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शोक का पुरस्कार

शोक का पुरस्कार

मुंशी प्रेमचंद


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जन्म

प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन्‌ १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे।

जीवन

धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।

शादी

आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, ष्उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।.......ष् उसके साथ — साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है ष्पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दियारू मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।ष् हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया।

विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहान्त हो गया। अचानक आपके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने आपको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।

शिक्षा

अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में आप अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने — जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।

साहित्यिक रुचि

गरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से आपने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। आपको बचपन से ही उर्दू आती थी। आप पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि आप बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए। आपने दो — तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला।

आपने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे। आपकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद ष्तिलस्मे — होशरुबाष् पढ़ डाली।

अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को आपने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी — बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग को अपने व्यक्तिगत विषम जीवन अनुभव तक ही महदूद रखा।

तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरु में आपने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह आपका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ — साथ रहा।

प्रेमचन्द की दूसरी शादी

सन्‌ १९०५ में आपकी पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन्‌ १९०५ के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।

यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात्‌ आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। आपके लेखन में अधिक सजगता आई। आपकी पदोन्नति हुई तथा आप स्कूलों के डिप्टी इन्सपेक्टर बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में आपकी पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी मशहूर हुआ।

व्यक्तित्व

सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। अपने जीवन की परेशानियों को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा ष्हमारा काम तो केवल खेलना है— खूब दिल लगाकर खेलना— खूब जी— तोड़ खेलना, अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात्‌ — पटखनी खाने के बाद, धूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर जैसा कि सूरदास कह गए हैं, ष्तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।ष् कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी—शक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्यता और उदारता के वह मूर्ति थे।

जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं ष्कि जाड़े के दिनों में चालीस — चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें।ष्

प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी—शक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।

ईश्वर के प्रति आस्था

जीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे — धीरे वे अनीश्वरवादी से बन गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा ष्तुम आस्तिकता की ओर बढ़े जा रहे हो — जा रहीं रहे पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।ष्

मृत्यू के कुछ घंटे पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था — ष्जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।ष्

प्रेमचन्द की कृतियाँ

प्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। १३ साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साकहत्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन्‌ १८९४ ई० में ष्होनहार बिरवार के चिकने—चिकने पातष् नामक नाटक की रचना की। सन्‌ १८९८ में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय ष्रुठी रानीष् नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन १९०२ में प्रेमा और सन्‌ १९०४—०५ में ष्हम खुर्मा व हम सवाबष् नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा—जीवन और विधवा—समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया।

जब कुछ आर्थिक निजिर्ंश्चतता आई तो १९०७ में पाँच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस समय प्रेमचन्द नायाबराय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नायाब राय की खोज शुरु हुई। नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन आपके सामने ही आपकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।

इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।

ष्सेवा सदनष्, ष्मिल मजदूरष् तथा १९३५ में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए ष्महाजनी सभ्यताष् नाम से एक लेख भी लिखा था।

मृत्यु

सन्‌ १९३६ ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने ष्प्रगतिशील लेखक संघष् की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण ८ अक्टूबर १९३६ में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण—कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया।

शोक का पुरस्कार

आज तीन दिन गुजर गये। शाम का वक्त था। मैं यूनिवर्सिटी हाल से खुश—खुश चला आ रहा था। मेरे सैंकड़ों दोस्त मुझे बधाइयॉँ दे रहे थे। मारे खुशी के मेरी बॉँछें खिली जाती थीं। मेरी जिन्दगी की सबसे प्यारी आरजू कि मैं एमए़ पास हो जाउँ पूरी हो गयी थी और ऐसी खूबी से जिसकी मुझे तनिक भी आशा न थी। मेरा नम्बर अव्वल था। वाइस चान्सलर ने खुद मुझसे हाथ मिलाया था और मुस्कराकर कहा था कि भगवान तुम्हें और भी बड़े कामों की शक्ति दे। मेरी खुशी की कोई सीमा न थी। मैं नौजवान था, सुन्दर था, स्वस्थ था, रुपये—पैसे की न मुझे इच्छा थी और न कुछ कमी, मॉँ—बाप बहुत कुछ छोड़ गये थे। दुनिया में सच्ची खुशी पाने के लिए जिन चीजों की जरूरत है वह सब मुझे प्राप्त थीं। और सबसे बढ़कर पहलू में एक हौसलामन्द दिल था जो ख्याति प्राप्त करने के लिए अधीर हो रहा था।

