जोगी की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली और होंठ अनायास फड़क उठे -

"आभा, मैं हर गाँव, हर शहर, गली-गली, तुम्हारे दिये हुए इकतारे से तुम्हारा दिया हुआ संगीत गाता-बजाता हुआ तुम्हें ढूंढते-ढूंढते जोगी बन गया, पर तुम कहीं नहीं मिली ! आज जब मिली हो, तो इस दशा में !" कहते-कहते जोगी भाव-विहल हो गये ।

तत्पश्चात् जोगी पावन पृथ्वी पर अपना आसन लगाकर बैठ गये । इकतारे पर उनकी अंगुलियाँ थिरकने लगी और उनके कंठ से संगीत का मधुर स्वर फूट पड़ा ।

आभा के निश्चेष्ट शरीर के निकट सिरहाने की ओर तख्त के एक कोने पर शुभ्रा बैठी थी । उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे । दूसरी ओर पावन पृथ्वी पर आसन लगाकर जोगी इकतारे के संगीत के माध्यम से अपने अबोध बचपन को पुनः जीने का प्रयास कर रहे थे और अपनी निर्मल मित्रता को एक बड़ा अर्थ देने में जुटे हुए थे । अपने निस्वार्थ पवित्र लौकिक प्रेम को अलौकिक ऊँचाई देने में तल्लीन थे । इकतारे की तान पर स्वर संधान करते-करते पूरा दिन बीत गया, पर जोगी के तन-मन में विश्रान्ति का चिह्नमात्र भी नहीं था । उनकी देखभाल करने वाली माई ने तथा शुभ्रा ने कई बार उन्हें विश्राम करने के लिए आग्रह किया, किन्तु लक्ष्य सिद्धि से पूर्व न तो उनके कंठ को और ना ही उंगलियों को विश्रांति की आकांक्षा थी । दो दिन दो रात तक निरंतर साधना करने के उपरांत उनके कानों में शुभ्रा का स्वर सुनाई पड़ा -

"जोगी गुरु ! माँ की आँखें थोड़ी-थोड़ी फड़क रही हैं !"

"जोगी ने शुभ्रा की बात का कोई उत्तर नहीं दिया, किंतु उसके शब्दों ने जोगी में उत्साहवर्धन अवश्य किया था । अब उनकी उंगलियाँ इकतारे पर कई गुना औज के साथ थिरकने लगी थी और जोगी अपने लक्ष्य सिद्धि की ओर पहले से अधिक उत्साह से जुट गये थे ।

जोगी को अपने परिश्रम का पारितोष उस समय मिला, जब तीसरे दिन आभा ने अपनी आँखें खोली । आभा की चेतना अस्सी प्रतिशत तक लौट चुकी थी । वह बातें करने लगी थी, किंतु उसकी चेतना और स्मृति वर्तमान आयु से वर्षों पीछे कार्य कर रही थी । वह इकतारे को पहचान रही थी ; इकतारे के नाद के साथ जोगी के कंठ से निकलने वाले स्वर को भी पहचान रही थी, किन्तु न अपनी बेटी शुभ्रा को, न अपने पति नहुष को, न अपनी सास को और न ही जोगी को तथा अपने निकट उपस्थित किसी अन्य व्यक्ति को पहचान पा रही थी ।

इकतारे के सुर के साथ जोगी के कंठ से निकलने वाला स्वर सुनकर उसकी आँखें कक्ष के प्रत्येक कोने में अपने बाल सखा राजकुमार को खोज रही थी । राजकुमार को अपने आसपास न पाकर उसकी दृष्टि निराश होकर नीचे झुक जाती थी । अपने बाल मन में इकतारे को लेकर उठ रहे प्रश्नों को लेकर आभा ने इकतारे की ओर प्रश्नात्मक मुद्रा में संकेत किया, तो जोगी का संकेत पाकर एक विश्वसनीय सखी के रूप में शुभ्रा उठी और दोनों हाथों से उठाकर इकतारा माँ की ओर बढ़ाते हुए कहा -

"यह लीजिए ! आप ही का है !" शुभ्रा ने माँ को आश्वस्त किया कि उस इकतारे को अब उनसे कोई नहीं लेगा । किन्तु, अभी भी आभा की आँखें कमरे के हर कोने में राजकुमार को तलाश रही थी । अतः जोगी का संकेत पाकर शुभ्रा ने पुनः कहा -

"राजकुमार ने संदेश भिजवाया है कि वह अभी कुछ विलम्ब से आने वाला है ! उसने वह अभी आने वाला है !"

आभा का पति नहुष अपनी पत्नी को तथा और उसकी सास अपनी बहू का बाल्योचित व्यवहार देखकर प्रसन्न नहीं थे । किंतु उसकी चेतना लौट आने पर वे कुछ संतुष्ट अवश्य थे और एक आशा उनके मन में अवश्य थी कि वह पूर्णतः ठीक हो जाएगी । दूसरी ओर शुभ्रा तथा जोगी बहुत प्रसन्न थे । अपनी प्रसन्नता और संतोष प्रकट करते हुए जोगी ने शुभ्रा से कहा -

"तुम माँ को प्रसन्न देखना चाहती थी न ? बालमन से वह जितनी प्रसन्न हो सकती है, शायद प्रौढ़वयः की समृतियाँ लौटने पर वह प्रसन्नता नहीं बचेगी । इसलिए चिंता करने की आवश्यकता नहीं है ! प्रौढ़ शरीर में बालमन के साथ जीते हुए उन्हें जीवन का आनंद लेने दें !" जोगी की बात सुनकर शुभा ने प्रश्न किया -

"किंतु, जोगी गुरु, उन्हें प्रसन्न रखने के लिए उसी राजकुमार की आवश्यकता होगी, जिसको उनकी दृष्टि अब भी निरन्तर तलाश रही है !"

जोगी मुस्कुराते हुए, "मैं अभी पाँच मिनट में आता हूँ !" कहकर बाहर निकल गये । पाँच मिनट बाद जोगी ने जोकर की वे,भूषा में कमरे में प्रवेश किया । उस वेशभूषा में जोगी को देखते ही आभा ठहाका लगाकर खिलखिलाकर हँसने लगी और हँसती ही रही । जोगी भी आभा के साथ -साथ बच्चों की भाँति खिलखिलाकर हँसते रहे । कुछ समय पश्चात जोगी गुरु ने शुभ्रा से कहा -

"एक बालक को अपने साथ खेलने के लिए बालक की आवश्यकता होती है ! आप में से जो भी चाहते हैं कि आभा प्रसन्न रहें ; आनंद में रहे, उनसे मेरी विनती है, वह आभा के साथ बच्चों की भाँति व्यवहार करें और स्वयं भी बच्चे बनकर रहें । भले ही मैं और आप सब मस्तिष्क से प्रौढ़ हैं, लेकिन दिल सदैव बच्चा रहता है ।"

"जोगी गुरु, मैं माँ को कम्पनी दूँगी ! माँ के साथ मैं भी फिर से अपना बचपन एंजोय करना चाहती हूँ !"

"बेटी, मुझे प्रसन्नता है कि आज आभा के साथ कोई है, जो उसे केवल प्रेम ही नहीं करता, उसे समझता भी है ! मेरा शुभाशीष तुम्हारे साथ है !"

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