Pahal to karni hogi - 2 books and stories free download online pdf in Hindi

पहल तो करनी होगी - 2

पहल तो करनी होगी

(दूसरा भाग)

कविता नन्दन

सेमिनार हाल में पहुंच कर रोशनी को अजीब सी बेचैनी का अहसास होने लगा. वह प्रोफेसर असीम को ढूढती हुई जाकर उनके बगल में बैठ गई. उन्होने पूछा ए.सी. ऑन है और तुमको पसीना क्यों आ रहा है? उसने बताया कि उसे फिर से देखने के लिए लड़के वाले आ रहे हैं. वह हॅंसते हुए बोले ‘तो इसमें हर्ज क्या है ? भाई तुम देखने की चीज हो सो देखने वाले तो देखेंगे ही. ’रोशनी ने पूछा ‘तो क्या मैं शादी कर लूं ?’ उन्होंने कहा जैसा चाहो. तुम अपने बारे में सोचने के लिए आजाद हो.’ रोशनी ने फिर पूछा ‘मेरे मण्डप की आग से कहीं आपकी चिता जल उठी तब?’ वह गंभीर हो गए. उसने जानना चाहा. बहुत संजीदगी से उन्होने कहा ‘तब तुम बीस की थी अब तीस की हो. तब तुम ग्रेजुएट थी आज प्रोफेसर हो. तब तुम्हें मेरी मदद की जरूरत थी आज तुम अपने लिए सक्षम हो. मंच पर वार्ष्णेय मैडम दहाड़ रही थीं कि महिलाओं के प्रति जो अपराध बढ़े हैं उसका कारण नीच जातियों के युवाओं का शिक्षित होना है. वह शिक्षित होकर ऊंची जातियों की लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फांस लेते हैं. मंच से रोशनी को अपनी स्पीच देने के लिए पुकारा गया. उसकी स्पीच सुनकर सभी लोग हैरान थे. क्योंकि आपराधिक घटनाओं के लिए मंच पर आए अब तक के सभी बुद्धिजीवियों ने सरकार, प्रशासन, पुलिस व्यवस्था और असामाजिक तत्वों को जिम्मेदार ठहराया था लेकिन रोशनी तो खुद वहां बैठे हर एक को जिम्मेदार मान रही थी. उसकी आवाज में उसके लेक्चर जैसी लोच नहीं थी बल्कि हमले की गुर्राहट थी. सभी उसे बड़े ध्यान से सुन रहे थे. वह कह रही थी .....यह समाज हमारा है और इसे देखकर हमें इतनी हैरानी क्यों हो रही है. हम इसे जैसा बना रहे थे यह वैसा ही तो बन रहा है. इन अपराध करने वालों से इतनी नफरत क्यों हो रही है ? इन्हें ट्रेंड करने का काम तो हमने ही किया है. यह पाकिस्तान, बंग्लादेश, चीन, कोरिया, अफगानिस्तान से नहीं हमारे आपके घरों में से निकल कर आए हैं. हमारे ही बाप, ताऊ, चाचा, मामा, मौसा, फूफा, जीजा, भाई, बेटे और भतीजे, भांजे हैं. इन्हें हमने जैसा तैयार किया था वैसे ही तो हुए हैं. अगर ये हमारे हैं और ये असामाजिक हैं तो हमें अपने को सामाजिक कहने का क्या अधिकार है..? बुद्ध ने संत बनाना चाहा तो अंगुलिमाल संत बन गया. कलिंग में लाशों का अंबार लगाने वाला हत्यारा अशोक अहिंसा का प्रचारक बन गया. गांधी ने देशप्रेमी बनाना चाहा तो भगतसिंह और चंद्रशेखर पैदा हो गए. आप पूछते हैं दिन-ब-दिन बलात्कार की घटनाओं में इजाफा क्यों हो रहा है ? क्या आपको नहीं पता कि हर एक के हाथ में आपने मोबाइल दे रखा है. जिसे अपनी किताब के कवर का चित्र याद नहीं सपने में वह पोर्न मूवी देख रहा है. आजकल कण्डोम परिवार नियोजन के लिए कितना इस्तेमाल किया जाता है ? जितना भी किया जाता हो उससे हजारों गुना ज्यादा व्यभिचार के लिए इस्तेमाल होता है. जिस चीज को हस्पताल में डाक्टर की देख-रेख में पेसेण्ट को मिलना चाहिए उसे आप पान की दुकान पर बेच रहे हैं. ....अगर आप सचमुच गंभीर हैं तो अपने घर से शुरुआत कीजिए,

