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टुकड़ा-टुकड़ा ख़त

टुकड़ा–टुकड़ा खत

डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’

मैं जाती हूँ भैया .....

हाँ–हाँ जा । मगर रूक….

कहते–कहते उसका एक हाथ पैण्ट की जेब में गया । फिर वह कुछ पलों को अबोल व जड़ सा खड़ा रह गया था ।

शिखा पूछ पड़ी थी,

तुम कुछ कहने जा रहे थे भैया….

हाँ.... कहने के साथ ही उसका हाथ जेब से बाहर निकल आया । एक मुड़े कागज की पुर्जी फँसी थी उसकी उँगलियों के बीच । उसने हाथ आगे को बढ़ाया तो वह थरथरा उठा । पर खुद को कड़ा करता बोल पड़ा वह

ये ले ऋचा को दे देना....

कहते–कहते मुड़ गया वह । मगर शिखा वहीं जड़वत खड़ी रह गयी थी ।

कुछ कदम आगे बढ़कर अमोल फिर लौटा और छूटते ही बोल पड़ा,

ये कागज उसे चुपके से देना । कोई देखे न ....तो जाता हूँ मैं ....

मगर पिछली बार की तरह वह कुछ कदम जाकर फिर लौट आया । बोला,

उससे कहना पढ़कर फाड़ देगी .....जरूर फाड़ देगी....

फिर तो वह एक पल को भी रूका न था ।

* * *

दरअसल वह एक सरकारी आवासीय कालेज था जहाँ शिखा और अमोल दोनो भाई–बहन पढ़ते थे । शिखा उम्र में अमोल से डेढ़ वर्ष छोटी थी और इस हिसाब से दोनो की कक्षायें भी अलग–अलग थीं । अमोल ग्यारहवीं में था और शिखा दसवीं में । उस विद्यालय में कहने को तो सह शिक्षा थी मगर वह विद्यालय की स्थापना के कुछ ही वर्षों के बाद दम तोड़ गयी थी । हुआ ये था कि गल्र्स छात्रावास में एक अप्रिय घटना घट गयी थी । मीडिया ने इस खबर को यूँ उछाला कि अभिभावकों का रोष फूट पड़ा । जैसे–तैसे मामला शान्त हुआ तो विद्यालय प्रशासन ने सख्त रूख अख्तियार कर लिया । लड़के और लड़कियों के बीच पर्याप्त दूरी बना दी गयी । ब्वायज हॉस्टल के बच्चे गल्र्स हॉस्टल के आस–पास भी नहीं फटक सकते थे । वहीं लड़कियों के ल्एिा ब्वायज हॉस्टल की तरफ देखना भी वर्जित था । चूँकि शिखा और अमोल भाई–बहन थे इसलिए उन्हे सप्ताह में एक बार मिलने की छूट थी ।

इसी विद्यालय में पढ़ते–पढ़ते अमोल कब बचपन की सीमा लांघकर किशोर उमंगों में डूबने उतराने लगा इसका पता उसको भी नहीं था । हाँ मसें भीगने के साथ ही उसके भीतर ही भीतर जाने क्या कुछ उगने–पनपने लगा था जिसे समझ पाना उसकी समझ के परे था । उसे अब फूल कुछ ज्यादा ही रंग बिरंगे व तितलियाँ पहले से कहीं ज्यादा सुन्दर लगने लगी थीं । कुछ तितलियाँ तो कभी–कभी उड़ती सपनों में भी चलीं आतीं .... और जब नींद टूटती तो अँधेरा । मगर उस अँधरे में भी अब कुछ–कुछ चमकने लगा था ।

तरूणाई की इस उर्जा के निकास का रास्ता पहले उसने किताबों में ढूँढना चाहा फिर हारकर जीती–जागती किताबों में भटकने लगा । वे किताबें उसके बस्ते में न होकर क्लास में थीं हॉस्टल में थीं और में जब–तब इधर– उधर नज़र आ जाया करती थीं । मगर एक दिन अचानक कुछ ऐसा घट गया कि एक किताब ज़मीन पर आ गिरी और तबसे इसके पन्ने दर पन्ने फड़फड़ाते जा रहे है. .... फड़फड़ाते जा रहे है. ....

