अरमान Ashish Kumar Trivedi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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अरमान

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मार्निंग वॉक से लौटते हुए वह फिर मिल गया। "क्या फैसला किया मैडम आपने। मैं एक लाख दस हजार तक दिला दूंगा। सौदा बुरा नही है. छह महिने और निकल गए तो कोई अस्सी हज़ार भी नही देगा।"

बिना कोई जवाब दिए नीलिमा ने अपनी चाल तेज़ कर दी। पर उसने भी पीछा नहीं छोड़ा। पीछे से उसने आवाज़ लगाई।

"सोंच कर देखिएगा मैडम। सौदा बुरा नहीं है। क्या फायदा अगर खड़े खड़े बेकार हो जाए।"

नीलिमा बिना ध्यान दिए अपनी राह चलती रही।

घर पहुँच कर वह सीधे पोर्च में खड़ी कार के पास गई। कवर हटा कर देखा बहुत धूल जमा थी। वह उसे पोंछने लगी। कार पोंछते हुए उसे अपने पति की याद आ गई। यह कार उसके पति का अरमान थी। वह अरमान जो कई साल तक गृहस्ती की ज़िम्मेदारियों बच्चों की पढ़ाई और उनकी जरूरतों के नीचे दबा रहा। फिर जब सारे दायित्वों से मुक्ति मिली तो उन्होंने वर्षों से दबाए इस अरमान को पूरा किया।

कार खरीदने से पहले उन्होंने कई कारों के बारे में जानकारी ली। दो एक का टेस्ट ड्राइव भी लिया। तब जाकर उन्हें यह मॉडल पसंद आया। उसके बाद बारी नीलिमा की थी। क्योंकी उसने पहले ही कह दिया था कि मॉडल आप चुनिए। पर कार का रंग मेरी पसंद का होगा। नीलिमा ने अपने नाम के हिसाब से नीला रंग ही पसंद किया।

जिस दिन कार शोरूम से घर आई वह दोनों बहुत खुश थे। नीलिमा के जेहन में वह क्षण अभी भी ताजा है जब वह दोनों कार लेकर पहली बार मंदिर गए थे ईश्वर को धन्यवाद करने के लिए। उन्होंने प्रसाद चढ़ा कर मंदिर के पास बैठे गरीब बच्चों का मुंह मीठा कराया था।

फिर तो लगभग हर रोज़ ही दोनों शाम को कार से घूमने निकलते थे। कभी किसी मित्र के घर तो कभी फिल्म देखने या बाहर खाना खाने के लिए। और कुछ नहीं तो शहर के मशहूर पार्क में कुछ देर ताज़ी हवा खाने के लिए ही चले जाते थे।

एक दिन सुबह सुबह नीलिमा के पति ने प्लान बनाया कि मौसम अच्छा है आज शहर से कुछ दूर बने बर्ड सेंचुरी में घूमने चलते हैं। यह पहला मौका था जब दोनों कार से इतनी दूर जा रहे थे। नीलिमा को डर था कि उसके पति के लिए लंबी ड्राइव आसान होगी या नहीं। लेकिन उसके पति ने तसल्ली दी कि वह बेवजह परेशान ना हो। उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी।

उस दिन बर्ड सेंचुरी की सैर नीलिमा और उसके पति के लिए एक यादगार दिन बन गई। दोनों ने वहाँ सैर का खूब मज़ा लिया। लौटते समय ढाबे पर रुक कर खाना खाया। जब वह ढाबे से खाना खाकर| निकले तो बारिश होने लगी। बारिश में ड्राइव नीलिमा को बहुत अच्छी लगी।

उसके पति अक्सर कहते थे।

"नीलू तुम भी कार चलाना सीख लो।"

वह छेड़ने के इरादे से कहती।

"मैं क्यों सीखूं ? मेरे पास तो ड्राइवर है।"

इस बात पर उसके पति झूठा गुस्सा दिखाते

"तो मैं तुम्हारा ड्राइवर हूँ ?"

वह हंस कर जवाब देती।

"जब आप हैं तो मुझे किस बात की फ़िक् हे?"