सेमिनार हाल में मीडिया वालों का हुजूम डा. त्रिपाठी और रोशनी से इंटरव्यू करना चाहता था. चूंकि आयोजक मण्डल की अध्यक्षा प्रोफेसर मधूलिका वार्ष्णेय थीं, इसलिए वह सभी इनसे ही सिफारिश कर रहे थे. डा. त्रिपाठी को लेकर वार्ष्णेय मैडम के पास कोई इशु नहीं था. इसीलिए उन्होने डा. त्रिपाठी को रोककर इंटरव्यू के लिए राजी कर लिया था. लेकिन ऐसा कैसे हो सकता था कि वार्ष्णेय मैडम हों और रोशनी को तवज्जो दी जाए. उन्होने मीडिया से कहा ‘मैं आप को ऐसी एक्सक्लूसिव खबर दूंगी कि आपके चैनल सप्ताह भर और कोई खबर नहीं होगी. सेमिनार हाल से बाहर निकलते समय ही उसने प्रोफेसर असीम से रिक्वेस्ट किया था कि वह आज घर चलें. रोशनी के मां-बाप उसकी शादी को लेकर परेशान थे. घर पर सभी रिश्तेदार इकठ्ठा भी हुए थे क्योंकि इस बार रिश्ता रिश्तेदारी से ही आया था सो सभी लोग चाह रहे थे कि अफवाहों का बाजार जो गर्म है, अगर उसमें किसी तरह की कोई सच्चाई नहीं है तो तुरंत शादी करके इस झमेले का निपटारा कर दिया जाए. बात लोकल मीडिया में भी उछल रही थी, जिसके पीछे वार्ष्णेय मैडम की बहुत बड़ी मेहनत थी. मां भी जानती थी कि उनकी बेटी को बदनाम करने के लिए वार्ष्णेय मैडम ने क्या नहीं किया है और जब से मैडम की बेटी ने दूसरी बिरादरी में जाकर वार्ष्णेय कर ली तब से तो उन्होने नाक में दम कर रखा था. उन्हें लगता है कि उनकी बेटी ने इन छोटी बिरादरी के लोगों से प्रभावित होकर ऐसा कदम उठाया है. खैर जैसे-तैसे करके उन्होंने दहेज के लिए पंद्रह लाख रुपये देने की बात भी मान ली है. लड़के की शहर में ही मिठाई की दुकान है, वे लोग चाहते हैं कि शादी के बाद रोशनी प्रोफेसरशिप छोड़ दे. यह सब जान लेने के बाद प्रोफेसर असीम ने पूछा क्या तुम इस शादी के लिए तैयार हो ? रोशनी ने कहा बिल्कुल नहीं. पिताजी भी मेरी ओर हैं लेकिन रिश्तेदारों के दबाव से वह कुछ बोल नहीं पा रहे हैं.’ प्रोफेसर असीम ने कहा ‘चलो चलते हैं. वैसे यह शादी तुम नहीं करोगी. बहुत सारे अच्छे लोग हैं जो तुम्हारे काबिल कहे जा सकते हैं, उन्हें छोड़कर इस मिठाई वाले को .... नहीं बिल्कुल नहीं.’ रोशनी ने कहा ‘एकाध नाम मुझे भी बता देते कि मेरे काबिल कौन है तो मैं मां और पापा को बता देती.’ प्रोफेसर अभी सोच ही रहे थे कि रोशनी ने कहा ‘सर ! इतनी मेहनत मत कीजिए. मुझे तो लगता है कि आप मेरी शादी रुकवाने के लिए ही आए हैं. मैंने तो सोचा था कि मिठाई की दुकान पर कम-से-कम मिठाई खाने को मिलेगी.’ रोशनी मुस्कुरा रही थी. प्रोफेसर किसी काबिल स्टूडेंट को अपने ख्यालों में ढूंढ रहे थे, जो सचमुच रोशनी के काबिल हो. रोशनी ने पूछा ‘कोई याद आया ?’ उन्होंने कहा ‘अभी तो नहीं.’ वार्ष्णेय मैडम ने जो आग लगाई कि डा. त्रिपाठी उन पर बरस पड़े थे ‘मधूलिका ! तुम्हें जरा भी शर्म है.... मैं उन दोनों को तुमसे ज्यादा जानता हूं...’ लेकिन मीडिया वालों को तो खबर चाहिए, चाहे उससे किसी की इज्जत तार-तार ही क्यों न होती हो. रोशनी पीएच.