हुआ ये था कि वह एकेडमिक ब्लाक की इन्ट्रेन्स गेट से भीतर को दाखिल हो रहा था कि अनायास किसी से टकरा गया । उस टक्कर में उस पर तो कोई फर्क न पडा । पर दूसरे का बैग धराशायी हो गया और उसमें से निकलकर किताबें फर्श पर इधर–उधर फैल गयी थीं । अमोल ने किताबें देखीं. नेम स्लिप पर लिखा था..ऋचा शुक्ला, क्लास –10 फिर उसने निगाह उठाकर सामने को देखा । वह एक लड़की थी ।

लड़की अपनी किताबें उठाने को झुकती कि अमोल पहले ही झुककर जल्दी–जल्दी उन्हे उठाने लगा । इसी उठा–पटक में कन्धे भी टकरा गये । फर्श पर बिखरी हुई चीजें जैसे–तैसे लड़की के बैग में आयीं । वह चलने को हुई तो उसने घूरकर अमोल को देखा पर अमोल की निगाहें अनायास झुकती चली गयी थीं । झुकती पलकों ने शायद यही कहा था, सॉरी ऋचा मुझे माफ करना । मैने जानबूझ कर ये गलती नहीं की थी .... ।

बात आयी गयी हो गयी । दिन बीतते गये । अमोल ने तो अपनी खता के ल्एिा ऋचा से माफी माँग ली थी मगर उसका माफीनामा कबूल न हो सका था, क्योंकि बन्द पलकों के पीछे उसे वही ऋचा अक्सर घूरती नजर आ जाया करती थी । एक मासूम चेहरा, जो बैग गिर जाने से घबराया हुआ था । उसने गुस्सा होना चाहा था पर खुलकर हो न सकी थी जिसके चलते उसकी मासूमियत अनायास बड़ी खूबसूरत हो चली थी .... .... ....

ऋचा बराबर उसके ख्यालों में आती रही । उसने शुरू में तो उससे पीछा छुड़ाना चाहा,पर उसकी इस कोशिश में वह उसके और करीब आती गयी । कभी कॉपियों पर,कभी किताबों पर, वह छा जाती तो अमोल उसी में लिपटता चला जाता । वह सोचने लगता कि काश,एक बार वह और टकरा जाती उससे और उसका बैग जा गिरता फर्श पर .... .... फिर उसका घूरना ही सही .... ....

मगर ऐसा कुछ उसकी किस्मत के हिस्से में न आ सका । ऐसे किसी संयोग या दुर्योग की प्रतीक्षा में दिन कटते गये । मगर प्रतीक्षायें सदा साकार कहाँ होती हैं । अन्त में हार कर उसे एक बड़ा अनचाहा निर्णय लेना पड़ गया । उसने एकान्त में बैठकर कुछ लिखा । कागज को कई मोड़ दिए । फिर उसे अपनी एक किताब में छुपा दिया । उसकी बहन उस शाम उससे मिलने आयी थी । वह जाने लगी तो बोली,

मैं जाती हूँ भैया ....

हाँ–हाँ .... जा । मगर रूक ....

फिर हाथ पैण्ट की जेब में । एक मुड़ा–तुड़ा कागज उसकी उँगलियों में ।

ये ले ऋचा को दे देना ....

भरसक साहस जुटाने के बाद ही वह इतना कह पाया था अपनी बहन से उस शाम को । मगर उसके जाने के बाद उसकी रात कटनी मुश्किल हो गयी थी ।

* * *

गोली तो निकल चुकी थी बन्दूक से । उसे वापस लाने को उसे शिखा से मिलने गल्र्स हॉस्टल जाना होता जो वहाँ के कायदे–कानून के मुताबिक कतई मुमकिन न था । शिखा तक खबर भिजवा पाना भी असम्भव ही था । गोली अपने लक्ष्य पर जाकर लगनी ही थी । फिर जाने चिनगारियाँ छूटें या कोई विस्फोट हो जाये जिसमें उसकी प्रतिष्ठा और कैरियर के चिथड़े–चिथड़े उड़ जायें । वह रेस्टिकेट कर दिया जाये स्कूल से । उसकी बहन भी जो एकदम बेकसूर थी इस पूरे प्रकरण में ....