घर आया, दोस्तों ने यहॉँ भी पीछा न छोड़ा, दावत की ठहरी। दोस्तों की खातिर—तवाजो में बारह बज गये, लेटा जो बरबस ख्याल मिस लीलावती की तरफ जा पहुँचा जो मेरे पड़ोस में रहती थी और जिसने मेरे साथ बी0ए0 का डिप्लोमा हासिल किया था। भाग्यशाली होगा वह व्यक्ति जो मिस लीला को ब्याहेगा, कैसी सुन्दर है? कितना मीठा गला है! कैसा हँसमुख स्वभाव! मैं कभी—कभी उसके यहॉँ प्रोफेसर साहब से दर्शनशास्त्र में सहायता लेने के लिए जाया करता था। वह दिन शुभ होता था जब प्रोफेसर साहब घर पर न मिलते थे। मिस लीला मेरे साथ बड़े तपाक से पेश आती और मुझे ऐसा मालूम होता था कि मैं ईसामसीह की शरण में आ जाऊँ तो उसे मुझे अपना पति बना लेने में आपत्ति न होगी। वह शैली, बायरन और कीट्‌स की प्रेमी थी और मेरी रूचि भी बिलकुल उसी के समान थी। हम जब अकेले होते तो अकसर प्रेम और प्रेम के दर्शन पर बातें करने लगते और उसके मुँह से भावों में डूबी हुई बातें सुन—सुनकर मेरे दिल में गुदगदी पैदा होने लगती थी। मगर अफसोस मैं अपना मालिक न था। मेरी शादी एक ऊँचे घराने में कर दी गई थी और अगरचे मैंने अब तब अपनी बीवी की सूरत भी न देखी थी मगर मुझे पूरा—पूरा विश्वास था कि मुझे उसकी संगत में वह आनंद नहीं मिल सकता जो लीला की संगत में सम्भव है। शादी हुए दो साल हो चुके थे मगर उसने मेरे पास एक खत भी न लिखा था। मैंने दो—तीन खत लिखे भी, मगर किसी का जवाब न मिला। इससे मुझे एक शक हो गया था कि उसकी तालीम भी यों ही—सी है।

आह! क्या मैं इस लड़की के साथ जिन्दगी बसर करने पर मजबूर हूँगा?...इस सवाल ने मेरे तमाम हवाई किलों को ढा दिया जो मैंने अभी—अभी बनाये थे। क्या मैं मिस लीला से हमेशा के लिए हाथ धो लूँ? नामुमकिन है। मैं कुमुदिनी को छोड़ दूँगा, मैं अपने घरवालों से नाता तोड़ लूँगा, मैं बदनाम हूँगा, परेशान हूँगा, मगर मिस लीला को जरूर अपना बनालूँगा।

इन्हीं खयालों के असर में मैंने अपनी डायरी लिखी और उसे मेज पर खुला छोड़कर बिस्तर पर लेट रहा और सोचते—सोचते सो गया।

सबेरे उठकर देखता हूँ तो बाबू निरंजनदास मेरे सामने कुर्सी पर बैठे हैं। उनके हाथ में डायरी थी जिसे सह ध्यानपूर्वक पढ़ रहे थे। उन्हें देखते ही मैं बड़े चाव से लिपट गया। अफसोस, अब उस देवोपम स्वभाववाले नौजवान की सूरत देखनी न नसीब होगी। अचानक मौत ने उसे हमेशा के लिए हमसे अलग कर दिया। कुमुदिनी के सगे भाई थे, बहुत स्वस्थ, सुन्दर और हँसमुख, उम्र मुझसे दो ही चार साल ज्यादा थी, उँचे पद पर नियुक्त थे, कुछ दिनों से इसी शहर में तबदील होकर गए थे। मेरी और उनकी दोस्ती हो गई थी। मैंने पूछा—क्या तुमने डायरी पढ़ ली?

निरंजन— हॉँ।

मैं— मगर कुमुदिनी से कुछ न कहना।

निरंजन— बहुत अच्छाय न कहूँगा।

मैं इस वक्त किसी सोच में हूँ। मेरा डिप्लोमा देखा?

