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सुदर्शन

सुदर्शन


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वास्तविक नाम बदरीनाथ था। आपका जन्म सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान) में १८९६ में हुआ था। सुदर्शन की कहानियों का मुख्य लक्ष्य समाज व राष्ट्र को स्वच्छ व सुदृढ़ बनाना रहा है। प्रेमचन्द की भांति आप भी मूलतरू उर्दू में लेखन करते थे व उर्दू से हिन्दी में आये थे। सुदर्शन की भाषा सहज, स्वाभाविक, प्रभावी और मुहावरेदार है।

सुदर्शन प्रेमचन्द परम्परा के कहानीकार हैं। इनका दृष्टिकोण सुधारवादी है। आपकी प्रायः सभी प्रसिद्ध कहानियों में समस्यायों का समाधान आदशर्वाद से किया गया है।

हमें खेद है कि श्हार की जीतश् जैसी कालजयी रचना के लेखक के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। यदि आप पंडित सुदर्शन की जन्मतिथि, जन्मस्थान या कर्मभूमि के बारे में खोजें तो निराशा ही हाथ लगती है। मुंशी प्रेमचंद और उपेन्द्रनाथ अश्क की तरह पंडित सुदर्शन हिन्दी और उर्दू में लिखते रहे। उनकी गणना प्रेमचंद संस्थान के लेखकों में विश्वम्भरनाथ कौशिक, राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि के साथ की जाती है।

लाहौर की उर्दू पत्रिका, श्हजार दास्तांश् में उनकी अनेक कहानियां प्रकाशित हुईं। उनकी पुस्तकें मुम्बई के हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय द्वारा भी प्रकाशित हुईं। सुदर्शन को गद्य और पद्य दोनों में महारत थी। ष्हार की जीतष् पंडित जी की पहली कहानी है और १९२० में सरस्वती में प्रकाशित हुई थी।

मुख्यधारा विषयक साहित्य—सृजन के अतिरिक्त आपने अनेकों फिल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे। सोहराब मोदी की सिकंदर (१९४१) सहित अनेक फिल्मों की सफलता का श्रेय उनके पटकथा लेखन को जाता है। सन १९३५ में उन्होंने ष्कुंवारी या विधवाष् फिल्म का निर्देशन भी किया। आप १९५० में बने फिल्म लेखक संघ के प्रथम उपाध्यक्ष थे। सुदर्शन १९४५ में महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित अखिल भारतीय हिन्दुस्तानी प्रचार सभा वर्धा की साहित्य परिषद्‌ के सम्मानित सदस्यों में थे। उनकी रचनाओं में हार की जीत, सच का सौदा, अठन्नी का चोर, साईकिल की सवारी, तीर्थ—यात्रा, पत्थरों का सौदागर, पृथ्वी—वल्लभ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

फिल्म धूप—छाँव (१९३५) के प्रसिद्ध गीत श्बाबा मन की आँखें खोलश् व एक अन्य गीत श्तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जराश् जो शायद किसी फिल्म का गीत न होते हुए भी बहुत लोकप्रिय हुआ सुदर्शन के लिखे हुए गीत हैं।

वास्तविक नाम बदरीनाथ था। आपका जन्म सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान) में १८९६ में हुआ था। सुदर्शन की कहानियों का मुख्य लक्ष्य समाज व राष्ट्र को स्वच्छ व सुदृढ़ बनाना रहा है। प्रेमचन्द की भांति आप भी मूलतरू उर्दू में लेखन करते थे व उर्दू से हिन्दी में आये थे। सुदर्शन की भाषा सहज, स्वाभाविक, प्रभावी और मुहावरेदार है।

सुदर्शन प्रेमचन्द परम्परा के कहानीकार हैं। इनका दृष्टिकोण सुधारवादी है। आपकी प्रायः सभी प्रसिद्ध कहानियों में समस्यायों का समाधान आदशर्वाद से किया गया है।