एक कागज के टुकड़े ने उसके दिलो–दिमाग मे तूफान खड़ा कर दिया । वह बार–बार काँप जाता उसे सोंचकर । बड़ी गलती हो गयी मुझसे । कहीं ऋचा ने वह खत किसी को दिखा दिया तब क्या होगा .....बात सर तक भी पहुँच सकती है । या गुस्से में आकर कहीं वह उस खत को सर या बड़े सर के ही हवाले न कर दे ।

सिर्फ तूफान ही नहीं, भूचाल भी घुस आया था उसके कमरे में उस रात,ऐसे में वह सो कैसे पाता? जैसे–तैसे रात कटी सुबह हिम्मत न थी कि वह क्लास में जाये । मगर न जाने के परिणाम भी अच्छे न होते । बल्कि वह उसके अपराध की स्वीकरोक्ति या सुबूत मान लिया जाता कि उसी डर से वह आज क्लास में नहीं आया । उसने बेमन ब्रेकफास्ट लिया । नाश्ते की प्लेट जिस पर वह हर रोज झपट पड़ता था, उस सुबह को उस पर वैसा कोई असर न डाल सकी । नाश्ता बड़ा फीका –सा लगा । अन्त में अपना बैग लटकाया उसने और भारी कदमों चल पड़ा अपने क्लास के लिए ।

पहला पीरियड सकुशल बीत गया । उसने कुछ राहत की साँस ली । मगर तलवार अब भी टँगी पड़ी थी उसकी गरदन पर । फिर जब पूरा दिन सकुशल निकल गया तो वह किसी हद तक निश्चिन्त हो गया । सोचा, ऐसी कोई तलवार थी ही नहीं उसकी गरदन पर । मगर दिल को बुरा सोचना अच्छे से कहीं ज्यादा आता है । इसलिए वह कई दिनों तक डरा–डरा सा रहा । अन्ततÁ हफ्ता गुजर गया और उसकी बहन इतवार की सुबह आ गयी उससे मिलने को । उसने अपनी बहन को देखा तो जान में जान आयी । कुछ देर तक वह इन्तजार में रहा कि शिखा शायद ऋचा की बाबत कुछ कहे । जब उसने कुछ न कहा तो वह डरता–डरता पूछ पड़ा,

तुम्हारी ऋचा कैसी है?

ठीक है भैया ।

उसे दिया था ... वह बहुत धीरे से बुदबुदाया पर शिखा मासूमियत से पूछ पड़ी, वह कागज ?

हाँ–हाँ वही ....

दे तो दिया था मैने ....

अच्छा …...तो क्या बोली भी थी वह ?

नहीं, उसने तो कुछ भी नहीं कहा । कहो तो पूछ लूँ .... .कोई बात हो तो ....

नहीं–नहीं कुछ नहीं पूछना उससे । हाँ इतना कह देना मेरे भाई ने तुमसे माफी माँगी है ....

मगर किस बात की …. उस प्रकरण से अनजान शिखा पूछ पड़ी तो उसे बताना ही पड़ा,

वो क्या था कि एक बार वह टकरा गयी थी मुझसे । उसका बैग गिर गया था .... .

ओह ! पर तुमने मुझसे कुछ बताया ही न था भैया ....

* * *

उस पत्र प्रकरण का सप्ताह गुजरते–गुजरते अमोल के मन में पैठा भय धीरे–धीरे पिघलता गया । ऋचा उसे लगातार सुन्दर से सुन्दर दिखने लगी थी । हर नये दिन वह उसे और भी लुभावनी लगने लगती तो अमोल सोच में पड़ जाता कि ये तो पहले वाली वही ऋचा है,फिर इतना बदल कैसे गयी! इतनी सारी सुन्दरता उसमें अब तक कहाँ छिपी पड़ी थी ?