निरंजन— घर से खत आया है, पिताजी बीमार हैं, दो—तीन दिन में जाने वाला हूँ।

मैं— शौक से जाइए, ईश्वर उन्हें जल्द स्वस्थ करे।

निरंजन— तुम भी चलोगे, न मालूम कैसा पड़े, कैसा न पड़े।

मैं मुझे तो इस वक्त मांफ कर दो।

निरंजनदास यह कहकर चले गये। मैंने हजामत बनायी, कपडे बदले और मिस लीलीवती से मिलने का चाव मन में लेकर चला। वहॉँ जाकर देखा तो ताला पडा हुआ था। मालूम हुआ कि मिस लीला साहिबा की तबीयत दो—तीन दिन से खराब थी। आबहवा बदलने के लिए नैनीताल चली गई थी। अफसोस, मैं हाथ मसलकर रह गया। क्या लीला मुझसे नाराज थी? उसने मुझे क्यो खबर न दी। लीला क्या तू बेवफा है, तुझसे बेवफाई की उम्मीद न थी। फौरन पक्का इरादा कर लिया कि आज की डाक से नैनीताल चल दूँ। मगर घर आया तो लीला का खत मिला। कॉँपते हुए हाथो से खोला, लिखा था—मैं बीमार हूँ, मेरे जीने की कोई उम्मीद नही है, डाक्टर कहते है कि प्लेग है। जब तक तुम आओगे, शायद मेरा किस्सा तमाम हो जायेगा। आखिरी वक्त तुमसे न मिलने का सख्त सदमा है। मेरी याद दिल में कायम रखना। मुझे सख्त अफसोस है कि तुमसे मिलकर नहीं आयी। मेरा कुसूर माफ करना और अपनी अभागिनी लीला को भुला मत देना। खत मेरे हाथ से छूटकर गिर पडा। दुनिया आंखों में अंधेरी हो गई, मुंह से एक ठंडी आह निकली। बिना एक क्षण गंवाए मेंने बिस्तर बाधां और नैनीताल चलने को तैयार हो गया। घर से निकला ही था कि प्रोफेसर बोस से मुलाकात हो गई। कॉलेज से चले आ रहे थे, चेहरे पर शोक लिखा हुआ था। मुझे देखते ही उन्होंने जेब से एक तार निकालकर मेरे सामने फेंक दिया। मेरा कलेजा धक्‌ से हो गया। आंखों मे अंधेरा छा गया, तार कौन उठाता है, हाय मारकर बैठ गया। लीला, तू इतनी जल्द मुझसे जुदा हो गई।

मैं रोता हुआ घर आया और चारपाई पर मुंह ढॉँपकर खूब रोया। नैनीताल जाने का इरादा खत्म हो गया। दस—बारह दिन तक मैं उन्माद की दृ सी दशा मैं इधर दृ धर घूमता रहा। दोस्तो की सलाह हुई कि कुछ रोज के लिए कहीं घूमने चले जाओ। मेरे दिल में भी यह बात जम गई। निकल खडा हुआ और दो महीने तक विंध्याचल, पारसनाथ वगैरह पहाडियों मे आवारा फिरता रहा। ज्यों—त्यों करके नयी—नयी जगहों और दृश्यों की सैर से तबियत का जरा तस्कीन हुई। मैं आबू में था जब मेरे नाम तार पंहुचा कि मैं कॉलेज की असिस्टैण्ट प्रोफेसरी के लिए चुना गया हूँ। जी तो न चाहता था कि फिर इस शहर में आऊं, मगर प्रिन्सीपल के खत ने मजबूर कर दिया। लाचार, लौटा और अपने काम में लग गया। जिन्दादिली नाम को न बाकी रही थी। दोस्तों की संगत से भागता और हंसी—मजाक से चिढ़ मालू होती।

एक रोज शाम के वक्त मैं अपने अंधेरे कमरे में लेटा हुआ कल्पना लोक की सैर कर रहा था कि सामनेवाले मकान से गाने की आवाज आई। आह, क्या आवाज थी, तीर की तरह दिल में चुभी जाती थी, स्वर कितना करुण था इस वक्त मुझे अन्दाजा हुआ कि गाने में क्या असर होता है। तमाम रोंगटे खडे हो गये। कलेजा मसोसने लगा और दिल पर एक अजीब वेदना—सी छा गई। आंखों से आंसू बहने लगे। हाय, यह लीला का प्यारा गीत थारू