हमें खेद है कि श्हार की जीतश् जैसी कालजयी रचना के लेखक के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। यदि आप पंडित सुदर्शन की जन्मतिथि, जन्मस्थान या कर्मभूमि के बारे में खोजें तो निराशा ही हाथ लगती है। मुंशी प्रेमचंद और उपेन्द्रनाथ अश्क की तरह पंडित सुदर्शन हिन्दी और उर्दू में लिखते रहे। उनकी गणना प्रेमचंद संस्थान के लेखकों में विश्वम्भरनाथ कौशिक, राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि के साथ की जाती है।

लाहौर की उर्दू पत्रिका, श्हजार दास्तांश् में उनकी अनेक कहानियां प्रकाशित हुईं। उनकी पुस्तकें मुम्बई के हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय द्वारा भी प्रकाशित हुईं। सुदर्शन को गद्य और पद्य दोनों में महारत थी। ष्हार की जीतष् पंडित जी की पहली कहानी है और १९२० में सरस्वती में प्रकाशित हुई थी।

मुख्यधारा विषयक साहित्य—सृजन के अतिरिक्त आपने अनेकों फिल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे। सोहराब मोदी की सिकंदर (१९४१) सहित अनेक फिल्मों की सफलता का श्रेय उनके पटकथा लेखन को जाता है। सन १९३५ में उन्होंने ष्कुंवारी या विधवाष् फिल्म का निर्देशन भी किया। आप १९५० में बने फिल्म लेखक संघ के प्रथम उपाध्यक्ष थे। सुदर्शन १९४५ में महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित अखिल भारतीय हिन्दुस्तानी प्रचार सभा वर्धा की साहित्य परिषद्‌ के सम्मानित सदस्यों में थे। उनकी रचनाओं में हार की जीत, सच का सौदा, अठन्नी का चोर, साईकिल की सवारी, तीर्थ—यात्रा, पत्थरों का सौदागर, पृथ्वी—वल्लभ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

फिल्म धूप—छाँव (१९३५) के प्रसिद्ध गीत श्बाबा मन की आँखें खोलश् व एक अन्य गीत श्तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जराश् जो शायद किसी फिल्म का गीत न होते हुए भी बहुत लोकप्रिय हुआ सुदर्शन के लिखे हुए गीत हैं।

हार की जीत

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्‌—भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे सुल्तान कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख—देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रूपया, माल, असबाब, जमीन आदि अपना सब—कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे—से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा, उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो। जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ—दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चौन न आता।

खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते—होते सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, खडगसिंह, क्या हाल है?

खडगसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, आपकी दया है।

कहो, इधर कैसे आ गए?

सुलतान की चाह खींच लाई।

विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।

मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।

उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!

कहते हैं देखने में भी बहुत सुँदर है।

क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।

बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।

बाबा भारती और खड़गसिंह अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़गसिंह ने देखा आश्चर्य से। उसने सैंकड़ो घोड़े देखे थे, परन्तु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीजों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात्‌ उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की—सी अधीरता से बोला, परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?

दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर गए। घोड़ा वायु—वेग से उडने लगा। उसकी चाल को देखकर खड़गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते—जाते उसने कहा, बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।

बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रति क्षण खड़गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे। संध्या का समय था। बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे। सहसा एक ओर से आवाज आई, ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।

आवाज में करूणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, क्यों तुम्हें क्या कट है?

अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।

वहाँ तुम्हारा कौन है?

दुगार्दत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।

बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे—धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका—सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड़गसिंह था।बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात्‌ कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, जरा ठहर जाओ।

खड़गसिंह ने यह आवाज सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।

परंतु एक बात सुनते जाओ। खड़गसिंह ठहर गया।

बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड़गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।

बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल घोड़ा न दूँगा।

अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।

खड़गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड़गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, बाबाजी इसमें आपको क्या डर है?

सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन—दुखियों पर विश्वास न करेंगे। यह कहते—कहते उन्होंने सुल्तान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो।

बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, इसके बिना मैं रह न सकूँगा। इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन—भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग दीन—दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दे। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।

रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड़गसिंह सुल्तान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे—धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे। रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन—मन भर का भारी बना दिया। वे वहीं रूक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और जोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार—बार उसकी पीठपर हाथ फेरते, बार—बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। फिर वे संतोष से बोले, अब कोई दीन—दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।

कवि का चुनाव

1

चांद और सूरज के प्रिय महाराज ने अपने नौजवान मंत्री से कहा— हमें अपने दरबार के लिए एक कवि की जरूरत है, जो सचमुच कवि हो।ष्

दूसरे दिन नौजवान मंत्री ने नगर में मुनादी करा दी। तीसरे दिन एक हजार एक आदमी मंत्री के महल के नीचे खड़े थे, और कहते थे, हम सब कवि है। मंत्री ने इक्कीस दिनों में उन सबकी कविताएँ सुनी और देखा कि वह सबकी सब सुन्दर शब्दों और रसीले भावों से भरी थी और उनमें मधु की मिठास थी, और यौवन की शोभा थी, और मदभरी उपमाएं थी, और मन को मोह लेने वाले अलंकार थे।

मगर उनमें सर्वश्रेष्ठ कौन है, नौजवान मंत्री इसका फैसला न कर सका। उसने एक दिन सोचा, दो दिन सोचा, तीन दिन सोचा, चौथे दिन उसने फूल की पंखुरियो के कागज पर सुनहरे रंग से एक हजार एक कवियों के नाम लिखे, और यह सुनाम—सूची महाराज की सेवा में उपस्थित कर दी।

महाराज को हैरानी हुई। बोले— क्या यह सब कवि हैं?ष्

मंत्री ने विनय से सिर झुकाया, और धीरे से जवाब दिया— मैंने उनकी कृतियाँ सुनी हैं, और इसके बाद यह नामावली तैयार की है। मगर हमें एक कवि की जरूरत है, और यह एक हजार एक हैं। मैं चुनाव नहीं कर सका।

महाराजा ने एक घन्टा विचार किया, दो घंटे विचार किया, तीन घंटे विचार किया, चौथे घंटे आज्ञा दी— ष्इन सबको कैद कर दो, इनसे कोल्हू चलवाओ, और हुक्म दे दो, कि अब से जो आदमी कविता करेगा, उसे हमारे शहर का सबसे बलवान आदमी कोडे मार—मारकर जान से मार डालेगा।ष्

मंत्री ने आज्ञा का पालन किया——अब वहां एक भी कवि न था, न कोई काव्य की चर्चा करता था। लोग उन अभागो के संकट की कहानियां, सुनते थे, और उनके हाल पर अफसोस करते थे।

2

छह महीने बाद महाराज एक हजार एक कवियों के क़ैदख़ाने में गए, और उन सबकी तलाशी की आज्ञा दी और एक हजार एक कवियों में से एक सौ एक ऐसे निकले, जिन्होंने बंदी गृह की कड़ी यातनाओं के बीच में रहते हुए भी—रात के समय, जाग—जागकर, पहरेदारों से छुपा—छुपाकर कविता की थी, और यह न सोचा था, कि अगर महाराज को उनके इस अपराध (?) का पता लग गया, तो उनका क्रोध जाग उठेगा, और इस राज्य का सबसे बलवान आदमी उन्हें कोड़े मार—मारकर जान से मार डालेगा।

महाराजने अपने मंत्रीसे कहा — ष्तुमने देखा! यह नौ सो आदमी, कवि न थे, नाम के भूखे थे। इनको छह—छह महीने की तन्ख़ाह देकर विदा कर दो। और यह एक सौ एक आदमी किसी हद तक कवि हैं। इनको रहने के लिए हमारा मोर—महल दे दो। और देखो, इन्हें किसी तरह की तकलीफ न हो।ष्