डी वाले जमाने से ही प्रोफेसर असीम की कार से ही आती-जाती थी. वह उनकी कार में बैठ ही रही थी कि मीडिया वालों ने पूछा ‘मैडम! आप शादी कर रही हैं?’ उसने जवाब दिया ‘हां! लेकिन इसमें इतने हैरान होने की कौन सी बात है? सभी करते हैं मैं भी कर रही हूं.’ पत्रकारों ने फिर पूछा ‘क्या आपके घर वाले राजी हैं?’ उसने कहा ‘श्योर. मेरे तो घर पर आज सभी रिश्तेदार भी आए हैं. लेकिन मैं अपनी शादी को सिर्फ दोस्त-रिश्तेदारों के साथ ही शेयर करना चाहती हूं. प्लीज लीव मी.’ उसने कार का दरवाजा बंद कर लिया. प्रोफेसर असीम ने देखा कि वार्ष्णेय मैडम उन दोनों को देखते हुए मीडिया वालों को इशारों में कुछ समझा रही है. उन्हें लग रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है क्योंकि वार्ष्णेय उन दोनों को साथ देखकर पहली बार मुस्कुरा रही थी और डा. त्रिपाठी मीडिया वालों से हाथापाई करने पर आमादा हो रहे थे. वह त्रिपाठी जी के करीब अभी कार रोकने वाले ही थे कि रोशनी के पिता का फोन आया. वह फोन पर पूछ रहे थे कि टी.वी. वाले क्या बोल रहे हैं ? उसने भी हैरानी से पूछा ‘पापा ! क्या बात है? आप कुछ परेशान हैं!’ उन्होंने कहा ‘बेटा! वार्ष्णेय मैडम पत्रकारों को बता रही हैं कि तुम और प्रोफसर असीम शादी करने जा रहे हो. तुम दोनों का अफेयर पिछले दस साल से चल रहा था. प्रोफसर ने इसीलिए तुम्हारा एप्वाइंटमेंट करवाया है. कह रही हैं कि यह बात हम सभी को पहले से मालूम थी, इसीलिए बार-बार लड़के वालों को रिजेक्ट कर रहे थे..... बेटा मीडिया वाले चहारदीवारी फांद कर अंदर आ रहे हैं... मैं फोन रखता हू’ फोन कट गया था और रोशनी होठों को भींचे हुए प्रोफेसर असीम को देख रही थी जो इस वक्त प्रोफेसर त्रिपाठी को सम्हालते हुए खुद पत्रकारों से हाथापाई कर रहे थे. वार्ष्णेय मैडम इतनी बड़ी साजिश को अंजाम दे सकती हैं, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. जो कुछ घट रहा था उसकी रफ्तार इतनी तेज थी कि इस वक्त पूरा देश जान चुका था कि वे दोनों शादी कर रहे हैं. उसे मां की बात का ख्याल आया कि बदनामियों को उसके घर का पता ढूंढने में मुश्किल नही होती. फोन की टोन बज रही थी ‘अगर तुम मिल जाओ, जमाना छोड़ देंगे हम.’ यह ट्यून तो उसने अनदेखे अपने होने वाले साथी के लिए यूं ही लगा रखा था. उसने फोन रिसीव किया ‘बधाई हो मैम. आपको सर से अच्छा जीवनसाथी दूसरा मिल ही नहीं सकता था.....’ वह ‘हूं’ करने के सिवा कुछ बोल न सकी. उसका सिर जैसे फट रहा था. वह कार से उतर कर प्रोफेसर के करीब पहुंची और उन्हें खींचकर कार की ओर ले गई. उसने कहा ‘घर चलिए.’ प्रोफेसर उसे बताना चाह रहे थे कि उन लोगों ने कितनी खतरनाक अफवाह उड़ाई है. बोले ‘तुम नहीं जानती! इन लोगों ने क्या किया है ?’ उसने कहा मैं सब जान चुकी हूं.’ उन्होंने कहा ‘रोशनी! सब बकवास कर रहे हैं.’ उसने कहा ‘मुझे पता है. सोचना यह है कि अब क्या किया जाए... घर पर मीडिया वाले पहुंच चुके हैं. पापाजी भी परेशान है. मां तो सोच रही होगी कि मैं मर क्यों नहीं गई....’