पिया मिलन है कठिन बावरी।

मुझसे जब्त न हो सका, मैं एक उन्माद की—सी दशा में उठा और जाकर सामनेवाले मकान का दरवाजा खटखटाया। मुझे उस वक्त यह चेतना न रही कि एक अजनबी आदमी के मकान पर आकर खड़े हो जाना और उसके एकांत में विघ्न डालना परले दर्जे की असभ्यता है।

एक बुढिया ने दरवाजा खोल दिया और मुझे खड़े देखकर लपकी हुई अंदर गई। मैं भी उसके साथ चला गया। देहलीज तय करते ही एक बड़े कमरे में पहुंचा। उस पर एक सफेद फर्श बिछा हुआ था। गावतकिये भी रखे थे। दीवारों पर खूबसूरत तसवीरें लटक रही थीं और एक सोलह—सत्रह साल का सुंदर नौजवान जिसकी अभी मसें भीग रही थीं मसनद के करीब बैठा हुआ हारमोनियम पर गा रहा था। मैं कसम खा सकता हूं कि ऐसा सुंदर स्वस्थ नौजवान मेरी नजर से कभी नहीं गुजरा। चाल—ढाल से सिख मालूम होता था। मुझे देखते ही चौंक पडा और हारमोनियम छोडकर खडा हो गया। शर्म से सिर झुका लिया और कुछ घबराया हुआ—सा नजर आने लगा। मैंने कहा—माफ कीजिएगा, मैंने आपको बडी तकलीफ दी। आप इस फन के उसताद मालूम होते हैं। खासकर जो चीज अभी आप गा रहे थे, वह मुझे पसन्द है।

नौजवान ने अपनी बड़ी—बड़ी आँखों से मेरी तरफ देखा और सर नीचा कर लिया और होंठों ही में कुछ अपने नौसिखियेपन की बात कही। मैंने फिर पूछा—आप यहाँ कब से हैं?

नौजवान—तीन महीने के करीब होता है।

मैं—आपका शुभ नाम।

नौजवान—मुझे मेहर सिंह कहते हैं।

मैं बैठ गया और बहुत गुस्ताखाना बेतकल्लुफी से मेहर सिंह का हाथ पकडकर बिठा दिया और फिर माफी मांगी। उस वक्त की बातचीत से मालूम हुआ कि वह पंजाब का रहने वाला है और यहां पढने के लिए आया हुआ है। शायद डॉक्टरों ने सलाह दी थी कि पंजाब की आबहवा उसके लिए ठीक नहीं है। मैं दिल में तो झेंपा कि एक स्कूल के लड़के के साथ बैठकर ऐसी बेतकल्लुफी से बातें कर रहा हूँ, मगर संगीत के प्रेम ने इस खयाल को रहने न दिया ! रस्मी परिचय क बाद मैंने फिर प्रार्थना की कि वही चीज छेडिए। मेहर सिंह ने आंखें नीची करके जवाब दिया कि मैं अभी बिल्कुल नौसिखिया हूं।

मैं—यह तो आप अपनी जबान से कहिये।

मेहरसिंह—(झेंपकर) आप कुछ फरमायें, हारमोनियम हाजिर है।

मैं—इस फन में बिल्कुल कोरा हूं वर्ना आपकी फरमाइश जरुर पूरी करता।

इसके बाद मैंने बहुत आग्रह किया मगर मेहर सिंह झेंपता ही रहा। मुझे स्वभावतरू शिष्टाचार से घृणा है। हालांकि इस वक्त मुझे रुखा होने का कोई हक न था मगर जब मैंने देखा कि यह किसी तरह न मानेगा तो जरा रुखाई से बोला—खैर, जाने दीजिए। मुझे अफसोस है कि मैंने आप का बहुत वक्त बर्बाद किया। माफ कीजिए। यह कहकर उठ खड़ा हुआ। मेरी रोनी सूरत देखकर शायद मेहर सिंह को उस वक्त तरस आ गया, उसने झेंपते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला—आप तो नाराज हुए जाते हैं।