वह उसे बार–बार देखना चाहता, मगर ये देखा–देखी भी बस कनखियों तक ही सीमित थी । मगर बाद में आँखों ने सम्मुख दर्शन की डिमाण्ड कर दी तो वह बहाने–बहाने उसके सामने पड़ने की कोशिशें करने लगा । इस उपक्रम में कई बार सफलता भी मिली । एक बार सामने वाली आँखें अपनी नेत्र भाषा में उससे कुछ कहती सी तो वह एकदम से सिहर गया । किन्तु बाद में अमोल ने उस साइलेन्ट विज़न को कई–कई कोणों से जाँचा–परखा और प्रापर्ली रीड कर उसके मन मुताबिक अभिप्राय भी निकाल ल्एिा ।

फिर आँखों के बाद उसकी जुबान ने भी अपना दावा पेश कर दिया, किन्तु इसमें जोखिम ज्यादा था । कई बार मौके आये जब वह उससे कुछ ऐसे बोल सकता था जो किसी तीसरे के कान में न पड़ता । किन्तु ऐन मौके पर हिम्मत जवाब दे जाती । इधर प्रति सप्ताह एक की दर से उसके एकतरफा खतों का सिलसिला जरी रहा । एक दिन संयोग से स्कूल से निकलते वक्त,ये दोनों सबसे पीछे रह गये । अमोल का दिल धड़का । फिर बदन में थरथराहट । उसी थरथराहट में एक कोशिश मगर बेकार । दूसरी भी, पर तीसरी कोशिश एक फुसफुसाहट बन मुँह से बाहर छटक ही आयी, कैसी हो ऋचा ?

ठीक हूँ ....

सिर्फ और सिर्फ इतना ही । मगर ये 'इतना ही' इतना ज्यादा था कि उसके दिल में पूरा का पूरा समाना मुश्किल हो गया और दबाव इस हद तक बढ़ चला जैसे,कलेजा फाड़ कर दिल बाहर आ गिरेगा । ऋचा के दिल में क्या था,वो क्या जाने ?

* * *

फिर एक अगला सप्ताह और भाई–बहन के मिलने का एक और दिन । शिखा आयी और हमेशा की तरह पूछ पड़ी, कैसे हो भैया ?

ठीक हूँ और तुम ?

मैं भी .....कुछ दोगे ऋचा के लिए?

भाई कुछ झेंपता बोला, ले तो जाना ....

तो ये भी ले लो ।

ये क्या है?

ऋचा ने दिया है ....

क्या सच में ! उसने अपनी सम्पूर्ण वाक्शक्ति लगाकर पूछना चाहा, पर पूछ न सका । दिमाग सनसनाता जाने कहाँ–कहाँ तक भागने लगा, पर अमोल ने उस पर नियन्त्रण करने की कोशिश की । मगर उससे भी बड़ी कोशिश ये दिखाने की कि 'ऋचा ने उसे खत भिजवाया ', ये बात उसके लिए कोई मायने नहीं रखती । ये एक 'किशोर कोशिश' थी जो जैस–तैसे कामयाब भी हो गयी । तो भी वह एक जोड़ा नीली आँखों के उड़न खटोले पर सवार हो जाने कहाँ–कहाँ उड़ा जा रहा था । कि सहसा एक धीमी सी आवाज ने उसे फिर अपनी जगह पर ला पटका ।

भैया, ये मेरा खत भी लेते जाओ ।

क्या है ?

तुम्हारे दोस्त रोहित के लिए,उसे दे देना ।

रोहित ! मगर क्यों? कहते–कहते अमोल ने बहन को इस तरह घूरकर देखा,जैसे उसे ज़िन्दा का ज़िन्दा खा जायेगा । उसे घूरता देख शिखा पूछ पड़ी,

क्यों बात क्या है?

मगर अमोल उल्टा पूछ पड़ा, लिखा क्या है इसमें?

तो शिखा बेझिझक बोली, मैने तो कभी नहीं पूछी तुमसे ये बात, फिर तुम क्यों पूछ रहे हो?

पूछूंगा, सौ बार पूछूंगा । मेरा हक़ है ..... कहते–कहते उसका चेहरा तमतमा उठा और उसने उस खत के टुकड़े–टुकड़े कर डाले ।

समाप्त

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