पत्रकार दूसरी कोई बात सुनने को तैयार नहीं थे. रोशनी ने मां और पापा को सच्चाई बताया. उन्हें उस पर विश्वास था, लेकिन जो कुछ हो रहा था उससे रिश्तेदारों को लग रहा था कि टी.वी. वाले जो कुछ कह रहे हैं उसमें कुछ-न-कुछ सच्चाई जरूर होगी. उनकी इस भाव-भंगिमा से पत्रकारों को बल मिल रहा था. वह अपनी बातों का दावे के साथ दोहरा रहे थे. मां चिढ़ कर बोल रही थी ‘हां-हां-हां! मुझे सब मालूम था कि मेरी बेटी प्रोफेसर से प्यार करती है और प्रोफेसर भी उससे प्यार करते हैं. वह दोनों प्यार करते हैं और शादी करने जा रहे हैं तो क्या बुराई है ?’ मीडिया में मां की इस विक्षिप्तता से जन्मे संवाद को भी लाइव टेलीकास्ट किया जा रहा था. पिता जी प्रोफेसर साहब से बात कर रहे थे कि इनकी वजह से उनके सम्मान को ठेस पहुंची है. प्रोफेसर इस आकस्मिक घटी घटना से उतने परेशान नहीं थे जितना यह सोचकर कि रोशनी के मां-बाप उनके बारे में क्या सोच रहे होंगे. रोशनी ने पिता से पूछा ‘पापा! आप मुझसे कुछ कहना चाह रहे हैं ?’ उन्होने कहा ‘नहीं बेटा! मैं यह सोच रहा हूं कि अब तुम्हारा क्या होगा ?’ उसने कहा ‘मेरी फिक्र मत करिए.’ वह पत्रकारों को सही बात समझाना चाह रही थी लेकिन वह सुनने को तैयार नहीं थे. रोशनी ने कहा ‘आप लोग अगर मेरी बात सुनने में इंटरेस्टेड नहीं हैं तो मेरे घर से बाहर निकलिए.’ पत्रकार ने कहा ‘मैडम बस एक सवाल का जवाब दे दीजिए हम चले जाएंगे. प्रोफेसर साहब जाति में आपसे छोटे हैं आप जानते हुए भी उनसे शादी कर रही हैं, क्या आपको अपनी जाति-बिरादरी में अपने काबिल कोई नहीं मिला?’ इस बेहूदे सवाल पर वह तिलमिला गई. पिताजी और प्रोफेसर साहब ने रिश्तेदारों की मदद से किसी तरह पत्रकारों को गेट से बाहर किया तो उन सभी ने वार्ष्णेय मैडम के यहां डेरा डाल दिया. पूरा परिवार रात-भर जागता रहा. रिश्तेदार आपस में कानाफूसी करते रहे. सुबह होते ही बिना बात किये जब जाने लगे तो पिता ने कहा ऐसे नाराज होने की जरूरत नहीं है. रोशनी के फूफा ने कहा ‘कुजात को दामाद बना रहे हो और कहते हो नाराज होने की जरूरत नहीं.’ वह उन्हें समझाने का असफल प्रयास करते रहे कि यह प्रोफेसर वार्ष्णेय की फैलाई हुई अफवाह के सिवा कुछ और नहीं है, लेकिन कोई इस सच को मानने को तैयार नहीं था. सभी को विदा करने के बाद घर खाली हो गया था. मां ने चाय बनाई और डाइनिंग टेबल पर रख दिया. पिता ने मां से पूछा ‘क्या सोच रही हो? मां झुंझलाई हुई बोली ‘अजी सोचना क्या है ? यही सोच रही हूं कि तुम्हारी बेटी की रोशनी से टी.वी. भी चमक गया पर हमारी जिंदगी में अंधेरा हो गया.’ पिता ने एतराज करते हुए कहा ‘ऐसा क्यों कहती हो ?’ मां बोली ‘बताओ उससे कौन शादी करेगा ?’ पिता ने कहा रोशनी तुम्हें कुछ कहना है ?’ रोशनी बोली ‘हाँ! प्रोफसर साहब से ही मैं शादी करूंगी.’ मां ने कहा ‘सुन लो! इतना सब कुछ हो गया, अभी जाने क्या बाकी है जो दिखाना चाहती है. पिता भी रोशनी के इस जवाब के लिए तैयार नहीं थे लेकिन उन्हें लगा कि वह कुछ-न-कुछ सोच-समझ कर ही बोल रही होगी. बोले ‘बेटा! प्रोफेसर साहब बहुत अच्छे इंसान हैं अगर मैं ढूंढता तो शायद इतना भला इंसान नहीं ढूंढ पाता. लेकिन उनकी उम्र तुमसे ज्यादा है.’ रोशनी बोली ‘आप मम्मी से दस साल बड़े हैं लेकिन आप दोनो एक-दूसरे के साथ खुश हैं न! वह मुझसे कुछ और ज्यादा बड़े है लेकिन मुझे समझ सकते हैं. मैं यूनिवर्सिटी जा रही हूं. शाम को बात करेंगे’ और वह चली गई.