मैं—मुझे आपसे नाराज होने का हक हासिल नहीं।

मेहरसिंह—अच्छा बैठ जाइए, मैं आपकी फरमाइश पूरी करुंगा। मगर मैं अभी बिलकुल अनाड़ी हूं।

मैं बैठ गया और मेहरसिंह ने हारमोनियम पर वही गीत अलापना शुरु कियारू

पिया मिलन है कठिन बावरी।

कैसी सुरीली तान थी, कैसी मीठी आवाज, कैसा बेचौन करने वाला भाव ! उसके गले में वह रस था जिसका बयान नहीं हो सकता। मैंने देखा कि गाते—गाते खुद उसकी आंखों में आंसू भर आये। मुझ पर इस वक्त एक मोहक सपने की—सी दशा छाई हुई थी। एक बहुत मीठा नाजुक, दर्दनाक असर दिल पर हो रहा था जिसे बयान नहीं किया जा सकता। एक हरे—भरे मैदान का नक्शा आंखों के सामने खिंच गया और लीला, प्यारी लीला इस मैदान पर बैठी हुई मेरी तरफ हसरतनाक आंखों से ताक रही थी। मैंने एक लम्बी आह भरी और बिना कुछ कहे उठ खड़ा हुआ। इस वक्त मेहर सिंह ने मेरी तरफ ताका, उसकी आंखों में मोती के कतरे डबडबाये हुए थे और बोला—कभी—कभी तशरीफ लाया कीजिएगा।

मैंने सिफ इतना जबाव दिया— मैं आपका बहुत कृतज्ञ हूं।

धीरे—धीरे मेरी यह हालत हो गयी कि जबतक मेहर सिंह के यहां जाकर दो—चार गाने न सुन लूं जी को चौन न आता। शाम हुई और जा पहुंचा। कुछ देर तक गानों की बहार लूटता और तब उसे पढ़ाता। ऐसे जहीन और समझदार लड़के को पढ़ाने में मुझे खास मजा आता था। मालूम होता था कि मेरी एक—एक बात उसके दिल पर नक्श हो रही है। जब तक मैं पढ़ाता वह पूरी जी—जान से कान लगाये बैठा रहता। जब उसे देखता, पढ़ने—लिखने में डूबा हुआ पाता। साल भर में अपने भगवान्‌ के दिये हुए जेहन की बदौलत उसने अंग्रेजी में अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली। मामूली चिट्ठियां लिखने लगा और दूसरा साल गुजरते—गुजरते वह अपने स्कूल के कुछ छात्रों से बाजी ले गया। जितने मुदर्रिस थे, सब उसकी अक्ल पर हैरत करते और सीधा ने चलन ऐसा कि कभी झूठ—मूठ भी किसी ने उसकी शिकायत नहीं की। वह अपने सारे स्कूल की उम्मीद और रौनक था, लेकिन बावजूद सिख होने के उसे खेल—कूद में रूचि न थी। मैंने उसे कभी क्रिकेट में नहीं देखा। शाम होते ही सीधे घर पर चला आता और पढ़ने—लिखने में लग जाता।

मैं धीरे—धीरे उससे इतना हिल—मिल गया कि बजाय शिष्य के उसको अपना दोस्त समझने लगा। उम्र के लिहाज से उसकी समझ आश्चर्यजनक थी। देखने में १६—१७ साल से ज्यादा न मालूम होता मगर जब कभी भी रवानी में आकर दुर्बोध कवि—कल्पनाओं और कोमल भावों की उसके सामने व्याख्या करता तो मुझे उसकी भंगिमा से ऐसा मालूम होता कि एक—एक बारीकी को समझ रहा है। एक दिन मैंने उससे पूछा—मेहर सिंह, तुम्हारी शादी हो गई?

मेहर सिंह ने शरमाकर जवाब दिया— अभी नहीं।

मैं—तुम्हें कैसी औरत पसन्द है?

मेहर सिंह— मैं शादी करुंगा ही नहीं।

मैं—क्यों?