"अरे ये भी कोई बात हुई। कल मान लो ज़रूरत पड़े और मैं घर पर ना हूँ तो तुम किस के पास जाओगी। खुद ड्राइव कर सकोगी तो किसी से मदद मांगने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी।"

पर नीलिमा अपने तर्कों से बात को वहीं ख़त्म कर देती थी।

लेकिन नौ माह पूर्व दिल के दौरे के कारण उसके पति चल बसे। तब से इस कार के पहिए भी थम गए थे। अब तो हर कोई इसे बेंच देने की सलाह देता था। ना जाने कैसे एक गैराज के मालिक को इस कार का पता चल गया। एक दिन वह घर आ गया। उसने अपना परिचय देकर कार देखने की इच्छा जताई। उसने कार स्टार्ट करके देखी। नीलिमा को बैठा कर कुछ दूर ड्राइव भी की। उसे कार पसंद आ गई। वह खरीदने को तैयार हो गया।

पहले उसने नब्बे हज़ार की पेशकश की। पर नीलिमा नहीं मानी। तो उसने एक लाख कर दिए। पहले नीलिमा ने सोंचा कि कीमत बुरी नहीं है। कार खड़ी रहे इससे अच्छा तो उसे बेंच दे। लेकिन उसका मन नहीं माना। वह महज़ एक कार नहीं उसके पति का सपना थी। उसने कार बेचने से मना कर दिया। पर वह आदमी उसके पीछे पड़ गया। रकम एक लाख कर दी। आज दस हजार और बढ़ा दिए।

कार साफ कर उसने फिर से कवर डाल दिया। अंदर आकर वह अपने काम में लग गई। लेकिन बार बार उसका ध्यान कार की तरफ ही जा रहा था। उसे कहीं आना जाना होता था तो ऑटो से चली जाती थी। बहुत हुआ तो टैक्सी बुक करा लेती थी। उसे कोई परेशानी नहीं थी। अब ड्राइविंग सीखना भी उसके बस का नहीं था। कार खड़ी ही रहनी थी। बस उसे यही बात रोक रही थी कि उसके पति का सपना कोई सेकेंड हैंड कार की तरह खरीद रहा है। यह बात उसके दिल को पीड़ा देती थी। उसने तय कर लिया कि जो हो वह कार नहीं बेंचेगी।

शाम करीब छह बजे कॉलबेल बजी। उसने दरवाज़ा खोला तो गैराज का मालिक था। साथ में पच्चीस छब्बीस साल का एक नौजवान था। बैठते ही गैराज के मालिक ने सवाल किया।

"तो क्या सोंचा आपने। एक लाख दस हजार बहुत हैं। इससे ज्यादा कोई नहीं देगा।"

नीलिमा ने अपना फैसला सुना दिया।

"बात पैसे की नहीं है। मुझे कार नहीं बेंचनी है।"

"पैसे नहीं तो क्या बात है मैडम?"

नीलिमा ने कुछ रूखे ढंग से कहा।

"उससे आपका कोई संबंध नहीं।"

साथ आया नवयुवक दोनों की बात सुन रहा था। वह पूरे अदब के साथ बोला।

"आंटी जी बिल्कुल कार ना बेचने के आपके फैसले की मैं इज्ज़त करता हूँ। दरअसल यह मेरे चाचा हैं। मैंने इनसे अपने लिए एक कार देखने को कहा था। आपकी कार चाचा जी को पसंद आई।"

थोड़ा ठहर कर वह आगे बोला।

"आंटी जी कुछ ही दिनों में मेरी शादी है। जबसे नौकरी शुरू की अरमान था कि अपनी दुल्हन को अपनी कार में घर लेकर आऊँ। पर अभी इतने पैसे नहीं हैं कि नई कार ले सकूं। इसलिए चाचा जी आपके पीछे पड़े थे। पर आप जैसा चाहें।"

उस युवक की बात सुन कर नीलिमा को दुविधा समाप्त हो गई। वह सेकेंड हैंड कार खरीदने नहीं आया था। बल्कि उसके पति के सपने को अपना अरमान बनाने आया था। नीलिमा ने उसे शादी के लिए शुभ कामनाएं देते हुए कहा।

"यह कार मेरे पति ने बहुत चाव से खरीदी थी। लेकिन अब यह तुम्हारा अरमान पूरा करेगी। मैं कार बेंचने को तैयार हूँ।"