सुबह-सुबह आकर प्रोफेसर, वार्ष्णेय मैडम के घर पर धरना दिए हुए थे. मैडम ने जैसे ही उन्हें देखा पीछे के रास्ते से निकल कर गायब हो गईं. रोशनी को विभाग में त्रिपाठी जी को छोड़कर सभी ने बधाई दी और उसने भी मुस्कुराते हुए सहजता से स्वीकार किया. त्रिपाठी जी हैरान होकर रोशनी से उसके चैंबर में मिले. रोशनी मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं... तुम क्या सोच रही हो? अभी मीडिया वाले आएंगे’ त्रिपाठी जी ने कहा. रोशनी ने कहा ‘सर! पूरे देश में मेरी शादी का प्रचार हो गया है. अब आप एक काम कीजिए कि प्रोफेसर असीम को शादी के लिए मनाइये. बाकी इन सभी को मैं हैंडिल कर लूंगी.’ रामधनी ने भी बधाई देते हुए कहा ‘वो टी.वी. वाले आ गए है.

पूरी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सेमिनार हाल में थे. स्टूडेंट भी मौजूद थे. मीडिया वाले आगे की दोनो रो में बैठे थे. यह सभी लोग जान रहे थे कि मीडिया को बुलाने का काम मधूलिका वार्ष्णेय का है. मीडिया प्रभारी ने बताया कि ये लोग रोशनी मैडम से इंटरव्यू लेने आए हैं. रोशनी इस जंग के लिए पूरी तरह तैयार थी. मंच पर मीडियाकर्मी और रोशनी आमने-सामने बैठे हुए थे. सीनियर पत्रकार जो कि अपने चैनल का चीफ एडिटर था बोला ‘आप हमेशा से एक विवादित महिला प्रोफेसर रही हैं. ऐसा क्यों है?’ रोशनी ने जवाब दिया ‘जब भी कोई नया विचार समाज या फिर दुनिया के सामने आता है तो उससे तुरंत सहमति जताना सहज नहीं होता. जांच-परख के बाद जब वही विचार वैज्ञानिक दृष्टि से प्रामाणिक सिद्ध हो जाता है, सारा जमाना उसे स्वीकार करने लगता है. वही स्वीकार नहीं करते जो रुढ़िवादी होते हैं.’ पत्रकार ने दूसरा प्रश्न किया ‘आप दोनों की उम्र में बड़ा अंतर है. क्या इसके बारे में आपने नहीं सोचा? उसने जवाब दिया ‘वैदिक काल में जवान, अधेड़ और बजुर्ग हो चुके पुरूष जिनका समाज में सम्मानित स्थान होता था, कन्याओं से विवाह करते थे तो क्या वह उस अंतर को नही देखते थे. और मैं तो तीस साल की मैच्योर महिला हूं और प्रोफेसर स्वस्थ्य और समझदार व्यक्ति हैं, फिर क्या दिक्कत है.’ सवालो का तांता लगा रहा और रोशनी उसी संजीदगी से उन्हें अपने जवाब से लाजवाब करती रही. एडिटर ने कहा ‘‘एक अंतिम सवाल जो आप जैसे बुद्धिजीवियों से नहीं करना चाहिए फिर भी इस देश की जनता जो अभी पिछडे़पन की शिकार है जानना चाहेगी कि आखिर वह क्या वजह थी जो आपने एक गैरबिरादरी... अगर इसे जरा खुलकर कहें तो अपने से छोटी जाति में जाकर आपने अपना जीवन साथी चुना?’ उसने जवाब दिया ‘हम बुद्धिजीवी है. हमारी दृष्टि वैज्ञानिक है. हमें एक ऐसा रोल माडल तैयार करना चाहिए जो हमारे समाज के विकास में सहायक हो. सामान्य रूप से अपनी जाति से बड़ी जाति में अंतरण की चाह होती. वह गलत है. अगर हम इस बात में यकीन रखते है कि मनुष्य-मनुष्य में भेद करना प्राकृतिक रूप से गलत है. धर्म और जातियों का भेद यदि मानव निर्मित है तो एक मनुष्य का संबंध दूसरे से हो जाए तो इससे क्या क्षति होगी ? हां एक क्षति होगी वह यह कि रुढ़ियां भरभरा कर अपना अस्तित्व खो देंगी और ऐसी परंपराओं का अंत हो जाएगा जो एक-समान व्यक्तियों को एक-दूसरे से अलग करती है. इस व्यस्था के केंद्र में स्त्री का ही दोहन होता है. कमाल की बात नहीं लगती कि स्त्री की स्वयं की कोई जाति ही नहीं है. पिता के घर में है तो तो पिता की जाति, पति के घर में है तो पति की जाति. यह कैसा अन्याय. मर्द को जन्म औरत दे और उसकी जाति अनिश्चित और पुरूष की जाति समाज सम्मत. यह कैसा विज्ञान है. यह पाखण्ड इसीलिए कि औरत गुलामी की जंजीर अंतिम क्षण तक न तोड सके़. मैंने तोड़ने की कोशिश की है. कम-से-कम एक औरत को इस झूठी परंपरा से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया है. जिन्हे सही लगे मेरे साथ हों वर्ना यह अंधियारा अभी एक-दो सदी को और निगलेगा. औरत की मुक्ति का आंदोलन चलाना, भाषण देना आसान है लेकीन जमीनी स्तर पर उसके लिए उचित प्रयास करना बहुत मुश्किल. मर्दों ने तो सिर्फ बातें ही बनाई है. खुद लड़े बिना औरतों को अपनी आजादी नहीं मिलनी है. किसी-न-किसी को तो पहल करनी होगी. मैने पहल की है. पढ़ी-लिखी लड़कियां बिरादरी के नाम पर दहेज भी देती हैं और उम्र भर एक ऐसे मर्द की शर्तों पर जीती हैं जो सेक्स के लिए उन्हें भोगने की चीज समझता है और घर के काम-काज के लिए उम्र भर मुफ्त की गूंगी गुलाम बनाए रखता है. नौकरानी को वह कुछ पे भी करता है. इसे तो हर चीज के लिए अपने पर ही निर्भर रखना चाहता है ताकि वह गुलामी करती रहे. मैंने उसी गुलामी की जंजीर से आजाद होने की पहल की है. हम बुद्धिजीवी हैं इसलिए पहल हमें ही करनी होगी. चीफ एडिटर मुस्कुरा रहा था. वह बुजुर्ग हो चला था. लेकिन यह जवान ख्याल उसे अपनी आने वाली पीढ़ियों को रोशनी दिखाने वाला लगा. उसने रोशनी से हाथ मिलाते हुए नई जिंदगी के लिए शुभकामनाए भेंट की. यह प्रोग्राम लाइव दिखाया जा रहा था. रोशनी के मां-बाप भी देख रहे. मां ने पिता से कहा ‘अजी! रोशनी हमारी बेटी है. आपको उस पर गर्व नहीं होता? पिता ने कहा ‘मुझे ख़ुशी होती है कि तुम उसकी मां हो.’ दोनो ने एक-दूसरे को बाहों में भर लिया. उनकी आखों के आंसू पोंछने वाला अभी यहां कोई नहीं था. फिर भी उन्होंने सुकून की सांस ली. प्रोफेसर असीम तो रोशनी की अक्ल के जमाने से कायल थे. सेमिनार हाल के मुख्य दरवाजे पर स्टूडेंट के बीच खड़े सभी को देख रहे थे.

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