मेहर सिंह— मुझ जैसे जाहिल गंवार के साथ शादी करना कोई औरत पसंद न करेगी।

मैं—बहुत कम ऐसे नौजवान होंगे जो तुमसे ज्यादा लायक हों या तुमसे ज्यादा समझ रखते हों।

मेहर सिंह ने मेरी तरफ अचम्भे से देखकर कहा—आप दिल्लगी करते हैं।

मैं—दिल्लगी नहीं, मैं सच कहता हूं। मुझे खुद आश्चर्य होता है कि इतने दिनों में तुमने इतनी योग्यता क्योंकर पैदा कर ली। अभी तुम्हें अंग्रेजी शुरु किए तीन बरस से ज्यादा नहीं हुए।

मेहर सिंह दृक्या मैं किसी पढ़ी—लिखी लेडी को खुश रख सकूंगा।

मैं— (जोश से) बेशक !

गर्मी का मौसम था। मैं हवा खाने शिमले गया हुआ था। मेहर सिंह भी मेरे साथ था। वहां मैं बीमार पड़ा। चेचक निकल आई, तमाम जिस्म में फफोले पड़ गये। पीठ के बल चारपाई पर पड़ा रहता। उस वक्त मेहर सिंह ने मेरे साथ जो—जो एहसान किये वह मुझे हमेशा याद रहेंगे। डाक्टरों की सख्त मनाही थी कि वह मेरे कमरे में न आवे। मगर मेहर सिंह आठों पहर मेरे ही पास बैठा रहता। मुझे खिलाता—पिलाता, डठाता—बिठाता। रात—रात भर चारपाई के करीब बैठकर जागते रहना मेहर सिंह ही का काम था। सगा भाई भी इससे ज्यादा सेवा नहीं कर सकता था। एक महीना गुजर गया। मेरी हालत रोज—ब—रोज बिगड़ती जाती थी। एक रोज मैंने डॉक्टर को मेहर सिंह से कहते हुए सुना कि इनकी हालत नाजुक है। मुझे यकीन हो गया कि अब न बचूंगा, मगर मेहर सिंह कुछ ऐसी दृढ़ता से मेरी सेवा—सुश्रूषा में लगा हुआ था कि जैसे वह मुझे जबर्दस्ती मौत के मुहं से बचा लेगा। एक रोज शाम के वक्त मैं कमरे में लेटा हुआ था कि किसी के सिसकी लेने की आवाज आई। वहां मेहर सिंह को छोड़कर और कोई न था। मैंने पूछा—मेहर सिंह, मेहर सिंह, तुम रोते हो !

मेहर सिंह ने जब्त करके कहा—नहीं, रोऊं क्यों, और मेरी तरफ बड़ी दर्द—भरी आंखों से देखा।

मैं—तुम्हारे सिसकने की आवाज आई।

मेहर सिंह— वह कुछ बात न थी। घर की याद आ गयी थी।

मैं—सच बोलो।

मेहर सिंह की आंखें फिर डबडबा आईं। उसने मेज पर से आइना उठाकर मेरे सामने रख दिया। हे नारायण ! मैं खुद अपने को पहचान न सका। चेहरा इतना ज्यादा बदल गया था। रंगत बजाय सुर्ख के सियाह हो रही थी और चेचक के बदनुमा दागों ने सूरत बिगाड़ दी थी। अपनी यह बुरी हालत देखकर मुझसे भी जब्त न हो सका और आंखें डबडबा गईं। वह सौन्दर्य जिस पर मुझे इतना गर्व था बिलकुल विदा हो गया।

मैं शिमले से वापस आने की तैयारी कर रहा था। मेहर सिंह उसी रोज मुझसे विदा होकर अपने घर चला गया था। मेरी तबियत बहुत उचाट हो रही थी। असबाब सब बंध चुका था कि एक गाड़ी मेरे दरवाजें पर आकर रुकी और उसमें से कौन उतरा ? मिस लीला ! मेरी आंखों को विश्वास न हो रहा था, चकित होकर ताकने लगा। मिस लीलावती ने आगे वढ़कर मुझे सलाम किया और हाथ मिलाने को बढ़ाया। मैंने भी बौखलाहट में हाथ तो बढ़ा दिया पर अभी तक यह यकीन नहीं हुआ था कि मैं सपना देख रहा हूं या हकीकत है। लीला के गालों पर वह लाली न थी न वह चुलबुलापन बल्कि वह बहुत गम्भीर और पीली—पीली—सी हो रही थी। आखिर मेरी हैरत कम न होते देखकर उसने मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा—तुम कैसे जेण्टिलमैन हो कि एक शरीफ लेडी को बैठने के लिए कुर्सी भी नहीं देते !