मंत्री ने ऐसा ही किया। अब यह कवि अच्छे कपड़े पहनते थे, अच्छे भोजन खाते थे, और रात दिन रासंरग में लीन रहते थे। लोग उनके ऐश—आराम की कहानियां सुनते थे, और अपने दुर्भाग्य पर ठंढी आहें भरते थे । छह महीने बाद महाराज अपने मंत्री को साथ लेकर एक बार फिर एक सौ एक कवियों के मोर—महल में गए, और उन सबको अपने सामने बुलाकर बोले— ष्तुमने बेपरवाई के छह महीनों में क्या कुछ कहा है? हम सुनना चाहते हैं।ष्

एक सौ एक आराम दासों में से सिर्फ एक ऐसा था, जिसने मोर—महल की इन्द्र सभाओं में कोई भाग न लिया था और अपने मन के उद्‌गारों को शब्दों में बांधता रहा था। दूसरे शराब पीते थे, और झूमते थे।

वह एकान्त में बैठकर आप ही अपनी कविताएं पढता था, आप ही खुश होता था । जैसे जंगल में मोर आप ही नाचता है, आप ही देखकर खुश होता है।

चांद और सूरज के प्यारे महाराज ने अपने नौजवान मंत्री से कहा— ष्यह एक सौ आदमी भी कवि न थे, आराम के भूखे थे। जब यह क़ैद थे, इनकी आंखें अपनी दुर्दशा पर रोती थीं, और चूंकि उस वक्त इनका जीवन, जीवन की बहारों से ख़ाली था इसलिए उन दिनों इन्हें अपना जीवन प्यारा न था। उस समय इन्होंने कविता की, और उसमें अपने भाग्य केअंधेरे और अंधेरे के भाग्य का रोना रोया। मगर जब वे दिन बीत गए, और जब वे काली घडिरयाँ गुजर गई, तो इन्हें काव्य और कल्पनाकी कला भी भूल गई। यह दुःख के दिनों के कवि हैं, सुख के समय के कलाकार नहीं। इनको धक्के देकर महल से निकाल दो।ष्

इसके बाद महाराजने उस साधु स्वभाव, बेपरवा आदमी की तरफ इशारा करके कहा—ष्यह सच्चा कवि है, जिसके लिए दुःख और सुख दोनों एक बराबर हैं। यह दुःख की रात में भी कविता करता है, यह सुख के प्रभात में भी कविता करता है। यह मौत के काले रास्ते पर भी कविता करता है, यह जीवनकी सुन्दर घाटियों में भी कविता करता है। यह इसका स्वभाव है। यह इसका जीवन है। यह इसके बिना रह नहीं सकता। यह सच्चा कवि है। यह एक हजार एक कंकरों में हीरा है। हमने इसे आज से अपना दरबारी कवि नियत किया। हम इसे मुंह मांगी तनख़्‌वाह देंगे। इसका काम केवल इतना है, कि हमें हर रोज दरबार में आकर एक दोहा सुना जाया करे।

कविने दरबार में जाकर महाराज को एक दिन दोहा सुनाया, दूसरे दिन दोहा सुनाया, तीसरे दिन दोहा सुनाया, चौथे दिन लिख भेजा, मुझसे इस तरहकी कविता नहीं हो सकती। मैं उद्‌गारों का कवि हूं, किसी की मरजी का गुलाम नहीं।

नौजवान मंत्रीने कहा—ष्यह आदमी कितना अभागा है।ष्

मगर महाराज ने कहा—ष्नहीं यह अभागा नहीं, यह कवि है अगर आज तेरा पिता, मेरा पहला मंत्री जीता होता, तो साहित्य मंदिर के इस पुजारी के पांव पकड़ लेता। यह आजाद है, यह आजादी की कविता करता है। जो गुलाम होगा, वह गुलामी की कविता करेगा। यह आदमी दरबार में आए, या न आए इसकी तनख़ाह हमेशा इसके घर पहुँचती रहे। ऐसे उच्च कोटि के कलाकार का भूख़ा रहना मेरे राज्य का सबसे बड़ा अपमान है।ष्

नौजवान मंत्री की आँखें खुल गई।

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