मैंने अंदर से कुर्सी लाकर उसके लिए रख दी, मगर अभी तक यही समझ रहा था कि सपना देख रहा हूं।

लीलावती ने कहा—शायद तुम मुझे भूल गए।

मैं—भूल तो उम्र भर नहीं सकता मगर आंखों को एतबार नहीं आता।

लीला— तुम तो बिलकुल पहचाने नहीं जाते।

मैं—तुम भी तो वह नहीं रहीं। मगर आखिर यह भेद क्या है, क्या तुम स्वर्ग से लौट आयीं !

लीला—मैं तो नैनीताल में अपने मामा के यहाँ थी।

मैं—और वह चिट्ठी मुझे किसने लिखी थी और तार किसने दिया था ?

लीला—मैंने ही।

मैं—क्यों? तुमने मुझे यह धोखा क्यों दिया? शायद तुम अन्दाजा नहीं कर सकतीं कि मैंने तुम्हारे शोक में कितनी पीड़ा सही है।

मुझे उस वक्त एक अनोखा गुस्सा आया—यह फिर मेरे सामने क्यों आ गयी ! मर गयी थी तो मरी ही रहती !

लीला—इसमें एक गुर था, मगर यह बातें तो फिर होती रहेंगी। आओ इस वक्त तुम्हें अपनी एक लेडी फ्रेंड से इण्ट्रोड्यूस कराऊँ, वह तुमसे मिलने की बहुत इच्छुक है।

मैंने अचरज से पूछा—मुझसे मिलने को ! मगर लीलावती ने इसका कुछ जवाब न दिया और मेरा हाथ पकड़करी गाड़ी के सामने ले गयी। उसमें एक युवती हिन्दुस्तनी कपड़े पहने बैठी हुई थी। मुझे देखते ही उठ खड़ी हुई और हाथ बढ़ा दिया। मैंने लीला की तरफ सवाल करती हुई आंखों से देखा।

लीला—क्या तुमने नहीं पहचाना ?

मैं—मुझे अफसोस है कि मैंने आपको पहले कभी नहीं देखा और अगर देखा भी हो तो घुंघट की आड़ से क्योंकर पहचान सकता हूं।

लीला—यह तुम्हारी बीवी कुमुदिनी है !

मैंने आश्चर्य के स्वर में कहा— कुमुदिनी यहां !

लीला—कुमुदिनी, मुंह खोल दो और अपने प्यारे पति का स्वागत करो।

कुमुदिनी ने कांपते हुए हाथों से जरा—सा घूंघट उठाया। लीला ने सारा मुंह खोल दिया और ऐसा मालूम हुआ कि जैसे बादल से चांद निकल आया। मुझे खयाल आया, मैंने यह चेहरा कहीं देखा है। कहां? आह, उसकी नाक पर भी तो वही तिल है, उंगली में वही अंगूठी भी है।

लीला—क्या सोचते हो, अब पहचाना ?

मैं—मेरी कुछ अक्ल काम नहीं करती। हूबहू यही हुलिया मेरे एक प्यारे दोस्त मेहर सिंह का है।

लीला—(मुस्कराकर) तुम तो हमेशा निगाह के तेज बनते थे, इतना भी नहीं पहचान सकते !

मैं खुशी से फूल उठा—कुमुदिनी मेहर सिंह के भेस में ! मैंने उसी वक्त उसे गले से लगा लिया और खूब दिल खोलकर प्यार किया। इन कुछ क्षणों में मुझे जो खुशी हुई उसके मुकाबिले में जिंदगी—भर की खुशियां हेच हैं। हम दोनों आलिंगन—पाश में बंधे हुए थे। कुमुदिनी, प्यारी कुमुदिनी के मुंह से आवाज न निकलती थी। हां, आंखों से आंसू जारी थे।

मिस लीला बाहर खड़ी कोमल आंखों से यह दृश्य देख रही थी। मैंने उसके हाथों को चूमकर कहा—प्यारी लीला, तुम सच्ची देवी हो, जब तक जियेंगे तुम्हारे कृतज्ञ रहेंगे।

लीला के चेहरे पर एक हल्की—सी मुसकराहट दिखायी दी। बोली—अब तो शायद तुम्हें मेरे शोक का काफी पुरस्कार मिल गया।

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